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  • श्रीश्री रविशंकर के आर्ट ऑफ लिविंग को 5 करोड़ रुपये लौटाएगा DDA…. SC ने रद्द किया NGT का आदेश

    श्रीश्री रविशंकर के आर्ट ऑफ लिविंग को 5 करोड़ रुपये लौटाएगा DDA…. SC ने रद्द किया NGT का आदेश


    नई दिल्ली।
    सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने NGT (राष्ट्रीय हरित अधिकरण) के 2017 के उस आदेश को शनिवार को रद्द कर दिया, जिसमें साल 2016 में आयोजित विश्व संस्कृति महोत्सव (World Culture Festival) के कारण यमुना (Yamuna) के बाढ़ क्षेत्र को हुए नुकसान के लिए श्रीश्री रविशंकर (Sri Sri Ravi Shankar) के ‘आर्ट ऑफ लिविंग फाउंडेशन’ (‘Art of Living Foundation’) को जिम्मेदार ठहराया गया था। इसके साथ ही शीर्ष अदालत ने दिल्ली विकास प्राधिकरण (DDA) को फाउंडेशन द्वारा जमा किए गए पांच करोड़ रुपए के पर्यावरणीय मुआवजे को भी वापस करने का निर्देश दिया और इसके लिए उसे चार सप्ताह का समय भी दिया।

    यमुना के बाढ़ क्षेत्र डीएनडी फ्लाईवे में गंदगी फैलाने के आरोपों से आर्ट ऑफ लिविंग को क्लीन चिट देते हुए जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा और जस्टिस एन.के. सिंह की पीठ ने कहा कि रिकॉर्ड पर पर्याप्त सामग्री मौजूद है, जिससे पता चलता है कि आर्ट ऑफ लिविंग फाउंडेशन को सौंपे जाने से पहले ही कार्यक्रम स्थल खराब स्थिति में था। पीठ ने कहा, ‘रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री वास्तव में यह साबित करती है कि यदि कोई नुकसान हुआ भी है, तो उसके लिए अपीलकर्ता को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता…।’


    सुप्रीम कोर्ट ने रद्द किया 9 साल पुराना फैसला

    पीठ ने कहा, ‘सात दिसंबर 2017 के फैसले को रद्द किया जाता है और इसके परिणामस्वरूप अपीलकर्ता के खिलाफ की गई सभी कार्रवाइयों और अंतरिम आदेशों को भी निरस्त किया जाता है। अपीलकर्ता नौ मार्च 2016 के अधिकरण के आदेश के अनुपालन में डीडीए के पास जमा की गई पांच करोड़ रुपए की राशि वापस पाने का हकदार है। डीडीए आज से चार सप्ताह के भीतर यह राशि वापस करेगा।’


    NGT ने दिया था 5 करोड़ रुपए DDA को देने का आदेश

    शीर्ष अदालत ने यह आदेश ‘आर्ट ऑफ लिविंग फाउंडेशन’ से जुड़े ‘व्यक्ति विकास केंद्र इंडिया’ की ओर से दायर एक अपील पर दिया। एक समिति की रिपोर्ट के आधार पर राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने आर्ट ऑफ लिविंग फाउंडेशन को पांच करोड़ रुपए जमा करने का निर्देश दिया था और कहा था कि कार्यक्रम से बाढ़ क्षेत्र को नुकसान पहुंचा है।


    कोर्ट बोला- रिपोर्ट से पूरी तरह प्रभावित हो गया था NGT

    शीर्ष अदालत ने कहा कि NGT, विशेषज्ञ समिति की उस रिपोर्ट से प्रभावित हो गया, जिसमें कहा गया था कि स्थल पर बड़े पैमाने पर तैयारियां चल रही थीं और इस आधार पर उसने निष्कर्ष निकाला कि ऐसे काम करके अपीलकर्ता (आर्ट ऑफ लिविंग) ने बाढ़ क्षेत्र को गंभीर रूप से नुकसान पहुंचाया।


    बाढ़ क्षेत्र में कार्यक्रम की अनुमति देने पर भड़का कोर्ट

    अदालत ने सक्रिय बाढ़ क्षेत्र में कार्यक्रम आयोजित करने की अनुमति देने के लिए डीडीए की भी आलोचना की और उसे एनजीटी के निर्देश के अनुसार यमुना के बाढ़ क्षेत्र के बहाली का काम जारी रखने का निर्देश दिया। विश्व सांस्कृतिक महोत्सव 11 से 13 मार्च, 2016 तक आयोजित किया गया था। यह कार्यक्रम दिल्ली में यमुना नदी के सक्रिय बाढ़ क्षेत्र में डीएनडी फ्लाईवे के आगे की ओर 25 हेक्टेयर क्षेत्र में आयोजित किया गया था।

  • 33 साल बाद मिला न्याय: सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर पूर्व वायुसेना अधिकारी को मिलेगी सम्मानजनक विदाई

