Tag: Petrol Diesel Price

  • कच्चे तेल की कीमतों में तूफानी तेजी, सऊदी अरब के तेल ठिकानों पर हमलों से बढ़ी चिंता, पेट्रोल-डीजल पर मंडराया महंगाई का खतरा

    कच्चे तेल की कीमतों में तूफानी तेजी, सऊदी अरब के तेल ठिकानों पर हमलों से बढ़ी चिंता, पेट्रोल-डीजल पर मंडराया महंगाई का खतरा


    नई दिल्ली। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल ने भारत समेत दुनिया के कई तेल आयातक देशों की चिंता बढ़ा दी है। सऊदी अरब पर हमलों और पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के कारण वैश्विक स्तर पर तेल की आपूर्ति प्रभावित होने की आशंका गहरा गई है। गुरुवार को अंतरराष्ट्रीय बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड 113 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गया जबकि अमेरिकी कच्चा तेल डब्ल्यूटीआई करीब 99 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार करता रहा। तेल की कीमतों में आई इस तेजी का असर आने वाले दिनों में पेट्रोल डीजल की कीमतों और महंगाई पर पड़ सकता है। हालांकि घरेलू बाजार में ईंधन के दाम बढ़ेंगे या नहीं इसका फैसला तेल कंपनियों और सरकार की नीतियों समेत कई कारकों पर निर्भर करेगा।

    कच्चे तेल की कीमतों में तेजी के पीछे पश्चिम एशिया में बढ़ता सैन्य तनाव प्रमुख वजह माना जा रहा है। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक ईरान समर्थित हूती लड़ाकों ने सऊदी अरब के लाल सागर स्थित यनबू बंदरगाह के अलावा एक तेल क्षेत्र और हवाई अड्डे पर हमलों का दावा किया है। इन घटनाओं ने तेल उत्पादन और निर्यात से जुड़े बुनियादी ढांचे की सुरक्षा को लेकर चिंताएं बढ़ा दी हैं। सऊदी अरब वैश्विक तेल आपूर्ति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। ऐसे में उसके तेल ठिकानों या निर्यात केंद्रों पर किसी बड़े हमले से अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है।

    इस साल अमेरिका और ईरान के बीच जारी संघर्ष के कारण ब्रेंट क्रूड की कीमतों में 85 प्रतिशत से अधिक की बढ़ोतरी होने की बात रिपोर्ट में कही गई है। डीजल जैसे तैयार पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों में भी भारी तेजी दर्ज की गई है। इसके अलावा होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास तनाव ने बाजार की चिंता बढ़ा दी है। यह समुद्री मार्ग दुनिया के लिए तेल और गैस की आपूर्ति का अहम रास्ता है। यहां जहाजों की आवाजाही बाधित होने से अंतरराष्ट्रीय बाजार में ईंधन की उपलब्धता और कीमतों पर व्यापक असर पड़ सकता है।

    कच्चे तेल की महंगाई का भारत पर सीधा असर पड़ने की आशंका इसलिए भी अधिक है क्योंकि देश अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होने पर भारत का आयात बिल बढ़ता है और इससे विदेशी मुद्रा पर दबाव पड़ सकता है। परिवहन और माल ढुलाई की लागत बढ़ने से खाद्य पदार्थों समेत दूसरी वस्तुओं की कीमतों पर भी असर पड़ने की आशंका रहती है। रिपोर्ट के मुताबिक कच्चे तेल के प्रति बैरल भाव में 10 डॉलर की बढ़ोतरी से तेल कंपनियों को करीब छह रुपये प्रति लीटर के बराबर लागत का दबाव पड़ सकता है। हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि पेट्रोल और डीजल के खुदरा दाम भी स्वतः छह रुपये बढ़ जाएंगे।

    अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने गुरुवार को व्हाइट हाउस में बातचीत के दौरान दावा किया कि अमेरिका ने ईरान को काफी कमजोर कर दिया है। उन्होंने आगे भी कार्रवाई के संकेत दिए। इस बीच फारस की खाड़ी से कच्चे तेल की आवाजाही में कुछ सुधार के बावजूद पेट्रोलियम उत्पादों की आपूर्ति सीमित रहने की खबरें सामने आई हैं। रूस की रिफाइनरियों पर यूक्रेन के हमलों ने भी ईंधन बाजार पर दबाव बढ़ाया है। स्थिति से निपटने के लिए कुछ सरकारें अपने रणनीतिक भंडार से ईंधन जारी कर रही हैं।

