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  • स्वामित्व योजना के अतिरिक्त काम से नाराज पटवारियों का प्रदर्शन, 55 जिलों में कलमबंद हड़ताल की दी चेतावनी

    स्वामित्व योजना के अतिरिक्त काम से नाराज पटवारियों का प्रदर्शन, 55 जिलों में कलमबंद हड़ताल की दी चेतावनी

    मध्य प्रदेश । के छतरपुर जिले में स्वामित्व अधिकार अभिलेख निष्पादन एवं पंजीयन योजना के तहत अतिरिक्त जिम्मेदारियां सौंपे जाने के विरोध में पटवारियों ने मंगलवार को प्रदर्शन किया। मध्य प्रदेश पटवारी संघ जिला शाखा के आह्वान पर दर्जनों पटवारी रैली के रूप में कलेक्ट्रेट पहुंचे। यहां उन्होंने नारेबाजी करते हुए धरना दिया और अपनी मांगों को लेकर विरोध जताया। पटवारियों ने मुख्यमंत्री के नाम जिला प्रशासन को ज्ञापन सौंपने की बात कही।

    पटवारी संघ की मुख्य मांग है कि आबादी भूमि के पंजीयन और निष्पादन की प्रक्रिया, ई-केवाईसी तथा व्यक्तिगत दायित्व से जुड़े अन्य कार्यों से पटवारी संवर्ग को अलग रखा जाए। संघ का कहना है कि इन कार्यों में जमीन की सीमा, क्षेत्रफल, मालिकाना हक या दस्तावेजों से जुड़ी किसी भी त्रुटि की स्थिति में पटवारियों पर व्यक्तिगत कानूनी जिम्मेदारी आने की आशंका है। इसी वजह से संघ इन अतिरिक्त दायित्वों को लेकर विरोध कर रहा है।

    मध्य प्रदेश पटवारी संघ संघर्ष समिति के जिलाध्यक्ष हारून अहमद ने कहा कि पंजीयन से संबंधित कार्यों के लिए शासन के पास अलग विभाग मौजूद है। इसके बावजूद राजस्व विभाग के मैदानी कर्मचारियों को अतिरिक्त प्रशासनिक और कानूनी जिम्मेदारियां दी जा रही हैं। उनका कहना है कि ग्रामीण आबादी क्षेत्र का भू-स्वरूप कृषि भूमि से अलग है और पंचायत राज व्यवस्था के तहत सर्वेक्षण से जुड़े कार्य पंचायत विभाग से संबंधित हैं।

    पटवारियों ने किसान हितैषी फार्मर आईडी और जियो-टैग गिरदावरी में सामने आ रही तकनीकी खामियों का भी मुद्दा उठाया। संघ के अनुसार, तकनीकी समस्याओं के कारण मैदानी स्तर पर काम करने वाले कर्मचारियों पर अतिरिक्त दबाव बन रहा है। पटवारी संघ का कहना है कि पहले से ही कई जिम्मेदारियां निभा रहे कर्मचारियों पर लगातार नई योजनाओं का काम बढ़ाया जा रहा है।

    संघ ने ग्रेड-पे, वेतन विसंगति और कैडर रिव्यू जैसी लंबित मांगों का भी उल्लेख किया। पटवारियों के मुताबिक इन मुद्दों का अभी निराकरण नहीं हुआ है और इसके साथ ही अतिरिक्त कार्यभार लगातार बढ़ रहा है। इसी वजह से संघ ने शासन से आबादी पंजीयन एवं निष्पादन योजना से पटवारियों को तत्काल अलग करने की मांग की है।

    कलेक्ट्रेट में प्रदर्शन के दौरान पटवारी इस बात पर भी अड़े रहे कि मुख्यमंत्री के नाम ज्ञापन केवल जिला कलेक्टर को ही सौंपा जाएगा। डिप्टी कलेक्टर और एडीएम विनय द्विवेदी ज्ञापन लेने पहुंचे, लेकिन पटवारियों ने उन्हें ज्ञापन देने से इनकार कर दिया। इसके बाद दोनों अधिकारी बिना आवेदन लिए वापस लौट गए और पटवारी धरने पर बैठे रहे।

