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  • 440 टन प्याज लेकर अगरतला पहुंचेगी पहली कांदा एक्सप्रेस, त्योहारों से पहले पूर्वोत्तर में आपूर्ति बढ़ाने की तैयारी

    440 टन प्याज लेकर अगरतला पहुंचेगी पहली कांदा एक्सप्रेस, त्योहारों से पहले पूर्वोत्तर में आपूर्ति बढ़ाने की तैयारी

    नई दिल्ली ।त्योहारी सीजन से पहले पूर्वोत्तर भारत में प्याज की उपलब्धता बढ़ाने और उपभोक्ताओं को किफायती दरों पर इसकी आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए सरकार ने वितरण व्यवस्था का विस्तार किया है। इसी प्रयास के तहत लगभग 440 मीट्रिक टन प्याज लेकर पहली कांदा एक्सप्रेस के 18 अक्टूबर तक त्रिपुरा की राजधानी अगरतला पहुंचने की उम्मीद है। इस पहल का उद्देश्य क्षेत्र के प्रमुख बाजारों में प्याज की उपलब्धता मजबूत करना और त्योहारों के दौरान मांग को पूरा करने में मदद करना है।

    सरकार मूल्य स्थिरीकरण कोष के तहत उपलब्ध प्याज के बफर स्टॉक को पूर्वोत्तर के विभिन्न क्षेत्रों तक पहुंचा रही है। इसके लिए रेल और सड़क दोनों माध्यमों का इस्तेमाल किया जा रहा है।
    त्योहारी सीजन में प्याज की मांग बढ़ने की संभावना को देखते हुए आपूर्ति का दायरा बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है, ताकि उपभोक्ताओं को बाजार में पर्याप्त मात्रा में प्याज उपलब्ध हो सके।

    पहली कांदा एक्सप्रेस के अगरतला पहुंचने से त्रिपुरा में प्याज की आपूर्ति को अतिरिक्त सहारा मिलने की उम्मीद है। इस पहल के तहत राज्य के आठ में से सात जिलों में बाजारों तक प्याज पहुंचाने की योजना है। इनमें धलाई, दक्षिण त्रिपुरा, खोवाई, उनाकोटी, पश्चिम त्रिपुरा, गोमती और सिपाहीजाला शामिल हैं। इन जिलों में आपूर्ति बढ़ने से स्थानीय बाजारों में प्याज की उपलब्धता बेहतर बनाने में मदद मिल सकती है।

    पूर्वोत्तर क्षेत्र में बफर स्टॉक से प्याज पहुंचाने के लिए इससे पहले भी रेल और सड़क मार्ग का उपयोग किया गया है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, 840 मीट्रिक टन और 452 मीट्रिक टन प्याज लेकर दो कांदा एक्सप्रेस रेल रैक भेजे जा चुके हैं। इसके अलावा 44 ट्रकों के जरिए कुल 1,513.46 मीट्रिक टन बफर प्याज क्षेत्र में पहुंचाया गया है।

    इस आपूर्ति व्यवस्था के जरिए असम, त्रिपुरा और नागालैंड के प्रमुख उपभोक्ता केंद्रों तक प्याज पहुंचाया गया है। इनमें असम के कामरूप और गुवाहाटी के साथ त्रिपुरा के गोमती और सिपाहीजाला तथा नागालैंड के दीमापुर, कोहिमा, निउलैंड और चुमौकेदिमा जैसे क्षेत्र शामिल हैं। विभिन्न परिवहन माध्यमों से वितरण बढ़ाने का उद्देश्य प्रमुख बाजारों तक प्याज की नियमित उपलब्धता सुनिश्चित करना है।

    असम में पिछले कुछ सप्ताह के दौरान खुदरा प्याज की कीमतों में भी गिरावट दर्ज की गई है। राज्य के लगभग 12 केंद्रों पर खुदरा कीमतें एक रुपये से आठ रुपये प्रति किलोग्राम तक कम हुई हैं। इसके साथ ही असम और देश के औसत खुदरा मूल्य के बीच का अंतर भी पिछले दो वर्षों की तुलना में काफी घटा है।