    कुल मिलाकर कच्चे तेल की कीमतों में आगे की चाल पश्चिम एशिया में संघर्ष की स्थिति सऊदी अरब के तेल प्रतिष्ठानों की सुरक्षा और प्रमुख समुद्री मार्गों से आपूर्ति सामान्य रहने पर निर्भर करेगी। भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतों को लेकर फिलहाल किसी निश्चित बढ़ोतरी का निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी लेकिन लंबे समय तक तेल महंगा बना रहा तो देश की अर्थव्यवस्था और आम उपभोक्ताओं के बजट पर दबाव बढ़ सकता है।

  • Petrol Diesel Price: कच्चा तेल फिर 100 डॉलर के पार पेट्रोल-डीजल महंगा होने का खतरा बढ़ा मध्य पूर्व तनाव ने बढ़ाई चिंता

    Petrol Diesel Price: कच्चा तेल फिर 100 डॉलर के पार पेट्रोल-डीजल महंगा होने का खतरा बढ़ा मध्य पूर्व तनाव ने बढ़ाई चिंता


    नई दिल्ली। कच्चे तेल की कीमतों में लगातार तीसरे दिन तेजी देखने को मिली है और अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड एक बार फिर 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गया है। 2 अक्टूबर 2026 को ब्रेंट क्रूड की कीमत 102.61 डॉलर प्रति बैरल और WTI क्रूड 93.12 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया। मध्य पूर्व में जारी सैन्य तनाव और तेल की सप्लाई प्रभावित होने की आशंका ने कच्चे तेल के बाजार पर दबाव बढ़ा दिया है। इसका सीधा असर आने वाले समय में पेट्रोल और डीजल की कीमतों पर पड़ सकता है हालांकि घरेलू स्तर पर कीमतों में बदलाव कई दूसरे कारकों पर भी निर्भर करता है।

    फिलहाल भारतीय वाहन चालकों के लिए राहत की बात यह है कि 2 अक्टूबर को देश की ऑयल मार्केटिंग कंपनियों ने पेट्रोल और डीजल के दाम में कोई बदलाव नहीं किया है। दिल्ली में पेट्रोल 112.12 रुपये प्रति लीटर और डीजल 95.20 रुपये प्रति लीटर पर स्थिर है। रिपोर्ट के मुताबिक देश में आखिरी बार पेट्रोल और डीजल की कीमतों में मई 2026 में बढ़ोतरी हुई थी। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की मौजूदा तेजी पर घरेलू बाजार की नजर बनी हुई है।

    दरअसल मध्य पूर्व में बढ़ता तनाव तेल बाजार के लिए बड़ी चिंता बन गया है। अमेरिका की ओर से क्षेत्र में एक और एयरक्राफ्ट कैरियर ग्रुप भेजने पर विचार किए जाने की खबरों के बीच बाजार में सप्लाई को लेकर आशंकाएं बढ़ी हैं। अगर सैन्य तनाव और बढ़ता है और प्रमुख तेल मार्गों से कच्चे तेल की आवाजाही प्रभावित होती है तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों पर और दबाव आ सकता है।

    सबसे ज्यादा चिंता होर्मुज स्ट्रेट को लेकर है। यह दुनिया के महत्वपूर्ण तेल परिवहन मार्गों में शामिल है। यहां से गुजर रहे एक टैंकर को अज्ञात प्रोजेक्टाइल से निशाना बनाए जाने की सूचना के बाद तनाव और बढ़ गया है। फिलहाल घटना से हुए नुकसान की पूरी स्थिति स्पष्ट नहीं है लेकिन इस तरह की घटनाएं वैश्विक ऊर्जा बाजार में अनिश्चितता बढ़ा सकती हैं। यदि इस मार्ग से तेल की सप्लाई में बड़ा व्यवधान आता है तो इसका असर सिर्फ अमेरिका या यूरोप ही नहीं बल्कि भारत समेत कई देशों पर पड़ सकता है।

    ईरान से होने वाले तेल निर्यात को लेकर भी बाजार में चिंता बनी हुई है। रिपोर्ट के अनुसार सितंबर में ईरान ने टैंकरों पर लगभग कोई कच्चा तेल लोड नहीं किया। इसे अमेरिकी दबाव और क्षेत्रीय परिस्थितियों के बीच ईरान की वैश्विक ऊर्जा बाजार तक पहुंच प्रभावित होने के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है। हालांकि हाल में मध्य पूर्व से तेल की सप्लाई में कुछ सुधार के संकेत मिले थे लेकिन सैन्य तनाव बढ़ने से बाजार में दोबारा अस्थिरता पैदा हो गई है।

    अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची बनी रहती हैं तो भारत में भी इसका असर दिखाई दे सकता है। पेट्रोल और डीजल की कीमतों का प्रभाव सिर्फ वाहन चलाने की लागत तक सीमित नहीं रहता बल्कि माल ढुलाई परिवहन और कई वस्तुओं की लागत पर भी असर पड़ सकता है। इससे महंगाई का दबाव बढ़ने की आशंका रहती है। हालांकि घरेलू ईंधन कीमतों में वास्तविक बदलाव इस बात पर निर्भर करेगा कि कच्चे तेल की कीमतें कितने समय तक ऊंची रहती हैं और भारतीय तेल कंपनियां आगे क्या फैसला करती हैं।

  • मिडिल ईस्ट तनाव से तेल बाजार में हड़कंप 100 डॉलर की ओर बढ़ता क्रूड भारत के लिए क्यों बना चिंता का कारण

    मिडिल ईस्ट तनाव से तेल बाजार में हड़कंप 100 डॉलर की ओर बढ़ता क्रूड भारत के लिए क्यों बना चिंता का कारण


    नई दिल्ली। मिडिल ईस्ट में लगातार बढ़ते भू राजनीतिक तनाव का असर अब वैश्विक ऊर्जा बाजार पर साफ दिखाई देने लगा है। कच्चे तेल की कीमतों में लगातार उछाल दर्ज किया जा रहा है और ब्रेंट क्रूड 100 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच गया है। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य तनाव तथा रेड सी क्षेत्र में तेल टैंकरों पर बढ़ते हमलों ने अंतरराष्ट्रीय बाजार में सप्लाई को लेकर चिंता बढ़ा दी है। इसका सीधा असर तेल की कीमतों पर पड़ रहा है और विशेषज्ञ मान रहे हैं कि यदि हालात जल्द सामान्य नहीं हुए तो कीमतें और ऊपर जा सकती हैं।

    अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड करीब 96 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर कारोबार कर रहा है जबकि डब्ल्यूटीआई क्रूड भी लगातार मजबूत बना हुआ है। विश्लेषकों का कहना है कि वैश्विक सप्लाई प्रभावित होने की आशंका के चलते निवेशक तेजी से खरीदारी कर रहे हैं। कई अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों ने भी चेतावनी दी है कि यदि तनाव लंबा खिंचता है तो कच्चे तेल की कीमतें 120 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती हैं।

    तेल की कीमतों में इस तेजी की सबसे बड़ी वजह होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास बढ़ता तनाव माना जा रहा है। यह दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री तेल मार्गों में शामिल है जहां से वैश्विक तेल आपूर्ति का बड़ा हिस्सा गुजरता है। इसके अलावा रेड सी में जहाजों पर बढ़ते हमलों ने भी अंतरराष्ट्रीय व्यापार और तेल परिवहन को प्रभावित किया है जिससे बाजार में अनिश्चितता और बढ़ गई है।

    भारत के लिए यह स्थिति इसलिए ज्यादा गंभीर है क्योंकि देश अपनी जरूरत का लगभग 88 प्रतिशत कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमत बढ़ने का सीधा असर आयात बिल पर पड़ता है। यदि लंबे समय तक कच्चा तेल महंगा बना रहता है तो सरकारी तेल कंपनियों पर वित्तीय दबाव बढ़ सकता है और पेट्रोल तथा डीजल की खुदरा कीमतों में बढ़ोतरी की संभावना भी मजबूत हो जाएगी।

    विशेषज्ञों का मानना है कि यदि कच्चा तेल 95 से 120 डॉलर प्रति बैरल के बीच लंबे समय तक बना रहता है तो पेट्रोल और डीजल के दाम में प्रति लीटर पांच से आठ रुपये तक की बढ़ोतरी हो सकती है। इससे केवल वाहन चालकों की जेब पर असर नहीं पड़ेगा बल्कि माल ढुलाई की लागत बढ़ने से फल सब्जियां दूध अनाज और अन्य दैनिक उपयोग की वस्तुएं भी महंगी हो सकती हैं। इसका असर खुदरा महंगाई पर भी देखने को मिल सकता है।

