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  • वंदे मातरम के छह अंतरे अनिवार्य करने के कानून को चुनौती, सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से मांगा जवाब

    वंदे मातरम के छह अंतरे अनिवार्य करने के कानून को चुनौती, सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से मांगा जवाब

    नई दिल्ली ।वंदे मातरम के छह अंतरे गाने को अनिवार्य करने वाले प्रावधान को चुनौती देने वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से जवाब मांगा है। मंगलवार को हुई सुनवाई में अदालत ने केंद्र से दो सप्ताह के भीतर अपना पक्ष रखने को कहा। मामला कर्नाटक के संगीतकार टीएम कृष्णा की ओर से दायर रिट याचिका से जुड़ा है।

    याचिका में केंद्र सरकार के उस सर्कुलर को चुनौती दी गई है, जिसमें वंदे मातरम के छह पदों के गायन को अनिवार्य किए जाने का प्रावधान किया गया है। याचिकाकर्ता ने इस व्यवस्था को लेकर संवैधानिक और धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़े सवाल उठाए हैं।

    टीएम कृष्णा की ओर से अदालत में कहा गया कि वंदे मातरम के चार पदों में हिंदू देवी-देवताओं का उल्लेख है। याचिका में तर्क दिया गया है कि लोगों को इन पदों का गायन करने के लिए बाध्य करना धार्मिक और वैचारिक समर्थन के लिए मजबूर करने के समान हो सकता है।

    याचिका में वंदे मातरम को राष्ट्रगान के समान दर्जा देने से जुड़े हालिया संशोधन को भी चुनौती दी गई है। इसमें यह सवाल उठाया गया है कि क्या इस तरह का प्रावधान कानून के स्तर पर लागू किया जा सकता है और इसके तहत किसी व्यक्ति पर गायन के लिए दबाव बनाया जा सकता है।

    सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने इस पहलू की जांच करने पर सहमति जताई कि वंदे मातरम नहीं गाने को दंडनीय अपराध बनाया जा सकता है या नहीं। अदालत ने हालांकि इस चरण पर यह तय करने से इनकार किया कि राष्ट्रगीत को केवल दो अंतरों तक सीमित रखा जाना चाहिए या छह अंतरों तक इसका गायन किया जाना चाहिए।

    मामले की सुनवाई के दौरान धार्मिक कारणों से वंदे मातरम नहीं गाने वाले व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई किए जाने का मुद्दा भी सामने आया। अदालत ने इस विषय को याचिका में उठाए गए संवैधानिक सवालों के संदर्भ में देखा।

    केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल ने सुनवाई के दौरान कानून बनाए जाने से जुड़े तर्क रखे। वहीं याचिका में उस संशोधन को भी चुनौती दी गई है, जिसके तहत वंदे मातरम को राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम से जुड़े कानून के दायरे में लाने की बात कही गई है।

    याचिकाकर्ता ने इस संशोधन को मनमाना बताते हुए अदालत से इसकी संवैधानिक वैधता की जांच करने की मांग की है। याचिका का मुख्य सवाल यह है कि राष्ट्रीय गीत के गायन को किस सीमा तक अनिवार्य किया जा सकता है और ऐसा नहीं करने पर किसी व्यक्ति के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई की जा सकती है या नहीं।

    सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल मामले में कोई अंतिम फैसला नहीं दिया है। अदालत ने केंद्र सरकार को जवाब दाखिल करने का समय दिया है, जिसके बाद मामले में आगे की सुनवाई होगी।

    मामले में धार्मिक स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और राष्ट्रीय गीत से जुड़े कानूनी प्रावधानों के बीच संतुलन का प्रश्न महत्वपूर्ण रहेगा। अदालत अब केंद्र के जवाब के बाद इन मुद्दों पर आगे विचार करेगी।

  • UCC पर मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड का विरोध, भोपाल बैठक में कानूनी लड़ाई की रणनीति और 17 सितंबर के कार्यक्रम पर चर्चा

    UCC पर मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड का विरोध, भोपाल बैठक में कानूनी लड़ाई की रणनीति और 17 सितंबर के कार्यक्रम पर चर्चा

