Tag: Petrol Price

  • क्रूड ऑयल में 2 फीसदी से ज्यादा तेजी ने बढ़ाई टेंशन, आने वाले दिनों में महंगा हो सकता है पेट्रोल-डीजल

    क्रूड ऑयल में 2 फीसदी से ज्यादा तेजी ने बढ़ाई टेंशन, आने वाले दिनों में महंगा हो सकता है पेट्रोल-डीजल

    नई दिल्ली । पेट्रोल और डीजल की कीमतों को लेकर आम लोगों की चिंता एक बार फिर बढ़ सकती है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में अचानक तेज उछाल देखने को मिला है। 20 अगस्त को ब्रेंट क्रूड करीब 2.4 फीसदी की तेजी के साथ 93.78 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया। यह 24 जुलाई के बाद इसका सबसे ऊंचा स्तर बताया जा रहा है। दूसरी तरफ अमेरिकी WTI क्रूड की कीमत में भी करीब 2.5 फीसदी की तेजी दर्ज की गई। कच्चे तेल की इस तेजी ने भारत जैसे बड़े आयातक देश के लिए ईंधन की कीमतों को लेकर दबाव बढ़ा दिया है। हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि पेट्रोल और डीजल के दाम तुरंत बढ़ने वाले हैं लेकिन अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड लंबे समय तक महंगा बना रहा तो घरेलू कीमतों पर असर पड़ने की संभावना जरूर बढ़ सकती है।

    कच्चे तेल की कीमतों में इस तेजी के पीछे सबसे बड़ी वजह मध्य पूर्व में बढ़ता तनाव माना जा रहा है। अमेरिका और ईरान के बीच संबंधों में तनाव बढ़ने के साथ बाजार में तेल की आपूर्ति को लेकर आशंकाएं मजबूत हुई हैं। अमेरिका की ओर से ईरान के समर्थन वाले देशों पर आर्थिक दबाव बढ़ाने की चेतावनी ने भी बाजार की चिंता बढ़ाई है। तेल बाजार में किसी बड़े उत्पादक क्षेत्र से सप्लाई बाधित होने की आशंका पैदा होते ही कीमतों में तेजी देखने को मिलती है। यही स्थिति अभी दिखाई दे रही है।

    इस पूरे मामले में हॉर्मुज जलडमरूमध्य का महत्व बेहद ज्यादा है। यह दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल परिवहन मार्गों में शामिल है। इस रास्ते से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल और पेट्रोलियम उत्पादों की आवाजाही होती है। अगर क्षेत्र में तनाव बढ़ता है और इस मार्ग से तेल की आवाजाही प्रभावित होती है तो वैश्विक बाजार में सप्लाई को लेकर दबाव और बढ़ सकता है। इसका सीधा असर अंतरराष्ट्रीय क्रूड कीमतों पर पड़ सकता है।

    भारत के लिए यह चिंता इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि देश अपनी कच्चे तेल की जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है। जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड महंगा होता है तो भारतीय तेल कंपनियों की लागत पर दबाव बढ़ सकता है। हालांकि घरेलू पेट्रोल और डीजल की कीमत केवल कच्चे तेल के भाव से तय नहीं होती। इसमें केंद्र और राज्य सरकारों के टैक्स डीलर कमीशन तेल कंपनियों की लागत और मार्जिन तथा अंतरराष्ट्रीय बाजार की स्थिति जैसे कई कारक शामिल होते हैं। इसलिए क्रूड में तेजी आने के साथ ही अगले दिन पेट्रोल और डीजल महंगा हो जाए ऐसा जरूरी नहीं है।

    सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर कच्चे तेल की कीमत लंबे समय तक 90 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बनी रहती है तो क्या होगा। ऐसी स्थिति में घरेलू ईंधन की कीमतों को मौजूदा स्तर पर बनाए रखना तेल कंपनियों और नीति निर्माताओं के लिए चुनौतीपूर्ण हो सकता है। अगर क्रूड की कीमतें और ऊपर जाती हैं तथा रुपया भी डॉलर के मुकाबले कमजोर होता है तो आयात लागत पर दोहरा दबाव पड़ सकता है। इसका असर पेट्रोल और डीजल के साथ परिवहन लागत पर भी दिखाई दे सकता है।

    ईंधन महंगा होने का असर केवल वाहन चलाने वालों तक सीमित नहीं रहता। डीजल की कीमत बढ़ने पर माल ढुलाई और परिवहन लागत बढ़ सकती है। इससे सब्जियों खाद्य सामग्री और अन्य जरूरी सामान की कीमतों पर भी अप्रत्यक्ष दबाव पड़ सकता है। उद्योगों की लागत बढ़ने से महंगाई पर भी असर पड़ सकता है। हालांकि वास्तविक प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि क्रूड की कीमतें कितने समय तक ऊंचे स्तर पर रहती हैं और सरकार तथा तेल कंपनियां घरेलू कीमतों को लेकर क्या फैसला करती हैं।

