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  • फ्रांस में शांतिपूर्ण प्रदर्शनों के बीच कौन फैला रहा हिंसा, नकाबपोश 'कैसर्स' की भूमिका से बढ़ी सुरक्षा एजेंसियों की चिंता

    फ्रांस में शांतिपूर्ण प्रदर्शनों के बीच कौन फैला रहा हिंसा, नकाबपोश 'कैसर्स' की भूमिका से बढ़ी सुरक्षा एजेंसियों की चिंता

    नई दिल्ली ।फ्रांस में महंगाई, आर्थिक असमानता और सरकारी नीतियों के खिलाफ जारी विरोध प्रदर्शन अब हिंसक घटनाओं के कारण चर्चा में हैं। लगातार तीसरे सप्ताहांत हजारों लोग सड़कों पर उतरे। देश के अधिकांश हिस्सों में प्रदर्शन शांतिपूर्ण रहे, लेकिन 31 अक्टूबर को रैलियां समाप्त होने के दौरान पेरिस सहित कई शहरों में नकाबपोश लोगों के समूहों की पुलिस से झड़प हो गई। इन घटनाओं के बाद सवाल उठने लगा है कि शांतिपूर्ण प्रदर्शनों के बीच हिंसा फैलाने वाले ये लोग कौन हैं और उनका विरोध करने का तरीका क्या है?

    फ्रांस में ऐसे उपद्रवियों के लिए ‘कैसर्स’ शब्द इस्तेमाल किया जाता है। फ्रांसीसी भाषा में इसका अर्थ तोड़फोड़ करने वाले होता है। ये किसी एक पंजीकृत संगठन या राजनीतिक दल के सदस्य नहीं हैं, बल्कि अलग-अलग छोटे समूहों में सक्रिय रहते हैं। प्रदर्शन के दौरान इनकी गतिविधियों में सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाना, पुलिस से भिड़ना और सरकारी व्यवस्था के खिलाफ हिंसक कार्रवाई करना शामिल बताया जाता है।

    इन समूहों में अक्सर युवा और कट्टर वामपंथी विचारधारा से जुड़े कार्यकर्ताओं की मौजूदगी बताई जाती है। इन्हें कई बार अल्ट्रा-लेफ्ट समूहों के रूप में भी पहचाना जाता है। हालांकि, इनका कोई केंद्रीय नेतृत्व या साझा सदस्यता व्यवस्था सामने नहीं आई है। अलग-अलग समूहों में सक्रिय रहने के कारण इनकी पहचान और संगठनात्मक ढांचे का पता लगाना सुरक्षा एजेंसियों के लिए चुनौती बना रहता है।

    कैसर्स आमतौर पर बड़े प्रदर्शनों के दौरान रैलियों के किनारे या उनके अंतिम पड़ाव पर सक्रिय होते हैं। शांतिपूर्ण तरीके से अपनी मांग रखने के बजाय ये पुलिस के साथ टकराव और तोड़फोड़ की घटनाओं में शामिल होते हैं। पहचान छिपाने के लिए नकाब, चश्मे और काले कपड़ों का इस्तेमाल करते हैं। कुछ घटनाओं में इनके पास हथौड़े और आतिशबाजी से जुड़ी सामग्री भी देखी गई है। बैंकों, रियल एस्टेट कार्यालयों और बड़े कारोबारी प्रतिष्ठानों को निशाना बनाने की घटनाएं भी इनके विरोध के तरीकों में शामिल बताई जाती हैं।

    31 अक्टूबर को फ्रांस के विभिन्न शहरों में करीब 3.20 लाख लोग प्रदर्शन में शामिल हुए। इनमें लगभग 70 हजार लोग अकेले पेरिस में सड़कों पर उतरे थे। अधिकांश रैलियां शांतिपूर्ण रहीं, लेकिन राजधानी में पोर्टे डी शारांटों के आसपास स्थिति बिगड़ गई। काले कपड़े पहने दर्जनों नकाबपोश लोगों ने हथौड़ों से सड़क के पत्थर उखाड़कर पुलिस पर फेंके। सुरक्षा बलों पर एक आग लगाने वाला उपकरण भी फेंका गया। जवाब में पुलिस ने आंसू गैस, स्टन ग्रेनेड और लाठीचार्ज का इस्तेमाल किया।

    पुलिस अधिकारियों के अनुसार, कुछ सौ उपद्रवियों का एक समूह लगातार सुरक्षा बलों पर हमले कर रहा था। पेरिस में 400 से 800 कट्टर वामपंथी कार्यकर्ताओं की मौजूदगी का अनुमान लगाया गया था। हालांकि, यह अनुमानित संख्या थी और इससे सभी उपद्रवियों की प्रमाणित पहचान नहीं होती।

    इस बार हैलोवीन के त्योहार ने भी सुरक्षा व्यवस्था को चुनौती दी। कई प्रदर्शनकारी स्पाइडरमैन और फ्रैंकेंस्टाइन जैसे किरदारों की पोशाक पहनकर पहुंचे। कुछ लोगों ने हैलोवीन के मुखौटों से चेहरे ढके। गृह मंत्री लॉरां नूनेज ने चेतावनी दी थी कि पहचान छिपाने के लिए चेहरा ढकने वालों पर जुर्माना लगाया जा सकता है। सोशल मीडिया पर हैलोवीन की रात क्रांति शुरू करने की अपील वाले संदेश भी सामने आए थे।

