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  • MP सरकार को बड़ा झटका…. दिल्ली HC ने दिया वकील को 78 लाख का भुगतान करने का आदेश

    MP सरकार को बड़ा झटका…. दिल्ली HC ने दिया वकील को 78 लाख का भुगतान करने का आदेश


    नई दिल्ली।
    दिल्ली हाई कोर्ट (Delhi High Court) ने मध्य प्रदेश सरकार (Madhya Pradesh Government) को आदेश दिया कि वह वरिष्ठ अधिवक्ता अनूप जॉर्ज चौधरी (Anoop George Chaudhari) को एक मामले में सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) में पेश होने के बदले 78 लाख 65 हजार रुपए और उस पर 9% सालाना की दर से ब्याज का भुगतान भी करे। उच्च न्यायालय ने राज्य के इस दावे को खारिज कर दिया कि वरिष्ठ अधिवक्ता असल में सिर्फ दो बार पेश हुए थे।

    जस्टिस सचिन दत्ता की पीठ ने इंदौर डेवलपमेंट अथॉरिटी बनाम मनोहरलाल व अन्य (2020) मामले में उच्चतम न्यायालय की संविधान पीठ के आदेश का हवाला दिया और वरिष्ठ अधिवक्ता की मौजूदगी को नोट किया। पीठ ने कहा कि कार्यवाही के रिकॉर्ड में दिख रही पेशी को देखने से पता चलता है कि याचिकाकर्ता मध्य प्रदेश सरकार की तरफ से पेश हुए थे। ऐसे में ना ही इसमें कोई शक रह जाता है और इस रिकॉर्ड के महत्व को कम करके भी नहीं आंका जा सकता।

    अदालत ने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय में पेशी दर्ज करना कोई अनौपचारिक या सामान्य काम नहीं है। उच्चतम न्यायालय नियम, 2013 के आदेश IV नियम 1(बी) के तहत किसी पार्टी के ‘एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड’ के अलावा कोई अन्य वकील किसी मामले में अदालत के सामने पेश नहीं हो सकता, बहस नहीं कर सकता। अदालत को संबोधित नहीं कर सकता, जब तक कि उसे ‘एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड’ ने निर्देश न दिया हो या अदालत ने अनुमति न दी हो।

    पीठ ने कहा कि एक वरिष्ठ अधिवक्ता उच्चतम न्यायालय में किसी पक्षकार पर अपनी पेशी थोप नहीं सकता। उसकी पेशी केवल उस पार्टी के ‘एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड’ के माध्यम से और उनके निर्देशों पर ही दर्ज की जा सकती है। पीठ ने पाया कि याचिकाकर्ता की पेशी राज्य के स्थाई वकील व राज्य के ‘एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड’ के साथ चौदह तारीखों पर दर्ज की गई, इसलिए यह निष्कर्ष निकला कि ऐसी हर तारीख पर उनकी पेशी राज्य के ही अधिकृत प्रतिनिधियों द्वारा कराई गई।

  • कैश में रूम रेंट चुकाते हैं तो रखें सबूत, रेंट रिसिप्ट और डिजिटल रिकॉर्ड से सुरक्षित रहेंगे आपके अधिकार

    कैश में रूम रेंट चुकाते हैं तो रखें सबूत, रेंट रिसिप्ट और डिजिटल रिकॉर्ड से सुरक्षित रहेंगे आपके अधिकार

    नई दिल्ली । भारत में आज भी बड़ी संख्या में लोग मकान का किराया नकद यानी कैश में चुकाते हैं, विशेषकर छोटे शहरों और कस्बों में यह व्यवस्था सामान्य मानी जाती है। हालांकि नकद में किराया देना कानून के विरुद्ध नहीं है, लेकिन यदि भुगतान का कोई लिखित प्रमाण नहीं रखा जाए तो भविष्य में कई प्रकार की कानूनी और वित्तीय परेशानियां सामने आ सकती हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि किरायेदारों को हर भुगतान के साथ रेंट रिसिप्ट अवश्य लेनी चाहिए, ताकि किसी भी विवाद की स्थिति में उनके पास पर्याप्त दस्तावेजी साक्ष्य मौजूद रहे।