    दो वर्ष पहले असम में प्याज का औसत खुदरा मूल्य 61.96 रुपये प्रति किलोग्राम था, जबकि अखिल भारतीय औसत कीमत 54.13 रुपये प्रति किलोग्राम दर्ज की गई थी। उस समय दोनों के बीच 7.83 रुपये प्रति किलोग्राम का अंतर था। मौजूदा आंकड़ों के अनुसार, असम में औसत खुदरा कीमत 54.30 रुपये प्रति किलोग्राम है, जबकि देश का औसत 53.07 रुपये प्रति किलोग्राम है। इस तरह कीमतों का अंतर घटकर 1.23 रुपये प्रति किलोग्राम रह गया है।

    देश की प्रमुख मंडियों में भी प्याज की कीमतों में नरमी देखने को मिली है। खरीफ फसल की नई आवक बढ़ने के साथ अखिल भारतीय औसत मंडी मूल्य सितंबर में लगभग 3,600 रुपये प्रति क्विंटल से घटकर अक्टूबर में करीब 3,300 रुपये प्रति क्विंटल रह गया है।

    सरकार की इस व्यवस्था में बफर स्टॉक से प्याज का वितरण बढ़ाने के साथ परिवहन के विभिन्न साधनों का इस्तेमाल किया जा रहा है। त्योहारों से पहले अगरतला और पूर्वोत्तर के अन्य बाजारों में अतिरिक्त आपूर्ति पहुंचने से प्याज की उपलब्धता मजबूत करने में मदद मिलने की उम्मीद है।

  • सरकारी बिक्री में 35 रुपये किलो प्याज, खुले बाजार में 60 से 70 रुपये तक पहुंची कीमत..

    सरकारी बिक्री में 35 रुपये किलो प्याज, खुले बाजार में 60 से 70 रुपये तक पहुंची कीमत..

    नई दिल्ली । प्याज की बढ़ती कीमतों ने एक बार फिर घरेलू बजट पर दबाव बढ़ा दिया है। देश के कई खुदरा बाजारों में प्याज 60 से 70 रुपये प्रति किलो तक बिक रही है। दूसरी ओर सरकारी बफर स्टॉक से प्याज 35 रुपये प्रति किलो की दर पर उपलब्ध कराने की कोशिश की जा रही है। दोनों कीमतों के बीच बड़ा अंतर होने के बावजूद सरकारी प्याज हर बाजार और हर उपभोक्ता तक पर्याप्त मात्रा में नहीं पहुंच पा रही है।

    16 सितंबर को देशभर में प्याज का औसत खुदरा भाव 53.84 रुपये प्रति किलो दर्ज किया गया। एक साल पहले इसी दिन औसत खुदरा कीमत 27.71 रुपये प्रति किलो थी। इस तरह एक साल के दौरान औसत खुदरा भाव में करीब 94 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। थोक बाजार में भी कीमतों पर दबाव बना हुआ है। 16 सितंबर को प्याज का औसत थोक भाव 45.65 रुपये प्रति किलो रहा।

    बढ़ती कीमतों को नियंत्रित करने के लिए सरकार ने 24 अगस्त से बफर स्टॉक से प्याज बाजार में उतारना शुरू किया है। प्राइस स्टेबलाइजेशन फंड के तहत रखे गए इस स्टॉक की बिक्री 35 रुपये प्रति किलो की दर से की जा रही है। इसके लिए नेशनल कोऑपरेटिव कंज्यूमर फेडरेशन, नेशनल एग्रीकल्चरल कोऑपरेटिव मार्केटिंग फेडरेशन, केंद्रीय भंडार और मोबाइल वैन का इस्तेमाल किया जा रहा है।

    हालांकि, सरकारी बिक्री के बावजूद प्याज की उपलब्धता को लेकर चुनौती बनी हुई है। उत्पादक राज्यों से बड़े खपत केंद्रों तक बफर स्टॉक पहुंचाना आसान नहीं है। यही वजह है कि सरकारी बिक्री में प्याज अपेक्षाकृत कम कीमत पर उपलब्ध है, जबकि खुले बाजार में उपभोक्ताओं को काफी अधिक रकम चुकानी पड़ रही है।

    कीमतों पर नियंत्रण के लिए बफर स्टॉक की आपूर्ति को 19 शहरों तक बढ़ाया गया है। उत्पादक क्षेत्रों से बड़े शहरों तक प्याज पहुंचाने के लिए ‘कांदा एक्सप्रेस’, रेलवे रैक और 30 से अधिक ट्रकों का इस्तेमाल किया जा रहा है। सरकारी स्तर पर माना गया है कि कुछ बाजारों में बफर प्याज की बिक्री का असर दिखाई देने लगा है। हालांकि, खुदरा कीमतों में व्यापक राहत के लिए सरकारी स्टॉक की पहुंच और उपलब्धता महत्वपूर्ण बनी हुई है।