    इन घटनाओं के बीच कैसर्स को अप्रवासी समुदाय से जोड़ने की कोशिशों पर भी सवाल उठे हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, इन हिंसक समूहों को सीधे अप्रवासी समुदाय से जोड़ने का कोई ठोस आधार नहीं है। इनमें फ्रांसीसी नागरिकों और कट्टर वामपंथी विचारधारा से जुड़े युवाओं की भी बड़ी संख्या बताई गई है।

    दरअसल, मौजूदा आंदोलन की शुरुआत महंगाई, बढ़ती जीवनयापन लागत, आर्थिक असमानता और सार्वजनिक सेवाओं की स्थिति के विरोध में हुई थी। इसमें छात्र, ट्रेड यूनियन और येलो वेस्ट आंदोलन से जुड़े लोग शामिल हैं। पुलिस कार्रवाई और प्रदर्शनकारियों के घायल होने के बाद नागरिक स्वतंत्रता तथा विरोध के अधिकार की मांग भी आंदोलन का हिस्सा बन गई।

    17 अक्टूबर को हुए शुरुआती बड़े प्रदर्शनों के दौरान कई शहरों में दुकानों में लूटपाट और सार्वजनिक इमारतों में आगजनी हुई थी। अब छात्र संगठनों ने नवंबर के पहले सप्ताह में स्कूलों और विश्वविद्यालयों को बंद कराने तथा 5 नवंबर को मजदूर संगठनों के साथ प्रदर्शन करने की घोषणा की है। ऐसे में फ्रांस में आने वाले दिनों में विरोध प्रदर्शनों और सुरक्षा व्यवस्था पर नजर बनी रहेगी।

  • फ्रांस में शिक्षा व्यवस्था के खिलाफ छात्रों का आंदोलन तेज, स्कूलों में भीड़ और शिक्षकों की कमी से सड़कों पर उतरे छात्र

    फ्रांस में शिक्षा व्यवस्था के खिलाफ छात्रों का आंदोलन तेज, स्कूलों में भीड़ और शिक्षकों की कमी से सड़कों पर उतरे छात्र

    नई दिल्ली ।फ्रांस की राजधानी पेरिस से शुरू हुआ शिक्षा व्यवस्था में सुधार का छात्र आंदोलन अब देश के कई हिस्सों तक फैल गया है। स्कूलों में बढ़ती छात्र संख्या, कक्षाओं की कमी, शिक्षकों की कमी और अन्य सुविधाओं के अभाव को लेकर छात्र सड़कों पर प्रदर्शन कर रहे हैं। आंदोलन के दौरान अलग-अलग स्थानों पर पुलिस और प्रदर्शनकारी छात्रों के बीच झड़प की घटनाएं भी सामने आई हैं। लेंस शहर में एक स्कूल के पास हुए धमाके में 15 साल का एक छात्र गंभीर रूप से घायल हो गया। एक अन्य छात्र के सिर में आंसू गैस का गोला लगने और जबड़े में दो जगह फ्रैक्चर होने की जानकारी सामने आई है।

    आंदोलन से जुड़े आंकड़ों के मुताबिक, अब तक करीब 190 छात्र घायल हुए हैं, जबकि पुलिस ने लगभग 5 हजार लोगों को गिरफ्तार किया है। गिरफ्तार लोगों में करीब 85 प्रतिशत छात्र नाबालिग बताए गए हैं। छात्र संगठनों ने मंगलवार को होने वाले आंदोलन में अधिक से अधिक लोगों से शामिल होने की अपील की थी। कई शिक्षक संगठनों ने भी प्रदर्शन को समर्थन देने का ऐलान किया है। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि स्कूलों में छात्रों की संख्या लगातार बढ़ रही है, लेकिन उसके अनुपात में कक्षाएं, शिक्षक और दूसरी जरूरी सुविधाएं नहीं बढ़ाई गई हैं।

    आंदोलन के बीच फ्रांस के प्रधानमंत्री सेबास्तियन लेकोर्नू ने छात्रों और शिक्षकों की समस्याओं को दूर करने के लिए कुछ जरूरी कदम उठाने का ऐलान किया है। हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया है कि हिंसक प्रदर्शन के मामले में सरकार की ओर से नरमी नहीं बरती जाएगी। शिक्षा मंत्री एडुआर जॉफ्रे ने बताया कि आंदोलन शुरू होने के बाद से 24 स्कूलों में बड़े स्तर पर तोड़फोड़ की गई और कुछ स्कूलों को आग के हवाले भी किया गया।

    इस आंदोलन की शुरुआत 21 सितंबर को पेरिस के एक स्कूल से हुई थी। छात्रों ने स्कूल में स्टाफ और संसाधनों की कमी को दूर करने की मांग उठाई थी। जब उनकी मांगें पूरी हुईं तो संबंधित छात्रों ने हड़ताल खत्म कर दी, लेकिन तब तक आंदोलन दूसरे इलाकों तक पहुंच चुका था। धीरे-धीरे इसका विस्तार कॉलेज और विश्वविद्यालयों तक भी हो गया। पिछले दो दशकों में फ्रांस के माध्यमिक स्कूलों में छात्रों की संख्या बढ़ी है, जबकि उसके अनुपात में शिक्षकों की संख्या नहीं बढ़ सकी है। इस अवधि में छात्रों की संख्या करीब ढाई लाख बढ़ने की बात सामने आई है।

