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  • बेटी के जन्म पर रिश्तों में आई दरार की कहानी बनी चर्चा, बुजुर्ग दंपति ने समाज को दिया समानता का संदेश

    बेटी के जन्म पर रिश्तों में आई दरार की कहानी बनी चर्चा, बुजुर्ग दंपति ने समाज को दिया समानता का संदेश

    नई दिल्ली । बेटी और बेटे के बीच भेदभाव को लेकर समाज में समय-समय पर बहस होती रही है। इसी विषय से जुड़ा एक अनुभव इन दिनों सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बना हुआ है। एक बुजुर्ग दंपति ने अपने वीडियो के माध्यम से एक महिला की आपबीती साझा करते हुए समाज से बेटियों के प्रति समान और सम्मानजनक व्यवहार अपनाने की अपील की। वीडियो में साझा किए गए अनुभव ने परिवार, पालन-पोषण और सामाजिक सोच को लेकर नई चर्चा शुरू कर दी है।

    वीडियो में बताया गया कि एक महिला ने बुजुर्ग दंपति से अपनी एक परिचित की कहानी साझा की। महिला के अनुसार, उसकी सहेली ने बेटी को जन्म दिया तो ससुराल पक्ष का व्यवहार अचानक बदल गया। कथित तौर पर परिवार के सदस्य नवजात बच्ची और उसकी मां से मिलने अस्पताल तक नहीं पहुंचे। इतना ही नहीं, अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद भी उसे अपने ससुराल ले जाने के बजाय मायके भेज दिया गया।

    महिला ने यह भी दावा किया कि बेटी के जन्म के बाद कई वर्षों तक ससुराल पक्ष ने उससे कोई संपर्क नहीं रखा और न ही उसकी या बच्ची की कोई जानकारी ली। बाद में जब बच्ची के पालन-पोषण और खर्च से जुड़े अधिकारों के लिए कानूनी नोटिस भेजा गया, तब कथित रूप से ससुराल पक्ष ने दोबारा संपर्क करने की इच्छा जताई। हालांकि इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन इस अनुभव ने सामाजिक सोच और पारिवारिक जिम्मेदारियों पर व्यापक चर्चा को जन्म दिया है।

    इस पूरे प्रसंग पर प्रतिक्रिया देते हुए बुजुर्ग दंपति ने कहा कि किसी भी बच्चे के जन्म को परिवार के लिए खुशी का अवसर माना जाना चाहिए, चाहे वह बेटा हो या बेटी। उन्होंने कहा कि बेटियां किसी भी दृष्टि से परिवार पर बोझ नहीं होतीं, बल्कि वे भी परिवार की जिम्मेदारियों को निभाने और माता-पिता का सहारा बनने में समान रूप से सक्षम होती हैं। उनके अनुसार, बच्चे के लिंग के आधार पर व्यवहार बदलना न केवल सामाजिक असमानता को बढ़ावा देता है, बल्कि परिवारों में भावनात्मक दूरी भी पैदा करता है।

    दंपति ने यह भी कहा कि आधुनिक समाज में शिक्षा, रोजगार, खेल, विज्ञान, प्रशासन और अन्य अनेक क्षेत्रों में बेटियां लगातार अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन कर रही हैं। ऐसे में केवल लिंग के आधार पर उनके साथ भेदभाव करना न तो सामाजिक रूप से उचित है और न ही मानवीय दृष्टि से स्वीकार्य। उनका मानना है कि बच्चों के प्रति समान अवसर और समान सम्मान ही स्वस्थ समाज की पहचान है।

    विशेषज्ञ भी समय-समय पर इस बात पर जोर देते रहे हैं कि परिवार का सहयोग और सकारात्मक वातावरण बच्चे के मानसिक, सामाजिक और भावनात्मक विकास के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। यदि जन्म के समय ही भेदभावपूर्ण व्यवहार किया जाए, तो इसका प्रभाव केवल मां पर ही नहीं, बल्कि बच्चे के भविष्य और पूरे परिवार के संबंधों पर भी पड़ सकता है।

    सोशल मीडिया पर सामने आई यह कहानी एक व्यक्तिगत अनुभव के रूप में साझा की गई है, लेकिन इसने बेटियों के सम्मान, लैंगिक समानता और जिम्मेदार अभिभावक बनने जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर फिर से चर्चा शुरू कर दी है। समाज में समान अवसर और समान सम्मान की भावना को मजबूत करना ही ऐसे संदेशों का मुख्य उद्देश्य माना जा रहा है।