    फिलहाल सबसे बड़ी निगाह अमेरिका और ईरान के बीच तनाव तथा मध्य पूर्व से तेल की आपूर्ति पर बनी हुई है। अगर तनाव कम होता है और सप्लाई सामान्य रहती है तो कच्चे तेल की कीमतों में नरमी आ सकती है। लेकिन अगर आपूर्ति बाधित होने का खतरा बढ़ता है तो क्रूड में और तेजी संभव है। ऐसे में आने वाले दिनों में पेट्रोल और डीजल के दाम पर दबाव बढ़ सकता है। इसलिए फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि ईंधन की कीमत निश्चित रूप से बढ़ने वाली है लेकिन महंगे क्रूड ने सस्ते पेट्रोल-डीजल की उम्मीदों के सामने जरूर एक नई चुनौती खड़ी कर दी है।

  • E20 पर सरकार का जवाब, इथेनॉल मिश्रण ने बचाए उपभोक्ताओं के हजारों करोड़, पेट्रोल 125 रुपये लीटर तक जाने से रुका

    E20 पर सरकार का जवाब, इथेनॉल मिश्रण ने बचाए उपभोक्ताओं के हजारों करोड़, पेट्रोल 125 रुपये लीटर तक जाने से रुका


    नई दिल्ली। इथेनॉल मिश्रित E20 पेट्रोल को लेकर चल रही बहस के बीच केंद्र सरकार ने बड़ा दावा किया है। सरकार का कहना है कि यदि देश में इथेनॉल ब्लेंडिंग कार्यक्रम लागू नहीं किया गया होता तो पश्चिम एशिया में ईरान संकट के दौरान कच्चे तेल की कीमतों में आई तेज बढ़ोतरी का सीधा असर भारतीय उपभोक्ताओं पर पड़ता और दिल्ली में पेट्रोल की कीमत करीब 125 रुपये प्रति लीटर तक पहुंच सकती थी। सरकार के अनुसार E20 नीति ने अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की महंगाई का प्रभाव काफी हद तक कम करने में मदद की है।

    पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि 20 प्रतिशत इथेनॉल मिश्रण वाली E20 नीति का उद्देश्य केवल वैकल्पिक ईंधन को बढ़ावा देना नहीं है बल्कि भारत की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करना और आयातित कच्चे तेल पर निर्भरता कम करना भी है। मंत्रालय का कहना है कि वैश्विक बाजार में जब कच्चे तेल की कीमतें तेजी से बढ़ीं तब इथेनॉल मिश्रण की वजह से पेट्रोल की लागत को नियंत्रित रखने में मदद मिली और उपभोक्ताओं को संभावित भारी मूल्य वृद्धि से राहत मिली।

    सरकार ने उन दावों को भी खारिज किया है जिनमें कहा जा रहा था कि E20 पेट्रोल पुराने वाहनों के लिए नुकसानदायक है या इससे बड़ी संख्या में वाहन अनुपयोगी हो जाएंगे। मंत्रालय के अनुसार E20 को लागू करने से पहले विभिन्न ऑटोमोबाइल कंपनियों और तकनीकी संस्थानों द्वारा व्यापक परीक्षण किए गए थे। सरकार का कहना है कि यह ईंधन अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप है और कई देशों में लंबे समय से उपयोग किया जा रहा है।

    मंत्रालय के मुताबिक इथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम का एक बड़ा फायदा विदेशी मुद्रा की बचत भी है। भारत अपनी तेल जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है और कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में उतार चढ़ाव का सीधा असर घरेलू अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। ऐसे में इथेनॉल ब्लेंडिंग से पेट्रोल में आयातित ईंधन की हिस्सेदारी कम होती है जिससे आयात बिल घटाने और ऊर्जा आत्मनिर्भरता बढ़ाने में मदद मिलती है।

    हालांकि E20 को लेकर कुछ वाहन मालिकों और विशेषज्ञों ने माइलेज तथा पुराने इंजनों पर संभावित प्रभाव को लेकर सवाल भी उठाए हैं। सरकार का कहना है कि E20 अनुकूल वाहनों में माइलेज पर प्रभाव सीमित है और यह वाहन की तकनीक रखरखाव तथा ड्राइविंग परिस्थितियों पर भी निर्भर करता है। मंत्रालय ने लोगों से अपील की है कि अपुष्ट दावों और भ्रामक सूचनाओं के बजाय आधिकारिक तकनीकी जानकारी पर भरोसा करें।

