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  • कच्चा तेल 71 डॉलर के करीब, फिर भी नहीं मिली राहत; जानिए 6 जुलाई को आपके शहर में पेट्रोल-डीजल के ताजा दाम और कीमतें घटने की पूरी तस्वीर

    कच्चा तेल 71 डॉलर के करीब, फिर भी नहीं मिली राहत; जानिए 6 जुलाई को आपके शहर में पेट्रोल-डीजल के ताजा दाम और कीमतें घटने की पूरी तस्वीर


    नई दिल्ली।
    अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में लगातार नरमी आने के बावजूद देश में पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतों में फिलहाल कोई बदलाव नहीं किया गया है। सोमवार 6 जुलाई को भी सरकारी तेल कंपनियों ने ईंधन के दाम स्थिर रखे हैं। इससे वाहन चालकों को बढ़ोतरी से राहत तो मिली है, लेकिन सस्ते कच्चे तेल का सीधा लाभ अभी उपभोक्ताओं तक नहीं पहुंच पाया है। पिछले कई दिनों से पेट्रोल और डीजल की कीमतें एक ही स्तर पर बनी हुई हैं और बाजार की नजर अब आगे होने वाले संभावित बदलाव पर टिकी है।

    अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार में हाल के दिनों में कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट दर्ज की गई है। उत्पादन बढ़ाने के फैसलों और वैश्विक आपूर्ति में सुधार की उम्मीद के चलते ब्रेंट और डब्ल्यूटीआई दोनों प्रमुख बेंचमार्क नीचे आए हैं। इससे यह उम्मीद जगी कि भारत में भी पेट्रोल और डीजल की कीमतों में राहत मिल सकती है। हालांकि घरेलू स्तर पर फिलहाल कीमतों में किसी प्रकार की कटौती नहीं की गई है।

    राजधानी दिल्ली में पेट्रोल 102.12 रुपये और डीजल 95.20 रुपये प्रति लीटर पर उपलब्ध है। मुंबई में पेट्रोल 111.21 रुपये और डीजल 97.83 रुपये प्रति लीटर बिक रहा है। कोलकाता में पेट्रोल 113.51 रुपये तथा डीजल 99.82 रुपये प्रति लीटर है। चेन्नई में पेट्रोल 107.76 रुपये और डीजल 99.55 रुपये प्रति लीटर के भाव पर मिल रहा है। इसके अलावा नोएडा, गुरुग्राम, लखनऊ, जयपुर, पटना, बेंगलुरु, हैदराबाद और चंडीगढ़ सहित अन्य शहरों में भी निर्धारित दरों पर ईंधन की बिक्री जारी है।

    सरकार का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में आई हालिया गिरावट का असर घरेलू कीमतों पर तुरंत दिखाई देना संभव नहीं है। इसकी प्रमुख वजह यह है कि तेल कंपनियां अभी भी कुछ समय पहले ऊंची कीमतों पर खरीदे गए कच्चे तेल को रिफाइन कर रही हैं। इसके अलावा परिवहन, बीमा और अन्य परिचालन लागत भी ईंधन की अंतिम कीमत तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। ऐसे में कच्चे तेल के सस्ता होने का लाभ उपभोक्ताओं तक पहुंचने में कुछ समय लग सकता है।

    सरकार का यह भी मानना है कि यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक मौजूदा स्तर पर बनी रहती हैं या और नीचे आती हैं, तभी पेट्रोल और डीजल की कीमतों की समीक्षा की जा सकती है। फिलहाल तेल कंपनियां पूर्व में हुए अतिरिक्त खर्च और लागत की भरपाई करने की प्रक्रिया में हैं, इसलिए तत्काल राहत की संभावना सीमित मानी जा रही है।

    गौरतलब है कि मई 2026 के दौरान पेट्रोल और डीजल की कीमतों में कई चरणों में बढ़ोतरी की गई थी। उसके बाद से अब तक किसी प्रकार का संशोधन नहीं हुआ है। यही कारण है कि उपभोक्ता अब अंतरराष्ट्रीय बाजार में आई गिरावट के बाद घरेलू कीमतों में कटौती की उम्मीद लगाए हुए हैं।

    जो उपभोक्ता अपने शहर के ताजा पेट्रोल और डीजल के दाम जानना चाहते हैं, वे संबंधित तेल कंपनियों की आधिकारिक डिजिटल सेवाओं या एसएमएस सुविधा के माध्यम से रोजाना अपडेट प्राप्त कर सकते हैं। चूंकि विभिन्न राज्यों में लगने वाले वैट और स्थानीय कर अलग-अलग होते हैं, इसलिए शहरों के अनुसार ईंधन की कीमतों में अंतर देखने को मिलता है। फिलहाल देशभर में कीमतें स्थिर हैं, जबकि बाजार की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की मौजूदा नरमी घरेलू ईंधन दरों में राहत का रास्ता कब खोलती है।

