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  • जनगणना के आंकड़ों से सामने आएगी शहरों की असली तस्वीर…. संसदीय समिति ने की सिफारिश

    जनगणना के आंकड़ों से सामने आएगी शहरों की असली तस्वीर…. संसदीय समिति ने की सिफारिश


    नई दिल्ली।
    देश में जारी जनगणना (Census) के नतीजे आने के बाद शहरों की असली तस्वीर सामने आएगी। संसद की संसदीय समिति (Parliamentary Committee) ने आवास और शहरी मामलों के मंत्रालय से कहा है कि वर्तमान में 3,000 से अधिक शहर या कस्बे शहरी विशेषताएं तो रखते हैं, लेकिन अब भी ग्रामीण स्थानीय निकायों (Rural Local Bodies) के प्रशासनिक नियंत्रण में हैं। यह स्थिति बदलनी चाहिए। शहर की मौजूदा परिभाषा पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता है। आजादी के सौवें वर्ष तक शहरी आबादी 87 करोड़ तक होने की उम्मीद है।

    मंत्रालय ने शहरीकरण की बदलती जरूरतों को देखते हुए बस्ती वर्गीकरण व्यवस्था में ‘संक्रमणकालीन क्षेत्र’ (ट्रांजिशनल एरिया) की नई श्रेणी बनाने का प्रस्ताव दिया है। इससे उन क्षेत्रों की पहचान और नियोजन आसान हो सकता है, जहां आबादी और आर्थिक गतिविधियां तो शहरी स्वरूप ले रही हैं, लेकिन उन्हें अभी शहर का दर्जा नहीं मिला है। भारत के महापंजीयक व जनगणना आयुक्त कार्यालय ने कहा है, मौजूदा जनगणना डिजिटल तरीके से हो रही है। आंकड़ों को अंतिम रूप दिए जाने के बाद गांव व शहरों के आंकड़ों से सीमाओं का विश्लेषण कर अर्धशहरी या संक्रमणकालीन बस्तियों की पहचान की जा सकती है। लेकिन इस वक्त जनगणना के बीच अर्ध शहरी क्षेत्रों की नई श्रेणी शुरू करना संभव नहीं है।

    वर्ष 2025 में भारत की शहरी आवादी लगभग 45 से 50 करोड़ के बीच होने का अनुमान था। वहीं, 2047 तक इसके बढ़कर 85 से 87 करोड़ होने की संभावना है। मंत्रालय का कहना है कि नए शहरी क्षेत्रों का विकास हाई स्पीड रेल नेटवर्क, क्षेत्रीय तीव्र पारगमन प्रणाली और प्रमुख एक्सप्रेसवे जैसे परिवहन एवं आर्थिक गलियारों के आसपास होने की संभावना है।


    क्या होते हैं जनगणना नगर व वैधानिक नगर

    5,000 आबादी, 400 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर जनसंख्या घनत्व वाला क्षेत्र जनगणना नगर कहलाता है। यहां मुख्य कामगारों में पुरुष के कम से कम 75 प्रतिशत गैर-कृषि गतिविधियों में शामिल रहना जरूरी शर्त है। वैधानिक नगर में नगर निगम, नगरपालिका, छावनी बोर्ड और अधिसूचित क्षेत्र समितियां शामिल हैं।


    संसदीय समिति की सिफारिशें

    संसदीय समिति ने कहा, शहर की परिभाषा में बदलाव की जरूरत है। सरकार लैंगिक पक्षपाती मानदंड में संशोधन के लिए एक केंद्रित अध्ययन कराए और शहरी क्षेत्रों की पहचान हेतु लैंगिक-समावेशी कार्यप्रणाली विकसित करे।

  • संसदीय समिति की चौंकाने वाली रिपोर्ट जेलों के भीतर मोबाइल और प्रतिबंधित सामान का खेल नहीं थम रहा

    संसदीय समिति की चौंकाने वाली रिपोर्ट जेलों के भीतर मोबाइल और प्रतिबंधित सामान का खेल नहीं थम रहा