    पटवारी संघ ने चेतावनी दी है कि यदि उनकी मांग पर तत्काल कार्रवाई नहीं हुई और अतिरिक्त जिम्मेदारियों को लेकर दबाव जारी रहा, तो प्रदेश के सभी 55 जिलों में पटवारी काम बंद कर कलमबंद हड़ताल करने के लिए मजबूर होंगे। संघ ने ऐसी स्थिति के लिए शासन-प्रशासन को जिम्मेदार बताया है।

  • ट्रंप के ‘चांद हमारा है’ दावे के बीच जानिए अंतरराष्ट्रीय कानून किसी देश या व्यक्ति को चंद्रमा की जमीन क्यों नहीं देता

    ट्रंप के ‘चांद हमारा है’ दावे के बीच जानिए अंतरराष्ट्रीय कानून किसी देश या व्यक्ति को चंद्रमा की जमीन क्यों नहीं देता

    नई दिल्ली ।अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के चांद को लेकर दिए गए बयान के बाद एक बार फिर यह सवाल उठ रहा है कि आखिर चांद पर किसका अधिकार है। ट्रंप ने रविवार को सोशल मीडिया पर चांद की तस्वीर साझा की, जिस पर ‘चंद्रमा हमारा है’ लिखा था और अमेरिकी झंडा भी दिखाई दे रहा था। इसके साथ ही चांद की जमीन खरीदने और उसके प्रमाणपत्र देने के दावे भी चर्चा में हैं।

    चांद पर जमीन खरीदने के दावे लंबे समय से सामने आते रहे हैं। कई लोग जन्मदिन, शादी या अन्य खास मौकों पर चांद की जमीन उपहार में देने की बात कहते हैं। कुछ संस्थाएं चांद की जमीन के नाम पर प्रमाणपत्र और दस्तावेज भी बेचती हैं। हालांकि इन दस्तावेजों से चांद की जमीन पर वास्तविक कानूनी मालिकाना हक हासिल नहीं होता।

    चांद और दूसरे खगोलीय पिंडों से जुड़े अंतरराष्ट्रीय नियमों का प्रमुख आधार 1967 की अंतरिक्ष संधि है। इस संधि में भारत और अमेरिका समेत 114 देश शामिल हैं। संधि के अनुसार बाहरी अंतरिक्ष की खोज और उसका इस्तेमाल सभी देशों के लाभ और हित में होना चाहिए। चांद और दूसरे खगोलीय पिंड भी इसी व्यवस्था का हिस्सा हैं।

    संधि का अनुच्छेद 2 विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। इसके अनुसार बाहरी अंतरिक्ष, जिसमें चांद और अन्य खगोलीय पिंड शामिल हैं, किसी देश के राष्ट्रीय अधिकार क्षेत्र में नहीं आ सकते। कोई देश संप्रभुता, कब्जे या किसी अन्य तरीके से चांद के किसी हिस्से को अपना राष्ट्रीय क्षेत्र घोषित नहीं कर सकता। इसलिए किसी देश का चांद पर राष्ट्रीय स्वामित्व का दावा अंतरराष्ट्रीय नियमों के अनुरूप नहीं है।

    हालांकि इसका अर्थ यह नहीं है कि देश चांद पर मिशन नहीं भेज सकते। अंतरिक्ष संधि सभी देशों को अंतरिक्ष और खगोलीय पिंडों की खोज तथा इस्तेमाल की स्वतंत्रता देती है। वैज्ञानिक अनुसंधान भी किया जा सकता है, लेकिन अंतरिक्ष गतिविधियां अंतरराष्ट्रीय शांति, सुरक्षा और सहयोग के सिद्धांतों के अनुरूप होनी चाहिए।

    चांद पर पहुंचने वाले यान और उपकरणों को लेकर भी संधि में अलग व्यवस्था है। अनुच्छेद 8 के अनुसार किसी देश के पंजीकरण में दर्ज अंतरिक्ष वस्तु पर उस देश का अधिकार और नियंत्रण बना रहता है। चांद पर उतरने के बाद भी किसी यान या उपकरण का स्वामित्व केवल इसलिए खत्म नहीं होता कि वह खगोलीय पिंड पर मौजूद है। लेकिन इससे चांद की जमीन पर उस देश का मालिकाना हक नहीं बनता।