    मध्य प्रदेश: की राजधानी भोपाल में यूनिफॉर्म सिविल कोड यानी UCC को लेकर मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की बैठक हुई। खानूगांव कैंपस में आयोजित बैठक में UCC के विरोध के साथ इसके खिलाफ कानूनी लड़ाई की रणनीति पर भी चर्चा की गई। बैठक के बाद शहर काजी मुश्ताक अली नदवी और बोर्ड के रुक्न-ए-आमला एवं कांग्रेस नेता आरिफ मसूद ने मुस्लिम समाज की ओर से अपना पक्ष रखा।

    शहर काजी मुश्ताक अली नदवी ने कहा कि मुस्लिम समाज UCC को स्वीकार नहीं करता और इस मुद्दे पर पहले भी अपनी बात रखता आया है। उन्होंने कहा कि संविधान धार्मिक स्वतंत्रता और अल्पसंख्यकों के अधिकारों की गारंटी देता है। ऐसे में UCC की जरूरत और उसके संभावित असर पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए। उन्होंने सरकार और जिम्मेदार लोगों से इस विषय पर गंभीरता से सोचने की बात कही।

    शहर काजी ने अपने पक्ष को रखते हुए आरएसएस के पूर्व सरसंघचालक एमएस गोलवलकर के 1972 में दिल्ली में दिए गए एक भाषण का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि उस भाषण में गोलवलकर ने कौमी इत्तेहाद के लिए सिविल कोड को जरूरी नहीं बताया था। शहर काजी ने कहा कि मुस्लिम पर्सनल लॉ से जुड़े विषयों पर मुस्लिम समाज और इस विषय के जानकारों की बात सुनी जानी चाहिए।

    उन्होंने कहा कि पर्सनल लॉ को समझने के लिए उसे पढ़ना और उस पर अमल करना जरूरी है। उनका कहना था कि इस विषय को केवल सामान्य चर्चा के आधार पर नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि इससे जुड़े पक्षों को भी गंभीरता से समझना जरूरी है।

    बैठक में महिलाओं और बच्चों के अधिकारों को लेकर भी चर्चा हुई। शहर काजी ने कहा कि इस्लाम ने महिलाओं को पहले से अधिकार और सम्मान दिया है। उन्होंने महिलाओं के मां, बेटी और पत्नी के रूप में अधिकारों के साथ संपत्ति में हिस्सेदारी का भी उल्लेख किया। उनका कहना था कि महिलाओं के अधिकारों के मामले में मुस्लिम समाज किसी से पीछे नहीं है।

    UCC के खिलाफ आगे की रणनीति को लेकर 17 सितंबर को दिल्ली के जंतर-मंतर पर होने वाले कार्यक्रम का भी मुद्दा बैठक में उठा। मध्य प्रदेश से लोगों से इस कार्यक्रम में शामिल होने की अपील की गई। शहर काजी ने मुस्लिम समाज के साथ सेक्युलर नागरिकों से भी कार्यक्रम में शामिल होने की अपील की।

    आरिफ मसूद ने कहा कि UCC के खिलाफ कानूनी लड़ाई के लिए बोर्ड की लीगल टीम तैयार है। उन्होंने बताया कि अलग-अलग जिलों में भी वकील अपने स्तर पर तैयारी कर रहे हैं। बोर्ड की ओर से याचिका का मसौदा तैयार होने की जानकारी भी दी गई। उन्होंने लोगों से जल्दबाजी में अलग-अलग याचिकाएं दाखिल करने के बजाय कानूनी लड़ाई के लिए एकजुट होकर आगे बढ़ने की अपील की।

    इस तरह भोपाल की बैठक में UCC को लेकर विरोध के साथ आंदोलन और कानूनी प्रक्रिया, दोनों स्तरों पर आगे की रणनीति पर चर्चा हुई। बोर्ड की ओर से 17 सितंबर के दिल्ली कार्यक्रम में भागीदारी बढ़ाने और कानूनी कार्रवाई को संगठित तरीके से आगे बढ़ाने पर जोर दिया गया।

  • जंतर-मंतर प्रदर्शन में भोजन व्यवस्था संभालने वाले जुनैद की सुप्रीम कोर्ट में याचिका, परिवार को परेशान करने का लगाया आरोप

    जंतर-मंतर प्रदर्शन में भोजन व्यवस्था संभालने वाले जुनैद की सुप्रीम कोर्ट में याचिका, परिवार को परेशान करने का लगाया आरोप

