Tag: Parenting tips

  • दीवार से चूना खुरचकर खा रहा है बच्चा तो न करें नजरअंदाज, इस आदत के पीछे छिपी हो सकती है बड़ी वजह

    दीवार से चूना खुरचकर खा रहा है बच्चा तो न करें नजरअंदाज, इस आदत के पीछे छिपी हो सकती है बड़ी वजह


    नई दिल्ली। छोटे बच्चों में कई बार ऐसी आदतें देखने को मिलती हैं जिन्हें देखकर माता पिता हैरान रह जाते हैं। कुछ बच्चे दीवार से चूना खुरचकर खाने लगते हैं तो कुछ मिट्टी चॉक कागज या दूसरी ऐसी चीजें मुंह में डालते हैं जो खाने योग्य नहीं होतीं। शुरुआत में माता पिता इसे बच्चे की शरारत या जिज्ञासा समझकर नजरअंदाज कर सकते हैं लेकिन अगर बच्चा बार बार ऐसी चीजें खाने की कोशिश कर रहा है तो इस आदत पर ध्यान देना जरूरी है। विशेषज्ञों के अनुसार गैर खाद्य चीजों को लगातार खाने की इच्छा Pica जैसी स्थिति से जुड़ी हो सकती है। इसके अलावा शरीर में आयरन की कमी या एनीमिया जैसे पोषण संबंधी कारणों की भी जांच की जरूरत पड़ सकती है।

    बच्चे के चूना खाने के पीछे कई वजहें हो सकती हैं। छोटे बच्चे अक्सर आसपास की चीजों को देखकर और उन्हें छूकर समझने की कोशिश करते हैं इसलिए कभी कभी जिज्ञासा के कारण भी वे दीवार से निकला चूना मुंह में डाल सकते हैं। लेकिन अगर यह व्यवहार लगातार बना हुआ है और बच्चा चूने के अलावा मिट्टी चॉक या अन्य गैर खाद्य वस्तुएं भी खाने लगा है तो इसे सामान्य आदत मानकर छोड़ना ठीक नहीं है। ऐसी स्थिति में बाल रोग विशेषज्ञ से सलाह लेना बेहतर होता है ताकि बच्चे की स्थिति और पोषण संबंधी जरूरतों को समझा जा सके।

    चूना खाने से बच्चे के स्वास्थ्य पर भी प्रतिकूल असर पड़ सकता है। चूने के प्रकार और निगली गई मात्रा के आधार पर परेशानी अलग अलग हो सकती है। कुछ मामलों में पेट दर्द उल्टी कब्ज या पाचन तंत्र से जुड़ी समस्याएं हो सकती हैं। अगर बच्चे ने अधिक मात्रा में चूना निगल लिया है या उसके मुंह में जलन दर्द उल्टी अथवा सांस लेने जैसी परेशानी दिखाई दे रही है तो इसे हल्के में नहीं लेना चाहिए और तत्काल चिकित्सा सहायता लेनी चाहिए।

    बच्चे को इस आदत से बचाने के लिए सबसे पहले घर का वातावरण सुरक्षित बनाना जरूरी है। जहां से दीवार का चूना निकल रहा है उसे जल्द ठीक करवाएं और घर में रखा चूना पेंट पुट्टी या ऐसी दूसरी सामग्री बच्चे की पहुंच से दूर रखें। बच्चे को बार बार डांटने या डराने के बजाय प्यार से समझाएं और उसका ध्यान किसी खेल खिलौने या दूसरी गतिविधि की तरफ मोड़ें। इससे धीरे धीरे उसकी आदत को कम करने में मदद मिल सकती है।

    बच्चे के भोजन पर भी ध्यान देना जरूरी है। उसकी उम्र और जरूरत के अनुसार आयरन प्रोटीन और अन्य पोषक तत्वों से भरपूर संतुलित आहार देना चाहिए। हरी सब्जियां दालें चना राजमा अंडा और दूसरे पौष्टिक खाद्य पदार्थ बच्चे की डाइट का हिस्सा बनाए जा सकते हैं। हालांकि केवल चूना खाने की आदत देखकर माता पिता को खुद से आयरन या कोई दूसरा सप्लीमेंट शुरू नहीं करना चाहिए। जरूरत होने पर डॉक्टर जांच के बाद उचित सलाह दे सकते हैं।

    अगर बच्चा लगातार चूना मिट्टी चॉक या अन्य गैर खाद्य चीजें खाता है तो बाल रोग विशेषज्ञ से परामर्श लेना सबसे बेहतर कदम है। समय रहते कारण समझने और सही उपाय अपनाने से इस आदत को नियंत्रित किया जा सकता है। माता पिता का धैर्य बच्चे की सुरक्षा और जरूरत पड़ने पर डॉक्टर की सलाह इस समस्या से निपटने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

  • सर्दियों में बच्चों की सुरक्षा है सबसे जरूरी सही खानपान गर्म कपड़े और देखभाल से रहें फिट और हेल्दी

    सर्दियों में बच्चों की सुरक्षा है सबसे जरूरी सही खानपान गर्म कपड़े और देखभाल से रहें फिट और हेल्दी