  • बच्चा हर सवाल पर सिर्फ 'ठीक हूं' कहकर करता है बात खत्म? अपनाएं ये आसान तरीके, बढ़ेगा भरोसा और खुलकर होगा संवाद

    बच्चा हर सवाल पर सिर्फ 'ठीक हूं' कहकर करता है बात खत्म? अपनाएं ये आसान तरीके, बढ़ेगा भरोसा और खुलकर होगा संवाद

    नई दिल्ली ।बच्चों का मानसिक और भावनात्मक विकास केवल अच्छी शिक्षा या बेहतर सुविधाओं पर निर्भर नहीं करता, बल्कि परिवार के भीतर होने वाले संवाद पर भी काफी हद तक आधारित होता है। कई बार माता-पिता जब बच्चों से उनके दिन, स्कूल या मन की स्थिति के बारे में पूछते हैं, तो उन्हें केवल “ठीक हूं” या “सब ठीक है” जैसा छोटा-सा जवाब मिलता है। यह हमेशा किसी समस्या का संकेत नहीं होता, लेकिन कई परिस्थितियों में यह इस बात का संकेत हो सकता है कि बच्चा अपनी भावनाएं खुलकर व्यक्त नहीं कर पा रहा है। ऐसे में परिवार का वातावरण और बातचीत का तरीका महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि बच्चों को अपनी भावनाएं साझा करने के लिए सुरक्षित और भरोसेमंद माहौल की आवश्यकता होती है। यदि उन्हें यह डर हो कि उनकी बात पर डांट मिलेगी, मजाक बनाया जाएगा या उन्हें गंभीरता से नहीं सुना जाएगा, तो वे धीरे-धीरे अपने मन की बातें छिपाने लगते हैं। इसलिए माता-पिता को ऐसा वातावरण तैयार करना चाहिए जहां बच्चा बिना झिझक अपनी खुशी, परेशानी या उलझन साझा कर सके।

    बच्चों से संवाद बेहतर बनाने के लिए सबसे पहले सवाल पूछने का तरीका बदलना उपयोगी हो सकता है। केवल “स्कूल कैसा था?” पूछने के बजाय ऐसे प्रश्न पूछे जा सकते हैं जिनका उत्तर विस्तार से दिया जा सके। उदाहरण के लिए, दिन की सबसे अच्छी घटना, किसी नई सीख या किसी ऐसी बात के बारे में पूछना जिससे बच्चा खुश या परेशान हुआ हो। इस तरह के प्रश्न बच्चों को सोचने और खुलकर बातचीत करने के लिए प्रेरित करते हैं।

    माता-पिता यदि अपनी छोटी-छोटी दैनिक घटनाएं, अनुभव या भावनाएं बच्चों के साथ साझा करते हैं, तो इससे भी सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। जब बच्चा देखता है कि परिवार में भावनाओं पर सहजता से बातचीत होती है, तो वह भी धीरे-धीरे अपनी बातें साझा करने में अधिक सहज महसूस करने लगता है। यह तरीका आपसी विश्वास बढ़ाने में मददगार साबित हो सकता है।

    बातचीत के दौरान धैर्य रखना भी उतना ही आवश्यक है। अक्सर माता-पिता बच्चे की बात पूरी होने से पहले ही सलाह देने या उसकी गलती बताने लगते हैं। इससे बच्चा भविष्य में अपनी बात कहने से बच सकता है। बेहतर होगा कि पहले उसकी पूरी बात ध्यान से सुनी जाए, फिर उसकी भावनाओं को समझते हुए शांत तरीके से प्रतिक्रिया दी जाए। इससे बच्चे को यह महसूस होता है कि उसकी बात महत्वपूर्ण है और उसे गंभीरता से सुना जा रहा है।

    विशेषज्ञ यह भी सलाह देते हैं कि परिवार रोजाना कुछ समय बिना मोबाइल, टीवी या अन्य स्क्रीन के साथ बिताए। केवल 15 से 20 मिनट का गुणवत्तापूर्ण समय, जिसमें साथ टहलना, खेलना, चित्र बनाना या सामान्य बातचीत करना शामिल हो, बच्चों और माता-पिता के रिश्ते को मजबूत बना सकता है। ऐसे शांत और सहज माहौल में बच्चे अक्सर अपनी भावनाएं अधिक खुलकर व्यक्त करते हैं।