    सरकार का मानना है कि इथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम केवल ईंधन लागत नियंत्रित करने तक सीमित नहीं है बल्कि इससे किसानों को अतिरिक्त बाजार उपलब्ध होता है पर्यावरणीय दृष्टि से कार्बन उत्सर्जन कम करने में मदद मिलती है और देश की ऊर्जा सुरक्षा भी मजबूत होती है। इसी कारण केंद्र सरकार आने वाले समय में भी इथेनॉल आधारित ईंधन नीति को आगे बढ़ाने पर जोर दे रही है।

  • E20 पेट्रोल की कीमत पर बड़ा खुलासा किसानों से लेकर कच्चे तेल तक समझिए क्यों नहीं घट रहे पेट्रोल के दाम

    E20 पेट्रोल की कीमत पर बड़ा खुलासा किसानों से लेकर कच्चे तेल तक समझिए क्यों नहीं घट रहे पेट्रोल के दाम


    नई दिल्ली । देशभर में पेट्रोल में 20 प्रतिशत एथेनॉल मिश्रण यानी E20 ईंधन की आपूर्ति तेज़ी से बढ़ाई जा रही है। सरकार का लक्ष्य आयातित कच्चे तेल पर निर्भरता कम करना और घरेलू स्तर पर तैयार होने वाले जैव ईंधन को बढ़ावा देना है। हालांकि आम लोगों के मन में सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब एथेनॉल भारत में ही तैयार होता है तो फिर E20 पेट्रोल सामान्य पेट्रोल से सस्ता क्यों नहीं मिलता। अब सरकार ने संसद में इस सवाल का विस्तृत जवाब देते हुए इसकी असली वजह स्पष्ट कर दी है।

    सरकार के मुताबिक मौजूदा परिस्थितियों में एथेनॉल कोई बहुत सस्ता ईंधन नहीं है। एथेनॉल का उत्पादन किसानों से खरीदे गए मक्का और अन्य कृषि उत्पादों से किया जाता है। किसानों को उचित मूल्य देने की नीति के तहत सरकार एथेनॉल की खरीद तय दरों पर करती है। इसके अलावा परिवहन भंडारण और कर जैसे अतिरिक्त खर्च भी इसमें शामिल होते हैं। यही कारण है कि E20 पेट्रोल तैयार करने की कुल लागत सामान्य पेट्रोल के बराबर या कई बार उससे अधिक हो जाती है।

    सरकार ने यह भी बताया कि जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत सामान्य स्तर पर रहती है तब एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल की लागत में कोई बड़ी कमी नहीं आती। यदि भविष्य में कच्चे तेल की कीमतें बहुत अधिक बढ़ती हैं तब एथेनॉल मिश्रण आर्थिक रूप से अधिक लाभदायक साबित हो सकता है। इसलिए फिलहाल उपभोक्ताओं को कीमत के रूप में सीधी राहत नहीं मिल पा रही है।

    हालांकि सरकार का कहना है कि E20 पेट्रोल का सबसे बड़ा फायदा कीमत नहीं बल्कि देश की ऊर्जा सुरक्षा है। पेट्रोल में 20 प्रतिशत एथेनॉल मिलाने का मतलब है कि ईंधन का एक बड़ा हिस्सा अब देश में ही तैयार हो रहा है। इससे विदेशी कच्चे तेल पर निर्भरता कम होती है और वैश्विक संकट या युद्ध जैसी परिस्थितियों में ईंधन आपूर्ति पर असर कम पड़ता है। साथ ही किसानों को उनकी फसल का बेहतर बाजार मिलता है जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिलती है।

    सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि पेट्रोल पंपों पर अलग से शुद्ध पेट्रोल E10 और E20 उपलब्ध कराना फिलहाल व्यावहारिक नहीं है। देश में एक लाख से अधिक पेट्रोल पंप हैं और हर स्थान पर तीन तरह का ईंधन रखने के लिए अलग भंडारण और वितरण व्यवस्था की जरूरत होगी। इससे लागत काफी बढ़ जाएगी और सप्लाई चेन को संभालना भी कठिन हो जाएगा। इसके अलावा एथेनॉल उत्पादन और वितरण नेटवर्क पर पहले ही बड़े पैमाने पर निवेश किया जा चुका है।

    माइलेज को लेकर भी सरकार ने स्थिति साफ की है। सरकार के अनुसार E20 ईंधन के उपयोग से कुछ वाहनों में लगभग तीन से पांच प्रतिशत तक माइलेज कम हो सकता है। हालांकि वास्तविक माइलेज केवल ईंधन पर निर्भर नहीं करता बल्कि वाहन की स्थिति ड्राइविंग शैली टायर का दबाव समय पर सर्विसिंग और एयर कंडीशनर के उपयोग जैसे कई अन्य कारकों से भी प्रभावित होता है।