  • OPEC+ ने बढ़ाया तेल उत्पादन, अब सबसे बड़ा सवाल खरीदारों का; भारत-चीन की मांग पर टिकी वैश्विक बाजार की दिशा

    OPEC+ ने बढ़ाया तेल उत्पादन, अब सबसे बड़ा सवाल खरीदारों का; भारत-चीन की मांग पर टिकी वैश्विक बाजार की दिशा


    नई दिल्ली ।
    वैश्विक ऊर्जा बाजार एक बार फिर महत्वपूर्ण मोड़ पर पहुंच गया है। OPEC+ देशों ने अगस्त से कच्चे तेल के उत्पादन में बढ़ोतरी का फैसला लेकर यह संकेत दिया है कि आने वाले महीनों में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की उपलब्धता और बढ़ सकती है। हालांकि उत्पादन बढ़ाने के इस निर्णय के साथ सबसे बड़ा सवाल यह खड़ा हो गया है कि अतिरिक्त तेल की खपत आखिर कौन करेगा और क्या वैश्विक मांग इतनी मजबूत है कि बढ़ी हुई सप्लाई को आसानी से समाहित किया जा सके।

    OPEC+ के प्रमुख सदस्य देशों ने अगस्त से प्रतिदिन लगभग 1.88 लाख बैरल अतिरिक्त उत्पादन पर सहमति बनाई है। अप्रैल से शुरू हुई उत्पादन वृद्धि को मिलाकर अब कुल बढ़ोतरी करीब आठ लाख बैरल प्रतिदिन तक पहुंच चुकी है। इस कदम का उद्देश्य वैश्विक बाजार में पर्याप्त आपूर्ति बनाए रखना और ऊर्जा बाजार को स्थिरता देना माना जा रहा है।

    उत्पादन बढ़ाने की योजना की सफलता काफी हद तक पश्चिम एशिया की भू-राजनीतिक परिस्थितियों पर भी निर्भर करेगी। विशेष रूप से होर्मुज जलडमरूमध्य वैश्विक तेल व्यापार का सबसे अहम समुद्री मार्ग माना जाता है। हाल के महीनों में क्षेत्रीय तनाव के कारण इस मार्ग से तेल परिवहन प्रभावित हुआ था, जिससे निर्यात में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई। हालांकि हालात में धीरे-धीरे सुधार के संकेत मिल रहे हैं और यदि यह मार्ग पूरी तरह सामान्य बना रहता है तो तेल निर्यात भी पहले की तुलना में तेज हो सकता है।

    बाजार में बढ़ती सप्लाई की संभावना का असर अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों पर भी दिखाई दे रहा है। हाल के सप्ताहों में ब्रेंट क्रूड की कीमतों में नरमी आई है और दरें युद्ध-पूर्व स्तर के आसपास पहुंच गई हैं। इससे संकेत मिलता है कि निवेशकों को भविष्य में पर्याप्त आपूर्ति मिलने का भरोसा है। यदि आने वाले समय में अतिरिक्त उत्पादन लगातार बाजार में पहुंचता है तो कीमतों पर दबाव बना रह सकता है।

    अब सबसे अधिक ध्यान दुनिया के दो बड़े तेल आयातक देशों भारत और चीन पर है। चीन लंबे समय से अपनी खरीद रणनीति के लिए जाना जाता है। जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होता है तो वहां आयात की गति धीमी कर दी जाती है, जबकि कीमतों में गिरावट आने पर बड़े पैमाने पर खरीद कर रणनीतिक भंडार बढ़ाया जाता है। हाल के महीनों में चीन का आयात अपेक्षाकृत कमजोर रहा है, लेकिन यदि कीमतें कम बनी रहती हैं तो उसकी रिफाइनरियां दोबारा सक्रिय होकर खरीद बढ़ा सकती हैं।

    भारत के लिए भी यह फैसला राहत देने वाला माना जा रहा है। देश अपनी कुल कच्चे तेल की आवश्यकता का लगभग 90 प्रतिशत आयात के जरिए पूरा करता है। ऐसे में वैश्विक बाजार में सप्लाई बढ़ने और कीमतों में नरमी आने से आयात लागत कम हो सकती है। इससे पेट्रोलियम कंपनियों के खर्च पर सकारात्मक असर पड़ सकता है और ऊर्जा सुरक्षा को भी मजबूती मिल सकती है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले महीनों में तेल बाजार की दिशा केवल उत्पादन बढ़ने से तय नहीं होगी, बल्कि वास्तविक मांग, वैश्विक आर्थिक गतिविधियों, समुद्री व्यापार की स्थिति और प्रमुख आयातक देशों की खरीद रणनीति भी अहम भूमिका निभाएगी। यदि भारत और चीन अपेक्षित स्तर पर खरीद बढ़ाते हैं तो अतिरिक्त उत्पादन को आसानी से बाजार मिल सकता है। वहीं मांग कमजोर रहने की स्थिति में वैश्विक तेल बाजार में अधिक आपूर्ति का दबाव बढ़ सकता है, जिससे कीमतों में और नरमी देखने को मिल सकती है।