    नई दिल्ली । देश की जेलों में सुरक्षा व्यवस्था को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। केंद्रीय गृह मामलों की संसदीय स्थायी समिति की ताजा रिपोर्ट में सामने आया है कि मोबाइल फोन समेत कई प्रतिबंधित सामान बड़ी आसानी से जेलों के भीतर पहुंच रहे हैं। सबसे चिंता की बात यह है कि आधुनिक सुरक्षा उपकरण जैमर और सीसीटीवी कैमरे लगाए जाने के बावजूद यह सिलसिला थम नहीं रहा है। रिपोर्ट के अनुसार इस पूरे नेटवर्क में जेल स्टाफ के साथ अस्पताल से जुड़े कुछ कर्मचारियों की मिलीभगत भी सामने आई है जिससे जेल सुरक्षा व्यवस्था की प्रभावशीलता पर सवाल उठने लगे हैं।

    समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि जेलों में लंबे समय तक एक ही स्थान पर तैनात रहने वाले कर्मचारियों और कैदियों के बीच नजदीकियां बढ़ जाती हैं। यही कारण है कि कई मामलों में सांठगांठ विकसित हो जाती है और प्रतिबंधित सामान अंदर पहुंचाने का रास्ता आसान बन जाता है। समिति ने सुझाव दिया है कि जेल कर्मचारियों का नियमित अंतराल पर तबादला किया जाए ताकि इस तरह की मिलीभगत की संभावना कम हो सके।

    रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि देश की अधिकांश जेलों में आधुनिक सुरक्षा संसाधनों की कमी है। कई स्थानों पर लगे जैमर प्रभावी ढंग से काम नहीं कर रहे हैं जबकि सीसीटीवी निगरानी व्यवस्था भी पर्याप्त नहीं है। इसलिए गृह मंत्रालय से सिफारिश की गई है कि राज्यों को पर्याप्त वित्तीय सहायता उपलब्ध कराई जाए ताकि डोर फ्रेम मेटल डिटेक्टर हैंड हेल्ड स्कैनर बैगेज स्कैनर बॉडी वॉर्न कैमरे आधुनिक सीसीटीवी सिस्टम और अन्य सुरक्षा उपकरण खरीदे जा सकें। साथ ही वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए कैदियों की पेशी को बढ़ावा देने की भी सलाह दी गई है जिससे जेल से बाहर ले जाने की जरूरत कम हो सके।

    हाल के वर्षों में कई ऐसे मामले सामने आए हैं जिन्होंने जेल सुरक्षा पर गंभीर चिंता बढ़ा दी है। गैंगस्टर लॉरेंस बिश्नोई के जेल के भीतर से मोबाइल फोन और एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग प्लेटफॉर्म के जरिए आपराधिक नेटवर्क संचालित करने के आरोपों ने पूरे देश का ध्यान आकर्षित किया। राष्ट्रीय जांच एजेंसी भी पहले कई बार यह संकेत दे चुकी है कि कुछ संगठित अपराधी जेल के भीतर से ही उगाही ड्रग तस्करी हवाला और टारगेट किलिंग जैसी गतिविधियों का संचालन करते रहे हैं।

    पूर्व वरिष्ठ जेल अधिकारियों का भी मानना है कि जेल मैनुअल में समय के अनुसार बदलाव की जरूरत है। उनका कहना है कि केवल निचले स्तर के कर्मचारियों को जिम्मेदार ठहराना पर्याप्त नहीं होगा क्योंकि कई मामलों में प्रभावशाली लोगों का संरक्षण भी ऐसी गतिविधियों को बढ़ावा देता है। जब तक जवाबदेही तय नहीं होगी और भ्रष्टाचार पर कठोर कार्रवाई नहीं होगी तब तक सुधार की प्रक्रिया अधूरी रहेगी।

    विशेषज्ञों का मानना है कि जेल केवल अपराधियों को बंद रखने का स्थान नहीं बल्कि सुधार गृह भी हैं। यदि जेलों के भीतर ही आपराधिक गतिविधियां संचालित होती रहेंगी तो कानून व्यवस्था और राष्ट्रीय सुरक्षा दोनों के लिए खतरा बढ़ेगा। ऐसे में संसदीय समिति की सिफारिशों को गंभीरता से लागू करना समय की सबसे बड़ी जरूरत बन गई है ताकि जेलों की सुरक्षा मजबूत हो सके और अपराधियों के नेटवर्क पर प्रभावी अंकुश लगाया जा सके।