    निजी कंपनियों के लिए भी नियम स्पष्ट हैं। अनुच्छेद 6 के तहत सरकारी और गैर-सरकारी संस्थाओं की अंतरिक्ष गतिविधियों की अंतरराष्ट्रीय जिम्मेदारी संबंधित देश की होती है। निजी संस्थाओं को अंतरिक्ष गतिविधियों के लिए संबंधित देश की अनुमति और लगातार निगरानी व्यवस्था के तहत काम करना होता है।

    चांद पर जमीन बेचने के दावे भी कई दशकों से होते रहे हैं। जर्मनी के नागरिक मार्टिन जुर्गेंस ने चांद को अपने परिवार की संपत्ति बताया था। बाद में अमेरिकी कारोबारी डेनिस होप ने लूनर एंबेसी नाम की संस्था के जरिए चांद की जमीन बेचने का दावा किया और लोगों को प्रमाणपत्र देने शुरू किए।

    ऐसे प्रमाणपत्र कुछ लोग मनोरंजन, कल्पना या उपहार के तौर पर खरीदते हैं। लेकिन अंतरराष्ट्रीय कानून में निजी व्यक्तियों या कंपनियों के लिए चांद की जमीन के मालिकाना हक का कोई मान्य पंजीकरण तंत्र नहीं है। इसलिए इन प्रमाणपत्रों को कानूनी संपत्ति अधिकार नहीं माना जाता।

    चांद पर गतिविधियों से होने वाले नुकसान को लेकर भी अंतरराष्ट्रीय नियम मौजूद हैं। अनुच्छेद 7 के अनुसार अंतरिक्ष वस्तुओं से दूसरे देशों या उनके लोगों को नुकसान होने की स्थिति में लॉन्च करने वाले देश की अंतरराष्ट्रीय जिम्मेदारी बन सकती है। अनुच्छेद 9 देशों को ऐसी गतिविधियों से बचने और दूसरे देशों के हितों का ध्यान रखने की बात कहता है।

    चांद तक पहुंचने में सोवियत संघ, अमेरिका, जापान, यूरोप, भारत और चीन समेत कई देशों ने महत्वपूर्ण उपलब्धियां हासिल की हैं। भारत के चंद्रयान-1 और चंद्रयान-3 जैसे मिशनों ने चंद्रमा के अध्ययन में योगदान दिया है। अमेरिका के अपोलो मिशनों ने इंसानों को चांद की सतह तक पहुंचाया, जबकि हाल के वर्षों में सरकारी और निजी मिशनों की गतिविधियां भी बढ़ी हैं।

    इसलिए चांद पर यान भेजना, वैज्ञानिक उपकरण स्थापित करना या शोध करना और चांद की जमीन का मालिक बनना अलग-अलग बातें हैं। मौजूदा अंतरराष्ट्रीय नियम किसी देश को चांद पर संप्रभुता स्थापित करने की अनुमति नहीं देते और जमीन खरीदने के प्रमाणपत्र भी वास्तविक कानूनी मालिकाना हक प्रदान नहीं करते।

  • गया में भैंस के असली मालिक का दावा विवादित, पहचान तय करने के लिए डीएनए जांच का आईजी ने दिया आदेश

    गया में भैंस के असली मालिक का दावा विवादित, पहचान तय करने के लिए डीएनए जांच का आईजी ने दिया आदेश

    नई दिल्ली:  बिहार के गया जिले के अतरी थाना क्षेत्र में एक भैंस के मालिकाना हक को लेकर चल रहे विवाद ने पुलिस जांच का नया रूप ले लिया है। दोनों पक्ष भैंस पर अपना अधिकार जता रहे हैं। मामले की गंभीरता को देखते हुए मगध प्रक्षेत्र के आईजी विकास वैभव ने भैंस की डीएनए जांच कराने का निर्देश दिया है। जांच की जिम्मेदारी ग्रामीण एसपी दिव्यांजलि जायसवाल को दी गई है।

    मामला मोहड़ा क्षेत्र के सेउतर गांव निवासी सूरज यादव की भैंस से जुड़ा है। ग्रामीणों के अनुसार, कुछ दिन पहले सूरज यादव की भैंस कहीं चली गई थी। बाद में उसके उपथू क्षेत्र के महाचक गांव पहुंचने की जानकारी मिली। वहां नौरंगा टोली में रहने वाले प्रकाश मांझी ने भैंस को अपने पास रख लिया।

