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  • किसी के 100 तो किसी के 14 बच्चे: अरबपतियों की दुनिया में बड़े परिवारों का चलन, जानिए इसके पीछे की सोच

    किसी के 100 तो किसी के 14 बच्चे: अरबपतियों की दुनिया में बड़े परिवारों का चलन, जानिए इसके पीछे की सोच

    नई दिल्ली: दुनिया के अति-अमीर लोगों की जीवनशैली में कई ऐसी बातें देखने को मिलती हैं, जो आम लोगों की जिंदगी से काफी अलग हैं। इनमें बड़ी संख्या में बच्चे पैदा करना और उनकी देखभाल के लिए सहायकों की पूरी टीम रखना भी शामिल है। जहां बहुत से परिवारों के लिए एक बच्चे की परवरिश का खर्च और जिम्मेदारी बड़ी चुनौती होती है, वहीं कुछ अरबपति दर्जनों बच्चों के माता-पिता बन रहे हैं। इस चलन ने परिवार, संपत्ति, सामाजिक प्रतिष्ठा और बच्चों के पालन-पोषण को लेकर नई चर्चा शुरू की है। कुछ मामलों में बच्चों की संख्या इतनी अधिक है कि उनकी देखभाल के लिए कई नैनी और सहायक नियुक्त किए जाते हैं। ऐसे परिवारों में बच्चों की रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा करने के लिए अलग-अलग लोगों की जिम्मेदारी तय रहती है। इससे यह सवाल भी उठता है कि आर्थिक संपन्नता के बावजूद माता-पिता अपने बच्चों के साथ कितना समय बिता पाते हैं और उनके भावनात्मक विकास में उनकी व्यक्तिगत भागीदारी कितनी रहती है।

    कारोबारी और मनोरंजन जगत की चर्चित हस्ती किम कार्दशियन का उदाहरण इस व्यवस्था को समझने में मदद करता है। उनके पूर्व पति से चार बच्चे हैं और उनकी देखभाल के लिए पांच नैनी नियुक्त होने की जानकारी सामने आई है। बताया गया है कि इन सहायकों की ड्यूटी अलग-अलग पालियों में चलती है। एक समय में एक नैनी बच्चों की देखभाल करती है, जबकि अन्य अपनी निर्धारित पाली के अनुसार जिम्मेदारी संभालती हैं। इस तरह बच्चों की दिनचर्या, उनकी जरूरतों और देखभाल के लिए एक व्यवस्थित व्यवस्था बनाई गई है। आर्थिक रूप से संपन्न परिवारों में घरेलू सहायकों की मदद लेना असामान्य नहीं है। बच्चों की देखभाल के लिए प्रशिक्षित लोगों की सहायता से माता-पिता अपने काम और निजी जीवन के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर सकते हैं। लेकिन जब बच्चों की संख्या अधिक हो और उनकी देखभाल का बड़ा हिस्सा सहायकों के जिम्मे हो, तो माता-पिता की व्यक्तिगत भागीदारी को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है।

    तकनीक क्षेत्र के कारोबारी पावेल दुरुव का मामला भी बड़ी संख्या में बच्चों को लेकर चर्चा में रहा है। रूस में जन्मे दुरुव के बारे में बताया गया है कि शुक्राणु दान के माध्यम से दुनिया के 12 देशों में उनके 100 से अधिक जैविक बच्चे हैं। इस मामले में बच्चों का जन्म पारंपरिक पारिवारिक व्यवस्था से अलग माध्यम के जरिए हुआ है। चीन के उद्योगपति शू बो के बारे में भी सरोगेसी के माध्यम से 100 से अधिक बच्चे होने का विवरण सामने आया है। इन उदाहरणों से पता चलता है कि प्रजनन तकनीकों और आर्थिक संसाधनों की उपलब्धता ने कुछ संपन्न लोगों के लिए परिवार बनाने के विकल्पों का दायरा बढ़ाया है। हालांकि, ऐसे मामलों में बच्चों की परवरिश, उनके साथ संबंध और पारिवारिक जिम्मेदारियों का स्वरूप व्यक्ति तथा परिवार की परिस्थितियों के अनुसार अलग-अलग हो सकता है।