    फ्रांस में 2010 में करीब साढ़े 8 लाख बच्चों का जन्म हुआ था, जो 1980 के दशक के बाद का सबसे बड़ा आंकड़ा बताया गया है। बच्चों के जन्म में इस बढ़ोतरी के पीछे 30 साल से अधिक उम्र की महिलाओं में बढ़ी प्रजनन दर को प्रमुख कारण बताया गया है। 2010 में जन्मे बच्चे अब करीब 15 से 16 साल के हो चुके हैं और हाई स्कूलों में पढ़ रहे हैं। छात्रों की संख्या बढ़ने के बावजूद स्कूलों में कक्षाओं, सुविधाओं और शिक्षकों की संख्या उसी अनुपात में नहीं बढ़ी।

    फ्रांस में जारी विरोध केवल शिक्षा व्यवस्था तक सीमित नहीं है। सरकारी कर्मचारी, फायर फाइटर, शिक्षक और स्वास्थ्यकर्मी भी वेतन बढ़ोतरी समेत अपनी अलग-अलग मांगों को लेकर प्रदर्शन कर रहे हैं। देश इस समय ईरान और यूक्रेन युद्ध की वजह से आर्थिक संकट का सामना कर रहा है। फ्रांस पर करीब 4 ट्रिलियन डॉलर का सरकारी कर्ज बताया गया है, जो उसकी सालाना अर्थव्यवस्था के करीब 119 प्रतिशत के बराबर है। आबादी के बूढ़े होने के कारण पेंशन और स्वास्थ्य सेवाओं पर सरकारी खर्च भी लगातार बढ़ रहा है।

  • पेरिस में जान्हवी कपूर ने पहनी मलमल खादी साड़ी, रिया कपूर ने इसे भारतीय धरोहर के सम्मान से जोड़ा

    पेरिस में जान्हवी कपूर ने पहनी मलमल खादी साड़ी, रिया कपूर ने इसे भारतीय धरोहर के सम्मान से जोड़ा


    नई दिल्ली ।
    बॉलीवुड अभिनेत्री जान्हवी कपूर अपने फैशन अंदाज के लिए जानी जाती हैं और इस बार पेरिस में उनका पारंपरिक भारतीय लुक चर्चा में रहा। बीओएफ 500 गाला में जान्हवी कपूर ने आधुनिक फैशन के बीच भारतीय परिधान और पारंपरिक कारीगरी को खास अंदाज में पेश किया। इस अवसर के लिए उन्होंने पंकज एस हेरिटेज का कस्टम आउटफिट पहना, जिसे फैशन स्टाइलिस्ट रिया कपूर ने तैयार और स्टाइल किया था। जान्हवी ऑफ-व्हाइट साड़ी में नजर आईं, जिसमें भारतीय टेक्सटाइल की खासियत साफ दिखाई दी।

    रिया कपूर ने सोशल मीडिया पर जान्हवी के इस लुक से जुड़ी जानकारी साझा की। उन्होंने बताया कि अभिनेत्री की साड़ी 460 काउंट बंगाल मलमल से तैयार की गई थी। इस खास मलमल को बाफ्त-ए-हवा, शबनमी और चांदनी जैसे नामों से भी जाना जाता है। रिया के अनुसार, यह मलमल पूरी तरह भारत में ही बुनी गई है। उन्होंने इस साड़ी को भारत की धरोहर के सम्मान से जोड़ा। इस तरह जान्हवी के पहनावे में फैशन के साथ भारतीय कपड़ा परंपरा को भी प्रमुखता मिली।

    जान्हवी की छह गज लंबी ऑफ-व्हाइट साड़ी में पारंपरिक भारतीय टेक्सटाइल और कारीगरी के साथ आधुनिक डिजाइन का मेल देखने को मिला। साड़ी की फ्लोइंग ड्रेपिंग को गोल्ड डिटेलिंग से सजाया गया था। इसके अलावा मोती, शेल्स और टैसल्स का इस्तेमाल किया गया, जिससे परिधान को अलग रूप मिला। साड़ी की बनावट और सजावट ने पूरे पहनावे को आकर्षक और पारंपरिक स्वरूप के साथ आधुनिक प्रस्तुति दी।

    इस खास आउटफिट के साथ जान्हवी ने मैचिंग बस्टियर स्टाइल ब्लाउज पहना। ब्लाउज में पतली स्ट्रैप्स और स्वीटहार्ट नेकलाइन दी गई थी। साड़ी के साथ इसे इस तरह रखा गया कि पारंपरिक परिधान और आधुनिक फैशन का संतुलन बना रहे। जान्हवी के पूरे लुक में सादगी के साथ बारीक कारीगरी और सजावटी विवरणों पर विशेष ध्यान दिखाई दिया। ऑफ-व्हाइट रंग ने भी पूरे परिधान को एक अलग और सौम्य रूप दिया।

    लुक को और खास बनाने के लिए साड़ी के साथ ऑर्नेट स्लीव्स जोड़ी गई थीं। इन स्लीव्स में पोल्की, गार्नेट और एमराल्ड जैसे कीमती पत्थरों का इस्तेमाल किया गया था। इसके साथ सराफा टैसल्स, किरण और रेशम की फ्रिंजिंग शामिल की गई। इन बारीक सजावटी तत्वों ने परिधान में रॉयल टच जोड़ा और पारंपरिक भारतीय शिल्प की खूबसूरती को उभारा। जान्हवी का यह पहनावा भारतीय कारीगरी और समकालीन फैशन के संयोजन के तौर पर सामने आया।