    इसके बाद सूरज यादव को जानकारी मिली कि उसकी भैंस नौरंगा में है। वह भैंस की तलाश में वहां पहुंचे और उसके चोरी होने की शिकायत दर्ज कराई। शिकायत के बाद अतरी थाना पुलिस ने भैंस को थाने बुलाया। प्रारंभिक कार्रवाई के बाद भैंस सूरज यादव को सौंप दी गई।

    हालांकि, इसके बाद मामले में विवाद और बढ़ गया। अतरी थाना प्रभारी पर एक पक्ष की मदद करने का आरोप लगाया गया। विवाद की स्थिति को देखते हुए भैंस को दोबारा थाने बुलाया गया। कुछ समय तक उसे थाना परिसर में रखा गया। बाद में फिलहाल भैंस को फिर सूरज यादव को सौंप दिया गया।

    दूसरी ओर प्रकाश मांझी के पक्ष के लोगों का दावा है कि जिस भैंस को लेकर विवाद चल रहा है, वह करीब चार वर्ष पहले उनके यहां से चोरी हुई थी। उनका कहना है कि भैंस को अपने पुराने घर की पहचान थी और इसी वजह से वह वापस उनके क्षेत्र में पहुंच गई। इस दावे के बाद दोनों पक्षों के बीच स्वामित्व को लेकर स्थिति और जटिल हो गई।

    मामले की जानकारी मिलने के बाद मगध प्रक्षेत्र के आईजी विकास वैभव ने इसे गंभीरता से लेते हुए निष्पक्ष जांच के निर्देश दिए। उन्होंने ग्रामीण एसपी को जांच में तेजी लाने और दोनों पक्षों के दावों की स्वतंत्र रूप से पड़ताल करने को कहा है।

    पुलिस के सामने मुख्य चुनौती यह निर्धारित करना है कि भैंस वास्तव में किस पक्ष की है। दोनों पक्ष अपने दावे के समर्थन में अलग-अलग बातें सामने रख रहे हैं। ऐसे में केवल मौखिक दावों के आधार पर स्वामित्व तय करने के बजाय वैज्ञानिक जांच का सहारा लेने का फैसला किया गया है।

    आईजी के निर्देश के अनुसार भैंस की डीएनए जांच कराई जाएगी। इसके लिए संबंधित पक्षों के दावों और जांच में सामने आने वाले तथ्यों को आधार बनाया जाएगा। डीएनए परीक्षण के परिणाम के बाद ही भैंस के वास्तविक मालिक की पहचान स्पष्ट होने की उम्मीद है।

    अधिकारियों के अनुसार, जांच पूरी होने तक मामले में किसी भी पक्ष के दावे को अंतिम नहीं माना जाएगा। डीएनए रिपोर्ट के आधार पर स्वामित्व से संबंधित स्थिति स्पष्ट होने के बाद आगे की कार्रवाई की जाएगी। इस मामले ने स्थानीय स्तर पर भी लोगों का ध्यान खींचा है, क्योंकि पशु के मालिकाना विवाद को सुलझाने के लिए पुलिस ने वैज्ञानिक परीक्षण का रास्ता अपनाया है।

  • एयरपोर्ट संचालकों के एयरलाइन कारोबार में उतरने पर कोई सरकारी रोक नहीं, कुछ PPP समझौतों में स्वामित्व की शर्तें लागू

    एयरपोर्ट संचालकों के एयरलाइन कारोबार में उतरने पर कोई सरकारी रोक नहीं, कुछ PPP समझौतों में स्वामित्व की शर्तें लागू


    नई दिल्ली ।
    केंद्र सरकार ने सोमवार को स्पष्ट किया कि देश में ऐसी कोई व्यापक सरकारी नीति लागू नहीं है, जो बड़े हवाई अड्डों के संचालकों को एयरलाइन कंपनियों में बड़ी हिस्सेदारी रखने या खुद एयरलाइन कारोबार संचालित करने से रोकती हो। सरकार का यह स्पष्टीकरण ऐसे समय में आया है जब भारत के तेजी से बढ़ते विमानन क्षेत्र में एयरपोर्ट संचालन और एयरलाइन कारोबार के बीच संभावित कारोबारी संबंधों को लेकर चर्चा बढ़ रही है। हालांकि, सरकार ने यह भी साफ किया कि सार्वजनिक-निजी भागीदारी यानी PPP मॉडल के तहत विकसित कुछ हवाई अड्डों के मौजूदा समझौतों में स्वामित्व से जुड़ी विशेष शर्तें मौजूद हैं।