    दुनिया के कई विकसित देशों में एथेनॉल मिश्रित ईंधन का सफलतापूर्वक उपयोग किया जा रहा है। भारत भी इसी दिशा में आगे बढ़ रहा है ताकि आयातित तेल पर खर्च कम हो और स्वदेशी जैव ईंधन के जरिए ऊर्जा क्षेत्र को अधिक आत्मनिर्भर बनाया जा सके। आने वाले समय में एथेनॉल उत्पादन बढ़ने और तकनीक बेहतर होने के साथ इसकी लागत में भी कमी आने की संभावना जताई जा रही है।

  • होर्मुज तनाव से उछला कच्चा तेल, 95 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंचा ब्रेंट; पेट्रोल-डीजल कीमतों पर बढ़ी चिंता

    होर्मुज तनाव से उछला कच्चा तेल, 95 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंचा ब्रेंट; पेट्रोल-डीजल कीमतों पर बढ़ी चिंता


    नई दिल्ली । पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव का असर एक बार फिर वैश्विक ऊर्जा बाजार पर दिखाई देने लगा है। अमेरिका और ईरान के बीच जारी टकराव तथा होर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़े घटनाक्रमों के बीच अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल दर्ज किया गया है। तेल बाजार में बढ़ती अनिश्चितता के कारण निवेशकों और आयातक देशों की चिंताएं भी बढ़ गई हैं।

    बाजार आंकड़ों के अनुसार ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमतों में उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की गई और यह 95 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच गया। वहीं अमेरिकी बेंचमार्क डब्ल्यूटीआई (WTI) क्रूड में भी तेजी देखने को मिली। विशेषज्ञों का कहना है कि तेल आपूर्ति मार्गों को लेकर पैदा हुई आशंकाओं ने बाजार की धारणा को प्रभावित किया है, जिसके चलते कीमतों में तेजी आई है।

    होर्मुज जलडमरूमध्य को दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल परिवहन मार्गों में गिना जाता है। वैश्विक स्तर पर समुद्री मार्ग से होने वाले तेल व्यापार का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है। ऐसे में इस क्षेत्र में किसी भी प्रकार का सैन्य तनाव या आपूर्ति बाधित होने की आशंका सीधे तेल बाजार को प्रभावित करती है। रिपोर्टों के अनुसार हालिया घटनाओं के बाद निवेशकों ने आपूर्ति जोखिम को लेकर सतर्क रुख अपनाया है।

    विश्लेषकों का मानना है कि यदि क्षेत्र में तनाव और बढ़ता है या तेल आपूर्ति प्रभावित होती है तो कच्चे तेल की कीमतों में और तेजी देखने को मिल सकती है। हालांकि बाजार की दिशा काफी हद तक आने वाले दिनों में राजनीतिक और सैन्य घटनाक्रमों पर निर्भर करेगी। फिलहाल निवेशक हर नए घटनाक्रम पर नजर बनाए हुए हैं।

    भारत जैसे बड़े तेल आयातक देशों के लिए कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी महत्वपूर्ण मानी जाती है। देश अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है, इसलिए अंतरराष्ट्रीय कीमतों में बदलाव का असर परिवहन, उद्योग और महंगाई पर पड़ सकता है। हालांकि पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतें केवल कच्चे तेल की दरों से तय नहीं होतीं, बल्कि इनमें कर, परिवहन लागत, विनिमय दर और तेल विपणन कंपनियों की मूल्य निर्धारण नीति भी अहम भूमिका निभाती है।

    विशेषज्ञों के अनुसार यदि कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंचे स्तर पर बनी रहती हैं तो भविष्य में ईंधन कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है। हालांकि फिलहाल किसी तत्काल मूल्य वृद्धि को लेकर आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है।

    देश के प्रमुख महानगरों में पेट्रोल और डीजल की कीमतें स्थिर बनी हुई हैं। दिल्ली, मुंबई, कोलकाता और चेन्नई जैसे शहरों में ईंधन दरों में फिलहाल कोई बड़ा बदलाव दर्ज नहीं किया गया है। इसके बावजूद अंतरराष्ट्रीय बाजार में जारी उतार-चढ़ाव के कारण उपभोक्ताओं और उद्योग जगत की निगाहें तेल बाजार पर टिकी हुई हैं।

    आर्थिक जानकारों का मानना है कि आने वाले दिनों में पश्चिम एशिया की स्थिति, वैश्विक मांग और आपूर्ति संतुलन तथा प्रमुख तेल उत्पादक देशों की नीतियां कच्चे तेल की कीमतों की दिशा तय करेंगी। ऐसे में ऊर्जा बाजार में अस्थिरता का दौर कुछ समय तक जारी रह सकता है।