    प्याज की कीमतों में मौसमी उतार-चढ़ाव का भी असर पड़ता है। रबी सीजन की प्याज का स्टॉक धीरे-धीरे कम होने के बाद अगली खरीफ फसल की आवक का इंतजार रहता है। रबी और खरीफ फसल के बीच का समय प्याज के लिए अपेक्षाकृत कम आपूर्ति वाला दौर माना जाता है। इसी अवधि में बाजार में बफर स्टॉक से प्याज उतारकर आपूर्ति बढ़ाने की व्यवस्था की जाती है।

    इस बार खरीफ प्याज की बुआई में देरी ने भी चिंता बढ़ाई है। महाराष्ट्र के नासिक में बुआई करीब 15 दिन पीछे चलने की जानकारी सामने आई थी। कर्नाटक के चित्रदुर्गा-चलकेरे क्षेत्र में भी बुआई सामान्य स्तर की करीब 60 प्रतिशत बताई गई थी। इससे नई फसल की मंडियों में आवक प्रभावित होने की आशंका बनी हुई है।

    मौसम की स्थिति और बाजार की गतिविधियों का असर भी कीमतों पर पड़ता है। मॉनसून में देरी और उससे जुड़े हालात को प्याज की स्थिति से जोड़ा गया है। कुछ कारोबारियों की सट्टा खरीदारी का असर बाजार की धारणा पर पड़ने की बात भी सामने आई है। हालांकि, देश में कुल उत्पादन के स्तर पर बड़ी कमी नहीं बताई गई है।

    2025-26 में प्याज का उत्पादन 307.37 लाख टन रहने का अनुमान है, जबकि पिछले साल यह 307.67 लाख टन था। सरकार ने 2026-27 के लिए 2 लाख टन रबी प्याज बफर के रूप में खरीदने का लक्ष्य रखा है। इसमें करीब 1.21 लाख टन की खरीद हो चुकी थी। बफर खरीद का भाव भी बढ़ाकर 2,125 रुपये प्रति क्विंटल किया गया है। इसका उद्देश्य कम आपूर्ति वाले समय में बाजार में प्याज की उपलब्धता बढ़ाकर कीमतों पर नियंत्रण रखना है।

  • प्याज, अदरक और लहसुन ने बिगाड़ा किचन का बजट, जानें अगस्त में क्या हुआ महंगा, महंगाई दर 4.82 फीसदी

    प्याज, अदरक और लहसुन ने बिगाड़ा किचन का बजट, जानें अगस्त में क्या हुआ महंगा, महंगाई दर 4.82 फीसदी


    नई दिल्ली।
    सब्जियों और रोजमर्रा की जरूरी चीजों की कीमतों में बदलाव का असर अब आम लोगों की जेब पर दिखाई देने लगा है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, देश की खुदरा महंगाई दर अगस्त 2026 में बढ़कर 4.82 फीसदी हो गई, जबकि जुलाई में यह 4.45 फीसदी थी। खास तौर पर अदरक, प्याज और लहसुन की कीमतों में तेज बढ़ोतरी ने रसोई का बजट प्रभावित किया है।

    हालांकि, महंगाई बढ़ने के बीच कुछ जरूरी सामान और सब्जियां ऐसी भी रहीं, जिनकी कीमतों में कमी दर्ज की गई। टमाटर और आलू सस्ते हुए, जबकि कुछ अन्य वस्तुओं के दाम भी नीचे आए। आइए जानते हैं अगस्त में किन चीजों की कीमत बढ़ी और किन सामानों ने राहत दी।

    ये चीजें हुईं सबसे ज्यादा महंगी

    अगस्त के दौरान अदरक, प्याज और लहसुन की कीमतों में सबसे ज्यादा बढ़ोतरी देखने को मिली।

    • अदरक: कीमत में 73.82 फीसदी की बढ़ोतरी
    • प्याज: दाम 48.27 फीसदी बढ़े
    • लहसुन: कीमत 43.60 फीसदी बढ़ी
    • सोना, हीरा और प्लेटिनम के आभूषण: 35.53 फीसदी महंगे हुए

