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  • छह दिन की विदेश यात्रा पर निकले प्रधानमंत्री मोदी, G7 बैठक से लेकर रणनीतिक साझेदारी तक कई अहम एजेंडे पर होगी चर्चा

    छह दिन की विदेश यात्रा पर निकले प्रधानमंत्री मोदी, G7 बैठक से लेकर रणनीतिक साझेदारी तक कई अहम एजेंडे पर होगी चर्चा

    नई दिल्ली । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शनिवार को छह दिवसीय विदेश यात्रा पर रवाना हो गए, जिसके तहत वह फ्रांस और स्लोवाकिया का दौरा करेंगे। इस यात्रा को भारत की विदेश नीति और वैश्विक कूटनीतिक सक्रियता के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। प्रधानमंत्री अपने दौरे के दौरान जी-7 शिखर सम्मेलन में भाग लेने के साथ-साथ कई देशों के शीर्ष नेताओं से द्विपक्षीय और बहुपक्षीय स्तर पर बातचीत करेंगे। यह अवसर भारत को वैश्विक आर्थिक, रणनीतिक और तकनीकी मुद्दों पर अपनी भूमिका और दृष्टिकोण को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करने का मंच प्रदान करेगा।

    प्रधानमंत्री मोदी का यह फ्रांस दौरा विशेष महत्व रखता है। प्रधानमंत्री बनने के बाद यह उनकी सातवीं फ्रांस यात्रा है, जो दोनों देशों के बीच लगातार मजबूत होते संबंधों को दर्शाती है। यात्रा से पहले प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत की रणनीतिक सोच में फ्रांस का विशेष स्थान है और दोनों देशों के बीच रक्षा, प्रौद्योगिकी, नवाचार, ऊर्जा तथा वैश्विक सहयोग के क्षेत्रों में निरंतर प्रगति हुई है। उन्होंने विश्वास जताया कि यह दौरा द्विपक्षीय साझेदारी को और अधिक मजबूत बनाने में सहायक सिद्ध होगा।

    फ्रांस प्रवास के दौरान प्रधानमंत्री मोदी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों से मुलाकात करेंगे। दोनों नेता इस वर्ष फरवरी में हुई चर्चाओं के बाद विभिन्न क्षेत्रों में हुई प्रगति की समीक्षा करेंगे। इसके अलावा दोनों देशों के बीच आर्थिक सहयोग, रक्षा साझेदारी, उभरती तकनीकों और वैश्विक चुनौतियों पर भी विस्तार से विचार-विमर्श होने की संभावना है। इस मुलाकात को भारत-फ्रांस संबंधों के अगले चरण की दिशा तय करने वाली महत्वपूर्ण बैठक माना जा रहा है।

    दौरे के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ‘भारत इनोवेट्स’ कार्यक्रम में भी भाग लेंगे। यह पहल भारत और फ्रांस के बीच नवाचार सहयोग को बढ़ावा देने के उद्देश्य से शुरू की गई है। कार्यक्रम में भारत, फ्रांस और अन्य देशों के स्टार्टअप, निवेशक, नवप्रवर्तक और वेंचर कैपिटल प्रतिनिधि एक मंच पर आएंगे। माना जा रहा है कि इससे भारतीय स्टार्टअप इकोसिस्टम को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान और अवसर प्राप्त होंगे। नवाचार और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने पर दोनों देशों का विशेष फोकस रहेगा।

    प्रधानमंत्री मोदी 17 जून को होने वाले जी-7 शिखर सम्मेलन में भी भाग लेंगे। यह सातवां अवसर होगा जब वह इस प्रतिष्ठित वैश्विक मंच का हिस्सा बनेंगे। इसके साथ ही वह लगातार सात बार जी-7 बैठक में शामिल होने वाले पहले भारतीय प्रधानमंत्री बन जाएंगे। सम्मेलन के दौरान वैश्विक अर्थव्यवस्था, ऊर्जा सुरक्षा, आपूर्ति श्रृंखला, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, जलवायु परिवर्तन और अंतरराष्ट्रीय स्थिरता जैसे विषयों पर चर्चा होने की संभावना है।

