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  • केपटाउन में दीपिका पादुकोण की 'किंग' साइज शूटिंग, तो मुंबई में नन्ही दुआ के साथ 'सुपर डैड' की भूमिका निभा रहे रणवीर सिंह।

    केपटाउन में दीपिका पादुकोण की 'किंग' साइज शूटिंग, तो मुंबई में नन्ही दुआ के साथ 'सुपर डैड' की भूमिका निभा रहे रणवीर सिंह।

    नई दिल्ली।
    भारतीय सिनेमा के सबसे ऊर्जावान और बहुमुखी अभिनेताओं में शुमार रणवीर सिंह इन दिनों पर्दे के पीछे एक बिल्कुल अलग और सराहनीय भूमिका में नजर आ रहे हैं। ‘धुरंधर’ और ‘धुरंधर-2’ जैसी लगातार दो ब्लॉकबस्टर फिल्में देने के बाद रणवीर ने अपनी पेशेवर प्राथमिकताओं को पूरी तरह से बदल लिया है। जहाँ पहले वह अपनी फिल्मों के प्रचार और कार्यक्रमों की चकाचौंध में डूबे रहते थे, वहीं अब वह एक समर्पित पिता और सहायक पति की जिम्मेदारी निभाने को सर्वोच्च महत्व दे रहे हैं। वर्तमान में दीपिका पादुकोण दक्षिण अफ्रीका के केपटाउन में शाहरुख खान के साथ अपनी बहुप्रतीक्षित फिल्म ‘किंग’ की शूटिंग में व्यस्त हैं। ऐसी स्थिति में रणवीर सिंह ने घर पर रहकर अपनी नन्ही बेटी दुआ पादुकोण का पूरा ख्याल रखने का फैसला किया है, ताकि दीपिका बिना किसी चिंता के अपना काम पूरा कर सकें।

    फिल्म जगत के जानकारों के अनुसार, रणवीर और दीपिका का एक-दूसरे के प्रति यह सहयोग और समझदारी वाकई मिसाल पेश करने वाली है। रणवीर ने ‘धुरंधर-2’ की अपार सफलता के बाद अपनी अगली बड़ी फिल्म ‘प्रलय’ पर काम शुरू करने से पहले परिवार के साथ समय बिताने का निर्णय लिया। उनकी बेटी दुआ के जन्म के बाद से ही रणवीर सिंह ने लाइमलाइट और सार्वजनिक कार्यक्रमों से थोड़ी दूरी बना ली है। उनके करीबी लोगों का कहना है कि पिता बनने के बाद रणवीर के व्यक्तित्व में काफी ठहराव और सकारात्मक बदलाव आए हैं। वे अब अपनी शूटिंग के व्यस्त शेड्यूल के बीच भी समय निकालकर अपने परिवार के पास लौटने का कोई भी मौका नहीं छोड़ते। उनके लिए उनकी बेटी दुआ एक ‘लकी चार्म’ की तरह है, जिसके आने के बाद से उनकी फिल्मों ने सफलता के नए कीर्तिमान स्थापित किए हैं।

    अगर उनके वर्क फ्रंट की बात करें, तो रणवीर सिंह अब किसी अन्य बड़े प्रोजेक्ट के बजाय अपना पूरा ध्यान फिल्म ‘प्रलय’ की तैयारी पर लगा रहे हैं। उन्होंने रचनात्मक मतभेदों के चलते कुछ पुराने प्रोजेक्ट्स से दूरी बना ली है और अब वह एक धमाकेदार अवतार में पर्दे पर लौटने की तैयारी में हैं। दूसरी ओर, दीपिका पादुकोण केपटाउन के खूबसूरत लोकेशन्स पर ‘किंग’ के जरिए एक बार फिर दर्शकों को रोमांचित करने के लिए तैयार हैं। इन दोनों सितारों का आपसी तालमेल यह स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि वे न केवल बड़े पर्दे पर एक सफल जोड़ी हैं, बल्कि अपनी निजी जिंदगी में भी एक-दूसरे के करियर और सपनों का पूरा सम्मान करते हैं। रणवीर का यह ‘सुपर डैड’ अवतार उनके प्रशंसकों के बीच काफी चर्चा और प्रशंसा बटोर रहा है।