    पेरिस के इस आयोजन में जान्हवी कपूर का लुक इसलिए भी खास रहा क्योंकि इसमें भारतीय परिधान को अंतरराष्ट्रीय फैशन मंच के अनुरूप प्रस्तुत किया गया। बंगाल मलमल से तैयार साड़ी, पारंपरिक कारीगरी, कीमती पत्थरों से सजी स्लीव्स और आधुनिक ब्लाउज डिजाइन ने उनके पूरे लुक को अलग पहचान दी। रिया कपूर द्वारा साझा की गई जानकारी के मुताबिक, इस परिधान का उद्देश्य भारतीय विरासत और टेक्सटाइल की खूबसूरती को सामने लाना था। जान्हवी का यह अंदाज आधुनिक फैशन और पारंपरिक भारतीय क्राफ्ट के मेल को दर्शाता नजर आया।

  • हिंदू समूह की यात्रा के दौरान महिला कर्मचारियों को ड्यूटी से हटाने पर भड़के एफिल टावर कर्मचारी, एक दिन बंद रहा टावर

    हिंदू समूह की यात्रा के दौरान महिला कर्मचारियों को ड्यूटी से हटाने पर भड़के एफिल टावर कर्मचारी, एक दिन बंद रहा टावर

    नई दिल्ली ।पेरिस के प्रसिद्ध एफिल टावर को सोमवार को कर्मचारियों की हड़ताल के कारण एक दिन के लिए बंद करना पड़ा। हड़ताल की वजह एक हिंदू धार्मिक समूह की यात्रा के दौरान महिला कर्मचारियों को ड्यूटी से हटाए जाने का मामला बताया जा रहा है। कर्मचारियों ने आरोप लगाया कि कार्यस्थल पर लिंग के आधार पर भेदभाव किया गया और महिलाओं को हटाकर उनकी जगह पुरुष कर्मचारियों को लगाया गया।

    घटना का संबंध बोचासनवासी अक्षर पुरुषोत्तम स्वामीनारायण संस्था यानी BAPS के एक प्रतिनिधिमंडल की एफिल टावर यात्रा से बताया गया है। समूह में 100 से अधिक संत और अन्य सदस्य शामिल थे। यात्रा से पहले महिला कर्मचारियों को उनके निर्धारित कार्यस्थलों से हटाने का निर्णय लिया गया था। इस फैसले से कर्मचारियों में नाराजगी पैदा हुई और बाद में उन्होंने विरोध स्वरूप हड़ताल कर दी।

    एफिल टावर की जिम्मेदारी संभालने वाली कंपनी एसईटीई के अनुसार, धार्मिक समूह की ओर से अनुरोध किया गया था कि उनके दौरे के दौरान महिलाओं से बातचीत कम से कम हो। कंपनी ने कहा कि उसने इस तरह की मांग को स्वीकार करने से इनकार कर दिया था। हालांकि, घटनाक्रम के दौरान महिला कर्मचारियों को ड्यूटी से हटाए जाने के बाद विवाद बढ़ गया।

    कर्मचारियों की ओर से इस मामले को कार्यस्थल पर लैंगिक भेदभाव से जोड़कर देखा गया। उनका कहना था कि किसी धार्मिक या सांस्कृतिक समूह की पसंद के आधार पर महिला कर्मचारियों को उनके काम से हटाना स्वीकार्य नहीं होना चाहिए। इसी मुद्दे को लेकर कर्मचारियों ने सोमवार को काम रोक दिया, जिसके चलते एफिल टावर आने वाले पर्यटकों को परेशानी का सामना करना पड़ा।

    इस विवाद के बाद BAPS से जुड़े पेरिस स्थित हिंदू मंदिर की ओर से भी खेद जताया गया। संस्था ने कहा कि यदि उनके प्रतिनिधिमंडल की वजह से किसी व्यक्ति को ठेस पहुंची है या किसी तरह की परेशानी हुई है तो उन्हें इसका अफसोस है। संस्था ने यह भी बताया कि प्रतिनिधिमंडल में 100 से अधिक लोग शामिल थे और बड़ी संख्या को देखते हुए यात्रा के दौरान किसी तरह की परेशानी से बचने के लिए व्यवस्थाएं पहले से तय की गई थीं।

    पेरिस के मेयर इमैनुएल ग्रेगोइरे ने भी इस मामले पर प्रतिक्रिया दी और कहा कि कंपनी को इस तरह की शर्तें स्वीकार नहीं करनी चाहिए थीं। विवाद ने धार्मिक स्वतंत्रता, कार्यस्थल पर समानता और महिला कर्मचारियों के अधिकारों से जुड़े सवालों को चर्चा में ला दिया है।

    एफिल टावर पेरिस की पहचान से जुड़ी दुनिया की सबसे प्रसिद्ध संरचनाओं में से एक है। सीन नदी के किनारे स्थित यह टावर करीब 330 मीटर ऊंचा है। इसका निर्माण 1887 से 1889 के बीच कराया गया था। इसे 1889 में आयोजित विश्व मेले के लिए तैयार किया गया था। यह आयोजन फ्रांसीसी क्रांति की 100वीं वर्षगांठ के अवसर पर किया गया था।