    नई दिल्ली । जंतर-मंतर पर आयोजित CJP प्रदर्शन से जुड़े मोहम्मद जुनैद ने पुलिस द्वारा कथित उत्पीड़न का आरोप लगाते हुए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। उन्होंने शीर्ष अदालत में दायर अपनी याचिका में दावा किया है कि उन्हें और उनके परिवार को लगातार परेशान किया जा रहा है। याचिका में न्यायालय से हस्तक्षेप कर उचित संरक्षण और राहत देने की मांग की गई है। यह मामला ऐसे समय सामने आया है जब प्रदर्शन से जुड़े कई पहलुओं को लेकर अलग-अलग स्तर पर चर्चा जारी है।

    याचिका के अनुसार, जुनैद का आरोप है कि पुलिस उन्हें दिल्ली से अपने साथ ले गई और कई घंटे तक अपने कब्जे में रखने के बाद हरिद्वार के पास छोड़ दिया। उनका कहना है कि इस दौरान उन्हें कथित रूप से धमकाया भी गया। उन्होंने अदालत को बताया कि इस पूरी घटना के कारण वे मानसिक दबाव में हैं और उन्हें अपनी तथा अपने परिवार की सुरक्षा को लेकर चिंता बनी हुई है।

    जुनैद ने अपनी याचिका में यह भी आरोप लगाया है कि पुलिस की कार्रवाई केवल उनके तक सीमित नहीं रही, बल्कि उनके परिवार के अन्य सदस्यों को भी परेशान किया जा रहा है। उनके अनुसार, उनके पिता से पूछताछ की गई और उनकी बहन के ससुराल पक्ष के लोगों को भी अनावश्यक रूप से परेशान किया गया। उन्होंने अदालत से आग्रह किया है कि इन आरोपों की निष्पक्ष जांच सुनिश्चित कराई जाए और उनके परिवार को किसी भी प्रकार के कथित उत्पीड़न से सुरक्षा प्रदान की जाए।

    मोहम्मद जुनैद उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद जिले के नाहल गांव के निवासी हैं। CJP प्रदर्शन के दौरान उनकी भूमिका मुख्य रूप से आंदोलन में शामिल लोगों के लिए भोजन और पीने के पानी जैसी आवश्यक व्यवस्थाएं उपलब्ध कराने की रही। शुरुआत में वे सार्वजनिक रूप से कम दिखाई देते थे और पर्दे के पीछे रहकर व्यवस्थाएं संभालते थे, लेकिन प्रदर्शन के अंतिम चरण में उनकी पहचान प्रतिभागियों के बीच एक प्रमुख सहयोगी के रूप में बनने लगी।

    बताया गया है कि उन्होंने आंदोलन के भीतर कोई औपचारिक पद नहीं संभाला था। उनकी जिम्मेदारी प्रदर्शन स्थल पर आने वाले लोगों के लिए आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध कराना और व्यवस्थाओं को सुचारु बनाए रखना थी। इसी भूमिका के कारण उनका नाम उस समय चर्चा में आया, जब पुलिस उनके घर पहुंची और तलाशी की कार्रवाई की गई।

    परिवार का कहना है कि तलाशी के दौरान कुछ दस्तावेज भी अपने कब्जे में लिए गए। उनके अनुसार, पुलिस उनके पिता को पूछताछ के लिए थाने भी लेकर गई थी। परिवार ने यह भी आरोप लगाया कि उनके रिश्तेदारों को भी अलग-अलग स्थानों पर परेशान किया गया, जिससे पूरे परिवार में चिंता का माहौल बना हुआ है।

    दूसरी ओर, संबंधित पुलिस अधिकारियों की ओर से पहले इन आरोपों का खंडन किया जा चुका है। विशेष रूप से मेरठ में रिश्तेदारों को हिरासत में लेने या उनके खिलाफ किसी कार्रवाई के दावों को पुलिस ने अस्वीकार करते हुए कहा था कि संबंधित थानों में ऐसी किसी कार्रवाई का रिकॉर्ड नहीं मिला। इस कारण मामले में दोनों पक्षों के दावे अलग-अलग हैं।

    अब इस पूरे प्रकरण पर सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई और उसके निर्देश महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं। अदालत याचिका में लगाए गए आरोपों, उपलब्ध तथ्यों और संबंधित पक्षों के जवाब पर विचार करने के बाद आगे की प्रक्रिया तय करेगी। ऐसे में इस मामले की अगली सुनवाई और न्यायालय की टिप्पणी पर सभी की नजर बनी हुई है।