  • विक्रांत मैसी की अनोखी पेरेंटिंग: बेटे के बर्थ सर्टिफिकेट पर नहीं लिखा कोई धर्म, बोले- 'यह मेरा अधिकार'

    विक्रांत मैसी की अनोखी पेरेंटिंग: बेटे के बर्थ सर्टिफिकेट पर नहीं लिखा कोई धर्म, बोले- 'यह मेरा अधिकार'


    नई दिल्ली । फिल्म ’12वीं फेल’ के जरिए हर घर में अपनी पहचान बनाने वाले विक्रांत मैसी इन दिनों अपनी प्रोफेशनल लाइफ से ज्यादा अपनी पर्सनल लाइफ और पेरेंटिंग स्टाइल को लेकर सुर्खियों में हैं। विक्रांत और उनकी पत्नी शीतल ठाकुर के घर पिछले साल 7 फरवरी 2024 को बेटे ‘वरदान’ का जन्म हुआ था। हाल ही में दिए एक इंटरव्यू में विक्रांत ने साझा किया कि उन्होंने अपने बेटे के कानूनी दस्तावेजों में धर्म की पहचान को अनिवार्य नहीं बनाया है।

    मल्टीकल्चरल परिवार और कड़वे अनुभव टाइम्स नाउ को दिए इंटरव्यू में विक्रांत ने बताया कि वह एक ऐसे परिवार से आते हैं जहाँ विभिन्न संस्कृतियों और धर्मों का संगम है। उन्होंने कहा कि उन्होंने अपने जीवन में धार्मिक तनाव और उसके नकारात्मक पहलुओं को बहुत करीब से देखा है। शायद यही वजह है कि वह अपने बेटे को बचपन से ही किसी खास धार्मिक लेबल में बांधना नहीं चाहते थे। विक्रांत ने स्पष्ट किया कि उनके इस फैसले का उद्देश्य अपने बेटे को उन तनावों से बचाना है जो अक्सर धर्म के नाम पर समाज में पैदा होते हैं।

    भारत सरकार के नियमों का हवाला विक्रांत ने अपने फैसले का बचाव करते हुए भारतीय कानून और सिस्टम की सराहना की। उन्होंने कहा कि भारत सरकार हमें यह विकल्प देती है कि हम आधिकारिक दस्तावेजों में धर्म का उल्लेख करना चाहते हैं या नहीं। उन्होंने इसकी तुलना उस नियम से की जिसके तहत अब सिंगल महिलाओं को पासपोर्ट पर पति का नाम देना अनिवार्य नहीं है। विक्रांत के मुताबिक सरकार द्वारा दी गई इस आजादी का इस्तेमाल करना उनका अधिकार है और उन्होंने वही किया जो उन्हें अपने बच्चे के भविष्य के लिए सही लगा।

    बेटे को दी चुनने की आजादी एक्टर ने इस बात पर जोर दिया कि वह चाहते हैं कि वरदान जब बड़ा हो जाए और दुनिया को समझने लगे तो वह खुद तय करे कि उसे किस विचारधारा या धर्म का पालन करना है। विक्रांत और शीतल की यह सोच आधुनिक भारत की एक नई तस्वीर पेश करती है जहाँ माता-पिता बच्चों पर अपनी पहचान थोपने के बजाय उन्हें स्वतंत्र व्यक्तित्व बनाने की ओर अग्रसर हैं। विक्रांत की इस सादगी और प्रगतिशील सोच की सराहना उनके चाहने वाले जमकर कर रहे हैं।