    इस विशाल टावर का डिजाइन गुस्ताव एफिल से जुड़ा है और उन्हीं के नाम पर इसे एफिल टावर कहा गया। शुरुआत में इसे प्रदर्शनी के लिए तैयार किया गया था, लेकिन समय के साथ यह पेरिस और फ्रांस की सबसे बड़ी पहचान बन गया। आज दुनियाभर से लाखों पर्यटक इसे देखने पहुंचते हैं। ऐसे में कर्मचारियों की हड़ताल के कारण इसका एक दिन बंद रहना अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी चर्चा का विषय बन गया।

  • छह दिन की विदेश यात्रा पर निकले प्रधानमंत्री मोदी, G7 बैठक से लेकर रणनीतिक साझेदारी तक कई अहम एजेंडे पर होगी चर्चा

    छह दिन की विदेश यात्रा पर निकले प्रधानमंत्री मोदी, G7 बैठक से लेकर रणनीतिक साझेदारी तक कई अहम एजेंडे पर होगी चर्चा

    नई दिल्ली । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शनिवार को छह दिवसीय विदेश यात्रा पर रवाना हो गए, जिसके तहत वह फ्रांस और स्लोवाकिया का दौरा करेंगे। इस यात्रा को भारत की विदेश नीति और वैश्विक कूटनीतिक सक्रियता के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। प्रधानमंत्री अपने दौरे के दौरान जी-7 शिखर सम्मेलन में भाग लेने के साथ-साथ कई देशों के शीर्ष नेताओं से द्विपक्षीय और बहुपक्षीय स्तर पर बातचीत करेंगे। यह अवसर भारत को वैश्विक आर्थिक, रणनीतिक और तकनीकी मुद्दों पर अपनी भूमिका और दृष्टिकोण को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करने का मंच प्रदान करेगा।

    प्रधानमंत्री मोदी का यह फ्रांस दौरा विशेष महत्व रखता है। प्रधानमंत्री बनने के बाद यह उनकी सातवीं फ्रांस यात्रा है, जो दोनों देशों के बीच लगातार मजबूत होते संबंधों को दर्शाती है। यात्रा से पहले प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत की रणनीतिक सोच में फ्रांस का विशेष स्थान है और दोनों देशों के बीच रक्षा, प्रौद्योगिकी, नवाचार, ऊर्जा तथा वैश्विक सहयोग के क्षेत्रों में निरंतर प्रगति हुई है। उन्होंने विश्वास जताया कि यह दौरा द्विपक्षीय साझेदारी को और अधिक मजबूत बनाने में सहायक सिद्ध होगा।

    फ्रांस प्रवास के दौरान प्रधानमंत्री मोदी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों से मुलाकात करेंगे। दोनों नेता इस वर्ष फरवरी में हुई चर्चाओं के बाद विभिन्न क्षेत्रों में हुई प्रगति की समीक्षा करेंगे। इसके अलावा दोनों देशों के बीच आर्थिक सहयोग, रक्षा साझेदारी, उभरती तकनीकों और वैश्विक चुनौतियों पर भी विस्तार से विचार-विमर्श होने की संभावना है। इस मुलाकात को भारत-फ्रांस संबंधों के अगले चरण की दिशा तय करने वाली महत्वपूर्ण बैठक माना जा रहा है।

    दौरे के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ‘भारत इनोवेट्स’ कार्यक्रम में भी भाग लेंगे। यह पहल भारत और फ्रांस के बीच नवाचार सहयोग को बढ़ावा देने के उद्देश्य से शुरू की गई है। कार्यक्रम में भारत, फ्रांस और अन्य देशों के स्टार्टअप, निवेशक, नवप्रवर्तक और वेंचर कैपिटल प्रतिनिधि एक मंच पर आएंगे। माना जा रहा है कि इससे भारतीय स्टार्टअप इकोसिस्टम को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान और अवसर प्राप्त होंगे। नवाचार और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने पर दोनों देशों का विशेष फोकस रहेगा।

    प्रधानमंत्री मोदी 17 जून को होने वाले जी-7 शिखर सम्मेलन में भी भाग लेंगे। यह सातवां अवसर होगा जब वह इस प्रतिष्ठित वैश्विक मंच का हिस्सा बनेंगे। इसके साथ ही वह लगातार सात बार जी-7 बैठक में शामिल होने वाले पहले भारतीय प्रधानमंत्री बन जाएंगे। सम्मेलन के दौरान वैश्विक अर्थव्यवस्था, ऊर्जा सुरक्षा, आपूर्ति श्रृंखला, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, जलवायु परिवर्तन और अंतरराष्ट्रीय स्थिरता जैसे विषयों पर चर्चा होने की संभावना है।

    जी-7 बैठक के दौरान प्रधानमंत्री मोदी की कई प्रमुख विश्व नेताओं से मुलाकात हो सकती है। इनमें अमेरिका सहित अन्य प्रमुख देशों के राष्ट्राध्यक्ष और सरकार प्रमुख शामिल हो सकते हैं। इन बैठकों में द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करने, व्यापार एवं निवेश बढ़ाने और वैश्विक चुनौतियों से निपटने के लिए सहयोग के नए अवसरों पर चर्चा होने की उम्मीद है।

    यात्रा का दूसरा महत्वपूर्ण पड़ाव स्लोवाकिया होगा। वर्ष 1993 में स्वतंत्र राष्ट्र बनने के बाद किसी भारतीय प्रधानमंत्री की यह पहली स्लोवाकिया यात्रा है। इस दौरे से दोनों देशों के बीच राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक संबंधों को नई गति मिलने की संभावना जताई जा रही है। विदेश नीति विशेषज्ञों का मानना है कि यह संपूर्ण यात्रा भारत की बढ़ती वैश्विक भूमिका, रणनीतिक साझेदारियों के विस्तार और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उसकी सक्रिय उपस्थिति को और मजबूत करेगी।