    बच्चों के साथ मजबूत भावनात्मक रिश्ता एक दिन में नहीं बनता, बल्कि रोज होने वाली छोटी-छोटी बातचीत, विश्वास और सम्मान से धीरे-धीरे विकसित होता है। जब बच्चे यह महसूस करते हैं कि उनकी बात सुनी जाएगी और बिना किसी निर्णय के स्वीकार की जाएगी, तो वे अपनी खुशियां, चिंताएं और समस्याएं भी परिवार के साथ साझा करने लगते हैं। यही भरोसा उनके आत्मविश्वास, मानसिक स्वास्थ्य और स्वस्थ पारिवारिक संबंधों की मजबूत नींव बनता है।

  • अभिषेक बच्चन का छलका दर्द: पिता अमिताभ की तारीफों और फिल्मी असफलताओं पर खुलकर बोले जूनियर बी

    अभिषेक बच्चन का छलका दर्द: पिता अमिताभ की तारीफों और फिल्मी असफलताओं पर खुलकर बोले जूनियर बी


    नई दिल्ली ।भारतीय सिनेमा के महानायक अमिताभ बच्चन अक्सर सोशल मीडिया और सार्वजनिक मंचों पर अपने बेटे अभिषेक बच्चन के अभिनय और उनकी मेहनत की सराहना करते नजर आते हैं। पिता का यह स्नेह जहां प्रशंसकों को पसंद आता है, वहीं कई बार अभिषेक को इसके कारण आलोचनाओं का भी सामना करना पड़ता है। हाल ही में एक साक्षात्कार के दौरान अभिषेक बच्चन ने इन तमाम पहलुओं पर अपनी बेबाक राय रखी और बताया कि एक ‘सुपरस्टार’ पिता के साये में रहकर अपनी पहचान बनाना कितना चुनौतीपूर्ण होता है।

    साल 2000 में फिल्म ‘रिफ्यूजी’ से अपने करियर की शुरुआत करने वाले अभिषेक ने स्वीकार किया कि 25 साल बीत जाने के बाद भी पिता से उनकी तुलना का दबाव कम नहीं हुआ है। अब 50 वर्ष के हो चुके अभिनेता ने माना कि लगातार मिलती सार्वजनिक असफलताएं और आलोचनाएं किसी भी इंसान को मनोवैज्ञानिक रूप से प्रभावित करती हैं। उन्होंने कहा कि जब आप हफ्ते दर हफ्ते जनता के बीच असफल साबित होते हैं, तो नकारात्मकता से दूर रहना और निराशावादी न होना बेहद मुश्किल हो जाता है। हालांकि, उन्होंने कड़वाहट पालने के बजाय हमेशा अपने काम पर ध्यान देने और अपना सर्वश्रेष्ठ देने की कोशिश की है।

    अमिताभ बच्चन द्वारा उनकी प्रशंसा किए जाने पर अभिषेक ने बहुत ही मानवीय दृष्टिकोण साझा किया। उन्होंने कहा कि दुनिया अक्सर उनके पिता को एक ‘लार्जर देन लाइफ’ व्यक्तित्व के रूप में देखती है और मानती है कि उन्हें एक सामान्य इंसान की तरह व्यवहार करने की अनुमति नहीं है। लेकिन वास्तविकता यह है कि वह भी एक इंसान हैं, एक पिता हैं और एक दादा हैं। उन्हें भी अपने बच्चों की उपलब्धि पर गर्व महसूस करने और एक सामान्य माता-पिता की तरह प्रतिक्रिया देने का पूरा हक है।

    अभिषेक ने यह भी स्पष्ट किया कि उनके माता-पिता, अमिताभ और जया बच्चन, उनके बॉक्स ऑफिस आंकड़ों के बजाय उनकी मेहनत और प्रयासों पर गर्व करते हैं। उनके लिए सफलता का पैमाना हिट फिल्में नहीं, बल्कि ईमानदारी से किया गया काम है। वर्कफ्रंट की बात करें तो हाल ही में ‘हाउसफुल 5’ में नजर आए अभिषेक अब बड़े पर्दे पर धमाका करने को तैयार हैं। वह शाहरुख खान और सुहाना खान की बहुचर्चित फिल्म ‘किंग’ में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते दिखेंगे, जिससे दर्शकों को काफी उम्मीदें हैं।