    अदरक की कीमतों में हाल के हफ्तों में भी तेजी देखी गई है। कई बाजारों में इसका भाव करीब 300 से 400 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गया है। लहसुन भी करीब 200 से 400 रुपये किलो के स्तर पर बिक रहा है। वहीं कई खुदरा बाजारों में प्याज की कीमत करीब 50 से 65 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गई है।

    इन चीजों ने दी महंगाई में राहत

    महंगाई के बीच कुछ जरूरी सामान और सब्जियों के दाम कम होने से उपभोक्ताओं को थोड़ी राहत भी मिली।

    • टमाटर: 31.09 फीसदी सस्ता हुआ
    • आलू: कीमत में 13.14 फीसदी की कमी
    • मोटर कार और जीप: 6.72 फीसदी सस्ती हुईं
    • भिंडी: दाम 5.41 फीसदी घटे
    • परवल और कुंदरू: कीमतों में 3.60 फीसदी की गिरावट

    जनवरी से अगस्त तक लगातार बढ़ी महंगाई

    साल 2026 में खुदरा महंगाई दर में लगातार बढ़ोतरी का रुझान देखने को मिला है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, महीनेवार खुदरा महंगाई दर इस प्रकार रही:

    महीना खुदरा महंगाई दर
    जनवरी 2.75%
    फरवरी 3.21%
    मार्च 3.40%
    अप्रैल 3.48%
    मई 3.93%
    जून 4.38%
    जुलाई 4.45%
    अगस्त 4.82%

    इन आंकड़ों से साफ है कि जनवरी 2026 में 2.75 फीसदी रही खुदरा महंगाई अगस्त तक बढ़कर 4.82 फीसदी पर पहुंच गई। यानी साल की शुरुआत के मुकाबले अगस्त में महंगाई दर में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई है। प्याज, अदरक और लहसुन जैसी रोजमर्रा की वस्तुओं की बढ़ती कीमतों का सीधा असर घरेलू बजट पर पड़ रहा है, हालांकि टमाटर और आलू जैसी सब्जियों में आई गिरावट कुछ राहत दे रही है।

  • लहसुन-प्याज के फायदे के बावजूद जैन समाज क्यों नहीं करता सेवन? वायरल वीडियो में मुनि के जवाब पर बजीं तालियां

    लहसुन-प्याज के फायदे के बावजूद जैन समाज क्यों नहीं करता सेवन? वायरल वीडियो में मुनि के जवाब पर बजीं तालियां

    नई दिल्ली । लहसुन और प्याज भारतीय रसोई में इस्तेमाल होने वाली प्रमुख सब्जियों में शामिल हैं। इनके सेवन को सामान्य तौर पर स्वाद और पोषण से जोड़ा जाता है। हालांकि जैन समाज में प्याज, लहसुन, आलू और जमीन के भीतर उगने वाली कई अन्य कंद-मूल सब्जियों का सेवन नहीं किया जाता। इसके पीछे केवल खानपान से जुड़े कारण नहीं, बल्कि जैन धर्म की धार्मिक मान्यताएं और अहिंसा का सिद्धांत महत्वपूर्ण माना जाता है।

    इसी विषय को लेकर सोशल मीडिया पर एक वीडियो तेजी से चर्चा में है। वीडियो में ‘भाभी जी घर पर है’ के कलाकार सानंद वर्मा, मुनिपुंगवश्री सुधा सागरजी महाराज से जैन समाज में प्याज और लहसुन के सेवन से परहेज किए जाने की वजह पूछते नजर आते हैं। मुनि ने सवाल का जवाब देते हुए भोजन और जैन जीवनशैली से जुड़ी मान्यताओं को समझाया।

    वीडियो में सानंद वर्मा पहले मुनिपुंगवश्री सुधा सागरजी महाराज का आशीर्वाद लेते हैं और फिर उनसे पूछते हैं कि जैन समाज के लोग प्याज और लहसुन क्यों नहीं खाते। इसके जवाब में महाराज उनसे सवाल करते हैं कि उन्हें किस समाज के लोगों की बुद्धि सबसे तेज लगती है। बातचीत के दौरान वह मजाकिया अंदाज में बनिया समाज का उल्लेख करते हैं और इसके बाद जमीन के अंदर उगने वाली चीजों को लेकर अपनी बात रखते हैं।

