Tag: Pakistan Economic Crisis

  • टोल-टैक्स में राहत नहीं तो तेल सप्लाई पर पड़ेगा असर, पाकिस्तान में ट्रांसपोर्टरों की हड़ताल से बढ़ी चिंता

    टोल-टैक्स में राहत नहीं तो तेल सप्लाई पर पड़ेगा असर, पाकिस्तान में ट्रांसपोर्टरों की हड़ताल से बढ़ी चिंता


    नई दिल्ली। पाकिस्तान पहले से आर्थिक परेशानियों से जूझ रहा है और अब देशव्यापी ट्रांसपोर्ट हड़ताल ने सरकार
    की मुश्किलें और बढ़ा दी हैं। सरकार के साथ बातचीत विफल होने के बाद गुड्स ट्रांसपोर्टर्स और ऑयल टैंकर ऑपरेटरों ने अनिश्चितकालीन चक्का जाम शुरू कर दिया है। शनिवार से शुरू हुई इस हड़ताल के कारण देशभर में मालवाहक ट्रकों और टैंकरों की आवाजाही प्रभावित हुई है। इसका सीधा असर जरूरी सामान खाद्य पदार्थों और पेट्रोलियम उत्पादों की सप्लाई पर पड़ने की आशंका है।

    मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक शुक्रवार रात ऑल पाकिस्तान गुड्स ट्रांसपोर्ट इत्तेहाद के प्रतिनिधियों और संघीय संचार मंत्री अलीम खान के बीच लंबी बातचीत हुई लेकिन दोनों पक्षों के बीच किसी ठोस समाधान पर सहमति नहीं बन सकी। बातचीत बेनतीजा रहने के बाद ट्रांसपोर्टरों ने अपनी सेवाएं बंद करने का फैसला किया और बड़ी संख्या में कमर्शियल मालवाहक वाहनों को सड़कों से हटाकर निर्धारित पार्किंग स्थानों पर खड़ा कर दिया गया।

    ट्रांसपोर्टरों का कहना है कि वे लंबे समय से सरकार के सामने अपनी समस्याएं रखते आ रहे हैं लेकिन उनकी मांगों पर पर्याप्त कार्रवाई नहीं हुई। ऑल पाकिस्तान गुड्स ट्रांसपोर्ट ओनर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष मोहम्मद ओवैस चौधरी ने कहा कि सरकार के सामने सभी जायज समस्याएं रखी गईं लेकिन बातचीत से कोई ठोस समाधान नहीं निकला। उनका कहना है कि जब तक मांगों को स्वीकार नहीं किया जाता तब तक देशव्यापी विरोध जारी रहेगा।

    इस हड़ताल में सिर्फ सामान्य मालवाहक वाहन ही शामिल नहीं हैं बल्कि खाद्य तेल के टैंकर पेट्रोलियम टैंकर भारी ट्रक ट्रेलर और अन्य इंटरसिटी कमर्शियल मालवाहक वाहन भी शामिल हैं। ऐसे में हड़ताल लंबी खिंचती है तो पाकिस्तान की सप्लाई चेन पर गंभीर असर पड़ सकता है।

    ट्रांसपोर्टरों की सबसे प्रमुख मांगों में एक्सल लोड और वाहन क्षमता से जुड़े नियमों में एकरूपता शामिल है। उनका कहना है कि पूरे देश में एक्सल लोड नियम समान रूप से लागू किए जाएं और 10 पहियों वाले वाहनों को 35 टन तक माल ले जाने की अनुमति दी जाए। इसके अलावा डीजल की बढ़ती कीमतों में राहत मोटरवे टोल टैक्स कम करने और ट्रांसपोर्ट सेक्टर को विदहोल्डिंग टैक्स में राहत देने की मांग भी की गई है।

    ट्रांसपोर्टर कस्टम कानूनों के तहत वाहनों की जब्ती के नियमों में बदलाव और हाईवे पर लगाए जाने वाले भारी जुर्माने को खत्म करने की मांग भी कर रहे हैं। इसके साथ ही पंजाब हाईवे पेट्रोल को कमर्शियल वाहनों के चालान काटने का अधिकार दिए जाने का भी विरोध किया जा रहा है। भारी वाहन लाइसेंस जारी करने की प्रक्रिया को आसान बनाने की मांग भी उनकी प्रमुख मांगों में शामिल है।

    सरकार की ओर से बातचीत दोबारा शुरू करने की बात कही गई है। संचार मंत्री अलीम खान के अनुसार सोमवार को ट्रांसपोर्टरों के साथ बातचीत का एक और दौर हो सकता है। हालांकि ट्रांसपोर्टर मांगें पूरी होने तक हड़ताल खत्म करने के मूड में नहीं हैं।

