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  • संघ प्रमुख मोहन भागवत की Z प्लस सिक्योरिटी को लेकर HC में याचिका… जानें क्या की गई डिमांड?

    संघ प्रमुख मोहन भागवत की Z प्लस सिक्योरिटी को लेकर HC में याचिका… जानें क्या की गई डिमांड?


    नई दिल्ली।
    RSS यानी राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (Rashtriya Swayamsevak Sangh) के प्रमुख मोहन भागवत (Mohan Bhagwat) को मिली Z प्लस सुरक्षा को लेकर बॉम्बे हाई कोर्ट (Bombay High Court.) में याचिका दाखिल हुई। इस याचिका के जरिए मांग की गई थी कि सुरक्षा पर हो रहे खर्च का भुगतान संघ की तरफ से ही किया जाना चाहिए। हालांकि, उच्च न्यायालय ने याचिका को खारिज कर दिया है। साथ ही याचिकाकर्ता की मंशा पर भी सवाल उठाए हैं।


    40 से 45 लाख रुपये महीने का खर्च

    उच्च न्यायालय की नागपुर पीठ के समक्ष दायर जनहित याचिका में दावा किया गया कि सुरक्षा कवर की लागत कथित तौर पर 40 लाख से 45 लाख रुपये प्रति माह बताई गई है, जो सार्वजनिक धन का दुरुपयोग और राज्य के खजाने का नुकसान है क्योंकि आरएसएस एक पंजीकृत संगठन नहीं है।

    याचिका को खारिज करते हुए मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति श्री चंद्रशेखर और जस्टिस अनिल किलोर की पीठ ने याचिका दायर करने के पीछे याचिकाकर्ता के मकसद और इरादे पर सवाल उठाए। याचिकाकर्ता के वकील ने यह जानकारी दी।


    याचिका में क्या

    नागपुर निवासी ललन सिंह द्वारा अपने वकील अश्विन इंगोले के माध्यम से दायर याचिका में यह दलील दी गई कि करदाताओं के पैसे का दुरुपयोग ऐसे व्यक्ति को ‘जेड-प्लस’ श्रेणी की वीवीआईपी सुरक्षा प्रदान करने के लिए किया जा रहा है, जिसका संगठन ‘पंजीकृत’ नहीं है। याचिकाकर्ता ने सरकार की तरफ से भागवत को दी गई उच्च स्तरीय सुरक्षा के लिए उनसे शुल्क की भरपाई का अनुरोध किया था।


    मुकेश अंबानी केस का दिया हवाला

    उन्होंने 2023 में उच्चतम न्यायालय द्वारा उद्योगपति मुकेश अंबानी से संबंधित एक मामले में दिए गए फैसले का हवाला दिया, जिसमें शीर्ष अदालत ने भारत सरकार की नीति के अनुसार उन्हें ‘जेड-प्लस’ श्रेणी की सुरक्षा प्रदान करने का निर्देश दिया था। साथ ही इसका पूरा खर्च उनके परिवार द्वारा उठाया जाना था।


    मोहन भागवत को कब मिली थी जेड प्लस सिक्योरिटी

    जून 2015 में संघ प्रमुख भागवत की सुरक्षा को बढ़ाकर जेड प्लस श्रेणी का कर दिया गया था। इसके साथ ही उनके सुरक्षा घेरे को संभालने का जिम्मा CISF यानी सेंट्रल आर्म्ड इंडस्ट्रियल सिक्योरिटी फोर्सेज के पास आ गया था। इससे पहले उनकी सुरक्षा में महाराष्ट्र पुलिस की टुकड़ियां तैनात थीं। खास बात है कि पहली बार साल 2012 में यूपीए सरकार के दौरान भागवत को जेड प्लस सिक्योरिटी देने के आदेश दिए गए थे। तब सुशील कुमार शिंदे देश के गृहमंत्री थे।

  • पदोन्नति नियम 2025 के दो प्रावधानों को असंवैधानिक करार देने की मांग, हाई कोर्ट में याचिका दायर

    पदोन्नति नियम 2025 के दो प्रावधानों को असंवैधानिक करार देने की मांग, हाई कोर्ट में याचिका दायर