    जी-7 बैठक के दौरान प्रधानमंत्री मोदी की कई प्रमुख विश्व नेताओं से मुलाकात हो सकती है। इनमें अमेरिका सहित अन्य प्रमुख देशों के राष्ट्राध्यक्ष और सरकार प्रमुख शामिल हो सकते हैं। इन बैठकों में द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करने, व्यापार एवं निवेश बढ़ाने और वैश्विक चुनौतियों से निपटने के लिए सहयोग के नए अवसरों पर चर्चा होने की उम्मीद है।

    यात्रा का दूसरा महत्वपूर्ण पड़ाव स्लोवाकिया होगा। वर्ष 1993 में स्वतंत्र राष्ट्र बनने के बाद किसी भारतीय प्रधानमंत्री की यह पहली स्लोवाकिया यात्रा है। इस दौरे से दोनों देशों के बीच राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक संबंधों को नई गति मिलने की संभावना जताई जा रही है। विदेश नीति विशेषज्ञों का मानना है कि यह संपूर्ण यात्रा भारत की बढ़ती वैश्विक भूमिका, रणनीतिक साझेदारियों के विस्तार और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उसकी सक्रिय उपस्थिति को और मजबूत करेगी।

  • FCAS प्रोग्राम के टूटने के बाद फ्रांस का बड़ा दांव, 2040 तक अकेले विकसित करेगा छठी पीढ़ी का लड़ाकू विमान

    FCAS प्रोग्राम के टूटने के बाद फ्रांस का बड़ा दांव, 2040 तक अकेले विकसित करेगा छठी पीढ़ी का लड़ाकू विमान

    नई दिल्ली । यूरोप की महत्वाकांक्षी रक्षा परियोजनाओं में शामिल फ्यूचर कॉम्बैट एयर सिस्टम (FCAS) कार्यक्रम के बंद होने के बाद वैश्विक रक्षा क्षेत्र में नए समीकरण उभरते दिखाई दे रहे हैं। फ्रांस ने अब स्पष्ट संकेत दिया है कि वह छठी पीढ़ी के लड़ाकू विमान के विकास का काम अपने दम पर आगे बढ़ाएगा। इस निर्णय को केवल एक रक्षा परियोजना का पुनर्गठन नहीं बल्कि यूरोपीय सैन्य उद्योग में बदलते शक्ति संतुलन के रूप में भी देखा जा रहा है।

    कई वर्षों से फ्रांस, जर्मनी और स्पेन संयुक्त रूप से FCAS कार्यक्रम पर काम कर रहे थे। इस परियोजना का उद्देश्य वर्ष 2040 के आसपास ऐसी उन्नत लड़ाकू विमान प्रणाली विकसित करना था जो कृत्रिम बुद्धिमत्ता, नेटवर्क आधारित युद्ध क्षमता, मानव रहित सहयोगी प्लेटफॉर्म और अत्याधुनिक स्टेल्थ तकनीकों से लैस हो। हालांकि परियोजना में जिम्मेदारियों, तकनीकी नियंत्रण और औद्योगिक हिस्सेदारी को लेकर लगातार मतभेद सामने आते रहे।

    फ्रांसीसी नेतृत्व ने अब संकेत दिया है कि पिछले वर्षों में किए गए अरबों यूरो के निवेश और अनुसंधान कार्य को आधार बनाकर देश अपने स्वतंत्र कार्यक्रम को आगे बढ़ाएगा। फ्रांस का मानना है कि अब तक विकसित की गई तकनीकी क्षमताएं उसे अगली पीढ़ी के लड़ाकू विमान निर्माण की दिशा में आत्मनिर्भर रूप से आगे बढ़ने में सक्षम बनाती हैं। फ्रांस की प्रमुख एयरोस्पेस कंपनी डसॉल्ट पहले से ही राफेल जैसे सफल लड़ाकू विमान का निर्माण कर चुकी है, जिससे इस परियोजना को तकनीकी आधार मिलने की उम्मीद है।

    दूसरी ओर जर्मनी ने भी अपने सहयोगी औद्योगिक समूहों के साथ अलग रास्ता अपनाने का संकेत दिया है। कई प्रमुख रक्षा और एयरोस्पेस कंपनियों ने मिलकर एक नया औद्योगिक गठबंधन तैयार किया है, जिसका उद्देश्य भविष्य के लड़ाकू विमान कार्यक्रम को स्वतंत्र रूप से आगे बढ़ाना है। इससे स्पष्ट है कि यूरोप अब एक साझा मंच के बजाय समानांतर सैन्य विमानन परियोजनाओं की ओर बढ़ सकता है।