    नई दिल्ली। सर्दियों का मौसम जहां एक ओर सुकून और खुशियां लेकर आता है वहीं छोटे बच्चों के लिए यह मौसम कई स्वास्थ्य चुनौतियां भी साथ लाता है। ठंडी हवा तापमान में गिरावट और संक्रमण का खतरा बच्चों को जल्दी बीमार बना सकता है। इस मौसम में सर्दी जुकाम खांसी बुखार निमोनिया और वायरल संक्रमण का जोखिम बढ़ जाता है। इसलिए माता पिता को बच्चों की देखभाल में अतिरिक्त सतर्कता बरतने की जरूरत होती है ताकि उनका स्वास्थ्य बेहतर बना रहे।

    सर्दियों में सबसे पहले बच्चों को मौसम के अनुसार गर्म कपड़े पहनाना जरूरी है। बच्चों को कई हल्की परतों वाले कपड़े पहनाना एक मोटे कपड़े से ज्यादा प्रभावी माना जाता है। सिर कान हाथ और पैरों को अच्छी तरह ढककर रखें क्योंकि शरीर की सबसे ज्यादा गर्मी इन्हीं हिस्सों से बाहर निकलती है। अगर बच्चा बाहर खेलने जा रहा है तो उसे टोपी मोजे और गर्म जूते जरूर पहनाएं।

    ठंड के मौसम में बच्चों का खानपान भी बेहद महत्वपूर्ण होता है। उन्हें ताजा और पौष्टिक भोजन दें जिसमें हरी सब्जियां मौसमी फल दाल दूध अंडा और सूखे मेवे शामिल हों। विटामिन सी और प्रोटीन से भरपूर आहार रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत बनाने में मदद करता है। बच्चों को पर्याप्त मात्रा में गुनगुना पानी पिलाते रहें क्योंकि सर्दियों में प्यास कम लगने के कारण शरीर में पानी की कमी हो सकती है।

    बच्चों को साफ सफाई की आदत भी जरूर सिखाएं। बाहर से आने के बाद हाथ साबुन से धोने की आदत संक्रमण के खतरे को काफी हद तक कम कर देती है। यदि घर में किसी सदस्य को सर्दी या खांसी है तो बच्चे को उसके सीधे संपर्क से बचाने की कोशिश करें। कमरे में पर्याप्त धूप और ताजी हवा आने दें ताकि वातावरण स्वच्छ बना रहे।

    सर्दियों में धूप बच्चों के लिए प्राकृतिक विटामिन डी का अच्छा स्रोत होती है। सुबह की हल्की धूप में कुछ समय बच्चों को खेलने या बैठने दें। इससे उनकी हड्डियां मजबूत होती हैं और शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता भी बेहतर होती है। हालांकि बहुत ज्यादा ठंडी हवा या कोहरे में बच्चों को लंबे समय तक बाहर न रखें।

    रात में बच्चों को पर्याप्त और आरामदायक नींद दिलाना भी जरूरी है। अच्छी नींद शरीर की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में मदद करती है। सोते समय कमरे का तापमान संतुलित रखें और बच्चे को जरूरत के अनुसार गर्म कंबल ओढ़ाएं लेकिन अत्यधिक गर्म कपड़ों से भी बचें ताकि उन्हें असहजता न हो।

    यदि बच्चे को लगातार तेज बुखार सांस लेने में तकलीफ लगातार खांसी या कमजोरी महसूस हो रही हो तो घरेलू उपायों पर निर्भर रहने के बजाय तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें। समय पर इलाज गंभीर बीमारियों से बचाव का सबसे सुरक्षित तरीका है।

    सर्दियों में थोड़ी सी सावधानी और नियमित देखभाल बच्चों को स्वस्थ रखने में बड़ी भूमिका निभाती है। सही खानपान पर्याप्त गर्माहट साफ सफाई और समय पर चिकित्सकीय सलाह अपनाकर माता पिता अपने बच्चों को ठंड के मौसम में भी सुरक्षित और ऊर्जावान रख सकते हैं।

  • मार्क्स नहीं हुनर बनाएगा सफल पेरेंट्स को डॉ संजीव अग्रवाल की सीख बच्चों को दें सीखने की आजादी

    मार्क्स नहीं हुनर बनाएगा सफल पेरेंट्स को डॉ संजीव अग्रवाल की सीख बच्चों को दें सीखने की आजादी


    मध्‍य प्रदेश आज के समय में शिक्षा केवल परीक्षा में अधिक अंक लाने तक सीमित नहीं रह गई है बल्कि बदलते दौर में सफलता का असली आधार ज्ञान के साथ कौशल और व्यक्तित्व विकास बन चुका है। ऐसे समय में सेज यूनिवर्सिटी के चांसलर और सेज ग्रुप के सीएमडी डॉ संजीव अग्रवाल ने अभिभावकों को महत्वपूर्ण संदेश देते हुए कहा है कि बच्चों को केवल नंबरों की दौड़ में उलझाने के बजाय उनकी प्रतिभा और स्किल्स को विकसित करने पर जोर देना चाहिए। उनका मानना है कि भविष्य में वही युवा सबसे आगे होंगे जिनके पास व्यावहारिक ज्ञान नई सोच और चुनौतियों का सामना करने की क्षमता होगी।