  • 'कोई याचिका दाखिल ही नहीं हुई थी', CJI सूर्यकांत ने स्पष्ट किया अपना रुख, गलत रिपोर्टिंग पर जताई नाराजगी

    'कोई याचिका दाखिल ही नहीं हुई थी', CJI सूर्यकांत ने स्पष्ट किया अपना रुख, गलत रिपोर्टिंग पर जताई नाराजगी

    नई दिल्ली । मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत ने सीजेपी प्रदर्शन से जुड़े मामले की सुनवाई को लेकर प्रसारित कुछ मीडिया रिपोर्टों पर कड़ी नाराजगी जताई है। उन्होंने स्पष्ट किया कि उन्होंने किसी मामले की सुनवाई से इनकार नहीं किया था, बल्कि संबंधित मामले में विधिवत याचिका ही दाखिल नहीं की गई थी। सीजेआई ने कहा कि बिना आवश्यक दस्तावेज और औपचारिक याचिका के किसी भी मामले को न्यायालय की सूची में शामिल नहीं किया जा सकता। उन्होंने इस पूरे घटनाक्रम को लेकर तथ्यों के विपरीत रिपोर्टिंग पर चिंता भी व्यक्त की।

    सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि कुछ समाचारों में यह दावा किया गया कि उन्होंने मामले को सूचीबद्ध करने से मना कर दिया, जबकि वास्तविक स्थिति इससे अलग थी। उन्होंने बताया कि अदालत की रजिस्ट्री से जानकारी लेने पर पता चला कि निर्धारित समय तक एक भी याचिका या आवश्यक दस्तावेज दाखिल नहीं किया गया था। ऐसे में किसी मामले को सूचीबद्ध करने का प्रश्न ही नहीं उठता। उन्होंने कहा कि केवल किसी प्रतिनिधित्व या पत्र को रिट याचिका नहीं माना जा सकता।

    सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि यदि कोई याचिका विधिसम्मत तरीके से दायर की जाती है तो न्यायालय उस पर कानून के अनुसार विचार करेगा। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि उनका उद्देश्य किसी मामले की सुनवाई से बचना नहीं था, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया का पालन सुनिश्चित करना था। उन्होंने कहा कि न्यायालय में प्रत्येक मामले की सुनवाई निर्धारित प्रक्रिया के अनुरूप ही होती है और बिना औपचारिक याचिका के अदालत कार्रवाई नहीं कर सकती।

    मुख्य न्यायाधीश ने मीडिया की भूमिका पर भी टिप्पणी करते हुए कहा कि तथ्यों की पुष्टि किए बिना खबरों का प्रसारण करना उचित नहीं है। उन्होंने कहा कि पिछले कुछ दिनों में उनके बयान को गलत तरीके से प्रस्तुत किया गया, जिससे यह संदेश गया कि उन्होंने मामले की सुनवाई से इनकार कर दिया है। जबकि वास्तविकता यह थी कि अदालत के समक्ष उस समय कोई विधिवत याचिका उपलब्ध नहीं थी। उन्होंने जिम्मेदार और तथ्य आधारित रिपोर्टिंग की आवश्यकता पर जोर दिया।

    यह मामला उस समय सामने आया जब सीजेपी प्रदर्शन के दौरान छात्रों के साथ कथित पुलिस कार्रवाई का मुद्दा अदालत के समक्ष उठाया गया था। एक अधिवक्ता ने न्यायालय का ध्यान इस विषय की ओर आकर्षित करते हुए तत्काल सुनवाई का अनुरोध किया था। हालांकि अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी भी मामले पर विचार करने के लिए पहले निर्धारित प्रक्रिया के तहत याचिका दाखिल होना आवश्यक है। इसी प्रक्रिया के अभाव में तत्काल सूचीबद्ध करने का अनुरोध स्वीकार नहीं किया जा सका।

    सीजेआई सूर्यकांत की इस टिप्पणी के बाद न्यायिक प्रक्रिया और मीडिया रिपोर्टिंग की जिम्मेदारी को लेकर नई चर्चा शुरू हो गई है। उन्होंने दोहराया कि न्यायपालिका का कार्य पूरी तरह स्थापित कानूनी प्रक्रिया के अनुरूप चलता है और किसी भी मामले में सुनवाई का निर्णय तथ्यों, दस्तावेजों और विधिक प्रक्रिया के आधार पर ही लिया जाता है। उनके स्पष्टीकरण से यह स्पष्ट हुआ कि मामले में सुनवाई से इनकार नहीं किया गया था, बल्कि आवश्यक कानूनी औपचारिकताएं पूरी नहीं होने के कारण उसे सूचीबद्ध नहीं किया जा सका।