  • पेट्रोल-डीजल के दामों में बड़ी गिरावट के संकेत! जुलाई के बाद कच्चे तेल में आ सकती है तेज नरमी

    पेट्रोल-डीजल के दामों में बड़ी गिरावट के संकेत! जुलाई के बाद कच्चे तेल में आ सकती है तेज नरमी


    नई दिल्ली। पिछले करीब 100 दिनों से वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों को लेकर लगातार चर्चा बनी हुई है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में बाधा के बाद अंतरराष्ट्रीय तेल आपूर्ति पर असर पड़ा है, जिससे वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतें बढ़कर 100 से 120 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई हैं। इससे तेल बाजार में अस्थिरता बनी हुई है।

    इसी बीच ग्लोबल रेटिंग एजेंसी फिच रेटिंग्स ने कच्चे तेल की कीमतों को लेकर नया अनुमान जारी किया है, जिसमें आने वाले महीनों में कीमतों में बदलाव के संकेत दिए गए हैं।

    फिच का अनुमान क्या कहता है?
    फिच के मुताबिक वर्ष 2026 में ब्रेंट क्रूड की औसत कीमत लगभग 87 डॉलर प्रति बैरल रह सकती है। एजेंसी का अनुमान है कि मई से जुलाई के बीच कच्चा तेल 100 से 110 डॉलर प्रति बैरल के दायरे में बना रह सकता है। हालांकि जुलाई के बाद कीमतों में गिरावट की संभावना जताई गई है। अनुमान के अनुसार अगस्त से कच्चा तेल 80 डॉलर प्रति बैरल तक आ सकता है, जबकि सितंबर के बाद यह स्तर 70 डॉलर प्रति बैरल के आसपास रह सकता है।

    होर्मुज स्ट्रेट खुलने पर क्या होगा असर?
    फिच के अनुसार यदि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में स्थिति सामान्य होती है और समुद्री मार्ग दोबारा खुलता है, तो कच्चे तेल की कीमतों में तेजी से गिरावट देखने को मिल सकती है। ऐसे में अगस्त और सितंबर से वैश्विक बाजार में तेल की आपूर्ति बढ़ने और कीमतों में नरमी आने की संभावना है।

    आपूर्ति और मांग का संतुलन बनेगा अहम कारण
    रेटिंग एजेंसी ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि मौजूदा कीमतों में तेजी उत्पादन में कमी के कारण नहीं, बल्कि सप्लाई बाधित होने की वजह से आई है। तेल भंडार और उत्पादन क्षमता को स्थायी नुकसान नहीं हुआ है। साथ ही यह भी अनुमान लगाया गया है कि ओपेक और ओपेक प्लस देशों द्वारा उत्पादन बढ़ाने के फैसले के बाद बाजार में तेल की उपलब्धता और बढ़ सकती है, जिससे ओवरसप्लाई की स्थिति बन सकती है।
    रेटिंग एजेंसी ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि मौजूदा कीमतों में तेजी उत्पादन में कमी के कारण नहीं, बल्कि सप्लाई बाधित होने की वजह से आई है। तेल भंडार और उत्पादन क्षमता को स्थायी नुकसान नहीं हुआ है। साथ ही यह भी अनुमान लगाया गया है कि ओपेक और ओपेक प्लस देशों द्वारा उत्पादन बढ़ाने के फैसले के बाद बाजार में तेल की उपलब्धता और बढ़ सकती है, जिससे ओवरसप्लाई की स्थिति बन सकती है।

    होर्मुज बना सबसे बड़ा कारक
    स्ट्रेट ऑफ होर्मुज वैश्विक तेल आपूर्ति के लिए बेहद महत्वपूर्ण मार्ग है, जहां से प्रतिदिन लगभग 2 करोड़ बैरल तेल का परिवहन होता है। यह वैश्विक तेल आपूर्ति का करीब पांचवां हिस्सा है। मौजूदा तनाव के कारण इस मार्ग पर बाधा बनी हुई है, जिसका सीधा असर कीमतों पर पड़ा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि स्थिति सामान्य होती है तो आने वाले महीनों में वैश्विक तेल बाजार में स्थिरता लौट सकती है और 2026 के अंत तक कीमतों में और गिरावट देखी जा सकती है।

  • भोपाल में अनोखा विरोध प्रदर्शन, पेट्रोल-सीएनजी महंगाई पर ऑटो यूनियन का हल्ला बोल