    डॉ संजीव अग्रवाल का कहना है कि शिक्षा का उद्देश्य केवल डिग्री दिलाना नहीं बल्कि ऐसे युवाओं का निर्माण करना होना चाहिए जो आत्मनिर्भर बनने के साथ दूसरों के लिए भी रोजगार के अवसर तैयार करें। उनका मानना है कि विश्वविद्यालयों को ऐसी शिक्षा व्यवस्था विकसित करनी चाहिए जहां छात्र सिर्फ नौकरी पाने की तैयारी न करें बल्कि नवाचार और उद्यमिता के माध्यम से जॉब क्रिएटर बनकर समाज और देश के विकास में योगदान दें।

    उन्होंने बताया कि सेज यूनिवर्सिटी में विद्यार्थियों के समग्र विकास पर विशेष ध्यान दिया जाता है। यदि कोई छात्र नियमित रूप से कक्षा में उपस्थित नहीं होता तो केवल सूचना देकर जिम्मेदारी पूरी नहीं की जाती बल्कि शिक्षक स्वयं उसके घर तक पहुंचते हैं और उसकी पढ़ाई से जुड़ी समस्याओं को समझने का प्रयास करते हैं। संस्थान का उद्देश्य हर छात्र को शिक्षा से जोड़कर रखना और उसकी क्षमता को सही दिशा देना है।

    डॉ अग्रवाल के अनुसार आज की शिक्षा केवल पुस्तकों तक सीमित नहीं रह सकती। इसलिए विश्वविद्यालय में स्किल डेवलपमेंट कार्यक्रमों के साथ उद्योग जगत के विशेषज्ञों को भी छात्रों से संवाद के लिए बुलाया जाता है। कैंपस में स्टार्टअप कॉन्क्लेव करियर डे और विभिन्न व्यावसायिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं ताकि विद्यार्थी वास्तविक दुनिया की चुनौतियों को समझ सकें और अपने करियर की बेहतर तैयारी कर सकें। उनका कहना है कि विद्यार्थियों को प्रकृति के करीब रहने व्यावहारिक सोच विकसित करने और नई परिस्थितियों में स्वयं निर्णय लेने का अवसर भी मिलना चाहिए।

    अपने छात्र जीवन को याद करते हुए उन्होंने कहा कि पहले शिक्षा का स्वरूप काफी अलग था। उस समय शिक्षक केवल किताबों तक सीमित ज्ञान देते थे लेकिन अब समय बदल चुका है। आज सफल होने के लिए कम्युनिकेशन स्किल्स लीडरशिप टीमवर्क और तकनीकी दक्षता जैसी क्षमताएं भी उतनी ही जरूरी हैं। उन्होंने स्वीकार किया कि उनके समय में भी कम अंक आने का डर रहता था लेकिन आज कई अभिभावक बच्चों पर जरूरत से ज्यादा दबाव डाल देते हैं जिससे उनका आत्मविश्वास प्रभावित होता है और वे अपनी वास्तविक प्रतिभा का प्रदर्शन नहीं कर पाते।

    युवाओं के लिए उनका संदेश भी स्पष्ट है कि सफलता मेहनत धैर्य और निरंतर सीखने की प्रक्रिया से मिलती है। यदि किसी प्रयास में तुरंत सफलता न मिले तो निराश होने की जरूरत नहीं बल्कि उसे अनुभव मानकर आगे बढ़ना चाहिए। उनका विश्वास है कि लगातार मेहनत करने वाले लोगों के लिए अवसर जरूर बनते हैं और ईमानदारी के साथ किया गया प्रयास कभी व्यर्थ नहीं जाता।

    डॉ संजीव अग्रवाल का मानना है कि भारत का भविष्य ऐसी शिक्षा व्यवस्था में छिपा है जो बच्चों को केवल अच्छे अंक नहीं बल्कि बेहतर इंसान जिम्मेदार नागरिक और सफल पेशेवर बनने की प्रेरणा दे। जब शिक्षा में स्किल्स नवाचार और नैतिक मूल्यों को बराबर महत्व मिलेगा तभी देश की युवा शक्ति वास्तव में राष्ट्र निर्माण की सबसे बड़ी ताकत बन सकेगी।

  • पुशी पेरेंटिंग से बचें बच्चों की सफलता नहीं बल्कि आत्मविश्वास भी छीन सकता है जरूरत से ज्यादा दबाव

    पुशी पेरेंटिंग से बचें बच्चों की सफलता नहीं बल्कि आत्मविश्वास भी छीन सकता है जरूरत से ज्यादा दबाव


    नई दिल्ली । आज के प्रतिस्पर्धी दौर में लगभग हर माता पिता अपने बच्चों को जीवन के हर क्षेत्र में सफल देखना चाहते हैं। अच्छी पढ़ाई बेहतर करियर और हर गतिविधि में उत्कृष्ट प्रदर्शन की इच्छा स्वाभाविक है लेकिन जब यही अपेक्षाएं बच्चों पर दबाव बनकर थोप दी जाती हैं तब यह उनके मानसिक और भावनात्मक विकास के लिए गंभीर खतरा बन सकती हैं। मनोविज्ञान में इस व्यवहार को पुशी पेरेंटिंग कहा जाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह पालन पोषण का ऐसा तरीका है जिसमें बच्चों से हमेशा सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन की उम्मीद की जाती है और उनकी व्यक्तिगत रुचियों भावनाओं तथा सीमाओं को नजरअंदाज कर दिया जाता है।