  • पैगंबर मोहम्मद पर कथित आपत्तिजनक टिप्पणियों के मामले में सुप्रीम कोर्ट का रुख स्पष्ट, पहले कानूनी प्रक्रिया अपनाने की दी सलाह

    पैगंबर मोहम्मद पर कथित आपत्तिजनक टिप्पणियों के मामले में सुप्रीम कोर्ट का रुख स्पष्ट, पहले कानूनी प्रक्रिया अपनाने की दी सलाह


    नई दिल्ली ।
    पैगंबर मोहम्मद पर कथित आपत्तिजनक टिप्पणियों से जुड़े मामले में दायर जनहित याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने तत्काल सुनवाई करने से इनकार कर दिया है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी भी मामले में सीधे सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाने से पहले कानून के तहत उपलब्ध प्रक्रियाओं का पालन किया जाना आवश्यक है। अदालत ने याचिकाकर्ता को संबंधित प्राधिकरण और कानून प्रवर्तन एजेंसियों के समक्ष शिकायत दर्ज कराने की सलाह दी।

    मामले की सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से यह दलील दी गई कि कथित टिप्पणियां सामाजिक और सांप्रदायिक सौहार्द को प्रभावित कर सकती हैं। इस आधार पर मामले में शीघ्र सुनवाई की मांग की गई। हालांकि अदालत ने इस अनुरोध को स्वीकार नहीं किया और कहा कि ऐसे मामलों के लिए पहले से निर्धारित कानूनी तंत्र मौजूद है, जिसका उपयोग किया जाना चाहिए।

    सुनवाई के दौरान न्यायालय ने यह जानना चाहा कि क्या मामले में संबंधित एजेंसियों या पुलिस के समक्ष शिकायत दर्ज कराई गई है। अदालत ने कहा कि देश में कानून लागू करने वाली संस्थाएं मौजूद हैं और उन पर विश्वास बनाए रखना चाहिए। यदि किसी व्यक्ति या संस्था ने कानून का उल्लंघन किया है तो उसके खिलाफ निर्धारित प्रक्रिया के तहत कार्रवाई की जा सकती है।

    अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि सुप्रीम कोर्ट की भूमिका सीधे हर शिकायत की प्रारंभिक जांच करने की नहीं है। शीर्ष न्यायालय का दायित्व व्यापक संवैधानिक और कानूनी निगरानी सुनिश्चित करना है। यदि प्रत्येक मामला सीधे सर्वोच्च अदालत में लाया जाएगा तो निचली अदालतों और अन्य सक्षम संस्थाओं की भूमिका प्रभावित होगी, जो न्यायिक व्यवस्था के लिए उचित नहीं माना जा सकता।

    न्यायालय ने कहा कि कानून के तहत उपलब्ध सभी विकल्पों का उपयोग किए जाने के बाद भी यदि संबंधित प्राधिकरण उचित कार्रवाई नहीं करते हैं, तब न्यायिक हस्तक्षेप की मांग की जा सकती है। अदालत ने संकेत दिया कि न्याय व्यवस्था में विभिन्न स्तरों पर स्थापित संस्थाओं को पहले अपना कार्य करने का अवसर मिलना चाहिए।

    सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी माना कि धार्मिक भावनाओं और सामाजिक सद्भाव से जुड़े मामले संवेदनशील प्रकृति के होते हैं। ऐसे मामलों में सभी पक्षों को जिम्मेदारी और संयम के साथ व्यवहार करना चाहिए। न्यायालय ने कहा कि संवेदनशील विषयों पर अनावश्यक विवाद या सनसनी फैलाने से बचना आवश्यक है, क्योंकि इससे सामाजिक वातावरण प्रभावित हो सकता है।

    अदालत ने दोहराया कि यदि किसी व्यक्ति द्वारा कानून का उल्लंघन किया गया है तो उसके खिलाफ कानूनी प्रावधानों के तहत कार्रवाई होनी चाहिए। साथ ही यह भी कहा गया कि शिकायतों के निपटारे के लिए स्थापित संस्थागत व्यवस्था पर भरोसा बनाए रखना लोकतांत्रिक और संवैधानिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

    इस घटनाक्रम के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि शीर्ष अदालत ऐसे मामलों में पहले वैधानिक प्रक्रिया अपनाने को प्राथमिकता देती है। न्यायालय का संदेश यह रहा कि कानून के दायरे में उपलब्ध सभी उपायों का उपयोग करने के बाद ही किसी मामले को सर्वोच्च न्यायिक मंच तक ले जाना उचित माना जाएगा।

  • संघ प्रमुख मोहन भागवत की Z प्लस सिक्योरिटी को लेकर HC में याचिका… जानें क्या की गई डिमांड?