    ऊर्जा विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार और तेल कंपनियां फिलहाल अंतरराष्ट्रीय हालात पर लगातार नजर बनाए हुए हैं। यदि वैश्विक तनाव कम होता है और सप्लाई सामान्य रहती है तो कीमतों में राहत मिल सकती है। लेकिन यदि हालात और बिगड़ते हैं तो आने वाले दिनों में आम लोगों को ईंधन और रोजमर्रा की वस्तुओं पर अधिक खर्च करना पड़ सकता है।

    फिलहाल बाजार की नजर मिडिल ईस्ट की स्थिति और वैश्विक तेल आपूर्ति पर टिकी हुई है। आने वाले कुछ सप्ताह यह तय करेंगे कि कच्चे तेल की कीमतें स्थिर होती हैं या फिर नया रिकॉर्ड बनाती हैं।

  • पेट्रोल-डीजल के दाम में नहीं हुआ कोई बदलाव, 7 मई को भी ईंधन कीमतें स्थिर

    पेट्रोल-डीजल के दाम में नहीं हुआ कोई बदलाव, 7 मई को भी ईंधन कीमतें स्थिर

    नई दिल्ली। देशभर में 7 मई को पेट्रोल और डीजल की कीमतों में किसी तरह का बदलाव नहीं देखा गया। लगातार कई दिनों से ईंधन के दाम स्थिर बने हुए हैं, जिससे उपभोक्ताओं को फिलहाल राहत मिल रही है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव के बावजूद घरेलू स्तर पर इसका असर तुरंत दिखाई नहीं दे रहा है।

    भारत में ईंधन की कीमतें रोजाना आधार पर तय की जाती हैं, लेकिन हाल के समय में इनमें स्थिरता बनी हुई है। इसका मुख्य कारण वैश्विक बाजार में संतुलन और घरेलू टैक्स संरचना का स्थिर रहना माना जा रहा है। तेल कंपनियां अंतरराष्ट्रीय कीमतों और मुद्रा विनिमय दरों के आधार पर रेट तय करती हैं, लेकिन फिलहाल बड़े बदलाव नहीं किए गए हैं।

    राजधानी दिल्ली में पेट्रोल और डीजल की कीमतें पहले की तरह ही बनी हुई हैं। वहीं मुंबई, कोलकाता, चेन्नई और बेंगलुरु जैसे महानगरों में पेट्रोल की कीमतें 100 रुपये प्रति लीटर के आसपास या उससे ऊपर बनी हुई हैं। डीजल की कीमतें अधिकतर शहरों में अभी भी 100 रुपये के नीचे हैं।

    महानगरों में ईंधन की कीमतों में अंतर टैक्स और परिवहन लागत की वजह से देखने को मिलता है। कुछ शहरों में पेट्रोल की कीमतें अपेक्षाकृत अधिक हैं, जबकि छोटे शहरों में यह दरें थोड़ी कम बनी हुई हैं।

    पिछले कुछ वर्षों में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में बड़े उतार-चढ़ाव कम देखने को मिले हैं। टैक्स में बदलाव के बाद से कीमतें एक सीमित दायरे में स्थिर बनी हुई हैं, जिससे उपभोक्ताओं को बड़ी राहत मिली है।

    ईंधन की कीमतें कई कारकों पर निर्भर करती हैं, जिनमें कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतें, डॉलर-रुपया विनिमय दर, टैक्स और लॉजिस्टिक्स लागत शामिल हैं। भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है, इसलिए वैश्विक बाजार में किसी भी बदलाव का असर धीरे-धीरे घरेलू कीमतों पर पड़ता है।

  • ईंधन कीमतों पर लगाम की तैयारी, सरकार ला सकती है प्राइस स्टेबिलाइजेशन मैकेनिज्म

    ईंधन कीमतों पर लगाम की तैयारी, सरकार ला सकती है प्राइस स्टेबिलाइजेशन मैकेनिज्म


    नई दिल्ली। वैश्विक बाजार में बढ़ती अनिश्चितता और कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव के बीच केंद्र सरकार अब एक बड़े कदम की तैयारी में है। पेट्रोल, डीजल और एलपीजी की कीमतों में अचानक बढ़ोतरी से आम लोगों को राहत देने के लिए सरकार ‘ईंधन मूल्य स्थिरीकरण तंत्र’ (Fuel Price Stabilization Mechanism) पर गंभीरता से विचार कर रही है।

