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  • गणेश विसर्जन पर पंचक का साया: जाने कब तक रहेगा पंचक, ऐसे करें बप्पा की विदाई

    गणेश विसर्जन पर पंचक का साया: जाने कब तक रहेगा पंचक, ऐसे करें बप्पा की विदाई


    नई दिल्ली। गणेश उत्सव के समापन और बप्पा की विदाई के बीच इस बार पंचक का संयोग बन रहा है। 23 सितंबर की रात से पंचक शुरू होंगे और 25 सितंबर को अनंत चतुर्दशी के दिन गणेश विसर्जन होगा। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पंचक के दौरान कुछ कार्यों को करने की मनाही होती है, हालांकि पूजा-पाठ, धार्मिक अनुष्ठान और गणेश विसर्जन पर इसका कोई प्रतिबंध नहीं माना गया है।

    23 सितंबर की रात से शुरू होगा पंचक

    द्रिक पंचांग के अनुसार सितंबर 2026 में पंचक की शुरुआत 23 सितंबर, बुधवार रात 9:57 बजे से होगी। पंचक का समापन 28 सितंबर, सोमवार सुबह 10:16 बजे होगा। इस दौरान चंद्रमा 23 सितंबर की रात 9:56 बजे से 26 सितंबर की सुबह 5:32 बजे तक कुंभ राशि में और इसके बाद 28 सितंबर की सुबह 10:15 बजे तक मीन राशि में रहेगा।

    ज्योतिषीय मान्यता के अनुसार जब चंद्रमा कुंभ और मीन राशि में रहते हुए धनिष्ठा, शतभिषा, पूर्वा भाद्रपद, उत्तरा भाद्रपद और रेवती नक्षत्रों से गुजरता है, तब पंचक का निर्माण होता है। यह अवधि करीब पांच दिन की होती है। हिंदू धर्म और ज्योतिष में पंचक के दौरान कुछ शुभ और सामान्य कार्यों को करने से बचने की सलाह दी जाती है।

    पंचक के बीच गणेश विसर्जन और पितृ पक्ष

    इस बार पंचक के दौरान कई महत्वपूर्ण धार्मिक अवसर भी पड़ रहे हैं। 24 सितंबर को गुरु प्रदोष व्रत, 25 सितंबर को अनंत चतुर्दशी और इसी दिन गणेश प्रतिमाओं का विसर्जन किया जाएगा। अनंत चतुर्दशी पर भगवान विष्णु के अनंत स्वरूप की पूजा का भी विधान है। इसके अगले दिन यानी 26 सितंबर से पितृ पक्ष शुरू होगा।

    ऐसे में गणेश भक्तों के सामने यह सवाल है कि पंचक के दौरान बप्पा का विसर्जन किया जा सकता है या नहीं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पंचक में गणेश विसर्जन करने में कोई बाधा नहीं मानी जाती। पंचक के दौरान पूजा-पाठ और धार्मिक अनुष्ठान किए जा सकते हैं। गणपति को विघ्नहर्ता माना जाता है, इसलिए पंचक के बीच भी श्रद्धा और विधि-विधान से गणेश प्रतिमा का विसर्जन किया जा सकता है।

    इसी तरह 26 सितंबर से शुरू होने वाले पितृ पक्ष में श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान जैसे कर्म करने पर भी पंचक की कोई बाधा नहीं मानी गई है। श्रद्धालु पितरों की आत्मा की शांति के लिए पहले दिन से ही विधिवत श्राद्ध कर्म कर सकते हैं।

    इन कामों से पंचक में बचने की मान्यता

    सितंबर में पड़ने वाला यह पंचक बुधवार से शुरू हो रहा है। ज्योतिषीय मान्यताओं में शुक्रवार से शुरू होने वाले पंचक को चोर पंचक, शनिवार से शुरू होने वाले पंचक को मृत्यु पंचक और मंगलवार से शुरू होने वाले पंचक को अग्नि पंचक कहा जाता है। बुधवार से शुरू होने वाले पंचक को इनकी तरह विशेष रूप से अशुभ नहीं माना जाता। फिर भी पंचक के दौरान सामान्य तौर पर जिन कार्यों को करने से बचने की सलाह दी जाती है, उन्हें टालना उचित माना जाता है।

    लकड़ी या लकड़ी से बनी वस्तुएं खरीदने से बचें।
    पलंग या बिस्तर खरीदने से बचने की मान्यता है।
    नए घर का निर्माण शुरू करना, छत डलवाना या पहली चौखट लगाना टालना चाहिए।
    दक्षिण दिशा की यात्रा करने से भी बचने की सलाह दी जाती है।

    धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है जानकारी
    पंचक, गणेश विसर्जन और श्राद्ध से जुड़े नियम धार्मिक मान्यताओं और पंचांग की गणना पर आधारित हैं। अलग-अलग क्षेत्रों और पंचांगों में तिथि, मुहूर्त और नियमों में अंतर हो सकता है। इसलिए किसी विशेष पूजा, विसर्जन या धार्मिक कर्म के लिए स्थानीय पंचांग और विद्वान या पुरोहित की सलाह लेना उचित माना जाता है।

  • पूर्णिमा सुबह 09:09 बजे से प्रारंभ…. आज पूरे दिन भद्रा का साया और कल पंचक, जानें राखी बांधने का शुभ मुहूर्त!

    पूर्णिमा सुबह 09:09 बजे से प्रारंभ…. आज पूरे दिन भद्रा का साया और कल पंचक, जानें राखी बांधने का शुभ मुहूर्त!


    नई दिल्ली।
    हिंदू धर्म ( Hinduism) में सावन पूर्णिमा (Sawan Purnima) का विशेष महत्व है। इस दिन रक्षा बंधन (Raksha Bandhan) या राखी का त्योहार मनाया जाता है। यह पर्व भाई-बहन के अटूट प्रेम, विश्वास और स्नेह का प्रतीक है। इस साल सावन पूर्णिमा तिथि 27 अगस्त को सुबह 09: 09 मिनट पर प्रारंभ हो गई है और 28 अगस्त 2026 को सुबह 09:47 बजे समाप्त होगी।

    प्रदोष काल और चंद्रोदय के समय पूर्णिमा तिथि व्याप्त होने के कारण सावन पूर्णिमा व्रत आज 27 अगस्त को है। 27 अगस्त को पूर्णिमा व्रत के दिन भद्रा और पंचक का साया भी रहेगा। इस बार पूर्णिमा तिथि पर चंद्र ग्रहण का संयोग भी बन रहा है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या चंद्र ग्रहण (Lunar Eclipse) के कारण सावन पूर्णिमा व्रत के दिन ही रक्षा बंधन मनाया जाएगा और भद्रा के कारण राखी बांधने में अड़चन आएगी या नहीं। आइए जानते हैं रक्षा बंधन कब मनाएं?

    27 या 28 अगस्त कब मनाएं रक्षा बंधन:

    पंडित नरेंद्र उपाध्याय के अनुसार, हिंदू धर्म में किसी भी पर्व या त्योहार को उदया तिथि में मनाना सर्वोत्तम माना गया है। सावन पूर्णिमा तिथि 27 अगस्त को सुबह प्रारंभ होगी। शास्त्रों में पूर्णिमा व्रत का विधान उस दिन है, दिन समय पूर्णिमा तिथि के साथ चंद्रोदय होता है। ऐसा संयोग 27 अगस्त को ही मिल रहा है। 28 अगस्त को सुबह के समय पूर्णिमा तिथि समाप्त हो जाएगी जिसके कारण पूर्णिमा युक्त चंद्रोदय संभव नहीं है। इसलिए सावन पूर्णिमा का व्रत 27 अगस्त को मान्य रहेगा।

    अगर रक्षा बंधन के पर्व की बात करें तो यह त्योहार हमेशा भद्रा रहित पूर्णिमा में मनाना उत्तम माना गया है। 27 अगस्त को भद्रा सुबह 07 बजे से शाम 06:02 बजे तक रहेगी। 28 अगस्त को सूर्योदय से पूर्व भद्रा समाप्त हो जाएगी और उदया पूर्णिमा मिलेगी। इसलिए उदयाव्यापी पूर्णिमा में रक्षा बंधन और सावन पूर्णिमा का स्नान-दान मनाना उत्तम रहने वाला है। हालांकि इस दिन पंचक भी रहेगा। लेकिन रक्षा बंधन पर भद्रा ज्यादा महत्वपूर्ण मानी गई है। मान्यता है कि भद्रा काल में भाई को राखी बांधने से भाई-बहन दोनों को ही नकारात्मक फलों की प्राप्ति होती है। इसलिए भद्रा के समय राखी बांधने से बचना चाहिए।


    28 अगस्त को राखी बांधने का शुभ मुहूर्त:

    28 अगस्त 2026 को भाई की कलाई पर राखी बांधने का सबसे उत्तम और श्रेष्ठ मुहूर्त सुबह 5:57 बजे से सुबह 9:48 बजे तक रहेगा। अगर आप सुबह के समय राखी नहीं बांध पाते हैं तो दोपहर 12:04 बजे से दोपहर 12:53 बजे तक भी राखी बांधने का शुभ मुहूर्त रहेगा। शुभ मुहूर्त में राखी बांधना अत्यंत शुभ माना गया है। भद्रा विराजमान नहीं होने के कारण 28 अगस्त को पूरे दिन राखी का पर्व मनाया जा सकेगा। हालांकि राहुकाल का विचार अनिवार्य है।

    28 अगस्त को राहुकाल कब से कब तक है:
    ज्योतिष शास्त्र में राहुकाल को शुभ नहीं माना गया है। मान्यता है कि इस समय किए गए कार्यों का अशुभ फल प्राप्त होता है। 28 अगस्त को राहुकाल सुबह 10:46 बजे से दोपहर 12:22 बजे के बीच रहेगा।


    चंद्र ग्रहण का राखी पर असर:

    28 अगस्त को साल का दूसरा और आखिरी चंद्र ग्रहण लगेगा। भारतीय समयानुसार इस ग्रहण की शुरुआत सुबह 06 बजकर 53 मिनट पर होगी और दोपहर 12 बजकर 32 मिनट पर समाप्त होगा। यह ग्रहण अपने चरम पर सुबह 09 बजकर 43 मिनट के आसपास होगा। यह ग्रहण दिन में लगेगा, जिसके कारण भारत में यह नजर नहीं आएगा। ग्रहण नहीं दिखने के कारण इसका सूतक काल मान्य नहीं रहेगा। सूतक काल नहीं लगने के कारण चंद्र ग्रहण का राखी के पर्व पर कोई असर नहीं रहेगा।

  • चैत्र नवरात्रि 2026: घट स्थापना का शुभ मुहूर्त और पूजन से जुड़े महत्व

    चैत्र नवरात्रि 2026: घट स्थापना का शुभ मुहूर्त और पूजन से जुड़े महत्व


    नई दिल्ली । चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से ही चैत्र नवरात्रि की शुरुआत होती है। इस वर्ष 2026 में यह पर्व 19 मार्च गुरुवार से शुरू हो रहा है। पंचांग के अनुसार चैत्र अमावस्या 19 मार्च को सुबह 6:52 बजे समाप्त होगी और प्रतिपदा आरंभ होने के साथ ही नवरात्रि प्रारंभ होगी। नवरात्रि 9 दिनों तक चलने वाला यह पावन पर्व परंपरागत रूप से घटस्थापना या कलश स्थापना के साथ आरंभ होता है।

    घटस्थापना का उद्देश्य
    घटस्थापना देवी का आह्वान करने के लिए की जाती है। इसका महत्व केवल पूजा तक सीमित नहीं है बल्कि इससे घर में सुख-शांति सकारात्मक ऊर्जा और सौहार्द की भावना बनी रहती है। परिवार के सभी सदस्य मिलकर पूजा करते हैं जिससे आपसी प्रेम और सहयोग की भावना मजबूत होती है और नकारात्मक प्रभाव दूर होते हैं।

    कलश स्थापना का शुभ मुहूर्त

    अभिजीत मुहूर्त: दोपहर 12:05 से 12:53 तक लाभ चौघड़िया: 12:29 से 1:59 तक सुबह का शुभ मुहूर्त: सुबह 6:54 से 7:57 तक शुभ चौघड़िया इन समयों में घटस्थापना और कलश स्थापना करने से विशेष फल प्राप्त होते हैं और पूजा का प्रभाव अधिकतम माना जाता है।

    पंचक और खरमास

    15 मार्च से खरमास शुरू हो चुके हैं। इस दौरान मां दुर्गा और उनके नौ स्वरूपों के साथ सूर्य देव की पूजा करने से विशेष फलों की प्राप्ति होती है। नवरात्रि के दौरान पंचक भी रहेगा जिसकी शुरुआत 16 मार्च शाम 6:14 से होगी और समाप्ति 20 मार्च रात 2:28 तक होगी।इस चैत्र नवरात्रि पर निर्धारित शुभ मुहूर्त में घटस्थापना और कलश स्थापना कर आप घर में सुख-शांति और समृद्धि का मार्ग प्रशस्त कर सकते हैं।