    सागरजी महाराज के अनुसार जमीन के अंदर उगने वाले पदार्थ अंधेरे, नमी और मिट्टी के संपर्क में रहते हैं। उन्होंने इसी संदर्भ में जमीन के नीचे उगने वाले फल खाने और जमीन के ऊपर उगने वाले फल खाने के बीच अंतर समझाने की कोशिश की। उनके कथन के अनुसार जमीन के ऊपर उगने वाले पौधों को प्रकाश और ऑक्सीजन मिलती है। इसी बात को उन्होंने जैन समुदाय के खानपान और मानसिक तेज होने की धारणा से जोड़कर बताया।

    इसके बाद महाराज ने जमीन के अंदर उगने वाली सब्जियों से परहेज का दूसरा कारण भी बताया। उन्होंने कहा कि जमीन के नीचे मौजूद चीजों को निकालते समय छोटे-छोटे जीवों को नुकसान पहुंच सकता है। पौधे को जड़ समेत उखाड़कर खाने से कई जीवों के नष्ट होने की आशंका रहती है। उन्होंने इसे अहिंसा के सिद्धांत से जोड़ते हुए भोजन के चयन का कारण बताया।

    जैन धर्म में अहिंसा को विशेष महत्व दिया गया है। जैन दर्शन के अनुसार प्रत्येक जीव में आत्मा मानी जाती है और किसी भी जीव को अनावश्यक कष्ट पहुंचाना हिंसा के रूप में देखा जाता है। इसी वजह से भोजन चुनते समय भी ऐसे विकल्पों को प्राथमिकता देने की बात कही जाती है, जिनसे जीवों को कम से कम नुकसान पहुंचे।

    जैन आहार परंपरा में आलू, प्याज, लहसुन, गाजर और मूली जैसे कई कंद-मूल को लेकर विशेष नियम माने जाते हैं। इन्हें जमीन से निकालने के लिए पौधे को उखाड़ना पड़ता है, जिससे मिट्टी में मौजूद सूक्ष्म जीवों को नुकसान पहुंचने की धार्मिक मान्यता है। कुछ कंदों से दोबारा पौधा विकसित होने की क्षमता को भी जैन दर्शन में जीवों की उपस्थिति से जोड़कर देखा जाता है।

    वीडियो में सानंद वर्मा महाराज की बात सुनने के बाद कहते हैं कि वह आगे से जमीन के ऊपर उगने वाले फल खाने की कोशिश करेंगे। जैन परंपरा में प्याज और लहसुन का त्याग केवल जमीन के भीतर उगने के कारण नहीं माना जाता, बल्कि संयम और आध्यात्मिक साधना से भी जोड़ा जाता है। भोजन को शरीर की आवश्यकता पूरी करने के साथ मन और इंद्रियों पर नियंत्रण का माध्यम माना जाता है। जैन साधु-साध्वियों के लिए आहार संबंधी नियम और भी अधिक कठोर होते हैं।

  • बढ़ती कीमतों के बीच सरकार ने निकाला प्याज का बफर स्टॉक…. 10 दिन में ही बिक गई 4000 टन

    बढ़ती कीमतों के बीच सरकार ने निकाला प्याज का बफर स्टॉक…. 10 दिन में ही बिक गई 4000 टन


    नई दिल्ली। ए
    क ओर जहां चीनी की कीमतों (Sugar prices) में बीते दिनों त्योहारों पर मिठास कम करने का काम किया, तो वहीं प्याज (Onion Price) लोगों की आंख से आंसू निकालती हुई नजर आई. देशभर में प्याज की कीमतों (Onion Price ) में तेज उछाल देखने मिला था. इसे देखते हुए सरकार ने कांदा एक्सप्रेस (Kanda Express) के जरिए तमाम बड़े शहरों में प्याज का बफर स्टॉक रिलीज किया। सरकार ने सिर्फ 10 दिनों में ही 4000 टन बफर स्टॉक प्याज बेच दिया है।


    17 शहरों में सस्ता बेचा प्याज

    एक रिपोर्ट के मुताबिक, कंज्यूमर अफेयर्स सेक्रेटरी निधि खरे ने रविवार को इस बारे में जानकारी शेयर करते हुए बताया कि सरकार ने आसमान छूती प्याज की कीमतों पर लगाम लगाने के उद्देश्य इसकी रियायती बिक्री शुरू की. बफर स्टॉक से निकाले गए इस प्याज को पहले 10 दिनों में 17 शहरों में पहुंचाया गया और करीब 4,000 टन बफर प्याज बेचा जा चुका है. गौरतलब है कि केंद्र सरकार ने अपनी एजेंसियों NCCF और NAFED के जरिए 2026 के लिए 1.21 लाख टन प्याज का बफर स्टॉक जमा रखा है।