     क्यों उठी इस तंत्र की जरूरत?
    पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनावों के कारण वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित हो रही है। इसका सीधा असर भारत जैसे आयात-निर्भर देशों पर पड़ता है। कच्चे तेल की कीमत बढ़ते ही घरेलू बाजार में ईंधन महंगा हो जाता है, जिससे महंगाई और बढ़ती है।
    इसी समस्या से निपटने के लिए Government of India एक ऐसा तंत्र तैयार कर रही है, जो कीमतों में अचानक उछाल को नियंत्रित कर सके।

    कैसे काम करेगा यह तंत्र?
    रिपोर्ट के अनुसार, प्रस्तावित व्यवस्था एक “बफर फंड” या रिजर्व सिस्टम पर आधारित होगी। जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें तेजी से बढ़ेंगी, तब इस फंड के जरिए हस्तक्षेप कर उपभोक्ताओं पर सीधा बोझ कम किया जाएगा।
    यह मॉडल कुछ हद तक कृषि उत्पादों के मूल्य स्थिरीकरण तंत्र जैसा होगा, जहां जरूरत पड़ने पर बफर स्टॉक बाजार में उतारा जाता है।

    पेट्रोल-डीजल और LPG होंगे शामिल
    इस प्रस्तावित योजना में पेट्रोल, डीजल और एलपीजी तीनों ईंधनों को शामिल किया जाएगा। इसके लिए एक अलग “ईंधन बफर फंड” बनाने की तैयारी है, जिससे कीमतों के तेज उतार-चढ़ाव को संतुलित किया जा सके।

     रणनीतिक भंडार से अलग होगा यह सिस्टम
    यह तंत्र भारत के मौजूदा रणनीतिक कच्चे तेल भंडार से अलग होगा। जहां रणनीतिक भंडार का मकसद आपूर्ति सुनिश्चित करना है, वहीं यह नया सिस्टम कीमतों को स्थिर रखने पर फोकस करेगा।

     कब होगा हस्तक्षेप? तय होंगे खास मानदंड
    सरकार इस बात पर भी काम कर रही है कि कब और कैसे हस्तक्षेप किया जाए। इसके लिए कुछ तय सीमाएं (थ्रेशहोल्ड) बनाई जा सकती हैं, जैस

    कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमत

    वैश्विक बाजार में अस्थिरता का स्तर
    जब ये सीमाएं पार होंगी, तब सरकार बफर फंड का इस्तेमाल कर कीमतों को काबू में रखने की कोशिश करेगी।

     स्थायी सब्सिडी नहीं, सिर्फ अस्थायी राहत
    सरकार का मकसद स्थायी सब्सिडी देना नहीं है, बल्कि सिर्फ अत्यधिक उतार-चढ़ाव के समय अस्थायी राहत देना है। जब हालात सामान्य हो जाएंगे, तब बफर को फिर से भर दिया जाएगा।

     आम लोगों को क्या फायदा?
    इस तंत्र के लागू होने से
    पेट्रोल-डीजल के अचानक महंगे होने का झटका कम लगेगा
    महंगाई पर नियंत्रण रखने में मदद मिलेगी
    घरेलू बजट पर दबाव घटेगा

  • पेट्रोल-डीजल की कीमतों का असर, महंगाई बढ़ी; दरों पर RBI का रुख नरम

    पेट्रोल-डीजल की कीमतों का असर, महंगाई बढ़ी; दरों पर RBI का रुख नरम


    नई दिल्ली। देश में बढ़ती ईंधन कीमतों का असर अब महंगाई पर साफ दिखने लगा है। मार्च 2026 में थोक महंगाई दर (WPI) में उछाल दर्ज किया गया है, जिससे आने वाले समय में Reserve Bank of India की मौद्रिक नीति पर असर पड़ सकता है। अर्थशास्त्रियों का मानना है कि मौजूदा हालात को देखते हुए आरबीआई फिलहाल ब्याज दरों को स्थिर रख सकता है।

    ईंधन बना महंगाई बढ़ने की सबसे बड़ी वजह
    रेटिंग एजेंसी ICRA के वरिष्ठ अर्थशास्त्री Rahul Agrawal के अनुसार, थोक महंगाई में यह बढ़ोतरी व्यापक स्तर पर हुई है, जिसमें क्रूड ऑयल, नेचुरल गैस और ईंधन-ऊर्जा की कीमतों का बड़ा योगदान रहा।
    उन्होंने बताया कि फरवरी की तुलना में मार्च में मुख्य महंगाई में 175 बेसिस पॉइंट की वृद्धि हुई, जिसमें करीब 150 बेसिस पॉइंट सिर्फ ईंधन और ऊर्जा सेक्टर से आए।