    अत्यधिक संपन्नता के बीच बड़े परिवारों का चलन सामाजिक प्रतिष्ठा से भी जोड़कर देखा जा रहा है। कुछ लोगों के लिए अधिक संतान होना परिवार की निरंतरता या व्यक्तिगत पसंद का विषय हो सकता है, जबकि अन्य मामलों में इसके पीछे अलग-अलग विचार और परिस्थितियां हो सकती हैं। हालांकि, केवल बच्चों की संख्या के आधार पर किसी व्यक्ति की मंशा तय नहीं की जा सकती। बड़ी संख्या में बच्चों की परवरिश के लिए आर्थिक संसाधनों के साथ समय, भावनात्मक सहयोग और नियमित देखभाल की भी जरूरत होती है। नैनी और दूसरे सहायकों की मदद से बच्चों की दैनिक जरूरतें पूरी की जा सकती हैं, लेकिन माता-पिता के साथ उनका व्यक्तिगत संबंध भी उनके जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा होता है।

    बच्चों के मानसिक और भावनात्मक विकास पर परिवार के माहौल, देखभाल की निरंतरता और माता-पिता के साथ संबंधों का प्रभाव पड़ सकता है। ऐसे में बड़ी संख्या में बच्चों वाले परिवारों के सामने यह चुनौती रहती है कि प्रत्येक बच्चे को पर्याप्त ध्यान और व्यक्तिगत समय कैसे दिया जाए। दूसरी ओर, यह भी महत्वपूर्ण है कि किसी परिवार की परिस्थितियों को समझे बिना बच्चों के विकास पर नकारात्मक प्रभाव पड़ने का निष्कर्ष नहीं निकाला जाए। हर बच्चे की जरूरतें और पारिवारिक अनुभव अलग हो सकते हैं। अंततः संपत्ति और सुविधाएं बच्चों के जीवन को आसान बनाने में मदद कर सकती हैं, लेकिन उनके पालन-पोषण में भावनात्मक जुड़ाव और जिम्मेदारी भी महत्वपूर्ण हैं। अरबपतियों के बड़े परिवारों के उदाहरण इसी व्यापक बहस को सामने लाते हैं कि आधुनिक समाज में परिवार का आकार, आर्थिक क्षमता और बच्चों की परवरिश के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।

  • बच्चों को पढ़ाई के साथ सिखाएं ये 10 जरूरी स्किल, मुश्किल हालात में समझदारी से फैसला लेने में आएंगी काम

    बच्चों को पढ़ाई के साथ सिखाएं ये 10 जरूरी स्किल, मुश्किल हालात में समझदारी से फैसला लेने में आएंगी काम


    नई दिल्ली ।
    बच्चों की परवरिश में पढ़ाई, होमवर्क और अच्छे व्यवहार के साथ उन्हें रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़ी जरूरी स्किल सिखाना भी बेहद अहम है। कई बार ऐसी परिस्थितियां सामने आ सकती हैं, जहां किताबों का ज्ञान पर्याप्त नहीं होता और बच्चे को अपनी सुरक्षा के लिए व्यावहारिक समझ की जरूरत पड़ती है। उम्र के अनुसार कुछ जरूरी बातें सिखाकर बच्चों को मुश्किल समय में घबराने के बजाय समझदारी से कदम उठाने के लिए तैयार किया जा सकता है।

    सबसे पहले बच्चे को अपना पूरा नाम, माता-पिता का नाम और जरूरत के मुताबिक घर से जुड़ी जरूरी जानकारी याद करानी चाहिए। छोटी उम्र में इसे खेल-खेल में दोहराकर सिखाया जा सकता है, ताकि जरूरत पड़ने पर बच्चा बिना घबराए अपनी पहचान और जरूरी जानकारी बता सके।

    बच्चों को यह भी पता होना चाहिए कि आपात स्थिति में किससे मदद मांगनी है। परिवार के जरूरी फोन नंबर याद कराने के साथ उन्हें यह समझाना जरूरी है कि फोन पर अपनी स्थिति और परेशानी को साफ शब्दों में कैसे बताया जाए।

    अनजान लोगों से सावधानी बरतना भी बच्चों के लिए महत्वपूर्ण स्किल है। उन्हें समझाएं कि हर व्यक्ति पर तुरंत भरोसा करना जरूरी नहीं है। अगर कोई अनजान व्यक्ति कुछ देने, कहीं ले जाने या माता-पिता के बारे में गलत जानकारी देने की कोशिश करे, तो बच्चे को वहां से हटकर किसी भरोसेमंद बड़े से मदद मांगनी चाहिए।