    जबलपुर। मध्य प्रदेश शासन के पदोन्नति नियम 2025 के तहत कुछ प्रावधानों को असंवैधानिक करार देने के लिए हाई कोर्ट में याचिका दायर की गई है। याचिका में यह दावा किया गया है कि इन नियमों का पालन सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों का उल्लंघन करता है। यह मामला अब हाई कोर्ट में सुनवाई के लिए रखा गया है और कोर्ट ने 13 जनवरी को मामले की सुनवाई निर्धारित की है।

    याचिकाकर्ता सिवनी निवासी ज्वाइंट डायरेक्टर सुरेश कुमरे हैं, जो मध्य प्रदेश शासन के पदोन्नति नियम 2025 के दो महत्वपूर्ण प्रावधानों को चुनौती दे रहे हैं। याचिकाकर्ता के अनुसार इन नियमों में उल्लेखित कुछ बातें आरक्षित वर्ग और अनारक्षित वर्ग के कर्मचारियों के लिए भेदभावपूर्ण हैं और इससे संविधान की मूल भावना का उल्लंघन हो रहा है। विशेष रूप से पदोन्नति के संबंध में नियम 11 में कहा गया है कि पहले आरक्षित वर्ग के कर्मचारियों की सूची बनाई जाएगी, उसके बाद अनारक्षित वर्ग की सूची बनेगी। इसके कारण, अनारक्षित वर्ग के कर्मचारी यदि मेरिट में बेहतर हैं, तो भी वे आरक्षित वर्ग के कर्मचारियों से पीछे रह सकते हैं और उन्हें पदोन्नति का मौका नहीं मिल सकता।

    इस नियम को सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के खिलाफ बताया गया है, जिनमें यह साफ किया गया था कि पदोन्नति के लिए आरक्षित वर्ग के कर्मचारियों को प्राथमिकता देना एक सीमा तक ही उचित है, और यदि अनारक्षित वर्ग के कर्मचारी मेरिट में बेहतर हैं तो उन्हें पदोन्नति का अवसर दिया जाना चाहिए। याचिकाकर्ता का कहना है कि यह नियम अनारक्षित वर्ग के कर्मचारियों के साथ अन्यायपूर्ण भेदभाव करता है और इसे संविधान के अनुच्छेद 14 समानता का अधिकार के तहत असंवैधानिक करार दिया जाना चाहिए।
    इस मामले में वरिष्ठ अधिवक्ता रामेश्वर सिंह ठाकुर याचिकाकर्ता की ओर से पैरवी करेंगे।

    हाई कोर्ट ने इस मामले को पहले से लंबित याचिकाओं के साथ संलग्न कर दिया है जिससे यह मामला एक व्यापक दृष्टिकोण से देखा जाएगा।सुरेश कुमरे ने कहा कि यदि यह नियम लागू होता है तो यह न केवल उन कर्मचारियों के लिए अन्यायपूर्ण होगा बल्कि यह सरकारी प्रशासन में भी असंतुलन पैदा कर सकता है। इसलिए वे इस नियम को चुनौती देने के लिए कोर्ट पहुंचे हैं ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि सभी कर्मचारियों को समान अवसर मिले और कोई भी वर्ग अपने मेरिट के आधार पर पदोन्नति से वंचित न रहे। हाई कोर्ट में इस मामले की सुनवाई 13 जनवरी को तय की गई है और अब सबकी निगाहें इस सुनवाई पर टिकी हैं।

  • MP: उज्जैन में महाकाल मंदिर विस्तार को चुनौती वाली तकिया मस्जिद की याचिका SC ने की खारिज

    MP: उज्जैन में महाकाल मंदिर विस्तार को चुनौती वाली तकिया मस्जिद की याचिका SC ने की खारिज


    उज्जैन।
    सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने उज्जैन (Ujjain) में महाकाल मंदिर परिसर (Mahakal Temple complex) के विस्तार (महाकाल लोक फेज-2) के लिए तकिया मस्जिद (Takiya Mosque) की जमीन अधिग्रहण को चुनौती देने वाली याचिका को गुरुवार को खारिज कर दिया। अदालत ने साफ कहा कि याचिकाकर्ता जमीन का मालिक नहीं, बल्कि केवल एक उपासक (भक्त) है, इसलिए उसे अधिग्रहण को चुनौती देने का कानूनी अधिकार नहीं है। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने यह फैसला मोहम्मद तैय्यब बनाम शहरी प्रशासन एवं विकास विभाग मामले में सुनाया।