    भोपाल में अनोखा विरोध प्रदर्शन, पेट्रोल-सीएनजी महंगाई पर ऑटो यूनियन का हल्ला बोल


    नई दिल्ली। भोपाल में महंगाई और ईंधन कीमतों में लगातार बढ़ोतरी का असर अब सड़क पर साफ दिखाई देने लगा है। सोमवार सुबह रायसेन रोड स्थित छावनी पठार क्षेत्र में ऑटो चालकों ने अपनी मांगों को लेकर अनोखे और प्रतीकात्मक तरीके से प्रदर्शन किया।

    प्रदर्शन में शामिल ऑटो चालकों ने बढ़ी हुई सीएनजी और पेट्रोल-डीजल की कीमतों के विरोध में फटे हुए अंडरवियर दिखाकर सरकार का ध्यान आकर्षित करने की कोशिश की। चालकों का कहना था कि महंगाई इतनी बढ़ चुकी है कि उनकी आर्थिक स्थिति बेहद खराब हो गई है और अब तो दैनिक जरूरतें पूरी करना भी मुश्किल हो गया है।

    इस प्रदर्शन का आयोजन रायसेन रोड स्थित शनि मंदिर के पास किया गया, जहां ऑटो संगठन के अध्यक्ष संजू अहिरवार के नेतृत्व में बड़ी संख्या में चालक एकत्र हुए। प्रदर्शन पूरी तरह शांतिपूर्ण रहा, लेकिन संदेश बेहद स्पष्ट था “किराया बढ़ाओ, वरना गुजारा मुश्किल है।”

    संजू अहिरवार ने बताया कि मौजूदा समय में एक सीएनजी ऑटो को रोजाना लगभग 500 रुपये की गैस भरवानी पड़ती है, जबकि औसतन 1200 रुपये की कमाई होती है। इसमें से ईंधन, किश्त और रखरखाव का खर्च निकालने के बाद चालकों के पास बहुत कम बचत बचती है। उन्होंने कहा कि मौजूदा हालात में ऑटो चलाना घाटे का सौदा बन गया है।

    चालकों का आरोप है कि लंबे समय से ऑटो किराए में कोई संशोधन नहीं किया गया है, जबकि ईंधन की कीमतें लगातार बढ़ती जा रही हैं। इसी असंतुलन के कारण हजारों ऑटो चालकों की आय प्रभावित हो रही है।

    प्रदर्शन में मौजूद चालकों पुषेंद्र अहिरवार, विशाल और राजेश ने भी अपनी पीड़ा साझा की। उन्होंने कहा कि बढ़ती महंगाई का सबसे ज्यादा असर मेहनतकश वर्ग पर पड़ रहा है। रोजाना की कमाई का बड़ा हिस्सा ईंधन और खर्चों में चला जाता है, जिससे घर चलाना भी मुश्किल हो गया है।

    इसी दौरान चालकों ने फटे कपड़ों को दिखाकर अपनी आर्थिक स्थिति का प्रतीकात्मक प्रदर्शन किया और कहा कि “किश्त भरते-भरते कपड़े तक फट गए हैं।”

    ऑटो संगठन ने सरकार से मांग की है कि वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए ऑटो किराए का पुनर्निर्धारण किया जाए, ताकि चालक अपनी किश्त समय पर चुका सकें और परिवार का भरण-पोषण ठीक से कर सकें।

    इस बीच देशभर में ईंधन कीमतों को लेकर भी चिंता बढ़ रही है। हाल ही में क्रिसिल की एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार के प्रभाव से पेट्रोल-डीजल की कीमतों में और बढ़ोतरी संभव है, जिससे आम जनता और परिवहन व्यवसाय पर अतिरिक्त बोझ पड़ सकता है। भोपाल में हुआ यह अनोखा प्रदर्शन एक बार फिर इस बात को उजागर करता है कि महंगाई का दबाव अब सीधे सड़क पर काम करने वाले वर्ग तक पहुंच चुका है।

  • पेट्रोल-डीजल कीमतों पर नजर: वैश्विक गिरावट के बावजूद भारत में क्यों नहीं घट रहे रेट?

    पेट्रोल-डीजल कीमतों पर नजर: वैश्विक गिरावट के बावजूद भारत में क्यों नहीं घट रहे रेट?