    खाद्य महंगाई स्थिर, गैर-खाद्य में उछाल
    मार्च में खाद्य महंगाई दर 1.8% पर स्थिर रही, लेकिन गैर-खाद्य वस्तुओं की महंगाई 3.3% से बढ़कर 3.7% पर पहुंच गई, जो पिछले 41 महीनों का उच्चतम स्तर है। यह संकेत देता है कि उत्पादन और परिवहन लागत बढ़ने से अन्य वस्तुएं महंगी हो रही हैं।

     वैश्विक कारणों का असर
    विशेषज्ञों का मानना है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में ऊर्जा कीमतों में बढ़ोतरी, शिपिंग और माल ढुलाई लागत में इजाफा और इनपुट लागत बढ़ने से आयात महंगा हो रहा है। इससे अप्रैल में भी महंगाई बढ़ने की आशंका जताई जा रही है।

    डीजल और गैस की कीमतों ने बढ़ाया दबाव
    CareEdge Ratings की मुख्य अर्थशास्त्री Rajani Sinha के मुताबिक, पश्चिम एशिया संकट के चलते थोक डीजल और अन्य ईंधनों की कीमतों में तेज उछाल आया है।
    मार्च में थोक डीजल की कीमतों में 25% से ज्यादा की वृद्धि हुई, जबकि घरेलू गैस सिलेंडर 60 रुपये और कमर्शियल सिलेंडर करीब 310 रुपये महंगे हुए।
    हालांकि खुदरा पेट्रोल-डीजल की कीमतें स्थिर रहीं, लेकिन थोक स्तर पर बढ़ोतरी का असर उद्योग और परिवहन पर पड़ा।

    कच्चे तेल की ऊंची कीमतें बनी रहेंगी चुनौती
    अनुमान है कि वित्त वर्ष 2027 में कच्चे तेल की कीमतें औसतन 85-90 डॉलर प्रति बैरल के बीच रह सकती हैं। इससे परिवारों, सरकार और तेल कंपनियों पर वित्तीय दबाव बना रहेगा।
    हालांकि मजबूत रिफाइनिंग मार्जिन के कारण कंपनियां 100-105 डॉलर प्रति बैरल तक कीमतों को संभाल सकती हैं।

    ब्याज दरों पर क्या होगा असर?
    मौजूदा महंगाई और वैश्विक अनिश्चितताओं को देखते हुए विशेषज्ञों का मानना है कि Reserve Bank of India फिलहाल ब्याज दरों में कोई बदलाव नहीं करेगा।
    अगर आर्थिक विकास दर कमजोर पड़ती है, तो साल के अंत तक दरों में कटौती पर विचार किया जा सकता है, लेकिन फिलहाल “वेट एंड वॉच” की रणनीति अपनाई जा सकती है।

  • जंग की आंच से महंगाई तेज: कच्चे तेल में उछाल, भारत में गैस महंगी, पड़ोस में पेट्रोल-डीजल के दाम आसमान पर

    जंग की आंच से महंगाई तेज: कच्चे तेल में उछाल, भारत में गैस महंगी, पड़ोस में पेट्रोल-डीजल के दाम आसमान पर


    नई दिल्ली:मिडिल ईस्ट में बढ़ते युद्ध और भू-राजनीतिक तनाव का असर अब वैश्विक अर्थव्यवस्था के साथ-साथ आम लोगों की जेब पर भी पड़ने लगा है। तेल बाजार में आई तेज उथल-पुथल ने कई देशों में महंगाई की आग भड़का दी है और भारत भी इससे अछूता नहीं रहा है। हाल ही में रसोई गैस यानी एलपीजी सिलेंडर की कीमत में 60 रुपये की बढ़ोतरी की गई है। यह फैसला ऐसे समय में लिया गया है जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में लगातार तेजी देखने को मिल रही है और सप्लाई को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है।

    माना जा रहा है कि मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव और युद्ध की वजह से ऊर्जा आपूर्ति पर दबाव बढ़ गया है। इसी कारण सरकार को आपातकालीन शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए देश की ऑयल रिफाइनरी कंपनियों को एलपीजी उत्पादन बढ़ाने के निर्देश देने पड़े। हालांकि फिलहाल पेट्रोल और डीजल की कीमतों में कोई बढ़ोतरी नहीं की गई है लेकिन अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम जिस तेजी से बढ़ रहे हैं उससे आने वाले समय में कीमतों पर दबाव बढ़ने की आशंका जताई जा रही है।