    मनोवैज्ञानिकों के अनुसार पुशी पेरेंटिंग में माता पिता अक्सर अपने अधूरे सपनों और महत्वाकांक्षाओं को बच्चों के माध्यम से पूरा करने की कोशिश करते हैं। बच्चे पर हमेशा बेहतर अंक लाने हर प्रतियोगिता में जीतने और हर क्षेत्र में सबसे आगे रहने का दबाव बनाया जाता है। बाहर से यह अनुशासन और सफलता की तैयारी जैसा दिखाई देता है लेकिन भीतर ही भीतर बच्चा लगातार तनाव और असुरक्षा की भावना से जूझता रहता है। वह पढ़ाई और गतिविधियों का आनंद लेने के बजाय केवल प्रदर्शन और परिणामों के बारे में सोचने लगता है।

    ऐसे माहौल में यदि बच्चा अच्छे अंक भी हासिल कर ले लेकिन प्रथम स्थान न ला पाए तो उसकी उपलब्धि की सराहना करने के बजाय उसे डांट या निराशा का सामना करना पड़ता है। धीरे धीरे उसके मन में यह भावना घर करने लगती है कि उसकी मेहनत की कोई अहमियत नहीं है और उसे तभी स्वीकार किया जाएगा जब वह दूसरों की अपेक्षाओं पर पूरी तरह खरा उतरे। इससे बच्चों में असफलता का डर बढ़ता है और उनका आत्मविश्वास कमजोर होने लगता है।

    पुशी पेरेंटिंग का एक और बड़ा नुकसान यह है कि बच्चों की अपनी पसंद और रुचियों को महत्व नहीं दिया जाता। कई बच्चों की रुचि खेल संगीत चित्रकला या अन्य रचनात्मक क्षेत्रों में होती है लेकिन माता पिता उन्हें अपनी पसंद के विषय या करियर की ओर धकेल देते हैं। लगातार ऐसा होने पर बच्चा अपनी इच्छाओं को दबा देता है और केवल दूसरों को खुश करने के लिए जीवन जीने लगता है। इससे उसकी रचनात्मकता और आत्मसंतुष्टि दोनों प्रभावित होती हैं।

    विशेषज्ञ यह भी बताते हैं कि बच्चों की लगातार दूसरों से तुलना करना उनके मानसिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक असर डालता है। जब बार बार किसी दूसरे बच्चे की उपलब्धियों का उदाहरण दिया जाता है तो बच्चा खुद को कमतर समझने लगता है। उसके भीतर हीन भावना पैदा होती है और धीरे धीरे वह अपनी क्षमताओं पर भरोसा खोने लगता है। यह स्थिति आगे चलकर चिंता अवसाद और आत्मविश्वास की कमी जैसी समस्याओं का कारण बन सकती है।

    कई परिवारों में माता पिता बच्चों के हर छोटे बड़े फैसले स्वयं लेने लगते हैं। क्या पहनना है क्या खाना है किससे दोस्ती करनी है या भविष्य में कौन सा विषय चुनना है जैसे निर्णय भी बच्चों को लेने का अवसर नहीं मिलता। इससे बच्चे में निर्णय लेने की क्षमता विकसित नहीं हो पाती और वह बड़े होने के बाद भी हर बात के लिए दूसरों पर निर्भर रहने लगता है।

    मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि बच्चों को सही दिशा देना और अनुशासन सिखाना जरूरी है लेकिन उनकी भावनाओं इच्छाओं और क्षमताओं का सम्मान करना भी उतना ही आवश्यक है। बच्चों को अपनी गलतियों से सीखने का अवसर देना चाहिए और उनकी सफलता के साथ साथ उनके प्रयासों की भी सराहना करनी चाहिए। सकारात्मक प्रोत्साहन और भरोसे का माहौल ही बच्चों के आत्मविश्वास मानसिक संतुलन और स्वस्थ व्यक्तित्व के विकास की मजबूत नींव बनता है।

  • क्या आपका बच्चा खाने की समस्या से जूझ रहा है? जानें ईटिंग डिसऑर्डर के संकेत और समाधान

    क्या आपका बच्चा खाने की समस्या से जूझ रहा है? जानें ईटिंग डिसऑर्डर के संकेत और समाधान

    नई दिल्ली ।आज की तेज रफ्तार जीवनशैली और डिजिटल दुनिया के बढ़ते प्रभाव ने बच्चों और किशोरों के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर गहरा असर डाला है। इन्हीं समस्याओं में से एक गंभीर स्थिति ईटिंग डिसऑर्डर यानी खाने से जुड़ी अनियमितता है, जो धीरे-धीरे बच्चे के शारीरिक स्वास्थ्य के साथ-साथ उसके मानसिक संतुलन को भी प्रभावित कर सकती है। इस समस्या में बच्चा खाने, वजन और शरीर की छवि को लेकर असामान्य सोच विकसित करने लगता है और अक्सर अपनी आत्म-छवि को केवल शरीर के आकार या वजन से जोड़ने लगता है।