    सरकार के अनुसार, प्रमुख हवाई अड्डों के संचालकों पर एयरलाइन कारोबार में प्रवेश को लेकर कोई सामान्य नीतिगत प्रतिबंध नहीं है। इसका मतलब यह है कि किसी एयरपोर्ट ऑपरेटर के लिए एयरलाइन कंपनी में पर्याप्त हिस्सेदारी रखना या एयरलाइन संचालन से जुड़ना अपने आप में प्रतिबंधित नहीं है। हालांकि, किसी विशेष हवाई अड्डे के लिए किए गए रियायत समझौते यानी कंसेशन एग्रीमेंट की शर्तें इस मामले में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।

    PPP मॉडल पर विकसित कुछ हवाई अड्डों के लिए किए गए मौजूदा समझौतों में ऐसी शर्तें रखी गई हैं, जिनके तहत अनुसूचित एयरलाइनों या उनसे संबंधित समूह कंपनियों और सहयोगी संस्थाओं को एयरपोर्ट संचालन करने वाली कंपनी में इक्विटी हिस्सेदारी रखने से सीमित किया गया है। इन प्रावधानों का उद्देश्य एयरपोर्ट संचालन और एयरलाइन कारोबार के बीच संभावित हितों के टकराव को नियंत्रित करना माना जाता है।

    सरकार ने यह भी बताया कि इस तरह के एक मौजूदा अनुबंध की शर्त में छूट देने का अनुरोध भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण के पास पहुंचा है। इस अनुरोध के जरिए संबंधित पक्ष एयरपोर्ट संचालन और एयरलाइन कारोबार के बीच मौजूदा स्वामित्व संबंधी सीमा में राहत चाहता है। यदि अनुबंध की शर्तों में बदलाव या छूट मिलती है तो संबंधित एयरपोर्ट संचालक के लिए एयरलाइन कारोबार में प्रवेश का रास्ता आसान हो सकता है।

    हालांकि, सरकार ने स्पष्ट किया है कि इस अनुरोध पर अभी नागर विमानन मंत्रालय की ओर से औपचारिक समीक्षा नहीं की गई है। यानी फिलहाल केवल अनुरोध प्राप्त हुआ है और उस पर अंतिम निर्णय या नीति संबंधी बदलाव की स्थिति नहीं बनी है। ऐसे में किसी एयरपोर्ट ऑपरेटर के एयरलाइन क्षेत्र में प्रवेश को लेकर तत्काल कोई निश्चित व्यवस्था मानना जल्दबाजी होगी।

    विमानन क्षेत्र में एयरपोर्ट और एयरलाइन के बीच कारोबारी संबंध लंबे समय से महत्वपूर्ण विषय रहे हैं। एक ही कारोबारी समूह के पास एयरपोर्ट और एयरलाइन से जुड़ी हिस्सेदारी होने पर प्रतिस्पर्धा, स्लॉट आवंटन, यात्री सेवाओं और अन्य कारोबारी फैसलों को लेकर सवाल उठ सकते हैं। दूसरी ओर, एकीकृत कारोबारी मॉडल के समर्थकों का मानना है कि इससे बुनियादी ढांचे और विमानन सेवाओं के बीच बेहतर तालमेल बनाया जा सकता है।

    भारत में हवाई यातायात और एयरपोर्ट इंफ्रास्ट्रक्चर का लगातार विस्तार हो रहा है। निजी निवेश और PPP मॉडल की भूमिका भी बढ़ी है। ऐसे में एयरपोर्ट संचालकों और एयरलाइन कंपनियों के बीच स्वामित्व संबंधों को लेकर आने वाले समय में नियमों और अनुबंधों की भूमिका महत्वपूर्ण रहेगी। फिलहाल सरकार के रुख से इतना स्पष्ट है कि एयरपोर्ट ऑपरेटरों के एयरलाइन कारोबार में उतरने पर कोई देशव्यापी सरकारी रोक नहीं है, लेकिन संबंधित PPP समझौतों की शर्तें किसी विशेष मामले में अलग स्थिति पैदा कर सकती हैं।