    अगर बच्चा भीड़ या किसी सार्वजनिक स्थान पर परिवार से अलग हो जाए, तो उसे इधर-उधर भागने के बजाय सुरक्षित जगह पर रुकना चाहिए। पुलिसकर्मी या किसी जिम्मेदार कर्मचारी से मदद मांगने की आदत उसे ऐसी स्थिति में सुरक्षित रहने में मदद कर सकती है।

    घर में आग लगने जैसी स्थिति के लिए भी बच्चों को पहले से सामान्य सुरक्षा नियम समझाना जरूरी है। उन्हें बताया जाना चाहिए कि घबराने के बजाय सुरक्षित स्थान की ओर जाना है और आग या धुएं वाली जगह पर वापस जाकर सामान लेने की कोशिश नहीं करनी चाहिए।

    पानी के आसपास सुरक्षा को लेकर भी बच्चों को जागरूक करना जरूरी है। स्विमिंग पूल, तालाब या किसी जलाशय के पास अकेले नहीं जाने और जरूरत पड़ने पर तुरंत किसी बड़े को बुलाने की आदत डालनी चाहिए।

    उम्र के अनुसार बच्चों को बेसिक फर्स्ट एड की जानकारी भी दी जा सकती है। छोटी चोट या कट लगने पर क्या करना है, यह समझाने के साथ उन्हें यह भी बताना चाहिए कि गंभीर चोट की स्थिति में खुद इलाज करने के बजाय तुरंत किसी बड़े से मदद लें।

    बड़े बच्चों को धीरे-धीरे किचन सेफ्टी के नियम सिखाए जा सकते हैं। गैस, गर्म बर्तन, चाकू और बिजली के उपकरणों से जुड़ी सावधानियां उनकी उम्र और समझ के अनुसार बताना जरूरी है।

    बच्चों को जरूरत पड़ने पर साफ तौर पर ‘ना’ कहना भी सिखाएं। अगर कोई बात या स्थिति उन्हें असहज लगे, तो वे बिना डर अपनी बात कह सकें और तुरंत माता-पिता या किसी भरोसेमंद बड़े को जानकारी दें।

    सबसे जरूरी बात यह है कि बच्चा परेशानी छिपाने के बजाय समय पर मदद मांगे। गलती होने या डर लगने पर सच बताना जरूरी है। इन स्किल्स को बच्चों पर दबाव डालकर नहीं, बल्कि रोजमर्रा के उदाहरणों, रोल-प्ले और छोटे अभ्यास के जरिए सहज तरीके से सिखाया जा सकता है।

  • किशोरों में चिड़चिड़ापन और नींद की समस्या को न करें नजरअंदाज, जानें स्ट्रेस और एंग्जाइटी के प्रमुख संकेत

    किशोरों में चिड़चिड़ापन और नींद की समस्या को न करें नजरअंदाज, जानें स्ट्रेस और एंग्जाइटी के प्रमुख संकेत


    नई दिल्ली । किशोरावस्था में बच्चों के व्यवहार में बदलाव को कई बार सामान्य मूड स्विंग मान लिया जाता है, लेकिन लगातार चिड़चिड़ापन, गुस्सा, बेचैनी, नींद में बदलाव और पढ़ाई से दूरी तनाव या एंग्जाइटी के संकेत हो सकते हैं। बच्चों और किशोरों में मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी परेशानियां हमेशा सीधे शब्दों में सामने नहीं आतीं। कई बच्चे अपनी भावनाओं और परेशानियों को ठीक से व्यक्त नहीं कर पाते, इसलिए माता-पिता के लिए उनके व्यवहार और रोजमर्रा की गतिविधियों में होने वाले बदलावों पर ध्यान देना जरूरी है।