    विशेषज्ञों के अनुसार यह समस्या किसी एक कारण से नहीं होती, बल्कि इसके पीछे कई मानसिक, सामाजिक और पारिवारिक कारक जिम्मेदार हो सकते हैं। बच्चों में बढ़ता तनाव, चिंता और अवसाद जैसी स्थितियां इस समस्या को जन्म दे सकती हैं। इसके अलावा आनुवंशिक प्रभाव, परिवार में पहले से किसी सदस्य को ऐसी समस्या होना और सोशल मीडिया पर दिखाए जाने वाले अवास्तविक सुंदरता के मानक भी बच्चों के सोचने के तरीके को प्रभावित करते हैं। इससे बच्चा अक्सर खुद को दूसरों से कमतर समझने लगता है और खाने-पीने के व्यवहार में बदलाव आने लगता है।

    ईटिंग डिसऑर्डर के शुरुआती संकेतों को समझना बेहद जरूरी है ताकि समय रहते स्थिति को नियंत्रित किया जा सके। इसमें बच्चा खाने के समय घबराहट या बेचैनी महसूस कर सकता है, कुछ विशेष खाद्य पदार्थों से दूरी बनाने लगता है, बार-बार कैलोरी गिनने या वजन को लेकर अत्यधिक चिंता करने लगता है। कई मामलों में बच्चा खाना छिपाकर खाने या खाने के बारे में झूठ बोलने जैसी आदतें भी विकसित कर सकता है। इसके साथ ही अत्यधिक व्यायाम करना और अपने शरीर या दिखावट को लेकर लगातार असंतोष जताना भी इसके संकेतों में शामिल हैं।

    विशेषज्ञों का मानना है कि यह समस्या किसी भी उम्र, लिंग या शारीरिक संरचना वाले बच्चे को प्रभावित कर सकती है। इसलिए माता-पिता और परिवार के सदस्यों की भूमिका इसमें सबसे महत्वपूर्ण होती है। बच्चों से बातचीत करते समय उन्हें डराने या दोष देने की बजाय समझ और सहानुभूति के साथ पेश आना चाहिए। उन्हें यह एहसास दिलाना जरूरी है कि स्वस्थ भोजन और संतुलित जीवनशैली आत्म-देखभाल का हिस्सा है, न कि कोई सजा या दबाव।

    घर के वातावरण में छोटे-छोटे बदलाव भी बड़े प्रभाव डाल सकते हैं। भोजन को ‘अच्छा’ या ‘बुरा’ कहने की बजाय संतुलित और पौष्टिक आहार पर जोर देना चाहिए। बच्चों को अपने शरीर की जरूरतों को समझना सिखाना चाहिए, जैसे भूख लगने पर खाना और पेट भरने पर रुक जाना। माता-पिता को खुद भी स्वस्थ खान-पान और संतुलित जीवनशैली अपनाकर उदाहरण प्रस्तुत करना चाहिए, क्योंकि बच्चे अक्सर अपने आसपास के व्यवहार को ही सीखते हैं।

    इसके अलावा परिवार के साथ समय बिताना, साथ मिलकर खाना बनाना और खाना खाने की प्रक्रिया को सकारात्मक अनुभव बनाना भी मददगार साबित हो सकता है। शारीरिक गतिविधियों को दबाव की बजाय खेल और मनोरंजन के रूप में अपनाना बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य को मजबूत करता है। साथ ही डिजिटल माध्यमों पर नजर रखना भी जरूरी है, ताकि बच्चे ऐसे कंटेंट से दूर रहें जो उन्हें अवास्तविक शरीर छवि और अस्वस्थ तुलना की ओर प्रेरित करता हो।

    यदि स्थिति गंभीर लगे तो देर न करते हुए विशेषज्ञ डॉक्टर या मनोवैज्ञानिक की मदद लेना सबसे सही कदम होता है। सही समय पर पहचान, सही संवाद और उचित मार्गदर्शन से ईटिंग डिसऑर्डर जैसी समस्या को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है और बच्चे को एक स्वस्थ व संतुलित जीवन की ओर आगे बढ़ाया जा सकता है।