    इस पूरे घटनाक्रम का असर भारत के लिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। भारत और फ्रांस के बीच पिछले एक दशक में रक्षा सहयोग लगातार मजबूत हुआ है। राफेल लड़ाकू विमानों की खरीद और नौसैनिक सहयोग ने दोनों देशों के रणनीतिक संबंधों को नई ऊंचाई दी है। ऐसे में फ्रांस यदि अपने नए लड़ाकू विमान कार्यक्रम के लिए अंतरराष्ट्रीय साझेदारों की तलाश करता है तो भारत एक स्वाभाविक विकल्प के रूप में सामने आ सकता है।

    हालांकि संभावित साझेदारी का रास्ता आसान नहीं होगा। भारत लंबे समय से रक्षा क्षेत्र में तकनीकी आत्मनिर्भरता पर जोर दे रहा है। किसी भी संयुक्त कार्यक्रम में भारत की प्राथमिकता केवल खरीददार की भूमिका निभाने के बजाय सह-विकास और सह-उत्पादन की होगी। उन्नत इंजन तकनीक, मिशन सिस्टम, सोर्स कोड और महत्वपूर्ण बौद्धिक संपदा तक पहुंच जैसे मुद्दे किसी भी संभावित समझौते के केंद्र में रहेंगे।

    इसके साथ ही भारत पहले से ही अपने स्वदेशी एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (AMCA) कार्यक्रम पर तेजी से काम कर रहा है। ऐसे में नीति निर्माताओं को यह तय करना होगा कि भविष्य की जरूरतों के लिए स्वदेशी परियोजना को प्राथमिकता दी जाए या किसी अंतरराष्ट्रीय साझेदारी के माध्यम से छठी पीढ़ी की तकनीकों तक तेजी से पहुंच बनाई जाए।

    विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में फ्रांस की नई रणनीति और भारत की रक्षा आवश्यकताओं के बीच कई साझा अवसर उभर सकते हैं। हालांकि किसी भी संभावित सहयोग का अंतिम स्वरूप तकनीकी हस्तांतरण, लागत, औद्योगिक भागीदारी और दीर्घकालिक रणनीतिक हितों पर निर्भर करेगा। फिलहाल FCAS कार्यक्रम का अंत एक अध्याय का समापन जरूर है, लेकिन इससे भविष्य की नई रक्षा साझेदारियों के लिए कई संभावनाएं भी खुलती दिखाई दे रही हैं।

  • चार घंटे से अधिक चले रोमांचक संघर्ष में ज्वेरेव ने कोबोली को दी शिकस्त, रचा ऐतिहासिक कीर्तिमान

    चार घंटे से अधिक चले रोमांचक संघर्ष में ज्वेरेव ने कोबोली को दी शिकस्त, रचा ऐतिहासिक कीर्तिमान

    नई दिल्ली । विश्व टेनिस परिदृश्य पर जर्मनी के स्टार खिलाड़ी अलेक्जेंडर ज्वेरेव ने आखिरकार अपने करियर का सबसे बड़ा मील का पत्थर हासिल करते हुए इतिहास के पन्नों में अपना नाम स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज करा लिया है। पेरिस के प्रतिष्ठित क्ले कोर्ट पर खेले गए फ्रेंच ओपन 2026 के पुरुष एकल वर्ग के खिताबी मुकाबले में विश्व नंबर-3 ज्वेरेव ने अपनी खेल क्षमता और मानसिक दृढ़ता का उत्कृष्ट प्रदर्शन किया। उन्होंने पांच सेट तक खिंचे बेहद कड़े और सांस रोक देने वाले फाइनल मैच में इटली के उभरते हुए खिलाड़ी फ्लेवियो कोबोली की चुनौती को ध्वस्त करते हुए अपने जीवन का पहला ग्रैंड स्लैम खिताब जीत लिया।