    युद्ध की वजह से वैश्विक तेल बाजार में जबरदस्त उछाल देखने को मिला है। एक सप्ताह के भीतर ही कच्चे तेल की कीमतों में करीब 35 प्रतिशत की तेजी दर्ज की गई है। अमेरिकी क्रूड ऑयल के फ्यूचर्स में यह अब तक की सबसे बड़ी साप्ताहिक बढ़त मानी जा रही है। WTI Crude Oil की कीमत लगभग 9.89 डॉलर बढ़कर करीब 90.90 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई है जबकि Brent Crude भी करीब 7.28 डॉलर की तेजी के साथ 92.69 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर पहुंच गया है। कच्चे तेल की कीमतों में इस तेजी ने दुनिया भर के देशों की चिंता बढ़ा दी है क्योंकि इससे ईंधन की कीमतों में बढ़ोतरी का खतरा बढ़ जाता है।

    हालांकि भारत सरकार ने फिलहाल लोगों को भरोसा दिलाया है कि देश में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में तुरंत कोई बढ़ोतरी नहीं होने दी जाएगी। इसके बावजूद कई शहरों में लोगों के बीच आशंका का माहौल बन गया है और पेट्रोल पंपों पर वाहनों की लंबी कतारें देखी जा रही हैं। पुणे मसूरी और नोएडा जैसे शहरों में लोग एहतियात के तौर पर अपनी गाड़ियों की टंकी फुल कराने पहुंच रहे हैं ताकि संभावित बढ़ोतरी से पहले ईंधन का स्टॉक किया जा सके।

    जहां भारत में फिलहाल कीमतों को स्थिर रखने की कोशिश की जा रही है वहीं पड़ोसी देश Pakistan में ईंधन की कीमतों में बड़ी बढ़ोतरी कर दी गई है। वहां पेट्रोल और डीजल के दाम में करीब 55 रुपये प्रति लीटर तक का इजाफा किया गया है। लगभग 20 प्रतिशत की इस बढ़ोतरी के बाद पाकिस्तान में पेट्रोल की कीमत करीब 335.86 रुपये प्रति लीटर और डीजल की कीमत करीब 321.17 रुपये प्रति लीटर तक पहुंच गई है।

    अगर भारत की बात करें तो राजधानी Delhi में 8 मार्च 2026 को पेट्रोल की कीमत लगभग 94.77 रुपये प्रति लीटर और डीजल की कीमत करीब 87.67 रुपये प्रति लीटर बनी हुई है। वहीं सीएनजी की कीमत करीब 77.09 रुपये प्रति किलो और पीएनजी लगभग 47.89 रुपये प्रति एससीएम के आसपास है।

    दरअसल इस पूरे संकट की एक बड़ी वजह मिडिल ईस्ट का रणनीतिक समुद्री मार्ग Strait of Hormuz भी है जहां से दुनिया के लगभग 20 प्रतिशत तेल की आपूर्ति होती है। भारत भी अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा इसी मार्ग से आयात करता है। युद्ध के चलते इस मार्ग पर जोखिम बढ़ने के बाद भारत ने वैकल्पिक रास्तों से तेल आयात बढ़ाने की रणनीति अपनाई है और अन्य मार्गों से तेल खरीद में करीब 10 प्रतिशत की बढ़ोतरी की है।

    ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि यदि युद्ध लंबे समय तक जारी रहा तो वैश्विक तेल बाजार में अस्थिरता बनी रह सकती है और इसका असर पेट्रोल डीजल तथा गैस की कीमतों पर भी पड़ सकता है। फिलहाल सरकार कीमतों को नियंत्रित रखने की कोशिश कर रही है लेकिन अंतरराष्ट्रीय बाजार की स्थिति पर सबकी नजर बनी हुई है।

  • पश्चिम एशिया तनाव के बीच राहत: भारत में नहीं बढ़ेंगे पेट्रोल डीजल के दाम, कनाडा-ऑस्ट्रेलिया से LPG आयात की तैयारी

    पश्चिम एशिया तनाव के बीच राहत: भारत में नहीं बढ़ेंगे पेट्रोल डीजल के दाम, कनाडा-ऑस्ट्रेलिया से LPG आयात की तैयारी

