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  • राहुल गांधी ने CJP नेताओं की गिरफ्तारी पर जताया विरोध, अब हाई टी के न्योते से विपक्षी एकजुटता की नई चर्चा

    राहुल गांधी ने CJP नेताओं की गिरफ्तारी पर जताया विरोध, अब हाई टी के न्योते से विपक्षी एकजुटता की नई चर्चा


    नई दिल्ली। कांग्रेस नेता राहुल गांधी और कॉकरोच जनता पार्टी यानी CJP के संस्थापक अभिजीत दीपके के बीच संभावित नजदीकी को लेकर राजनीतिक चर्चाएं तेज हो गई हैं। राहुल गांधी की ओर से आयोजित हाई टी में CJP के नेताओं को आमंत्रित करने की कोशिश की खबर सामने आने के बाद कांग्रेस और इस संगठन के संबंधों को लेकर नए सवाल उठने लगे हैं। हालांकि इसे दोनों के बीच दोस्ती या किसी औपचारिक राजनीतिक गठबंधन के रूप में देखना अभी जल्दबाजी होगी। रिपोर्ट के मुताबिक कांग्रेस ने CJP के संस्थापक अभिजीत दीपके और संगठन के अन्य नेताओं तक पहुंचने के लिए वकील और सामाजिक कार्यकर्ता प्रशांत भूषण की मदद लेने की कोशिश की थी। इस घटनाक्रम को विपक्षी एकजुटता की रणनीति और कांग्रेस के बदलते राजनीतिक रुख के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक मंगलवार सुबह कांग्रेस की ओर से CJP से संपर्क करने और उसके नेताओं को राहुल गांधी की हाई टी में आमंत्रित करने का फैसला किया गया। इसके लिए प्रशांत भूषण से मध्यस्थ की भूमिका निभाने का अनुरोध किया गया था। प्रशांत भूषण के करीबी सूत्रों के अनुसार कांग्रेस की ओर से उनसे संपर्क किया गया था। उस समय अभिजीत दीपके महाराष्ट्र में थे जबकि CJP के कुछ प्रमुख नेता जंतर मंतर पर प्रदर्शन के दौरान पुलिस हिरासत में थे। कांग्रेस से जुड़े सूत्रों का दावा है कि दीपके तक पहुंचने की कोशिश की गई लेकिन वह निमंत्रण को लेकर विशेष उत्साहित नहीं थे। ऐसे में फिलहाल यह स्पष्ट नहीं है कि इस संपर्क से दोनों पक्षों के बीच आगे कोई औपचारिक बातचीत होगी या नहीं।

    CJP मई में सोशल मीडिया पर चर्चा में आई थी। इसके बाद जून और जुलाई में संगठन ने परीक्षा में पेपर लीक के मुद्दे पर जंतर मंतर पर प्रदर्शन किया था। इस आंदोलन के चलते संगठन को व्यापक पहचान मिली। हालांकि कांग्रेस नेतृत्व का एक वर्ग शुरुआत से ही CJP को लेकर संदेह जताता रहा है। पार्टी के कुछ नेताओं की राय रही है कि यह संगठन आम आदमी पार्टी के प्रभाव में काम करता है या उसके राजनीतिक विस्तार के रूप में देखा जा सकता है। दूसरी ओर CJP खुद को स्वतंत्र संगठन बताती रही है। अब मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को रद्द करने की मांग को लेकर चल रहे अभियान ने दोनों पक्षों के बीच संभावित संवाद की चर्चा को बढ़ा दिया है।

    राहुल गांधी ने हाल ही में कहा था कि मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ प्रदर्शन करने वाले सभी समूह एक व्यापक आंदोलन का हिस्सा हैं। उनका कहना था कि संगठन और झंडे अलग हो सकते हैं लेकिन संविधान की रक्षा और नागरिक अधिकारों की मांग करने वालों के उद्देश्य समान हो सकते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि यदि कोई समूह संवैधानिक अधिकारों के लिए आवाज उठा रहा है तो कांग्रेस उसका समर्थन करेगी। इस बयान को विपक्षी दलों और अन्य संगठनों को साथ लाने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है।

    CJP नेताओं की गिरफ्तारी के बाद राहुल गांधी ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर भी प्रतिक्रिया दी थी। उन्होंने शांतिपूर्ण प्रदर्शन के दौरान तिरंगा लहराने को अपराध मानने पर सवाल उठाया और युवाओं को जेल भेजे जाने की आलोचना की। राहुल गांधी के बयान पर अभिजीत दीपके ने उनका आभार जताया था। इससे दोनों पक्षों के बीच संवाद की संभावनाओं को लेकर चर्चा और तेज हो गई। हालांकि CJP सोमवार को सुप्रीम कोर्ट तक निकाले गए इंडिया गठबंधन के मार्च में शामिल नहीं हुई थी। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि समान मुद्दों पर समर्थन के बावजूद दोनों पक्षों के बीच राजनीतिक तालमेल पूरी तरह स्थापित नहीं हुआ है।