  • Newborn Baby Bath Tips: नवजात को नहलाने का सही तरीका और जरूरी सावधानियां

    Newborn Baby Bath Tips: नवजात को नहलाने का सही तरीका और जरूरी सावधानियां


    नई दिल्ली। नवजात शिशु की देखभाल जितनी खुशी देती है, उतनी ही जिम्मेदारी भी मांगती है। खासतौर पर जब बात बच्चे को नहलाने की हो, तो माता-पिता को बेहद सतर्क रहने की जरूरत होती है। जन्म के बाद शुरुआती महीनों में शिशु की त्वचा बहुत कोमल होती है और उसका शरीर बाहरी वातावरण के अनुसार खुद को पूरी तरह ढाल नहीं पाता। ऐसे में नहलाते समय की गई छोटी-सी गलती भी बच्चे के लिए परेशानी का कारण बन सकती है।
    विशेषज्ञों के अनुसार, नवजात या प्रीमैच्योर बच्चे को नहलाते समय पानी का तापमान सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण होता है। पानी हमेशा हल्का गुनगुना होना चाहिए। ज्यादा गर्म पानी बच्चे की त्वचा को नुकसान पहुंचा सकता है, जबकि ठंडा पानी सर्दी-जुकाम या शरीर का तापमान गिरने का कारण बन सकता है। नहलाने से पहले हाथ से पानी का तापमान जरूर जांच लेना चाहिए।
    बच्चे को लंबे समय तक पानी में रखना भी सही नहीं माना जाता। नवजात शिशु जल्दी ठंड पकड़ लेते हैं, इसलिए उनका स्नान बहुत कम समय में और आरामदायक तरीके से होना चाहिए। कई लोग बच्चे को तेजी से रगड़कर साफ करने लगते हैं, लेकिन ऐसा करना नुकसानदायक हो सकता है। शिशु की त्वचा बेहद संवेदनशील होती है, इसलिए उसे हमेशा मुलायम कपड़े और हल्के हाथों से साफ करना चाहिए।
    डॉक्टरों का मानना है कि तेज खुशबू वाले साबुन, बॉडी वॉश या केमिकल युक्त प्रोडक्ट नवजात की त्वचा पर बुरा असर डाल सकते हैं। इसलिए बच्चे के लिए केवल माइल्ड और डॉक्टर द्वारा सुझाए गए प्रोडक्ट का ही इस्तेमाल करना चाहिए। कई मामलों में सिर्फ साफ गुनगुने पानी और मुलायम कपड़े से सफाई करना ही पर्याप्त होता है।
    नहलाते समय कमरे का तापमान भी सामान्य और आरामदायक होना चाहिए। ठंडी हवा, तेज पंखा या एसी वाले कमरे में बच्चे को नहलाने से वह जल्दी बीमार पड़ सकता है। स्नान के तुरंत बाद बच्चे को मुलायम तौलिए से अच्छी तरह सुखाकर गर्म कपड़े पहनाना जरूरी है।
    विशेषज्ञ यह भी बताते हैं कि हर दिन नवजात को पानी से नहलाना जरूरी नहीं होता। खासकर प्रीमैच्योर बच्चों के लिए स्पंज बाथ यानी गीले मुलायम कपड़े से शरीर साफ करना ज्यादा सुरक्षित माना जाता है। इससे बच्चा साफ भी रहता है और ठंड लगने का खतरा भी कम होता है।
    अगर बच्चे को नहलाने के बाद त्वचा लाल हो जाए, ज्यादा रोना आए, सांस लेने में दिक्कत हो या शरीर ठंडा महसूस हो, तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए। सही देखभाल और सावधानी के साथ ही नवजात शिशु स्वस्थ और सुरक्षित रह सकता है।
  • खाने में नखरे करने वाले बच्चों के लिए 7 असरदार टिप्स, माता-पिता की टेंशन होगी कम

    खाने में नखरे करने वाले बच्चों के लिए 7 असरदार टिप्स, माता-पिता की टेंशन होगी कम

    नई दिल्ली । बच्चों का खाने के समय नखरे करना आजकल बहुत आम समस्या बन गई है। कई माता-पिता इस बात से परेशान रहते हैं कि उनका बच्चा ठीक से खाना नहीं खाता और जरूरी पोषक तत्वों की कमी हो सकती है। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि सही तरीका अपनाकर और धैर्य रखकर इस आदत को आसानी से बदला जा सकता है।

    छोटे बच्चों का स्वाद समय-समय पर बदलता रहता है, इसलिए किसी भी नए खाने को तुरंत पसंद कर लेना उनके लिए जरूरी नहीं होता। ऐसे में माता-पिता को लगातार प्रयास करते रहना चाहिए और छोटे-छोटे बदलावों के साथ उन्हें नए स्वाद से परिचित कराना चाहिए।

    सबसे पहले जरूरी है कि बच्चे को बार-बार नए खाने का स्वाद चखने का मौका दिया जाए। कई बार किसी चीज को स्वीकार करने में समय लगता है, इसलिए एक ही बार में हार मान लेना सही नहीं है। नए खाने को उनकी पसंदीदा चीजों के साथ मिलाकर देना भी एक अच्छा तरीका हो सकता है।

    इसके साथ ही बच्चों को अलग-अलग तरह का पौष्टिक भोजन देने पर ध्यान देना चाहिए। फल, सब्जियां, अनाज, दालें और डेयरी उत्पाद जैसे खाद्य पदार्थ उनके रोज के आहार का हिस्सा बनने चाहिए। खाने में रंग, स्वाद और बनावट की विविधता बच्चों को आकर्षित करती है और उनकी रुचि बढ़ाती है।

    बच्चों को खाने की प्रक्रिया में शामिल करना भी बेहद प्रभावी तरीका माना जाता है। जब बच्चे खुद सब्जियां चुनते हैं या खाना बनाने में मदद करते हैं तो उनका खाने के प्रति उत्साह बढ़ जाता है। इससे वे खाने को एक जिम्मेदारी और मजेदार गतिविधि के रूप में देखने लगते हैं।

    एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि बच्चों पर खाने का दबाव नहीं डालना चाहिए। जब तक बच्चा स्वस्थ है और उसका विकास सामान्य है, तब तक उसे उसकी भूख के अनुसार खाने देना बेहतर होता है। जबरदस्ती करने से अक्सर खाने के प्रति नकारात्मक सोच विकसित हो सकती है।

    खाने की मात्रा भी उम्र के अनुसार संतुलित होनी चाहिए। छोटे हिस्सों में भोजन देना बच्चों के लिए अधिक आसान और स्वीकार्य होता है। साथ ही, अच्छे खाने की आदतों के लिए तारीफ करना भी उन्हें प्रोत्साहित करता है।

    खाने को इनाम या सजा से जोड़ना भी सही नहीं माना जाता, क्योंकि इससे बच्चे भोजन को गलत तरीके से समझने लगते हैं। इसके बजाय स्वस्थ खाने को रोजमर्रा की सामान्य आदत बनाना जरूरी है।

    सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि बच्चे वही सीखते हैं जो वे अपने माता-पिता को करते हुए देखते हैं। अगर घर में सभी लोग मिलकर संतुलित और पौष्टिक भोजन करते हैं, तो बच्चे भी धीरे-धीरे उसी आदत को अपनाने लगते हैं।

  • मोबाइल-टीवी की लत बना रही बच्चों का बचपन कैद: सेहत और दिमाग पर पड़ रहा गहरा असर

    मोबाइल-टीवी की लत बना रही बच्चों का बचपन कैद: सेहत और दिमाग पर पड़ रहा गहरा असर

    नई दिल्ली । आज के डिजिटल युग में जहां तकनीक ने जीवन को आसान बनाया है, वहीं इसका एक चिंताजनक पहलू भी तेजी से सामने आ रहा है—बच्चों में बढ़ती स्क्रीन की लत। घरों में अक्सर यह नजारा आम हो गया है कि बच्चे मैदान में खेलने के बजाय घंटों मोबाइल या टीवी स्क्रीन के सामने बैठे रहते हैं। शुरुआत में यह माता-पिता के लिए सुविधा का जरिया लगता है, लेकिन धीरे-धीरे यही आदत बच्चों के शारीरिक और मानसिक विकास के लिए खतरा बन जाती है।

    व्यस्त जीवनशैली के चलते कई पेरेंट्स बच्चों को शांत रखने या खाना खिलाने के लिए उनके हाथ में मोबाइल दे देते हैं। यह तरीका भले ही तुरंत काम कर जाए, लेकिन लंबे समय में यह एक तरह की डिजिटल निर्भरता पैदा कर देता है। जब बच्चा स्क्रीन की दुनिया में खो जाता है, तो उसका वास्तविक दुनिया से जुड़ाव कम होने लगता है, जिससे उसके सामाजिक कौशल प्रभावित होते हैं। दोस्तों के साथ खेलना, बातचीत करना और भावनाओं को समझना—ये सभी क्षमताएं धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगती हैं।

    स्क्रीन टाइम का असर बच्चों की सेहत पर भी साफ नजर आने लगा है। जहां पहले बच्चे घंटों बाहर खेलते थे, वहीं अब उनका समय वीडियो गेम और कार्टून में बीतता है। इस बदलाव के कारण मोटापा, आंखों में जलन, सूखापन और कम उम्र में चश्मा लगने जैसी समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं। लंबे समय तक एक ही जगह बैठने से रीढ़ की हड्डी पर भी असर पड़ता है। इसके अलावा स्क्रीन से निकलने वाली ब्लू लाइट बच्चों की नींद को प्रभावित करती है, जिससे उनकी दिनचर्या बिगड़ जाती है और वे चिड़चिड़े व थके हुए महसूस करते हैं।

    मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, अत्यधिक स्क्रीन टाइम बच्चों के दिमागी विकास पर भी असर डालता है। उनकी ध्यान केंद्रित करने की क्षमता घटने लगती है और वे जल्दी बोर या अधीर हो जाते हैं। डिजिटल कंटेंट की तेज गति उन्हें तुरंत परिणाम की आदत डाल देती है, जिससे धैर्य और एकाग्रता कमजोर हो जाती है। इसके साथ ही, वर्चुअल दुनिया में ज्यादा समय बिताने से बच्चों में सहानुभूति और सामाजिक समझ भी कम होने लगती है।

    हालांकि यह भी सच है कि आज के दौर में बच्चों को तकनीक से पूरी तरह दूर रखना संभव नहीं है। ऑनलाइन पढ़ाई, शैक्षणिक ऐप्स और जानकारी से भरपूर वीडियो उनके विकास के लिए जरूरी हैं। लेकिन असली चुनौती जरूरत और लत के बीच संतुलन बनाए रखने की है। तकनीक का उपयोग एक साधन के रूप में होना चाहिए, न कि आदत या निर्भरता के रूप में।