    संघ प्रमुख मोहन भागवत की Z प्लस सिक्योरिटी को लेकर HC में याचिका… जानें क्या की गई डिमांड?


    नई दिल्ली।
    RSS यानी राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (Rashtriya Swayamsevak Sangh) के प्रमुख मोहन भागवत (Mohan Bhagwat) को मिली Z प्लस सुरक्षा को लेकर बॉम्बे हाई कोर्ट (Bombay High Court.) में याचिका दाखिल हुई। इस याचिका के जरिए मांग की गई थी कि सुरक्षा पर हो रहे खर्च का भुगतान संघ की तरफ से ही किया जाना चाहिए। हालांकि, उच्च न्यायालय ने याचिका को खारिज कर दिया है। साथ ही याचिकाकर्ता की मंशा पर भी सवाल उठाए हैं।


    40 से 45 लाख रुपये महीने का खर्च

    उच्च न्यायालय की नागपुर पीठ के समक्ष दायर जनहित याचिका में दावा किया गया कि सुरक्षा कवर की लागत कथित तौर पर 40 लाख से 45 लाख रुपये प्रति माह बताई गई है, जो सार्वजनिक धन का दुरुपयोग और राज्य के खजाने का नुकसान है क्योंकि आरएसएस एक पंजीकृत संगठन नहीं है।

    याचिका को खारिज करते हुए मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति श्री चंद्रशेखर और जस्टिस अनिल किलोर की पीठ ने याचिका दायर करने के पीछे याचिकाकर्ता के मकसद और इरादे पर सवाल उठाए। याचिकाकर्ता के वकील ने यह जानकारी दी।


    याचिका में क्या

    नागपुर निवासी ललन सिंह द्वारा अपने वकील अश्विन इंगोले के माध्यम से दायर याचिका में यह दलील दी गई कि करदाताओं के पैसे का दुरुपयोग ऐसे व्यक्ति को ‘जेड-प्लस’ श्रेणी की वीवीआईपी सुरक्षा प्रदान करने के लिए किया जा रहा है, जिसका संगठन ‘पंजीकृत’ नहीं है। याचिकाकर्ता ने सरकार की तरफ से भागवत को दी गई उच्च स्तरीय सुरक्षा के लिए उनसे शुल्क की भरपाई का अनुरोध किया था।


    मुकेश अंबानी केस का दिया हवाला

    उन्होंने 2023 में उच्चतम न्यायालय द्वारा उद्योगपति मुकेश अंबानी से संबंधित एक मामले में दिए गए फैसले का हवाला दिया, जिसमें शीर्ष अदालत ने भारत सरकार की नीति के अनुसार उन्हें ‘जेड-प्लस’ श्रेणी की सुरक्षा प्रदान करने का निर्देश दिया था। साथ ही इसका पूरा खर्च उनके परिवार द्वारा उठाया जाना था।


    मोहन भागवत को कब मिली थी जेड प्लस सिक्योरिटी

    जून 2015 में संघ प्रमुख भागवत की सुरक्षा को बढ़ाकर जेड प्लस श्रेणी का कर दिया गया था। इसके साथ ही उनके सुरक्षा घेरे को संभालने का जिम्मा CISF यानी सेंट्रल आर्म्ड इंडस्ट्रियल सिक्योरिटी फोर्सेज के पास आ गया था। इससे पहले उनकी सुरक्षा में महाराष्ट्र पुलिस की टुकड़ियां तैनात थीं। खास बात है कि पहली बार साल 2012 में यूपीए सरकार के दौरान भागवत को जेड प्लस सिक्योरिटी देने के आदेश दिए गए थे। तब सुशील कुमार शिंदे देश के गृहमंत्री थे।