    नई दिल्ली । दुनिया के कई देशों में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में राहत देखने को मिल रही है। जून 2026 की शुरुआत के साथ पाकिस्तान, चीन, नेपाल और म्यांमार जैसे भारत के पड़ोसी देशों में ईंधन की कीमतों में कमी दर्ज की गई है। हालांकि भारत में फिलहाल पेट्रोल-डीजल के दाम स्थिर बने हुए हैं और निकट भविष्य में बड़ी राहत मिलने की संभावना कम मानी जा रही है।

    ग्लोबल पेट्रोल प्राइस के आंकड़ों के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के नीचे आने के बाद वैश्विक स्तर पर पेट्रोल की औसत कीमत में गिरावट दर्ज हुई है। इसके बावजूद भारत में पेट्रोल की औसत कीमत लगभग 108.71 रुपये प्रति लीटर बनी हुई है।

    पड़ोसी देशों की बात करें तो पाकिस्तान में पेट्रोल की औसत कीमत में उल्लेखनीय गिरावट आई है और यह 130 रुपये प्रति लीटर के आसपास पहुंच गई है। चीन में भी पेट्रोल के दाम में मामूली कमी दर्ज की गई है। वहीं नेपाल और म्यांमार में भी ईंधन सस्ता हुआ है। इसके विपरीत बांग्लादेश, भूटान और श्रीलंका में पेट्रोल की कीमतों में बढ़ोतरी देखने को मिली है।

    डीजल के मोर्चे पर भी कुछ देशों में राहत मिली है। पाकिस्तान, नेपाल और चीन में डीजल की कीमतें घटी हैं, जबकि श्रीलंका, भूटान और म्यांमार में इसके दाम बढ़े हैं।

    भारत में कीमतें कम क्यों नहीं हो रहीं, इसे लेकर विशेषज्ञों का कहना है कि हाल के महीनों में अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों और भू-राजनीतिक तनाव के दौरान सरकार ने करों में राहत देकर उपभोक्ताओं पर अतिरिक्त बोझ को सीमित रखने की कोशिश की थी। बाद में कीमतों में चरणबद्ध बढ़ोतरी भी की गई।

    वित्तीय विश्लेषकों का मानना है कि तेल विपणन कंपनियों पर बढ़ते दबाव और लागत को देखते हुए निकट भविष्य में कीमतों में कटौती की संभावना सीमित है। कुछ रिपोर्टों में यह भी संकेत दिया गया है कि यदि कंपनियों के घाटे बढ़ते हैं तो कीमतों में और वृद्धि की आवश्यकता पड़ सकती है।

    हालांकि, यदि वैश्विक स्तर पर तनाव कम होता है और कच्चे तेल की कीमतें लगातार नीचे आती हैं, तो भारत में भी पेट्रोल-डीजल की कीमतों में राहत का रास्ता खुल सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार कच्चे तेल का भाव 70 से 80 डॉलर प्रति बैरल के दायरे में स्थिर होने पर उपभोक्ताओं को फायदा मिलने की संभावना बढ़ सकती है।

    फिलहाल भारतीय उपभोक्ताओं को ईंधन कीमतों में तत्काल राहत मिलने की उम्मीद कम है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय बाजार की दिशा आने वाले महीनों में पेट्रोल-डीजल के दाम तय करने में अहम भूमिका निभाएगी।

  • अमेरिका-ईरान तनाव का असर: एक महीने में पेट्रोल-डीजल 7.5 रुपए तक महंगा, एलपीजी भी उछला

    अमेरिका-ईरान तनाव का असर: एक महीने में पेट्रोल-डीजल 7.5 रुपए तक महंगा, एलपीजी भी उछला

    नई दिल्ली । अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और अमेरिका-ईरान संघर्ष का असर अब भारतीय उपभोक्ताओं की जेब पर भी साफ दिखाई देने लगा है। पिछले एक महीने के दौरान देश में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की गई है, जबकि कमर्शियल एलपीजी सिलेंडर भी महंगा हो गया है। ऊर्जा बाजार में बनी अनिश्चितता और कच्चे तेल की कीमतों में उछाल के कारण ईंधन लागत लगातार बढ़ रही है, जिसका सीधा असर परिवहन, व्यापार और दैनिक जीवन पर पड़ने की आशंका जताई जा रही है।

    राजधानी दिल्ली में बीते एक महीने के दौरान पेट्रोल की कीमत में कुल 7.35 रुपए प्रति लीटर की वृद्धि हुई है। इसके बाद पेट्रोल का दाम 94.77 रुपए प्रति लीटर से बढ़कर 102.12 रुपए प्रति लीटर पहुंच गया है। इस अवधि में सरकार ने चार अलग-अलग चरणों में ईंधन कीमतों में संशोधन किया। 15 मई को पेट्रोल के दाम में 3 रुपए प्रति लीटर की वृद्धि की गई, जबकि 19 और 23 मई को 0.87-0.87 रुपए प्रति लीटर की बढ़ोतरी हुई। इसके बाद 25 मई को फिर 2.61 रुपए प्रति लीटर का इजाफा किया गया। लगातार हुई इन बढ़ोतरी ने उपभोक्ताओं के मासिक बजट पर अतिरिक्त दबाव बढ़ा दिया है।