  • FCAS प्रोग्राम के टूटने के बाद फ्रांस का बड़ा दांव, 2040 तक अकेले विकसित करेगा छठी पीढ़ी का लड़ाकू विमान

    FCAS प्रोग्राम के टूटने के बाद फ्रांस का बड़ा दांव, 2040 तक अकेले विकसित करेगा छठी पीढ़ी का लड़ाकू विमान

    नई दिल्ली । यूरोप की महत्वाकांक्षी रक्षा परियोजनाओं में शामिल फ्यूचर कॉम्बैट एयर सिस्टम (FCAS) कार्यक्रम के बंद होने के बाद वैश्विक रक्षा क्षेत्र में नए समीकरण उभरते दिखाई दे रहे हैं। फ्रांस ने अब स्पष्ट संकेत दिया है कि वह छठी पीढ़ी के लड़ाकू विमान के विकास का काम अपने दम पर आगे बढ़ाएगा। इस निर्णय को केवल एक रक्षा परियोजना का पुनर्गठन नहीं बल्कि यूरोपीय सैन्य उद्योग में बदलते शक्ति संतुलन के रूप में भी देखा जा रहा है।

    कई वर्षों से फ्रांस, जर्मनी और स्पेन संयुक्त रूप से FCAS कार्यक्रम पर काम कर रहे थे। इस परियोजना का उद्देश्य वर्ष 2040 के आसपास ऐसी उन्नत लड़ाकू विमान प्रणाली विकसित करना था जो कृत्रिम बुद्धिमत्ता, नेटवर्क आधारित युद्ध क्षमता, मानव रहित सहयोगी प्लेटफॉर्म और अत्याधुनिक स्टेल्थ तकनीकों से लैस हो। हालांकि परियोजना में जिम्मेदारियों, तकनीकी नियंत्रण और औद्योगिक हिस्सेदारी को लेकर लगातार मतभेद सामने आते रहे।

    फ्रांसीसी नेतृत्व ने अब संकेत दिया है कि पिछले वर्षों में किए गए अरबों यूरो के निवेश और अनुसंधान कार्य को आधार बनाकर देश अपने स्वतंत्र कार्यक्रम को आगे बढ़ाएगा। फ्रांस का मानना है कि अब तक विकसित की गई तकनीकी क्षमताएं उसे अगली पीढ़ी के लड़ाकू विमान निर्माण की दिशा में आत्मनिर्भर रूप से आगे बढ़ने में सक्षम बनाती हैं। फ्रांस की प्रमुख एयरोस्पेस कंपनी डसॉल्ट पहले से ही राफेल जैसे सफल लड़ाकू विमान का निर्माण कर चुकी है, जिससे इस परियोजना को तकनीकी आधार मिलने की उम्मीद है।

    दूसरी ओर जर्मनी ने भी अपने सहयोगी औद्योगिक समूहों के साथ अलग रास्ता अपनाने का संकेत दिया है। कई प्रमुख रक्षा और एयरोस्पेस कंपनियों ने मिलकर एक नया औद्योगिक गठबंधन तैयार किया है, जिसका उद्देश्य भविष्य के लड़ाकू विमान कार्यक्रम को स्वतंत्र रूप से आगे बढ़ाना है। इससे स्पष्ट है कि यूरोप अब एक साझा मंच के बजाय समानांतर सैन्य विमानन परियोजनाओं की ओर बढ़ सकता है।

    इस पूरे घटनाक्रम का असर भारत के लिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। भारत और फ्रांस के बीच पिछले एक दशक में रक्षा सहयोग लगातार मजबूत हुआ है। राफेल लड़ाकू विमानों की खरीद और नौसैनिक सहयोग ने दोनों देशों के रणनीतिक संबंधों को नई ऊंचाई दी है। ऐसे में फ्रांस यदि अपने नए लड़ाकू विमान कार्यक्रम के लिए अंतरराष्ट्रीय साझेदारों की तलाश करता है तो भारत एक स्वाभाविक विकल्प के रूप में सामने आ सकता है।

    हालांकि संभावित साझेदारी का रास्ता आसान नहीं होगा। भारत लंबे समय से रक्षा क्षेत्र में तकनीकी आत्मनिर्भरता पर जोर दे रहा है। किसी भी संयुक्त कार्यक्रम में भारत की प्राथमिकता केवल खरीददार की भूमिका निभाने के बजाय सह-विकास और सह-उत्पादन की होगी। उन्नत इंजन तकनीक, मिशन सिस्टम, सोर्स कोड और महत्वपूर्ण बौद्धिक संपदा तक पहुंच जैसे मुद्दे किसी भी संभावित समझौते के केंद्र में रहेंगे।

    इसके साथ ही भारत पहले से ही अपने स्वदेशी एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (AMCA) कार्यक्रम पर तेजी से काम कर रहा है। ऐसे में नीति निर्माताओं को यह तय करना होगा कि भविष्य की जरूरतों के लिए स्वदेशी परियोजना को प्राथमिकता दी जाए या किसी अंतरराष्ट्रीय साझेदारी के माध्यम से छठी पीढ़ी की तकनीकों तक तेजी से पहुंच बनाई जाए।

    विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में फ्रांस की नई रणनीति और भारत की रक्षा आवश्यकताओं के बीच कई साझा अवसर उभर सकते हैं। हालांकि किसी भी संभावित सहयोग का अंतिम स्वरूप तकनीकी हस्तांतरण, लागत, औद्योगिक भागीदारी और दीर्घकालिक रणनीतिक हितों पर निर्भर करेगा। फिलहाल FCAS कार्यक्रम का अंत एक अध्याय का समापन जरूर है, लेकिन इससे भविष्य की नई रक्षा साझेदारियों के लिए कई संभावनाएं भी खुलती दिखाई दे रही हैं।

  • चार घंटे से अधिक चले रोमांचक संघर्ष में ज्वेरेव ने कोबोली को दी शिकस्त, रचा ऐतिहासिक कीर्तिमान

    चार घंटे से अधिक चले रोमांचक संघर्ष में ज्वेरेव ने कोबोली को दी शिकस्त, रचा ऐतिहासिक कीर्तिमान

    नई दिल्ली । विश्व टेनिस परिदृश्य पर जर्मनी के स्टार खिलाड़ी अलेक्जेंडर ज्वेरेव ने आखिरकार अपने करियर का सबसे बड़ा मील का पत्थर हासिल करते हुए इतिहास के पन्नों में अपना नाम स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज करा लिया है। पेरिस के प्रतिष्ठित क्ले कोर्ट पर खेले गए फ्रेंच ओपन 2026 के पुरुष एकल वर्ग के खिताबी मुकाबले में विश्व नंबर-3 ज्वेरेव ने अपनी खेल क्षमता और मानसिक दृढ़ता का उत्कृष्ट प्रदर्शन किया। उन्होंने पांच सेट तक खिंचे बेहद कड़े और सांस रोक देने वाले फाइनल मैच में इटली के उभरते हुए खिलाड़ी फ्लेवियो कोबोली की चुनौती को ध्वस्त करते हुए अपने जीवन का पहला ग्रैंड स्लैम खिताब जीत लिया।

    अंतरराष्ट्रीय टेनिस कैलेंडर के इस बेहद महत्वपूर्ण खिताबी मुकाबले में दोनों खिलाड़ियों के बीच करीब चार घंटे और 20 मिनट तक मैराथन संघर्ष देखा गया। अलेक्जेंडर ज्वेरेव ने अंततः कोबोली को 6-1, 4-6, 6-4, 6-7(5), 6-1 से मात देकर रोलां गैरो की चमचमाती ट्रॉफी पर कब्जा जमाया। मैच का अंतिम और निर्णायक अंक जीतते ही जर्मन खिलाड़ी कोर्ट पर ही बेहद भावुक नजर आए। उनके लिए यह जीत इसलिए भी ऐतिहासिक है क्योंकि इससे पहले वे तीन बड़े ग्रैंड स्लैम फाइनल मुकाबलों में पहुंचकर भी उपविजेता बनकर रह गए थे, जिसमें 2020 का यूएस ओपन, 2024 का फ्रेंच ओपन और 2025 का ऑस्ट्रेलियन ओपन शामिल है।

    मैच की तकनीकी समीक्षा की जाए तो ज्वेरेव ने मुकाबले की आक्रामक शुरुआत करते हुए पहले सेट में पूरी तरह अपना दबदबा कायम किया और महज 34 मिनट के भीतर इसे 6-1 से अपने पक्ष में कर लिया। इसके बाद अपना पहला ग्रैंड स्लैम फाइनल खेल रहे इटली के फ्लेवियो कोबोली ने दूसरे सेट में शानदार वापसी की। कोबोली ने अपने बेहतरीन ड्रॉप शॉट्स और आक्रामक ग्राउंडस्ट्रोक्स के दम पर ज्वेरेव की सर्विस ब्रेक की और दूसरा सेट 6-4 से जीतकर मैच में रोमांच वापस ला दिया। तीसरे सेट में भी दोनों के बीच कांटे की टक्कर रही, लेकिन कोबोली की कुछ अप्रत्याशित गलतियों का लाभ उठाकर ज्वेरेव ने इसे 6-4 से जीत लिया।

    चौथे सेट में दोनों खिलाड़ियों का जज्बा चरम पर था जहां इतालवी खिलाड़ी कोबोली ने टाई-ब्रेकर में शानदार फोरहैंड विनर लगाते हुए खेल को निर्णायक पांचवें सेट में धकेल दिया। हालांकि, अंतिम सेट में ज्वेरेव ने एक सच्चे चैंपियन की तरह वापसी की और अपनी सर्विस पर 83 प्रतिशत अंक हासिल करते हुए कोबोली पर मानसिक दबाव बना दिया। ज्वेरेव ने शुरुआती गेम में ही विरोधी की सर्विस ब्रेक की और पीछे मुड़कर नहीं देखा तथा अंतिम सेट 6-1 से जीतकर खिताब अपने नाम कर लिया।

    इस ऐतिहासिक विजय के साथ ही अलेक्जेंडर ज्वेरेव ने जर्मन टेनिस के इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ दिया है। वह साल 1937 में हेनर हेन्केल के बाद फ्रेंच ओपन का पुरुष एकल खिताब जीतने वाले पहले जर्मन खिलाड़ी बन गए हैं। इसके अतिरिक्त, वर्ष 1996 के ऑस्ट्रेलियन ओपन में बोरिस बेकर की ऐतिहासिक जीत के बाद वे किसी भी ग्रैंड स्लैम इवेंट में पुरुष एकल का खिताब जीतने वाले पहले जर्मन पुरुष खिलाड़ी बने हैं। दूसरी ओर, उपविजेता रहे कोबोली भले ही खिताब से चूक गए हों, लेकिन इस टूर्नामेंट में उनके शानदार प्रदर्शन के दम पर वे विश्व रैंकिंग में शीर्ष-10 के बेहद करीब पहुंच गए हैं।