    किशोरावस्था में पढ़ाई और परीक्षा का दबाव, भविष्य को लेकर चिंता, दोस्तों के बीच स्वीकार्यता की चिंता, पारिवारिक तनाव और बुलिंग जैसी परिस्थितियां मानसिक दबाव बढ़ा सकती हैं। इस उम्र में मूड में बदलाव या कभी-कभी चिड़चिड़ापन होना सामान्य हो सकता है, लेकिन जब ये समस्याएं लगातार बनी रहें और बच्चे की पढ़ाई, नींद, सामाजिक जीवन या दैनिक गतिविधियों को प्रभावित करने लगें, तब इन्हें नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।

    विशेषज्ञों के अनुसार बच्चों और किशोरों में तनाव और चिंता होना अपने आप में असामान्य नहीं है। चिंता तब चिंता का विषय बनती है, जब वह लंबे समय तक बनी रहे या बच्चे की सामान्य जिंदगी में बाधा डालने लगे। किशोर में लगातार बेचैनी, किसी बात को लेकर अत्यधिक चिंता, बार-बार आश्वासन मांगना या ऐसी परिस्थितियों से बचना जिनमें वह पहले सामान्य रूप से शामिल होता था, एंग्जाइटी से जुड़े संकेत हो सकते हैं।

    माता-पिता को बच्चे के व्यवहार में अचानक आए बदलावों पर विशेष नजर रखनी चाहिए। अगर बच्चा पहले की तुलना में छोटी-छोटी बातों पर अधिक गुस्सा करने या झल्लाने लगा है, तो इसके पीछे केवल अनुशासन या जिद को कारण मानना उचित नहीं है। लगातार चिड़चिड़ापन कई बार बच्चे के भीतर चल रहे तनाव या भावनात्मक परेशानी का संकेत हो सकता है।

    दोस्तों और परिवार से दूरी बनाना भी एक महत्वपूर्ण बदलाव हो सकता है। यदि बच्चा सामाजिक गतिविधियों से बचने लगे, पहले पसंद आने वाली चीजों में रुचि कम हो जाए या वह ज्यादातर समय अकेले रहना पसंद करने लगे, तो माता-पिता को उससे शांत तरीके से बातचीत करने की कोशिश करनी चाहिए।

    नींद में बदलाव भी मानसिक तनाव से जुड़ा हो सकता है। सोने में परेशानी, रात में बार-बार जागना या जरूरत से ज्यादा सोना ऐसे बदलाव हैं जिन पर ध्यान दिया जाना चाहिए। इसी तरह बार-बार सिरदर्द, पेट दर्द, मितली या शरीर से जुड़ी अन्य शिकायतें भी कभी-कभी तनाव और चिंता के साथ दिखाई दे सकती हैं। हालांकि इन शारीरिक लक्षणों के दूसरे कारण भी हो सकते हैं, इसलिए इन्हें केवल मानसिक स्वास्थ्य समस्या मानकर नहीं चलना चाहिए।

    पढ़ाई या स्कूल से अचानक दूरी बनाना भी माता-पिता के लिए संकेत हो सकता है। परीक्षा का डर, पढ़ाई का दबाव, सामाजिक परेशानी या बुलिंग जैसी स्थितियां बच्चे के स्कूल जाने और पढ़ाई करने के तरीके को प्रभावित कर सकती हैं। ऐसे समय में बच्चे को डांटने के बजाय उसकी परेशानी समझने की कोशिश करना अधिक जरूरी है।

    सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि बच्चे को यह भरोसा दिलाया जाए कि उसकी बात ध्यान से सुनी जाएगी और उसकी परेशानी के लिए उसे तुरंत दोषी नहीं ठहराया जाएगा। माता-पिता को बिना दबाव बनाए बातचीत करनी चाहिए और बच्चे की भावनाओं को गंभीरता से लेना चाहिए। यदि तनाव या चिंता लंबे समय तक बनी रहती है या बच्चे की रोजमर्रा की जिंदगी प्रभावित होने लगती है, तो मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ या चिकित्सक से सलाह लेना उचित है। समय पर सहायता मिलने से समस्या को समझने और बच्चे को बेहतर तरीके से संभालने में मदद मिल सकती है।

  • बेटी के जन्म पर रिश्तों में आई दरार की कहानी बनी चर्चा, बुजुर्ग दंपति ने समाज को दिया समानता का संदेश

    बेटी के जन्म पर रिश्तों में आई दरार की कहानी बनी चर्चा, बुजुर्ग दंपति ने समाज को दिया समानता का संदेश