    इसी बीच अभिजीत दीपके ने शुक्रवार 16 अक्टूबर को दिल्ली के कनॉट प्लेस स्थित सेंट्रल पार्क में तिरंगा मार्च का आह्वान किया है। उन्होंने समर्थकों से शाम पांच बजे राष्ट्रीय ध्वज के साथ पहुंचने की अपील की है। दूसरे शहरों में भी तिरंगा फहराने का आग्रह किया गया है। अब राजनीतिक नजर इस बात पर रहेगी कि प्रस्तावित मार्च में कितने लोग शामिल होते हैं और कांग्रेस तथा CJP के बीच आगे कोई संवाद होता है या नहीं। फिलहाल हाई टी के निमंत्रण की कोशिश को विपक्षी एकजुटता के संदर्भ में एक घटनाक्रम के तौर पर देखा जा रहा है लेकिन इसे दोनों के बीच नई राजनीतिक दोस्ती का पक्का संकेत नहीं माना जा सकता।

  • मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की मांग ने संसद में राजनीतिक तापमान बढ़ाया, विपक्ष एकजुट

    मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की मांग ने संसद में राजनीतिक तापमान बढ़ाया, विपक्ष एकजुट


    नई दिल्ली। संसद के मौजूदा सत्र में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने की मांग को लेकर राजनीतिक माहौल तेजी से गरमाता जा रहा है। विपक्षी दलों ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाते हुए एक संयुक्त रणनीति के तहत नए रिमूवल नोटिस की तैयारी शुरू कर दी है। कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस और डीएमके सहित INDIA गठबंधन के प्रमुख दल इस मुद्दे पर एकजुट नजर आ रहे हैं। विपक्ष का आरोप है कि हाल के समय में चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर लगातार सवाल उठे हैं और मतदाता सूची से जुड़े मामलों में सामने आई शिकायतों पर अपेक्षित कार्रवाई नहीं की गई है।

    विपक्षी दलों का कहना है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था की निष्पक्षता अत्यंत महत्वपूर्ण है और किसी भी प्रकार की पक्षपात की आशंका लोकतंत्र की विश्वसनीयता को प्रभावित कर सकती है। इसी आधार पर विपक्ष संसद में इस विषय को औपचारिक रूप से उठाने की तैयारी कर रहा है ताकि आयोग की भूमिका और कार्यशैली पर व्यापक चर्चा हो सके। विपक्षी नेताओं का तर्क है कि यह मुद्दा किसी व्यक्ति विशेष के खिलाफ नहीं बल्कि संस्थागत पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने से जुड़ा हुआ है।

    संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया अत्यंत सख्त और जटिल मानी जाती है। इसके लिए संसद के दोनों सदनों में विशेष प्रक्रिया के तहत प्रस्ताव लाना आवश्यक होता है और उसे पारित करने के लिए विशेष बहुमत की जरूरत होती है। विपक्ष इस प्रक्रिया को ध्यान में रखते हुए अपने सांसदों का समर्थन जुटाने की रणनीति पर काम कर रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस कदम का उद्देश्य केवल हटाने की प्रक्रिया शुरू करना नहीं बल्कि सरकार और आयोग पर नैतिक और राजनीतिक दबाव बनाना भी हो सकता है।

    सरकारी पक्ष की ओर से इस मुद्दे पर अब तक संयमित रुख अपनाया गया है। सत्ता पक्ष का कहना है कि संवैधानिक संस्थाओं पर इस प्रकार के गंभीर आरोप लगाने से पहले ठोस और प्रमाणित आधार होना चाहिए। वहीं विपक्ष इसे लोकतांत्रिक निगरानी और जवाबदेही का हिस्सा बताते हुए संसद के भीतर और बाहर दोनों स्तरों पर इस मुद्दे को उठाने की तैयारी में है।

    राजनीतिक माहौल में यह विवाद ऐसे समय पर सामने आया है जब देश में आगामी चुनावी गतिविधियों की तैयारियां भी तेज हैं। ऐसे में चुनाव आयोग की भूमिका और भी अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है। विपक्ष का मानना है कि यदि संवैधानिक संस्थाओं पर भरोसा कमजोर होता है तो यह लोकतांत्रिक प्रक्रिया के लिए गंभीर चुनौती बन सकता है। यही कारण है कि यह मुद्दा अब संसद में एक बड़े राजनीतिक टकराव का रूप लेता जा रहा है।