    35 रुपये प्रति किलो भाव पर बेचा

    NCCF-NAFED द्वारा प्याज की बढ़ती कीमतों को नियंत्रित करने के उद्देश्य से इस बफर स्टॉक को रिटेल बिक्री के लिए निकाला गया. प्लान के तहत उत्पादक राज्यों से उपभोग केंद्रों तक प्याज को थोक में या तो कांदा एक्सप्रेस नामक स्पेशल ट्रेन से और ट्रकों द्वारा पहुंचाया जा रहा है. चुने गए प्राइस सेंसिटिव शहरों में बफर स्टॉक वाली प्याज 35 रुपये प्रति किलोग्राम की रियायती दर पर बेची जा रही है।

    सेक्रेटरी ने बताया कि भारी मात्रा में माल कांदा एक्सप्रेस के माध्यम से दिल्ली और चेन्नई पहुंच चुका है और आने वाले दिनों में गुवाहाटी भेजने के लिए तीसरी खेप लोड की जा रही है. उन्होंने कहा कि बफर स्टॉक वाली प्याज के डिस्ट्रीब्यूशन से उपभोक्ताओं को कुछ हद तक राहत मिली है और कीमतों में थोड़ी गिरावट दर्ज की गई है.


    NCCF ने कितना बेचा सस्ता प्याज?

    रिपोर्ट के मुताबिक, एनसीसीएफ की प्रबंध निदेशक एनीस जोसेफ चंद्र ने बताया है कि फेडरेशन द्वारा ने अब तक 35 रुपये प्रति किलोग्राम के भाव पर रिटेल बिक्री करते हुए देश के विभिन्न शहरों में 1,500 टन बफर प्याज बेचा गया है. इसके अलावा कुछ राज्यों के साथ अपने स्टोर, मोबाइल वैन, सहकारी समितियों और स्थानीय प्रशासन द्वारा पहचाने गए अन्य प्लेटफार्मों के जरिए बिक्री करने के लिए समझौता किया गया है।


    अभी भी कई राज्यों में 60 के पार कीमत

    उपभोक्ता मामलों के विभाग द्वारा पेश किए गए आंकड़ों से साफ पता चलता है कि बफर स्टॉक से प्याज की बिक्री से प्याज के अखिल भारतीय रिटेल प्राइस में गिरावट जरूर देखने को मिली है और ये रिलीज से पहले के 50.79 रुपये प्रति किलोग्राम की तुलना में बीते 28 अगस्त को 48.5 रुपये प्रति किलोग्राम पर आ गई।

    हालांकि, 5 सितंबर को देश के तमाम शहरों में Onion Price पर नजर डालें, तो इसकी कीमत दिल्ली में 58 रुपये प्रति किलो, मुंबई में 53 रुपये प्रति किलो, चेन्नई में 63 रुपये प्रति किलो और रांची में 40 रुपये प्रति किलो थी, जबकि औसत थोक मूल्य 42.79 रुपये प्रति किलो था।

  • चीनी के साथ प्याज, दाल और खाद्य तेल की कीमतों में तेजी ने बढ़ाई चिंता, सरकार के कदमों के बावजूद महंगाई का दबाव जारी

    चीनी के साथ प्याज, दाल और खाद्य तेल की कीमतों में तेजी ने बढ़ाई चिंता, सरकार के कदमों के बावजूद महंगाई का दबाव जारी

    नई दिल्ली । देश के कई हिस्सों में रोजमर्रा की रसोई में इस्तेमाल होने वाली जरूरी खाद्य वस्तुओं की कीमतों में पिछले कुछ समय से तेजी देखी जा रही है। चीनी, प्याज, दाल और खाद्य तेल के दाम बढ़ने से आम परिवारों के मासिक बजट पर दबाव बढ़ गया है। खास तौर पर चीनी की कीमतों में तेज उछाल ने उपभोक्ताओं की चिंता बढ़ाई है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, पिछले एक सप्ताह में चीनी के दाम करीब 7 रुपये प्रति किलो तक बढ़े हैं, जबकि एक महीने में इसकी कीमत में लगभग 17 रुपये प्रति किलो तक की वृद्धि दर्ज की गई है। कई बाजारों में चीनी करीब 70 रुपये किलो तक बिक रही है।