    33 साल बाद मिला न्याय: सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर पूर्व वायुसेना अधिकारी को मिलेगी सम्मानजनक विदाई


    नई दिल्ली। तीन दशक पहले नौकरी से बर्खास्त किए गए भारतीय वायुसेना (IAF) के एक पूर्व अधिकारी को आखिरकार न्याय मिल गया है। सुप्रीम कोर्ट ने 1993 की बर्खास्तगी को अवैध और अनुचित ठहराते हुए न सिर्फ उसे रद्द किया, बल्कि अधिकारी को सम्मानजनक विदाई देने का ऐतिहासिक आदेश भी दिया है।

    अदालत ने कहा कि किसी भी सैनिक के लिए उसका सम्मान सबसे बड़ी पूंजी होता है, और उसे बहाल करना न्याय का अहम हिस्सा है।

    कोर्ट का बड़ा फैसला
    जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की पीठ ने पूर्व स्क्वाड्रन लीडर आर. सूद की बर्खास्तगी को रद्द करते हुए कहा कि वायुसेना की कार्रवाई कानूनी रूप से कमजोर और त्रुटिपूर्ण थी।

    कोर्ट ने निर्देश दिया कि:

    वायुसेना प्रमुख द्वारा तय तारीख पर उन्हें औपचारिक विदाई दी जाए
    विदाई उसी सम्मान के साथ हो, जिसके वे नियमित सेवानिवृत्ति पर हकदार होते

    क्या था मामला?
    यह पूरा विवाद 1987 की एक घटना से जुड़ा है। आरोप था कि एक नागरिक ड्राइवर को रेगिस्तान में छोड़ दिया गया था, जहां बाद में उसके अवशेष मिले। इसी मामले में कार्रवाई करते हुए 22 सितंबर 1993 को वायुसेना अधिनियम की धारा 19 के तहत आर. सूद को सेवा से हटा दिया गया था।

    सुप्रीम कोर्ट ने क्यों पलटा फैसला?

    पहले ही मिल चुकी थी क्लीन चिट
    एक आपराधिक अदालत ने सबूतों के अभाव में आर. सूद को पहले ही बरी कर दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब मुकदमा चलाने लायक सबूत ही नहीं थे, तो विभागीय कार्रवाई का आधार भी कमजोर हो जाता है।
    सजा में भेदभाव पर सख्त टिप्पणी
    कोर्ट ने पाया कि इस मामले में वरिष्ठ अधिकारी को मामूली सजा दी गई, जबकि आदेश का पालन करने वाले आर. सूद को बर्खास्त कर दिया गया—जो स्पष्ट रूप से असमानता है।

    वरिष्ठ के आदेश का पालन बना सजा का कारण
    अदालत ने कहा कि किसी अधीनस्थ अधिकारी को सिर्फ इसलिए कठोर सजा नहीं दी जा सकती कि उसने अपने वरिष्ठ के आदेशों का पालन किया।

    सम्मान की वापसी को प्राथमिकता
    चूंकि आर. सूद अब सेवानिवृत्ति की उम्र पार कर चुके हैं, उन्हें सेवा में बहाल करना संभव नहीं है। लेकिन कोर्ट ने आदेश दिया कि उन्हें सभी लाभ ऐसे दिए जाएं मानो वे कभी बर्खास्त ही नहीं हुए थे।

    सबसे अहम बात—अदालत ने आर्थिक मुआवजे से ज्यादा “सम्मान की बहाली” को प्राथमिकता दी। यह फैसला बताता है कि एक सैनिक के लिए उसकी प्रतिष्ठा ही सबसे बड़ी पहचान होती है, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने 33 साल बाद फिर से स्थापित कर दिया।

  • छत्रपति शिवाजी महाराज की प्रतिमा हटाने का आदेश…. बाम्बे हाईकोर्ट ने गोवा सरकार को लगाई फटकार

    छत्रपति शिवाजी महाराज की प्रतिमा हटाने का आदेश…. बाम्बे हाईकोर्ट ने गोवा सरकार को लगाई फटकार


    मुम्बई।
    बॉम्बे हाईकोर्ट (Bombay High Court) ने हाल ही में एक मामले की सुनवाई करते हुए गोवा (Goa) में स्थित छत्रपति शिवाजी महाराज (Chhatrapati Shivaji Maharaj) की एक प्रतिमा को गिराने का आदेश दे दिया है। इस दौरान कोर्ट ने राज्य सरकार को कड़ी फटकार भी लगाई है। बॉम्बे हाईकोर्ट की गोवा पीठ ने अवैध रूप से स्थापित छत्रपति शिवाजी महाराज की प्रतिमा को हटाने का आदेश देते हुए कहा कि मोरमुगाओ पोर्ट प्राधिकरण (Mormugao Port Authority) की जमीन पर अतिक्रमण रोकने में सरकार ने गंभीर लापरवाही दिखाई है।

    जस्टिस वाल्मीकि मेनेजेस और जस्टिस अमित एस जमसांडेकर की पीठ ने राज्य के अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे सुरक्षा की व्यवस्था करें, ताकि प्रतिमा को हटा कर पहले पहले जैसा बनाया जा सके। इससे पहले मोरमुगाओ पोर्ट प्राधिकरण ने अदालत का दरवाजा खटखटाते हुए आरोप लगाया था कि उसकी जमीन पर जबरन घुसकर स्थायी प्रतिमा स्थापित कर दी गई, जबकि इस संबंध में पहले ही पुलिस और अन्य अधिकारियों को शिकायत दी गई थी।


    क्या बोला हाईकोर्ट?