    इस समस्या से बचाव के लिए माता-पिता को सक्रिय भूमिका निभानी होगी। बच्चों के लिए स्क्रीन टाइम की एक निश्चित सीमा तय करना जरूरी है। इसके साथ ही उन्हें आउटडोर खेल, किताबें पढ़ने, पेंटिंग, संगीत या अन्य रचनात्मक गतिविधियों की ओर प्रोत्साहित करना चाहिए। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि बच्चे अपने बड़ों से सीखते हैं, इसलिए माता-पिता को खुद भी मोबाइल और स्क्रीन का सीमित उपयोग करना चाहिए।

    अगर समय रहते इस आदत पर नियंत्रण नहीं किया गया, तो यह बच्चों के भविष्य के लिए गंभीर चुनौती बन सकती है। इसलिए जरूरी है कि डिजिटल दुनिया और वास्तविक जीवन के बीच संतुलन बनाकर ही बच्चों का स्वस्थ और खुशहाल बचपन सुनिश्चित किया जाए।

  • एथलीट पेरेंट्स की दुविधा: जब बच्चे का मन न लगे मैदान में, तो दबाव नहीं 'डायरेक्शन' बदलें

    एथलीट पेरेंट्स की दुविधा: जब बच्चे का मन न लगे मैदान में, तो दबाव नहीं 'डायरेक्शन' बदलें


    नई दिल्ली । अक्सर देखा जाता है कि जिन घरों में माता-पिता खुद खेल की दुनिया के दिग्गज रहे हैं, वहां समाज और परिवार को उम्मीद होती है कि उनका बच्चा भी उसी विरासत को आगे बढ़ाएगा। लेकिन हकीकत इससे अलग हो सकती है। अगर आप एक एथलीट हैं और आपका बेटा स्पोर्ट्स में रुचि नहीं ले रहा, तो यह आपके लिए निराशाजनक हो सकता है, लेकिन यहाँ यह समझना जरूरी है कि ‘जबरदस्ती का खेल’ कभी चैंपियन पैदा नहीं करता।

    रुचि न होने के पीछे छिपे मनोवैज्ञानिक कारण अक्सर माता-पिता बच्चे की अरुचि को उसका ‘आलस’ मान लेते हैं, जबकि इसके पीछे कई गहरे मनोवैज्ञानिक कारण हो सकते हैं। सबसे बड़ा कारण ‘परफॉर्मेंस प्रेशर’ होता है। जब बच्चा देखता है कि उसके माता-पिता खेल में सफल रहे हैं, तो उसे हारने से डर लगने लगता है। उसे लगता है कि अगर वह अच्छा नहीं खेला, तो वह अपने माता-पिता के नाम को छोटा कर देगा। इसके अलावा, खेल के मैदान पर होने वाला सोशल जजमेंट या एंग्जाइटी भी उसे पीछे धकेलती है। कभी-कभी कारण शारीरिक भी होते हैं, जैसे लो-एनर्जी लेवल या किसी खेल विशेष में रुचि की कमी। सख्त कोच का व्यवहार या साथी खिलाड़ियों से लगातार तुलना भी बच्चे के मन में खेल के प्रति नफरत पैदा कर सकती है।

    फोर्स करना क्यों हो सकता है खतरनाक? यदि आप बच्चे को उसकी इच्छा के विरुद्ध मैदान पर भेजते हैं, तो इसके परिणाम नकारात्मक हो सकते हैं। जबरदस्ती करने से बच्चा न केवल खेल से दूर होगा, बल्कि उसका आत्मविश्वास भी डगमगा सकता है। दबाव में खेलने से उसमें चिड़चिड़ापन, तनाव और माता-पिता के प्रति विद्रोह की भावना पैदा हो सकती है। खेल जो खुशी और मानसिक शांति का माध्यम होना चाहिए, वह उसके लिए एक ‘बोझ’ बन जाता है। लॉन्ग टर्म में, यह आपके और बच्चे के बीच के भावनात्मक रिश्ते को भी कमजोर कर सकता है।

    क्या करें कि वह खेलों में रुचि ले? बतौर पेरेंट्स आपकी पहली जिम्मेदारी यह पहचानना है कि बच्चा किस चीज में ‘बेस्ट’ है। यदि उसे क्रिकेट या फुटबॉल पसंद नहीं, तो शायद उसे तैराकी, बैडमिंटन या चेस जैसा कोई अन्य खेल पसंद आ सकता है। उसे विभिन्न खेलों के विकल्प दें और खुद फैसला करने का मौका दें। घर का माहौल ऐसा रखें जहाँ खेल केवल जीतने के लिए नहीं, बल्कि आनंद और सेहत के लिए खेला जाए।

    याद रखें, सही पेरेंटिंग का अर्थ बच्चे को अपनी परछाई बनाना नहीं, बल्कि उसे उसकी अपनी चमक खोजने में मदद करना है। अगर वह खेल में करियर नहीं बनाना चाहता, तो भी उसे फिजिकल एक्टिविटी के अन्य तरीकों जैसे डांस या योग के लिए प्रेरित किया जा सकता है। उसे स्पोर्ट्स के फायदे बताएं, लेकिन उसे अपनी विरासत ढोने के लिए मजबूर न करें। जब बच्चा खुद को सुरक्षित और बिना किसी जजमेंट के महसूस करेगा, तभी वह अपनी असली प्रतिभा को निखार पाएगा।