    चीनी की कीमतों में तेजी के पीछे आपूर्ति और बाजार में उपलब्ध स्टॉक को लेकर चिंता प्रमुख कारणों में शामिल है। सरकार ने कीमतों को नियंत्रित करने के लिए बाजार में अतिरिक्त आपूर्ति सुनिश्चित करने की दिशा में कदम उठाए हैं। इसके तहत 31 अक्टूबर तक 10 लाख टन चीनी के शुल्क-मुक्त आयात को मंजूरी दी गई है। इसके अलावा जमाखोरी रोकने के लिए कारोबारियों के स्टॉक पर सीमा निर्धारित की गई है। घरेलू स्तर पर नई चीनी की उपलब्धता जल्दी बढ़ाने के लिए चीनी मिलों में पेराई सत्र भी सामान्य से पहले शुरू करने की तैयारी है।

    प्याज की कीमतों में भी पिछले कुछ सप्ताह में बढ़ोतरी हुई है। 21 अगस्त को प्याज का औसत खुदरा भाव करीब 40.79 रुपये प्रति किलो दर्ज किया गया, जबकि एक सप्ताह पहले यह लगभग 36.56 रुपये और एक महीने पहले 34.87 रुपये प्रति किलो था। इस तरह कुछ ही समय में प्याज के दाम में 4 से 5 रुपये प्रति किलो तक की वृद्धि हुई है। खरीफ प्याज की नई फसल की आवक में देरी को इसकी प्रमुख वजह माना जा रहा है। दक्षिण भारत में आवक प्रभावित होने के साथ महाराष्ट्र के प्रमुख उत्पादक क्षेत्रों में मानसून की स्थिति का भी असर पड़ा है। कीमतों को नियंत्रित करने के लिए बफर स्टॉक से प्याज की आपूर्ति बढ़ाने की कोशिश की जा रही है।

    दालों की कीमतों में भी हल्की तेजी का रुख बना हुआ है। अरहर, मूंग, उड़द और चना जैसी प्रमुख दालों के दाम में पिछले एक महीने में लगभग 1 से 2 रुपये प्रति किलो तक की बढ़ोतरी हुई है। दलहन की बुवाई के रकबे में कमी और मानसून से जुड़ी अनिश्चितता को इसकी प्रमुख वजहों में गिना जा रहा है। कमजोर बारिश या फसल उत्पादन में कमी की आशंका आगे दालों की कीमतों पर दबाव बढ़ा सकती है।

    खाद्य तेल भी महंगाई के इस दबाव से अछूते नहीं हैं। अंतरराष्ट्रीय बाजार में पाम ऑयल की कीमतों में तेजी आई है। उत्पादन वाले क्षेत्रों में मौसम संबंधी परिस्थितियों और वैश्विक आपूर्ति में बदलाव का असर भारतीय बाजार पर भी पड़ रहा है। भारत खाद्य तेल की अपनी जरूरत का एक बड़ा हिस्सा आयात के जरिए पूरा करता है, इसलिए अंतरराष्ट्रीय कीमतों में बदलाव का सीधा प्रभाव घरेलू बाजार पर पड़ता है। पिछले एक महीने में खाद्य तेलों की कीमतों में करीब 2 से 3 प्रतिशत तक बढ़ोतरी देखी गई है।

    इस तरह रसोई की महंगाई के पीछे किसी एक वस्तु की समस्या नहीं बल्कि आपूर्ति, मौसम, घरेलू उत्पादन, आयात लागत और वैश्विक बाजार की परिस्थितियों का संयुक्त प्रभाव दिखाई दे रहा है। सरकार चीनी और प्याज की उपलब्धता बढ़ाने तथा जमाखोरी पर रोक लगाने जैसे कदम उठा रही है, लेकिन आने वाले दिनों में कीमतों की दिशा नई फसल की आवक, मानसून और अंतरराष्ट्रीय बाजार की स्थिति पर काफी हद तक निर्भर करेगी।