  • पदोन्नति नियम 2025 के दो प्रावधानों को असंवैधानिक करार देने की मांग, हाई कोर्ट में याचिका दायर

    पदोन्नति नियम 2025 के दो प्रावधानों को असंवैधानिक करार देने की मांग, हाई कोर्ट में याचिका दायर


    जबलपुर। मध्य प्रदेश शासन के पदोन्नति नियम 2025 के तहत कुछ प्रावधानों को असंवैधानिक करार देने के लिए हाई कोर्ट में याचिका दायर की गई है। याचिका में यह दावा किया गया है कि इन नियमों का पालन सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों का उल्लंघन करता है। यह मामला अब हाई कोर्ट में सुनवाई के लिए रखा गया है और कोर्ट ने 13 जनवरी को मामले की सुनवाई निर्धारित की है।

    याचिकाकर्ता सिवनी निवासी ज्वाइंट डायरेक्टर सुरेश कुमरे हैं, जो मध्य प्रदेश शासन के पदोन्नति नियम 2025 के दो महत्वपूर्ण प्रावधानों को चुनौती दे रहे हैं। याचिकाकर्ता के अनुसार इन नियमों में उल्लेखित कुछ बातें आरक्षित वर्ग और अनारक्षित वर्ग के कर्मचारियों के लिए भेदभावपूर्ण हैं और इससे संविधान की मूल भावना का उल्लंघन हो रहा है। विशेष रूप से पदोन्नति के संबंध में नियम 11 में कहा गया है कि पहले आरक्षित वर्ग के कर्मचारियों की सूची बनाई जाएगी, उसके बाद अनारक्षित वर्ग की सूची बनेगी। इसके कारण, अनारक्षित वर्ग के कर्मचारी यदि मेरिट में बेहतर हैं, तो भी वे आरक्षित वर्ग के कर्मचारियों से पीछे रह सकते हैं और उन्हें पदोन्नति का मौका नहीं मिल सकता।

    इस नियम को सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के खिलाफ बताया गया है, जिनमें यह साफ किया गया था कि पदोन्नति के लिए आरक्षित वर्ग के कर्मचारियों को प्राथमिकता देना एक सीमा तक ही उचित है, और यदि अनारक्षित वर्ग के कर्मचारी मेरिट में बेहतर हैं तो उन्हें पदोन्नति का अवसर दिया जाना चाहिए। याचिकाकर्ता का कहना है कि यह नियम अनारक्षित वर्ग के कर्मचारियों के साथ अन्यायपूर्ण भेदभाव करता है और इसे संविधान के अनुच्छेद 14 समानता का अधिकार के तहत असंवैधानिक करार दिया जाना चाहिए।
    इस मामले में वरिष्ठ अधिवक्ता रामेश्वर सिंह ठाकुर याचिकाकर्ता की ओर से पैरवी करेंगे।

    हाई कोर्ट ने इस मामले को पहले से लंबित याचिकाओं के साथ संलग्न कर दिया है जिससे यह मामला एक व्यापक दृष्टिकोण से देखा जाएगा।सुरेश कुमरे ने कहा कि यदि यह नियम लागू होता है तो यह न केवल उन कर्मचारियों के लिए अन्यायपूर्ण होगा बल्कि यह सरकारी प्रशासन में भी असंतुलन पैदा कर सकता है। इसलिए वे इस नियम को चुनौती देने के लिए कोर्ट पहुंचे हैं ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि सभी कर्मचारियों को समान अवसर मिले और कोई भी वर्ग अपने मेरिट के आधार पर पदोन्नति से वंचित न रहे। हाई कोर्ट में इस मामले की सुनवाई 13 जनवरी को तय की गई है और अब सबकी निगाहें इस सुनवाई पर टिकी हैं।

  • MP: उज्जैन में महाकाल मंदिर विस्तार को चुनौती वाली तकिया मस्जिद की याचिका SC ने की खारिज

    MP: उज्जैन में महाकाल मंदिर विस्तार को चुनौती वाली तकिया मस्जिद की याचिका SC ने की खारिज


    उज्जैन।
    सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने उज्जैन (Ujjain) में महाकाल मंदिर परिसर (Mahakal Temple complex) के विस्तार (महाकाल लोक फेज-2) के लिए तकिया मस्जिद (Takiya Mosque) की जमीन अधिग्रहण को चुनौती देने वाली याचिका को गुरुवार को खारिज कर दिया। अदालत ने साफ कहा कि याचिकाकर्ता जमीन का मालिक नहीं, बल्कि केवल एक उपासक (भक्त) है, इसलिए उसे अधिग्रहण को चुनौती देने का कानूनी अधिकार नहीं है। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने यह फैसला मोहम्मद तैय्यब बनाम शहरी प्रशासन एवं विकास विभाग मामले में सुनाया।