  • पेरिस नर्सरी स्कूल कांड पर हड़कंप, सार्वजनिक ट्रायल से फ्रांस में बाल सुरक्षा बहस तेज

    पेरिस नर्सरी स्कूल कांड पर हड़कंप, सार्वजनिक ट्रायल से फ्रांस में बाल सुरक्षा बहस तेज


    नई दिल्ली । फ्रांस की राजधानी पेरिस में बच्चों के साथ कथित यौन शोषण के एक बेहद गंभीर मामले ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है। इस संवेदनशील प्रकरण में पहली बार सार्वजनिक ट्रायल की शुरुआत की गई है, जो सामान्य परिस्थितियों से अलग और बेहद दुर्लभ माना जा रहा है। आमतौर पर फ्रांस में नाबालिगों से जुड़े मामलों की सुनवाई बंद कमरे में होती है, लेकिन इस बार पीड़ित बच्चों के माता पिता की मांग पर इसे सार्वजनिक किया गया है ताकि समाज में बाल सुरक्षा को लेकर व्यापक जागरूकता लाई जा सके।

    यह मामला अप्रैल 2025 में सामने आया था जब कुछ छोटे बच्चों ने अपने परिजनों को बताया कि उनके साथ नर्सरी स्कूल के अंदर गलत व्यवहार हुआ है। इसके बाद जांच शुरू की गई और 36 वर्षीय स्कूल सहायक पर गंभीर आरोप लगाए गए। आरोपी की पहचान गोपनीय रखी गई है। आरोप है कि अगस्त 2024 से अप्रैल 2025 के बीच उसने स्कूल के बाथरूम, लंच ब्रेक और आफ्टर स्कूल केयर के दौरान तीन से पांच वर्ष की उम्र के बच्चों के साथ यौन उत्पीड़न किया। आरोपी ने सभी आरोपों से इनकार किया है।

    मामले में यह भी सामने आया है कि सिर्फ बच्चों ही नहीं बल्कि दो महिला सहकर्मियों के साथ भी यौन उत्पीड़न और एक के साथ यौन हमले के आरोप जुड़े हैं। यदि आरोपी दोषी पाया जाता है तो उसे दस साल तक की सजा हो सकती है। इस केस ने फ्रांस में स्कूलों और डे केयर केंद्रों की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

    सबसे अहम बात यह है कि पीड़ित बच्चों को अदालत में पेश नहीं किया जाएगा। उनके बयान पहले ही जांच के दौरान दर्ज कर लिए गए थे जिन्हें अब न्यायाधीश अदालत में पढ़कर सुनाएंगे। इस फैसले को बच्चों की मानसिक सुरक्षा के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    हाल के महीनों में पेरिस और अन्य शहरों से ऐसे कई मामलों के सामने आने के बाद चिंता और बढ़ गई है। पेरिस की मुख्य अभियोजक लॉरे बेकुआ ने बताया कि राजधानी में 84 नर्सरी स्कूल, करीब 20 प्राथमिक स्कूल और 10 डे केयर केंद्रों से जुड़े मामलों की जांच चल रही है। यह आंकड़ा पूरे शिक्षा तंत्र में सुरक्षा व्यवस्था की गंभीर स्थिति को दर्शाता है।

    पीड़ित परिवारों और सामाजिक संगठनों का कहना है कि बच्चों की शिकायतों को लंबे समय तक नजरअंदाज किया गया, जिससे मामला और गंभीर हो गया। एक मां ने पहले ही स्कूल प्रशासन को चेतावनी दी थी, लेकिन उस पर कार्रवाई नहीं हुई। अब परिजन और संगठनों का कहना है कि यह घटना पूरे सिस्टम के लिए चेतावनी है।

    माता पिता संगठन मीटू इकोले की सह संस्थापक बरका जरुआली ने अदालत के बाहर प्रदर्शन के दौरान कहा कि अब देश को जागने की जरूरत है। प्रदर्शनकारियों ने बच्चों की सुरक्षा से जुड़े संदेश लिखे बैनर भी उठाए और सख्त कार्रवाई की मांग की। पीड़ित परिवारों की वकील रेबेका रॉयर ने इसे बच्चों की सुरक्षा के लिए निर्णायक मोड़ बताया है और सरकार से स्कूलों में निगरानी व्यवस्था मजबूत करने की मांग की है।

    पेरिस के मेयर इमैनुएल ग्रेगॉयर ने भी इस मुद्दे को प्राथमिकता बताते हुए कहा है कि 78 स्कूल कर्मचारियों को निलंबित किया गया है जिनमें कई पर यौन हिंसा के आरोप हैं। उन्होंने स्कूल सुरक्षा प्रणाली को मजबूत करने के लिए करोड़ों यूरो की योजना की घोषणा की है। यह मामला अब सिर्फ एक आपराधिक जांच नहीं बल्कि फ्रांस में बच्चों की सुरक्षा और शिक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता पर एक बड़ा राष्ट्रीय सवाल बन चुका है।