  • टमाटर-प्याज-आलू की कीमतों में भारी इजाफा…. बिगड़ा रसोई का बजट

    टमाटर-प्याज-आलू की कीमतों में भारी इजाफा…. बिगड़ा रसोई का बजट


    नई दिल्ली।
    अगर आपको पिछले कुछ दिनों से सब्जी मंडी (Vegetable Market) में टमाटर, प्याज और आलू पहले से महंगे नजर आ रहे हैं, तो यह सिर्फ आपका भ्रम नहीं है। देशभर में इन तीनों जरूरी सब्जियों की कीमतों (Vegetable prices) में लगातार बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है। इससे एक बार फिर खाने-पीने की चीजों की महंगाई यानी फूड इंफ्लेशन (Food inflation) बढ़ने की आशंका पैदा हो गई है। उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय के ताजा आंकड़ों के अनुसार, पिछले एक महीने में टमाटर की औसत खुदरा कीमत में करीब 18 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है।

    मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, प्याज लगभग 11 प्रतिशत और आलू करीब 1.3 प्रतिशत महंगा हुआ है। ये तीनों सब्जियां भारतीय रसोई का अहम हिस्सा हैं और उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) में इनका संयुक्त योगदान करीब 1.75 प्रतिशत है। इसलिए इनके दाम बढ़ने का सीधा असर महंगाई के आंकड़ों पर भी पड़ सकता है। अगर पिछले साल की तुलना करें तो टमाटर की कीमत करीब 25 प्रतिशत अधिक हो चुकी है, जबकि प्याज लगभग 3.3 प्रतिशत महंगा है। हालांकि, आलू अभी भी पिछले साल के मुकाबले करीब 17 प्रतिशत सस्ता है, लेकिन हाल के दिनों में इसकी कीमतों में भी तेजी देखने को मिली है।


    50% तक बढ़ीं टमाटर की कीमतें

    एक रिपोर्ट के मुताबिक, सबसे ज्यादा असर टमाटर पर देखने को मिला है। उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में टमाटर की कीमतें 50 प्रतिशत तक बढ़ गई हैं। वहीं राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में टमाटर लगभग दोगुना महंगा हो गया है। इसकी सबसे बड़ी वजह भीषण गर्मी को माना जा रहा है। अत्यधिक तापमान के कारण टमाटर की फसल प्रभावित हुई, जिससे उत्पादन कम हो गया। इसके अलावा गर्म मौसम में लंबी दूरी तक टमाटर की ढुलाई भी मुश्किल हो गई, क्योंकि फल जल्दी पककर खराब होने लगे।

    दिल्ली की आजादपुर मंडी के व्यापारियों के अनुसार, राजस्थान और हरियाणा से आने वाली टमाटर की आवक में काफी कमी आई है। इसका सीधा असर राजधानी समेत उत्तर भारत के कई शहरों में कीमतों पर पड़ा है।


    प्याज की कीमतों में भी तेजी

    प्याज की कीमतों में भी तेजी देखने को मिल रही है। कई राज्यों में प्याज 10 से 20 प्रतिशत तक महंगा हो गया है। विशेषज्ञों का कहना है कि बेमौसम बारिश के कारण प्याज की गुणवत्ता और भंडारण क्षमता प्रभावित हुई, जिससे बाजार में अच्छी गुणवत्ता वाला प्याज कम पहुंच रहा है।

    एक्सपर्ट बताते हैं कि मानसून के दौरान टमाटर और प्याज की कीमतों में उतार-चढ़ाव सामान्य बात है। लेकिन इस बार एल-नीनो के प्रभाव, भीषण गर्मी और मानसून में देरी ने स्थिति को और गंभीर बना दिया है। अगर आने वाले दिनों में बारिश सामान्य नहीं रही या आपूर्ति में और कमी आई, तो कीमतें और बढ़ सकती हैं।

    महंगाई के बढ़ते दबाव के बीच आम लोगों की रसोई का बजट फिर बिगड़ सकता है। खासकर मध्यम वर्ग और गरीब परिवारों पर इसका सबसे ज्यादा असर पड़ने की आशंका है। अगर टमाटर, प्याज और आलू की कीमतें लंबे समय तक ऊंची बनी रहती हैं, तो आने वाले महीनों में फूड इंफ्लेशन के आंकड़ों में भी तेजी देखने को मिल सकती है। फिलहाल, उपभोक्ताओं की नजर इस बात पर है कि मानसून की रफ्तार और सरकारी कदम इन बढ़ती कीमतों पर कितना असर डाल पाते हैं।