    अदालत ने क्या कहा

    सुनवाई के दौरान पीठ ने पाया कि याचिका में अधिग्रहण की अधिसूचनाओं को सीधे तौर पर चुनौती नहीं दी गई है, बल्कि आपत्ति केवल मुआवजा तक सीमित है। ऐसे मामलों में कानून के तहत वैकल्पिक वैधानिक उपाय मौजूद हैं। पीठ ने वरिष्ठ अधिवक्ता हूज़ेफ़ा अहमदी, जो याचिकाकर्ता की ओर से पेश हुए, से कहा- “मूल प्रश्न वही है। अधिग्रहण को चुनौती नहीं दी गई है, केवल अवॉर्ड को।” अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि याचिकाकर्ता भूमि का स्वामी नहीं, केवल उपासक है, इसलिए अधिग्रहण की वैधता पर सवाल उठाने का उसे अधिकार नहीं है।


    याचिकाकर्ता की दलीलें

    बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, याचिकाकर्ता की ओर से तर्क दिया गया कि भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्स्थापन में उचित मुआवजा और पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम, 2013 के तहत सामाजिक प्रभाव आकलन अनिवार्य है, जिसे नहीं कराया गया। इसके अलावा कहा गया कि हाई कोर्ट ने यह मानकर फैसला दिया कि अधिग्रहण की प्रक्रिया पहले ही पुष्टि हो चुकी है, जबकि ऐसा नहीं था। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट इस दलील से सहमत नहीं हुआ।


    पहले भी खारिज हो चुकी हैं याचिकाएं

    गौरतलब है कि इससे पहले सुप्रीम कोर्ट तकिया मस्जिद के ध्वस्तीकरण को चुनौती देने वाली एक अन्य याचिका भी खारिज कर चुका है। उस मामले में अदालत ने राज्य सरकार के इस रुख को स्वीकार किया था कि जमीन अधिग्रहित हो चुकी है और मुआवजा भी दिया जा चुका है, जबकि किसी भी आपत्ति के लिए 2013 कानून के तहत वैधानिक रास्ते उपलब्ध हैं।

    हाई कोर्ट का फैसला
    इससे पहले 11 जनवरी को मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने भी महाकाल लोक फेज-2 परियोजना से जुड़ी जमीन के मुआवजे को चुनौती देने वाली कई याचिकाएं खारिज कर दी थीं। हाई कोर्ट ने कहा था कि याचिकाकर्ता न तो रिकॉर्डेड भू-स्वामी हैं और न ही टाइटल-होल्डर, इसलिए वे अधिग्रहण को नहीं, बल्कि केवल मुआवजे को लेकर धारा 64 के तहत संदर्भ मांग सकते हैं।


    याचिका में क्या कहा गया था

    याचिका में दावा किया गया था कि अधिग्रहित जमीन 1985 से मध्य प्रदेश वक्फ बोर्ड में दर्ज वक्फ संपत्ति है और 11 जनवरी 2025 को मस्जिद को गिरा दिया गया। साथ ही यह तर्क दिया गया कि महाकाल मंदिर परिसर के लिए पार्किंग और अन्य सुविधाओं के विस्तार हेतु भूमि लेना सार्वजनिक उद्देश्य की परिभाषा में नहीं आता और इससे संविधान के अनुच्छेद 14, 25, 26 और 300-A का उल्लंघन होता है। इसके अलावा वक्फ अधिनियम की धारा 91 के उल्लंघन और आपात शक्तियों के दुरुपयोग का भी आरोप लगाया गया था।

    अब आगे क्या?

    सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के साथ महाकाल लोक फेज-2 परियोजना के लिए भूमि अधिग्रहण को अंतिम कानूनी मंजूरी मिल गई है। यह परियोजना उज्जैन में महाकाल मंदिर परिसर और उससे जुड़े सार्वजनिक स्थलों के बड़े पुनर्विकास का हिस्सा है। याचिका अधिवक्ता वैभव चौधरी के माध्यम से दाखिल की गई थी।