    नई दिल्ली । बेटी और बेटे के बीच भेदभाव को लेकर समाज में समय-समय पर बहस होती रही है। इसी विषय से जुड़ा एक अनुभव इन दिनों सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बना हुआ है। एक बुजुर्ग दंपति ने अपने वीडियो के माध्यम से एक महिला की आपबीती साझा करते हुए समाज से बेटियों के प्रति समान और सम्मानजनक व्यवहार अपनाने की अपील की। वीडियो में साझा किए गए अनुभव ने परिवार, पालन-पोषण और सामाजिक सोच को लेकर नई चर्चा शुरू कर दी है।

    वीडियो में बताया गया कि एक महिला ने बुजुर्ग दंपति से अपनी एक परिचित की कहानी साझा की। महिला के अनुसार, उसकी सहेली ने बेटी को जन्म दिया तो ससुराल पक्ष का व्यवहार अचानक बदल गया। कथित तौर पर परिवार के सदस्य नवजात बच्ची और उसकी मां से मिलने अस्पताल तक नहीं पहुंचे। इतना ही नहीं, अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद भी उसे अपने ससुराल ले जाने के बजाय मायके भेज दिया गया।

    महिला ने यह भी दावा किया कि बेटी के जन्म के बाद कई वर्षों तक ससुराल पक्ष ने उससे कोई संपर्क नहीं रखा और न ही उसकी या बच्ची की कोई जानकारी ली। बाद में जब बच्ची के पालन-पोषण और खर्च से जुड़े अधिकारों के लिए कानूनी नोटिस भेजा गया, तब कथित रूप से ससुराल पक्ष ने दोबारा संपर्क करने की इच्छा जताई। हालांकि इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन इस अनुभव ने सामाजिक सोच और पारिवारिक जिम्मेदारियों पर व्यापक चर्चा को जन्म दिया है।

    इस पूरे प्रसंग पर प्रतिक्रिया देते हुए बुजुर्ग दंपति ने कहा कि किसी भी बच्चे के जन्म को परिवार के लिए खुशी का अवसर माना जाना चाहिए, चाहे वह बेटा हो या बेटी। उन्होंने कहा कि बेटियां किसी भी दृष्टि से परिवार पर बोझ नहीं होतीं, बल्कि वे भी परिवार की जिम्मेदारियों को निभाने और माता-पिता का सहारा बनने में समान रूप से सक्षम होती हैं। उनके अनुसार, बच्चे के लिंग के आधार पर व्यवहार बदलना न केवल सामाजिक असमानता को बढ़ावा देता है, बल्कि परिवारों में भावनात्मक दूरी भी पैदा करता है।

    दंपति ने यह भी कहा कि आधुनिक समाज में शिक्षा, रोजगार, खेल, विज्ञान, प्रशासन और अन्य अनेक क्षेत्रों में बेटियां लगातार अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन कर रही हैं। ऐसे में केवल लिंग के आधार पर उनके साथ भेदभाव करना न तो सामाजिक रूप से उचित है और न ही मानवीय दृष्टि से स्वीकार्य। उनका मानना है कि बच्चों के प्रति समान अवसर और समान सम्मान ही स्वस्थ समाज की पहचान है।

    विशेषज्ञ भी समय-समय पर इस बात पर जोर देते रहे हैं कि परिवार का सहयोग और सकारात्मक वातावरण बच्चे के मानसिक, सामाजिक और भावनात्मक विकास के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। यदि जन्म के समय ही भेदभावपूर्ण व्यवहार किया जाए, तो इसका प्रभाव केवल मां पर ही नहीं, बल्कि बच्चे के भविष्य और पूरे परिवार के संबंधों पर भी पड़ सकता है।

    सोशल मीडिया पर सामने आई यह कहानी एक व्यक्तिगत अनुभव के रूप में साझा की गई है, लेकिन इसने बेटियों के सम्मान, लैंगिक समानता और जिम्मेदार अभिभावक बनने जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर फिर से चर्चा शुरू कर दी है। समाज में समान अवसर और समान सम्मान की भावना को मजबूत करना ही ऐसे संदेशों का मुख्य उद्देश्य माना जा रहा है।

  • बच्चा हर सवाल पर सिर्फ 'ठीक हूं' कहकर करता है बात खत्म? अपनाएं ये आसान तरीके, बढ़ेगा भरोसा और खुलकर होगा संवाद