    इसके बाद हाईकोर्ट ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि यह एक बड़े बंदरगाह की संपत्ति पर सीधा अतिक्रमण है और राज्य सरकार मूकदर्शक बनी रही। अदालत ने यहां तक कहा कि ऐसा लगता है कि अधिकारियों ने अतिक्रमण करने वालों के साथ परोक्ष रूप से सहयोग किया है। अदालत ने पुलिस के हलफनामे का हवाला देते हुए कहा कि स्थानीय पुलिस ने पहले ही कानून व्यवस्था बिगड़ने की आशंका जताई थी, इसके बावजूद कार्यकारी मजिस्ट्रेट, जिलाधिकारी और अन्य अधिकारियों ने 19 फरवरी को प्रतिमा के उद्घाटन को रोकने के लिए कोई प्रभावी कदम नहीं उठाया।


    सरकार की मंशा पर उठाए सवाल

    HC ने यह भी नोट किया कि उद्घाटन कार्यक्रम में स्थानीय विधायक संकल्प आमोणकर और अन्य राजनीतिक हस्तियां मौजूद थीं। इससे यह संकेत मिलता है कि प्रशासन और स्थानीय नेताओं के बीच किसी तरह की समझ बनी हुई थी और पोर्ट की जमीन की सुरक्षा के लिए कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई। हाईकोर्ट ने यह भी पाया कि इसी जमीन पर प्रतिमा लगाने के लिए पहले विधायक की ओर से अनुमति मांगी गई थी, जिसे पोर्ट प्राधिकरण ने केंद्र सरकार की भूमि नीति के तहत खारिज कर दिया था।

    HC ने राज्य सरकार की इस दलील को भी खारिज कर दिया कि पोर्ट प्राधिकरण को सार्वजनिक परिसर कानून के तहत ही कार्रवाई करनी चाहिए या अपनी सुरक्षा व्यवस्था पर निर्भर रहना चाहिए। अदालत ने स्पष्ट कहा कि कानून व्यवस्था बनाए रखना राज्य की जिम्मेदारी है और पुलिस और अन्य प्रशासनिक अधिकारियों को इसमें सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए।

  • शासकीय कार्यालयों में बगैर वैध दस्तावेज के वाहन नहीं चल सकेंगे सरकार का बड़ा फैसला

    शासकीय कार्यालयों में बगैर वैध दस्तावेज के वाहन नहीं चल सकेंगे सरकार का बड़ा फैसला


    नई दिल्ली । मध्यप्रदेश शासन के परिवहन विभाग ने शासकीय विभागों, निगमों एवं निकायों द्वारा विभिन्न प्रयोजनों के लिए अनुबंधित किए जाने वाले वाहनों के संबंध में नवीन निर्देश जारी किए हैं। जारी आदेशानुसार अब बगैर वैध दस्तावेजों के किसी भी वाहन को शासकीय कार्यालयों में उपयोग में नहीं लिया जाएगा।

    शासकीय विभागों द्वारा सीधे अथवा निजी एजेंसियों के माध्यम से उपयोग में लाए जाने वाले मालवाहक एवं यात्री वाहनों के सभी वैधानिक दस्तावेज अनुबंध से पूर्व और वाहन उपयोग की संपूर्ण अवधि के दौरान वैध होना अनिवार्य होगा। साथ ही, विभागों को भुगतान से पहले भी इन दस्तावेजों की नियमित जांच सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए हैं।

    परिवहन विभाग ने यह भी निर्देश दिये है कि खनिज अथवा अन्य सामग्री के परिवहन के लिये जारी की जाने वाली अनुमति संबंधित वाहन की निर्धारित क्षमता से अधिक नहीं होनी चाहिए। अनुबंधित वाहनों द्वारा नियमानुसार मोटरयान कर का भुगतान किया गया होना चाहिए।

    ई-मेल से भीप्राप्‍त कर स‍कते हैं मार्गदर्शन

    सभी विभागों, निगमों एवं निकायों को यह सुविधा प्रदान की गई है कि वे अपने यहां अनुबंधित अथवा एजेंसियों द्वारा उपयोग में लाए जा रहे वाहनों के संबंध में परिवहन आयुक्त कार्यालय, मध्यप्रदेश, ग्वालियर से मार्गदर्शन प्राप्त कर सकते हैं। इसके लिए ई-मेल आईडी [email protected] पर पत्र प्रेषित किया जा सकता है।