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  • अमेरिका-ईरान वार्ता फिर शुरू कराने में जुटा पाकिस्तान, शहबाज-मुनीर ने तेज की कूटनीतिक पहल

    अमेरिका-ईरान वार्ता फिर शुरू कराने में जुटा पाकिस्तान, शहबाज-मुनीर ने तेज की कूटनीतिक पहल

    नई दिल्ली। इस्लामाबाद में अमेरिका और ईरान के बीच हुई शुरुआती बातचीत बेनतीजा रहने के बाद पाकिस्तान ने दोनों देशों को फिर से वार्ता की मेज पर लाने के लिए अपनी कूटनीतिक गतिविधियां तेज कर दी हैं। यह दावा पाकिस्तानी अखबार द न्यूज इंटरनेशनल ने सरकारी सूत्रों के हवाले से किया है।

    पहले दौर की बातचीत नहीं दे सकी ठोस नतीजा
    रिपोर्ट के मुताबिक, प्रारंभिक वार्ता में कोई औपचारिक समझौता नहीं हो पाया, हालांकि दोनों पक्षों ने अपने-अपने रुख स्पष्ट रूप से सामने रखे। इसके बावजूद पाकिस्तान को उम्मीद है कि आगे बातचीत के जरिए समाधान की दिशा में प्रगति हो सकती है।

    वॉशिंगटन और तेहरान से लगातार संपर्क
    पाकिस्तान इस समय अमेरिका और ईरान दोनों के संपर्क में बना हुआ है और जल्द से जल्द दूसरे दौर की बातचीत शुरू करने की कोशिश कर रहा है। सूत्रों के अनुसार, 22 अप्रैल के आसपास समाप्त होने वाले संभावित सीजफायर से पहले किसी ठोस नतीजे तक पहुंचना प्राथमिक लक्ष्य है, ताकि क्षेत्र में तनाव दोबारा न बढ़े।

    डेडलाइन से पहले समाधान की कोशिश
    एक वरिष्ठ पाकिस्तानी अधिकारी ने कहा कि तय समयसीमा के भीतर इस मुद्दे को सुलझाने का प्रयास किया जा रहा है। साथ ही, इसी अवधि में दूसरे दौर की वार्ता आयोजित कराने की दिशा में भी लगातार प्रयास जारी हैं।

    शहबाज शरीफ के निर्देश पर चल रही पहल
    यह पूरी कूटनीतिक कवायद पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के निर्देश पर की जा रही है, जिससे स्पष्ट है कि इस्लामाबाद इस मामले को काफी अहम मान रहा है।

    डार और मुनीर कर रहे नेतृत्व
    पाकिस्तान के उपप्रधानमंत्री व विदेश मंत्री इसहाक डार और सेना प्रमुख आसिम मुनीर इस प्रक्रिया का नेतृत्व कर रहे हैं। पाकिस्तान दोनों देशों तक वार्ता फिर से शुरू करने का संदेश पहुंचा चुका है और अब उनके जवाब का इंतजार किया जा रहा है। पाकिस्तान को उम्मीद है कि जल्द ही सकारात्मक प्रतिक्रिया मिलेगी, जिससे तनावपूर्ण स्थिति को नियंत्रित किया जा सके और सीमित समय में कूटनीतिक समाधान निकाला जा सके।

  • दो नावों पर सवार पाकिस्तान, चीन के हथियार और अमेरिका की कृपा के बीच फंसी कूटनीति

    दो नावों पर सवार पाकिस्तान, चीन के हथियार और अमेरिका की कृपा के बीच फंसी कूटनीति

    नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच जब ईरान अमेरिका और इजरायल के बीच टकराव ने वैश्विक चिंता बढ़ा दी तब अचानक सीजफायर की घोषणा ने दुनिया को राहत दी। लेकिन इस युद्धविराम के पीछे जिस देश का नाम सामने आया उसने सभी को चौंका दिया। यह देश था पाकिस्तान जो खुद आर्थिक और सुरक्षा चुनौतियों से जूझ रहा है।

    अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सेना प्रमुख आसिम मुनीर का नाम लेकर सीजफायर का श्रेय दिए जाने के बाद इस्लामाबाद ने इसे अपनी बड़ी कूटनीतिक जीत के रूप में पेश करना शुरू कर दिया। हालांकि वैश्विक विश्लेषकों का मानना है कि यह कहानी इतनी सीधी नहीं है बल्कि इसके पीछे बड़ी शक्तियों का जटिल खेल छिपा है।

    असल में चीन लंबे समय से पाकिस्तान का आर्थिक और सैन्य सहयोगी रहा है। भारी कर्ज और हथियारों के सहारे पाकिस्तान की रणनीतिक स्थिति बनी हुई है। लेकिन हाल के वर्षों में आर्थिक दबाव और कर्ज वापसी की सख्ती ने पाकिस्तान को नई राह तलाशने पर मजबूर कर दिया है। ऐसे में अमेरिका के साथ रिश्तों को फिर से मजबूत करना उसके लिए एक जरूरी विकल्प बन गया।

    विशेषज्ञ मानते हैं कि सीजफायर के पूरे घटनाक्रम में पाकिस्तान की भूमिका एक स्वतंत्र मध्यस्थ की कम और एक संदेशवाहक की अधिक रही। चीन जो ईरान से तेल आपूर्ति पर काफी निर्भर है इस संघर्ष के लंबा खिंचने से खुद आर्थिक दबाव में आ सकता था। ऐसे में उसने पाकिस्तान के माध्यम से दबाव बनाकर स्थिति को नियंत्रित करने की कोशिश की।

    दूसरी ओर अमेरिका के लिए भी यह युद्ध लंबे समय तक जारी रखना आसान नहीं था। घरेलू दबाव और अंतरराष्ट्रीय आलोचना के बीच उसे एक ऐसे चेहरे की जरूरत थी जो मध्यस्थ के रूप में सामने आ सके। पाकिस्तान इस भूमिका के लिए उपयुक्त था क्योंकि वह पहले से ही दोनों खेमों से संवाद बनाए हुए था।

    यह भी साफ है कि पाकिस्तान की यह सक्रियता केवल शांति स्थापित करने की मंशा से नहीं थी। उसके सामने कई मोर्चों पर संकट खड़े हैं। अफगानिस्तान सीमा पर अस्थिरता आंतरिक आर्थिक संकट और बढ़ता कर्ज उसे लगातार दबाव में रखे हुए हैं। इसके अलावा भारत के साथ तनाव और सैन्य चुनौतियां भी उसकी स्थिति को कमजोर करती हैं।

    इसी कारण पाकिस्तान ने एक संतुलन साधने की रणनीति अपनाई है जिसमें वह एक तरफ चीन को नाराज नहीं करना चाहता और दूसरी ओर अमेरिका की कृपा भी हासिल करना चाहता है। यही वजह है कि वह दोनों देशों के बीच अपनी उपयोगिता साबित करने में जुटा है।

    कुल मिलाकर यह घटनाक्रम पाकिस्तान की कूटनीति से ज्यादा उसकी मजबूरी को उजागर करता है। चीन के कर्ज और अमेरिका के भरोसे के बीच फंसा पाकिस्तान अब हर उस मौके को भुनाने की कोशिश कर रहा है जिससे उसकी वैश्विक छवि सुधरे और आर्थिक राहत मिल सके। लेकिन यह संतुलन कितने समय तक टिकेगा यह आने वाले समय में ही साफ हो पाएगा।