    बच्चा हर सवाल पर सिर्फ 'ठीक हूं' कहकर करता है बात खत्म? अपनाएं ये आसान तरीके, बढ़ेगा भरोसा और खुलकर होगा संवाद

    नई दिल्ली ।बच्चों का मानसिक और भावनात्मक विकास केवल अच्छी शिक्षा या बेहतर सुविधाओं पर निर्भर नहीं करता, बल्कि परिवार के भीतर होने वाले संवाद पर भी काफी हद तक आधारित होता है। कई बार माता-पिता जब बच्चों से उनके दिन, स्कूल या मन की स्थिति के बारे में पूछते हैं, तो उन्हें केवल “ठीक हूं” या “सब ठीक है” जैसा छोटा-सा जवाब मिलता है। यह हमेशा किसी समस्या का संकेत नहीं होता, लेकिन कई परिस्थितियों में यह इस बात का संकेत हो सकता है कि बच्चा अपनी भावनाएं खुलकर व्यक्त नहीं कर पा रहा है। ऐसे में परिवार का वातावरण और बातचीत का तरीका महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि बच्चों को अपनी भावनाएं साझा करने के लिए सुरक्षित और भरोसेमंद माहौल की आवश्यकता होती है। यदि उन्हें यह डर हो कि उनकी बात पर डांट मिलेगी, मजाक बनाया जाएगा या उन्हें गंभीरता से नहीं सुना जाएगा, तो वे धीरे-धीरे अपने मन की बातें छिपाने लगते हैं। इसलिए माता-पिता को ऐसा वातावरण तैयार करना चाहिए जहां बच्चा बिना झिझक अपनी खुशी, परेशानी या उलझन साझा कर सके।

    बच्चों से संवाद बेहतर बनाने के लिए सबसे पहले सवाल पूछने का तरीका बदलना उपयोगी हो सकता है। केवल “स्कूल कैसा था?” पूछने के बजाय ऐसे प्रश्न पूछे जा सकते हैं जिनका उत्तर विस्तार से दिया जा सके। उदाहरण के लिए, दिन की सबसे अच्छी घटना, किसी नई सीख या किसी ऐसी बात के बारे में पूछना जिससे बच्चा खुश या परेशान हुआ हो। इस तरह के प्रश्न बच्चों को सोचने और खुलकर बातचीत करने के लिए प्रेरित करते हैं।

    माता-पिता यदि अपनी छोटी-छोटी दैनिक घटनाएं, अनुभव या भावनाएं बच्चों के साथ साझा करते हैं, तो इससे भी सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। जब बच्चा देखता है कि परिवार में भावनाओं पर सहजता से बातचीत होती है, तो वह भी धीरे-धीरे अपनी बातें साझा करने में अधिक सहज महसूस करने लगता है। यह तरीका आपसी विश्वास बढ़ाने में मददगार साबित हो सकता है।

    बातचीत के दौरान धैर्य रखना भी उतना ही आवश्यक है। अक्सर माता-पिता बच्चे की बात पूरी होने से पहले ही सलाह देने या उसकी गलती बताने लगते हैं। इससे बच्चा भविष्य में अपनी बात कहने से बच सकता है। बेहतर होगा कि पहले उसकी पूरी बात ध्यान से सुनी जाए, फिर उसकी भावनाओं को समझते हुए शांत तरीके से प्रतिक्रिया दी जाए। इससे बच्चे को यह महसूस होता है कि उसकी बात महत्वपूर्ण है और उसे गंभीरता से सुना जा रहा है।

    विशेषज्ञ यह भी सलाह देते हैं कि परिवार रोजाना कुछ समय बिना मोबाइल, टीवी या अन्य स्क्रीन के साथ बिताए। केवल 15 से 20 मिनट का गुणवत्तापूर्ण समय, जिसमें साथ टहलना, खेलना, चित्र बनाना या सामान्य बातचीत करना शामिल हो, बच्चों और माता-पिता के रिश्ते को मजबूत बना सकता है। ऐसे शांत और सहज माहौल में बच्चे अक्सर अपनी भावनाएं अधिक खुलकर व्यक्त करते हैं।