    अगर यह चक्का जाम लंबे समय तक जारी रहता है तो पाकिस्तान के बड़े शहरों में रोजमर्रा की जरूरी चीजों की आपूर्ति प्रभावित हो सकती है। लाहौर कराची इस्लामाबाद और पेशावर जैसे शहरों में खाद्य पदार्थों के साथ पेट्रोल और डीजल की उपलब्धता पर भी दबाव बढ़ सकता है। ऐसे में सरकार के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती ट्रांसपोर्टरों की मांगों और आर्थिक दबाव के बीच ऐसा रास्ता निकालना है जिससे देश की सप्लाई चेन को पूरी तरह चरमराने से बचाया जा सके।

  • आर्थिक संकट के बीच पाकिस्तान का बढ़ता रक्षा बजट: 10 साल में ढाई गुना उछाल, फंडिंग और पारदर्शिता पर उठे सवाल

    आर्थिक संकट के बीच पाकिस्तान का बढ़ता रक्षा बजट: 10 साल में ढाई गुना उछाल, फंडिंग और पारदर्शिता पर उठे सवाल


    नई दिल्ली। गंभीर आर्थिक संकट से जूझ रहे पाकिस्तान में एक ओर जहां सरकार अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं से राहत पैकेज पर निर्भर है, वहीं दूसरी ओर देश का रक्षा खर्च लगातार बढ़ता जा रहा है। पिछले एक दशक में पाकिस्तान का सैन्य बजट करीब ढाई गुना बढ़कर 2.5 ट्रिलियन पाकिस्तानी रुपये के पार पहुंच गया है, जिसने वित्तीय प्राथमिकताओं और पारदर्शिता को लेकर नई बहस छेड़ दी है।

    उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, 2016 के आसपास जहां रक्षा बजट करीब 1.08 ट्रिलियन पाकिस्तानी रुपये था, वहीं हाल के वर्षों में इसमें तेज बढ़ोतरी दर्ज की गई है। यह वृद्धि ऐसे समय में हुई है जब पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था उच्च महंगाई, विदेशी कर्ज और कमजोर राजस्व ढांचे जैसी चुनौतियों से जूझ रही है।

    इस बीच International Monetary Fund और World Bank जैसी संस्थाएं पाकिस्तान के वित्तीय अनुशासन पर नजर बनाए हुए हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि रक्षा खर्च के वास्तविक आंकड़ों को लेकर पारदर्शिता की कमी लंबे समय से चिंता का विषय रही है। कई विश्लेषकों का मानना है कि सैन्य पेंशन, रणनीतिक कार्यक्रम और कुछ उच्च-मूल्य परियोजनाओं को अलग मदों में दर्शाया जाता है, जिससे कुल रक्षा व्यय की वास्तविक तस्वीर पूरी तरह सामने नहीं आ पाती।

    रक्षा आधुनिकीकरण के मोर्चे पर पाकिस्तान ने हाल के वर्षों में कई परियोजनाओं पर काम तेज किया है। इनमें नौसेना के बुनियादी ढांचे का विस्तार, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध क्षमताओं को मजबूत करना और नई सैन्य तकनीकों में निवेश शामिल है। साथ ही चीन के सहयोग से पनडुब्बियों और लड़ाकू विमानों की खरीद भी चर्चा में रही है।

    विशेषज्ञ यह भी बताते हैं कि पाकिस्तान की रक्षा फंडिंग का एक बड़ा हिस्सा बाहरी सहयोग पर आधारित है। चीन से दीर्घकालिक ऋण और रक्षा सहयोग के जरिए महंगी परियोजनाओं की लागत को लंबी अवधि में बांटा जाता है। इसके अलावा सऊदी अरब के साथ हुए समझौते के तहत ऊर्जा और वित्तीय सहायता भी पाकिस्तान की आर्थिक जरूरतों को सहारा देती है।

    हालांकि, इन व्यवस्थाओं के बावजूद सवाल यह उठता है कि आर्थिक दबाव के बीच बढ़ता रक्षा बजट देश की दीर्घकालिक आर्थिक स्थिरता पर क्या असर डालेगा। कुछ विशेषज्ञ इसे सुरक्षा जरूरतों के लिहाज से जरूरी बताते हैं, जबकि अन्य का मानना है कि सामाजिक और विकास क्षेत्रों की कीमत पर रक्षा खर्च बढ़ाना संतुलित नीति नहीं माना जा सकता।

    कुल मिलाकर, पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था और रक्षा प्राथमिकताओं के बीच यह असंतुलन आने वाले समय में और गहन समीक्षा की मांग करता है खासतौर पर तब, जब अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाएं देश की नीतियों पर करीबी नजर रखे हुए हैं।