    अंतरराष्ट्रीय टेनिस कैलेंडर के इस बेहद महत्वपूर्ण खिताबी मुकाबले में दोनों खिलाड़ियों के बीच करीब चार घंटे और 20 मिनट तक मैराथन संघर्ष देखा गया। अलेक्जेंडर ज्वेरेव ने अंततः कोबोली को 6-1, 4-6, 6-4, 6-7(5), 6-1 से मात देकर रोलां गैरो की चमचमाती ट्रॉफी पर कब्जा जमाया। मैच का अंतिम और निर्णायक अंक जीतते ही जर्मन खिलाड़ी कोर्ट पर ही बेहद भावुक नजर आए। उनके लिए यह जीत इसलिए भी ऐतिहासिक है क्योंकि इससे पहले वे तीन बड़े ग्रैंड स्लैम फाइनल मुकाबलों में पहुंचकर भी उपविजेता बनकर रह गए थे, जिसमें 2020 का यूएस ओपन, 2024 का फ्रेंच ओपन और 2025 का ऑस्ट्रेलियन ओपन शामिल है।

    मैच की तकनीकी समीक्षा की जाए तो ज्वेरेव ने मुकाबले की आक्रामक शुरुआत करते हुए पहले सेट में पूरी तरह अपना दबदबा कायम किया और महज 34 मिनट के भीतर इसे 6-1 से अपने पक्ष में कर लिया। इसके बाद अपना पहला ग्रैंड स्लैम फाइनल खेल रहे इटली के फ्लेवियो कोबोली ने दूसरे सेट में शानदार वापसी की। कोबोली ने अपने बेहतरीन ड्रॉप शॉट्स और आक्रामक ग्राउंडस्ट्रोक्स के दम पर ज्वेरेव की सर्विस ब्रेक की और दूसरा सेट 6-4 से जीतकर मैच में रोमांच वापस ला दिया। तीसरे सेट में भी दोनों के बीच कांटे की टक्कर रही, लेकिन कोबोली की कुछ अप्रत्याशित गलतियों का लाभ उठाकर ज्वेरेव ने इसे 6-4 से जीत लिया।

    चौथे सेट में दोनों खिलाड़ियों का जज्बा चरम पर था जहां इतालवी खिलाड़ी कोबोली ने टाई-ब्रेकर में शानदार फोरहैंड विनर लगाते हुए खेल को निर्णायक पांचवें सेट में धकेल दिया। हालांकि, अंतिम सेट में ज्वेरेव ने एक सच्चे चैंपियन की तरह वापसी की और अपनी सर्विस पर 83 प्रतिशत अंक हासिल करते हुए कोबोली पर मानसिक दबाव बना दिया। ज्वेरेव ने शुरुआती गेम में ही विरोधी की सर्विस ब्रेक की और पीछे मुड़कर नहीं देखा तथा अंतिम सेट 6-1 से जीतकर खिताब अपने नाम कर लिया।

    इस ऐतिहासिक विजय के साथ ही अलेक्जेंडर ज्वेरेव ने जर्मन टेनिस के इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ दिया है। वह साल 1937 में हेनर हेन्केल के बाद फ्रेंच ओपन का पुरुष एकल खिताब जीतने वाले पहले जर्मन खिलाड़ी बन गए हैं। इसके अतिरिक्त, वर्ष 1996 के ऑस्ट्रेलियन ओपन में बोरिस बेकर की ऐतिहासिक जीत के बाद वे किसी भी ग्रैंड स्लैम इवेंट में पुरुष एकल का खिताब जीतने वाले पहले जर्मन पुरुष खिलाड़ी बने हैं। दूसरी ओर, उपविजेता रहे कोबोली भले ही खिताब से चूक गए हों, लेकिन इस टूर्नामेंट में उनके शानदार प्रदर्शन के दम पर वे विश्व रैंकिंग में शीर्ष-10 के बेहद करीब पहुंच गए हैं।

  • पेरिस नर्सरी स्कूल कांड पर हड़कंप, सार्वजनिक ट्रायल से फ्रांस में बाल सुरक्षा बहस तेज

    पेरिस नर्सरी स्कूल कांड पर हड़कंप, सार्वजनिक ट्रायल से फ्रांस में बाल सुरक्षा बहस तेज