    बच्चों के साथ मजबूत भावनात्मक रिश्ता एक दिन में नहीं बनता, बल्कि रोज होने वाली छोटी-छोटी बातचीत, विश्वास और सम्मान से धीरे-धीरे विकसित होता है। जब बच्चे यह महसूस करते हैं कि उनकी बात सुनी जाएगी और बिना किसी निर्णय के स्वीकार की जाएगी, तो वे अपनी खुशियां, चिंताएं और समस्याएं भी परिवार के साथ साझा करने लगते हैं। यही भरोसा उनके आत्मविश्वास, मानसिक स्वास्थ्य और स्वस्थ पारिवारिक संबंधों की मजबूत नींव बनता है।

  • अभिषेक बच्चन का छलका दर्द: पिता अमिताभ की तारीफों और फिल्मी असफलताओं पर खुलकर बोले जूनियर बी

    अभिषेक बच्चन का छलका दर्द: पिता अमिताभ की तारीफों और फिल्मी असफलताओं पर खुलकर बोले जूनियर बी


    नई दिल्ली ।भारतीय सिनेमा के महानायक अमिताभ बच्चन अक्सर सोशल मीडिया और सार्वजनिक मंचों पर अपने बेटे अभिषेक बच्चन के अभिनय और उनकी मेहनत की सराहना करते नजर आते हैं। पिता का यह स्नेह जहां प्रशंसकों को पसंद आता है, वहीं कई बार अभिषेक को इसके कारण आलोचनाओं का भी सामना करना पड़ता है। हाल ही में एक साक्षात्कार के दौरान अभिषेक बच्चन ने इन तमाम पहलुओं पर अपनी बेबाक राय रखी और बताया कि एक ‘सुपरस्टार’ पिता के साये में रहकर अपनी पहचान बनाना कितना चुनौतीपूर्ण होता है।

    साल 2000 में फिल्म ‘रिफ्यूजी’ से अपने करियर की शुरुआत करने वाले अभिषेक ने स्वीकार किया कि 25 साल बीत जाने के बाद भी पिता से उनकी तुलना का दबाव कम नहीं हुआ है। अब 50 वर्ष के हो चुके अभिनेता ने माना कि लगातार मिलती सार्वजनिक असफलताएं और आलोचनाएं किसी भी इंसान को मनोवैज्ञानिक रूप से प्रभावित करती हैं। उन्होंने कहा कि जब आप हफ्ते दर हफ्ते जनता के बीच असफल साबित होते हैं, तो नकारात्मकता से दूर रहना और निराशावादी न होना बेहद मुश्किल हो जाता है। हालांकि, उन्होंने कड़वाहट पालने के बजाय हमेशा अपने काम पर ध्यान देने और अपना सर्वश्रेष्ठ देने की कोशिश की है।

    अमिताभ बच्चन द्वारा उनकी प्रशंसा किए जाने पर अभिषेक ने बहुत ही मानवीय दृष्टिकोण साझा किया। उन्होंने कहा कि दुनिया अक्सर उनके पिता को एक ‘लार्जर देन लाइफ’ व्यक्तित्व के रूप में देखती है और मानती है कि उन्हें एक सामान्य इंसान की तरह व्यवहार करने की अनुमति नहीं है। लेकिन वास्तविकता यह है कि वह भी एक इंसान हैं, एक पिता हैं और एक दादा हैं। उन्हें भी अपने बच्चों की उपलब्धि पर गर्व महसूस करने और एक सामान्य माता-पिता की तरह प्रतिक्रिया देने का पूरा हक है।

    अभिषेक ने यह भी स्पष्ट किया कि उनके माता-पिता, अमिताभ और जया बच्चन, उनके बॉक्स ऑफिस आंकड़ों के बजाय उनकी मेहनत और प्रयासों पर गर्व करते हैं। उनके लिए सफलता का पैमाना हिट फिल्में नहीं, बल्कि ईमानदारी से किया गया काम है। वर्कफ्रंट की बात करें तो हाल ही में ‘हाउसफुल 5’ में नजर आए अभिषेक अब बड़े पर्दे पर धमाका करने को तैयार हैं। वह शाहरुख खान और सुहाना खान की बहुचर्चित फिल्म ‘किंग’ में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते दिखेंगे, जिससे दर्शकों को काफी उम्मीदें हैं।