    यदि किराया नकद में दिया जाता है और मकान मालिक उसकी रसीद जारी नहीं करता, तो बाद में यह साबित करना कठिन हो सकता है कि संबंधित महीने का किराया समय पर चुका दिया गया था। ऐसी स्थिति में हाउस रेंट अलाउंस (HRA) का दावा करने, कर संबंधी औपचारिकताएं पूरी करने या मकान मालिक के साथ किसी विवाद में अपना पक्ष साबित करने में कठिनाई आ सकती है। इसलिए किराया भुगतान का स्पष्ट रिकॉर्ड रखना किरायेदार के हित में माना जाता है।

    मॉडल टेनेंसी एक्ट, 2021 लिखित किरायानामा और पारदर्शी भुगतान व्यवस्था को बढ़ावा देता है। इस व्यवस्था का उद्देश्य मकान मालिक और किरायेदार दोनों के अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है। हालांकि किरायेदारी से जुड़े नियम अलग-अलग राज्यों में भिन्न हो सकते हैं, इसलिए स्थानीय कानूनों की जानकारी रखना भी आवश्यक है।

    रेंट रिसिप्ट केवल भुगतान की रसीद नहीं होती, बल्कि यह इस बात का आधिकारिक प्रमाण होती है कि मकान मालिक ने निर्धारित अवधि का किराया प्राप्त कर लिया है। सामान्य तौर पर इसमें किरायेदार और मकान मालिक का नाम, मकान का पता, किराया राशि, संबंधित माह, भुगतान की तारीख, भुगतान का तरीका और मकान मालिक के हस्ताक्षर जैसी महत्वपूर्ण जानकारी दर्ज होती है। यही विवरण भविष्य में किसी भी कानूनी या प्रशासनिक प्रक्रिया में उपयोगी साबित हो सकते हैं।

    विशेषज्ञों का कहना है कि यदि संभव हो तो किराया डिजिटल माध्यमों जैसे यूपीआई, बैंक ट्रांसफर, आईएमपीएस, आरटीजीएस या चेक के जरिए देना अधिक सुरक्षित रहता है। डिजिटल भुगतान का बैंक रिकॉर्ड अपने आप तैयार हो जाता है, जिससे भुगतान का प्राथमिक प्रमाण उपलब्ध रहता है। हालांकि केवल बैंक स्टेटमेंट हमेशा यह साबित नहीं करता कि भेजी गई राशि किस महीने के किराए के लिए थी। इसलिए डिजिटल भुगतान के साथ भी रेंट रिसिप्ट लेना बेहतर माना जाता है।

    यदि कोई मकान मालिक रेंट रिसिप्ट देने से इनकार करता है, तो किरायेदार को विवाद बढ़ाने के बजाय लिखित माध्यम से रसीद की मांग करनी चाहिए। व्हाट्सएप संदेश, ईमेल, एसएमएस या लिखित आवेदन के माध्यम से की गई मांग भविष्य में उपयोगी साक्ष्य बन सकती है। साथ ही भुगतान की तारीख, राशि और संबंधित बातचीत का रिकॉर्ड भी सुरक्षित रखना चाहिए।

    कई बार किरायेदार शुरुआत में दस्तावेजों पर ध्यान नहीं देते और विवाद होने के बाद सबूत जुटाने की कोशिश करते हैं। ऐसी स्थिति में उनके लिए अपने दावों को साबित करना कठिन हो सकता है। इसलिए किरायानामा, भुगतान का रिकॉर्ड, रेंट रिसिप्ट और मकान मालिक के साथ हुई महत्वपूर्ण बातचीत को शुरू से ही सुरक्षित रखना समझदारी भरा कदम माना जाता है।

    विशेषज्ञों के अनुसार, पारदर्शी दस्तावेजी प्रक्रिया अपनाने से मकान मालिक और किरायेदार दोनों के हित सुरक्षित रहते हैं। नियमित रिकॉर्ड रखने की आदत न केवल कानूनी विवादों से बचाती है, बल्कि कर लाभ, वित्तीय दस्तावेजों और भविष्य की किसी भी प्रशासनिक आवश्यकता को पूरा करने में भी मददगार साबित होती है।