    नई दिल्ली । फ्रांस की राजधानी पेरिस में बच्चों के साथ कथित यौन शोषण के एक बेहद गंभीर मामले ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है। इस संवेदनशील प्रकरण में पहली बार सार्वजनिक ट्रायल की शुरुआत की गई है, जो सामान्य परिस्थितियों से अलग और बेहद दुर्लभ माना जा रहा है। आमतौर पर फ्रांस में नाबालिगों से जुड़े मामलों की सुनवाई बंद कमरे में होती है, लेकिन इस बार पीड़ित बच्चों के माता पिता की मांग पर इसे सार्वजनिक किया गया है ताकि समाज में बाल सुरक्षा को लेकर व्यापक जागरूकता लाई जा सके।

    यह मामला अप्रैल 2025 में सामने आया था जब कुछ छोटे बच्चों ने अपने परिजनों को बताया कि उनके साथ नर्सरी स्कूल के अंदर गलत व्यवहार हुआ है। इसके बाद जांच शुरू की गई और 36 वर्षीय स्कूल सहायक पर गंभीर आरोप लगाए गए। आरोपी की पहचान गोपनीय रखी गई है। आरोप है कि अगस्त 2024 से अप्रैल 2025 के बीच उसने स्कूल के बाथरूम, लंच ब्रेक और आफ्टर स्कूल केयर के दौरान तीन से पांच वर्ष की उम्र के बच्चों के साथ यौन उत्पीड़न किया। आरोपी ने सभी आरोपों से इनकार किया है।

    मामले में यह भी सामने आया है कि सिर्फ बच्चों ही नहीं बल्कि दो महिला सहकर्मियों के साथ भी यौन उत्पीड़न और एक के साथ यौन हमले के आरोप जुड़े हैं। यदि आरोपी दोषी पाया जाता है तो उसे दस साल तक की सजा हो सकती है। इस केस ने फ्रांस में स्कूलों और डे केयर केंद्रों की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

    सबसे अहम बात यह है कि पीड़ित बच्चों को अदालत में पेश नहीं किया जाएगा। उनके बयान पहले ही जांच के दौरान दर्ज कर लिए गए थे जिन्हें अब न्यायाधीश अदालत में पढ़कर सुनाएंगे। इस फैसले को बच्चों की मानसिक सुरक्षा के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    हाल के महीनों में पेरिस और अन्य शहरों से ऐसे कई मामलों के सामने आने के बाद चिंता और बढ़ गई है। पेरिस की मुख्य अभियोजक लॉरे बेकुआ ने बताया कि राजधानी में 84 नर्सरी स्कूल, करीब 20 प्राथमिक स्कूल और 10 डे केयर केंद्रों से जुड़े मामलों की जांच चल रही है। यह आंकड़ा पूरे शिक्षा तंत्र में सुरक्षा व्यवस्था की गंभीर स्थिति को दर्शाता है।

    पीड़ित परिवारों और सामाजिक संगठनों का कहना है कि बच्चों की शिकायतों को लंबे समय तक नजरअंदाज किया गया, जिससे मामला और गंभीर हो गया। एक मां ने पहले ही स्कूल प्रशासन को चेतावनी दी थी, लेकिन उस पर कार्रवाई नहीं हुई। अब परिजन और संगठनों का कहना है कि यह घटना पूरे सिस्टम के लिए चेतावनी है।

    माता पिता संगठन मीटू इकोले की सह संस्थापक बरका जरुआली ने अदालत के बाहर प्रदर्शन के दौरान कहा कि अब देश को जागने की जरूरत है। प्रदर्शनकारियों ने बच्चों की सुरक्षा से जुड़े संदेश लिखे बैनर भी उठाए और सख्त कार्रवाई की मांग की। पीड़ित परिवारों की वकील रेबेका रॉयर ने इसे बच्चों की सुरक्षा के लिए निर्णायक मोड़ बताया है और सरकार से स्कूलों में निगरानी व्यवस्था मजबूत करने की मांग की है।

    पेरिस के मेयर इमैनुएल ग्रेगॉयर ने भी इस मुद्दे को प्राथमिकता बताते हुए कहा है कि 78 स्कूल कर्मचारियों को निलंबित किया गया है जिनमें कई पर यौन हिंसा के आरोप हैं। उन्होंने स्कूल सुरक्षा प्रणाली को मजबूत करने के लिए करोड़ों यूरो की योजना की घोषणा की है। यह मामला अब सिर्फ एक आपराधिक जांच नहीं बल्कि फ्रांस में बच्चों की सुरक्षा और शिक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता पर एक बड़ा राष्ट्रीय सवाल बन चुका है।