    नई दिल्ली । पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और अमेरिका-इजरायल तथा ईरान के बीच जारी संघर्ष के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेजी देखी जा रही है लेकिन भारत सरकार ने आम उपभोक्ताओं को राहत देते हुए स्पष्ट किया है कि फिलहाल देश में पेट्रोल और डीजल के दाम नहीं बढ़ाए जाएंगे। छह दिन से जारी युद्ध के चलते वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमत करीब 16 प्रतिशत बढ़कर 85 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई है और ब्रेंट क्रूड लगभग 85.41 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर पहुंच गया है। इसके बावजूद केंद्र सरकार का कहना है कि भारत के पास पर्याप्त तेल और गैस का भंडार मौजूद है और घरेलू बाजार पर इसका तत्काल कोई असर नहीं पड़ेगा।

    पेट्रोलियम मंत्रालय के अनुसार भारत ने अपनी ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने के लिए वैकल्पिक आपूर्ति स्रोतों पर तेजी से काम किया है। एलपीजी के मामले में भारत केवल कतर पर निर्भर नहीं है बल्कि ऑस्ट्रेलिया और कनाडा जैसे देशों ने भी गैस की आपूर्ति का प्रस्ताव दिया है। सरकार का कहना है कि जरूरत पड़ने पर इन देशों से आयात बढ़ाकर किसी भी संभावित कमी को पूरा किया जा सकता है। मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक भारत लगातार विभिन्न ऊर्जा उत्पादकों और आपूर्तिकर्ताओं के संपर्क में है और स्थिति पर करीबी नजर रखी जा रही है।

    दरअसल पश्चिम एशिया में बढ़ते युद्ध के बीच कतर ने अस्थायी रूप से अपना गैस उत्पादन रोक दिया है जिसका असर वैश्विक आपूर्ति पर पड़ सकता है। वर्तमान में भारत लगभग 195 मिलियन मीट्रिक स्टैंडर्ड क्यूबिक मीटर गैस का आयात करता है जिसमें करीब 60 एमएमएससीएम यानी लगभग 30 प्रतिशत गैस कतर से आती है। सरकार का कहना है कि इस कमी को पूरा करने के लिए अन्य देशों से गैस आयात बढ़ाने की योजना तैयार है। यदि जरूरत पड़ी तो गैस कंपनियां उद्योगों को गैस आपूर्ति की प्राथमिकताओं में बदलाव कर सकती हैं लेकिन घरेलू उपभोक्ताओं पर इसका कोई असर नहीं पड़ेगा।

    सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि पीएनजी और सीएनजी जैसे घरेलू उपयोग वाले गैस उपभोक्ताओं को किसी तरह की परेशानी नहीं होगी। उद्योगों के पास वैकल्पिक ऊर्जा स्रोत उपलब्ध होते हैं इसलिए गैस की संभावित कमी की स्थिति में आपूर्ति का संतुलन बनाया जा सकता है। फिलहाल ऐसी कोई स्थिति नहीं बनी है जिससे आम उपभोक्ताओं को चिंता करने की जरूरत पड़े।

    ऊर्जा सुरक्षा को लेकर सरकार ने यह भी जानकारी दी है कि देश में फिलहाल करीब 50 दिनों के लिए तेल का पर्याप्त भंडार मौजूद है। इसमें 25 दिनों के लिए कच्चे तेल का स्टॉक और लगभग 25 दिनों की जरूरत के हिसाब से पेट्रोल और डीजल उपलब्ध है। इसके अलावा भारत लगातार दूसरे देशों से भी तेल आपूर्ति को लेकर बातचीत कर रहा है ताकि किसी भी आपात स्थिति से निपटा जा सके।

    ईरान द्वारा होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद करने की दी जा रही धमकी को लेकर भी सरकार ने कहा है कि इसका भारत पर सीमित असर पड़ेगा। भारत के कुल तेल आयात का लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा ही इस मार्ग से गुजरता है जबकि बाकी 60 प्रतिशत अन्य रास्तों से आता है। सरकार ने सुरक्षित मार्गों से आयात बढ़ाने की रणनीति भी तैयार कर ली है।

    ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि अगर युद्ध कुछ समय और चलता है तो कच्चे तेल की कीमतें 90 डॉलर प्रति बैरल तक जा सकती हैं लेकिन संघर्ष थमते ही कीमतों में गिरावट की संभावना है क्योंकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की उपलब्धता पर्याप्त है। इस बीच भारत अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी और ओपेक जैसे संगठनों के साथ भी आपूर्ति को लेकर लगातार बातचीत कर रहा है। साथ ही समुद्री परिवहन को सुरक्षित और सस्ता बनाए रखने के लिए अमेरिका की वित्तीय संस्था डीएफसी के साथ जहाजों के बीमा से जुड़े मुद्दों पर भी चर्चा जारी है।