    अदालत ने क्या कहा

    सुनवाई के दौरान पीठ ने पाया कि याचिका में अधिग्रहण की अधिसूचनाओं को सीधे तौर पर चुनौती नहीं दी गई है, बल्कि आपत्ति केवल मुआवजा तक सीमित है। ऐसे मामलों में कानून के तहत वैकल्पिक वैधानिक उपाय मौजूद हैं। पीठ ने वरिष्ठ अधिवक्ता हूज़ेफ़ा अहमदी, जो याचिकाकर्ता की ओर से पेश हुए, से कहा- “मूल प्रश्न वही है। अधिग्रहण को चुनौती नहीं दी गई है, केवल अवॉर्ड को।” अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि याचिकाकर्ता भूमि का स्वामी नहीं, केवल उपासक है, इसलिए अधिग्रहण की वैधता पर सवाल उठाने का उसे अधिकार नहीं है।


    याचिकाकर्ता की दलीलें

    बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, याचिकाकर्ता की ओर से तर्क दिया गया कि भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्स्थापन में उचित मुआवजा और पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम, 2013 के तहत सामाजिक प्रभाव आकलन अनिवार्य है, जिसे नहीं कराया गया। इसके अलावा कहा गया कि हाई कोर्ट ने यह मानकर फैसला दिया कि अधिग्रहण की प्रक्रिया पहले ही पुष्टि हो चुकी है, जबकि ऐसा नहीं था। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट इस दलील से सहमत नहीं हुआ।


    पहले भी खारिज हो चुकी हैं याचिकाएं

    गौरतलब है कि इससे पहले सुप्रीम कोर्ट तकिया मस्जिद के ध्वस्तीकरण को चुनौती देने वाली एक अन्य याचिका भी खारिज कर चुका है। उस मामले में अदालत ने राज्य सरकार के इस रुख को स्वीकार किया था कि जमीन अधिग्रहित हो चुकी है और मुआवजा भी दिया जा चुका है, जबकि किसी भी आपत्ति के लिए 2013 कानून के तहत वैधानिक रास्ते उपलब्ध हैं।

    हाई कोर्ट का फैसला
    इससे पहले 11 जनवरी को मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने भी महाकाल लोक फेज-2 परियोजना से जुड़ी जमीन के मुआवजे को चुनौती देने वाली कई याचिकाएं खारिज कर दी थीं। हाई कोर्ट ने कहा था कि याचिकाकर्ता न तो रिकॉर्डेड भू-स्वामी हैं और न ही टाइटल-होल्डर, इसलिए वे अधिग्रहण को नहीं, बल्कि केवल मुआवजे को लेकर धारा 64 के तहत संदर्भ मांग सकते हैं।


    याचिका में क्या कहा गया था

    याचिका में दावा किया गया था कि अधिग्रहित जमीन 1985 से मध्य प्रदेश वक्फ बोर्ड में दर्ज वक्फ संपत्ति है और 11 जनवरी 2025 को मस्जिद को गिरा दिया गया। साथ ही यह तर्क दिया गया कि महाकाल मंदिर परिसर के लिए पार्किंग और अन्य सुविधाओं के विस्तार हेतु भूमि लेना सार्वजनिक उद्देश्य की परिभाषा में नहीं आता और इससे संविधान के अनुच्छेद 14, 25, 26 और 300-A का उल्लंघन होता है। इसके अलावा वक्फ अधिनियम की धारा 91 के उल्लंघन और आपात शक्तियों के दुरुपयोग का भी आरोप लगाया गया था।

    अब आगे क्या?

    सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के साथ महाकाल लोक फेज-2 परियोजना के लिए भूमि अधिग्रहण को अंतिम कानूनी मंजूरी मिल गई है। यह परियोजना उज्जैन में महाकाल मंदिर परिसर और उससे जुड़े सार्वजनिक स्थलों के बड़े पुनर्विकास का हिस्सा है। याचिका अधिवक्ता वैभव चौधरी के माध्यम से दाखिल की गई थी।