    डीजल की कीमतों में भी लगभग इसी तरह की वृद्धि दर्ज की गई है। दिल्ली में डीजल का दाम 87.67 रुपए प्रति लीटर से बढ़कर 95.20 रुपए प्रति लीटर हो गया है। कुल मिलाकर डीजल 7.53 रुपए प्रति लीटर महंगा हुआ है। 15 मई को इसमें 3 रुपए प्रति लीटर की बढ़ोतरी हुई थी, जबकि 19 और 23 मई को 0.91-0.91 रुपए प्रति लीटर की वृद्धि दर्ज की गई। इसके बाद 25 मई को डीजल के दाम में 2.71 रुपए प्रति लीटर का इजाफा किया गया। डीजल कीमतों में बढ़ोतरी का असर माल ढुलाई, कृषि गतिविधियों और सार्वजनिक परिवहन पर भी पड़ सकता है, जिससे कई वस्तुओं की लागत बढ़ने की संभावना है।

    ईंधन के साथ-साथ कमर्शियल एलपीजी सिलेंडर भी महंगा हुआ है। दिल्ली में 19 किलोग्राम वाले कमर्शियल एलपीजी सिलेंडर की कीमत बढ़कर 3,113.50 रुपए तक पहुंच गई है। एक जून को सिलेंडर के दाम में 42 रुपए की नई बढ़ोतरी की गई। खास बात यह है कि जनवरी से अब तक कमर्शियल एलपीजी सिलेंडर की कीमतों में 1,400 रुपए से अधिक की वृद्धि दर्ज की जा चुकी है। वर्ष की शुरुआत में इसकी कीमत 1,691.50 रुपए थी, जो अब दोगुने के करीब पहुंच चुकी है। इसका असर होटल, रेस्तरां, कैटरिंग और छोटे व्यवसायों की लागत पर पड़ सकता है।

    हालांकि घरेलू बाजार में ईंधन कीमतों में बढ़ोतरी के बावजूद भारत अभी भी कई देशों की तुलना में अपेक्षाकृत कम कीमत पर पेट्रोल और डीजल उपलब्ध करा रहा है। विकसित अर्थव्यवस्थाओं में पेट्रोल की खुदरा कीमतें 150 रुपए प्रति लीटर से ऊपर बताई जा रही हैं, जबकि कई देशों में यह 180 रुपए प्रति लीटर से भी अधिक है। यूरोपीय संघ के देशों में पेट्रोल और डीजल दोनों की औसत कीमत भारत की तुलना में काफी ज्यादा है। वहीं पड़ोसी देशों पाकिस्तान, नेपाल, श्रीलंका, म्यांमार और फिलीपींस में भी पेट्रोल की कीमतें भारतीय स्तर से ऊपर बनी हुई हैं।

    वैश्विक ऊर्जा बाजार में जारी अस्थिरता का असर भारत के ईंधन बाजार पर लगातार दिखाई दे रहा है। यदि अंतरराष्ट्रीय तनाव लंबे समय तक बना रहता है, तो आने वाले महीनों में परिवहन लागत और महंगाई पर अतिरिक्त दबाव देखने को मिल सकता है।

  • पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतों पर राहुल गांधी का सरकार पर बड़ा हमला, ‘महंगाई मानव मोदी’ कहकर साधा निशाना

    पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतों पर राहुल गांधी का सरकार पर बड़ा हमला, ‘महंगाई मानव मोदी’ कहकर साधा निशाना

    नई दिल्ली । देश में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में लगातार हो रही बढ़ोतरी को लेकर राजनीतिक माहौल एक बार फिर गर्माता दिखाई दे रहा है। ईंधन दरों में बढ़ोतरी का असर आम लोगों की जेब पर पड़ता है और यही वजह है कि यह मुद्दा राजनीतिक बहस का बड़ा केंद्र बन गया है। हालिया कीमत वृद्धि के बाद विपक्ष ने सरकार की आर्थिक नीतियों और महंगाई को लेकर सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं।

    लोकसभा में विपक्ष के नेता Rahul Gandhi ने ईंधन की कीमतों में बढ़ोतरी को लेकर केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोला। उन्होंने आरोप लगाया कि पेट्रोल और डीजल के दामों में लगातार बढ़ोतरी करके आम जनता पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ डाला जा रहा है। उन्होंने इस मुद्दे को महंगाई और जनजीवन से जोड़ते हुए सरकार की कार्यशैली पर सवाल खड़े किए।

    अपने बयान में राहुल गांधी ने तंज भरे अंदाज में प्रधानमंत्री की नीतियों की आलोचना करते हुए कहा कि कीमतों में चरणबद्ध बढ़ोतरी की जा रही है, जिससे आम लोगों पर असर धीरे-धीरे पड़ता रहे। उन्होंने यह भी कहा कि चुनावी वादों और बाद की आर्थिक परिस्थितियों के बीच बड़ा अंतर दिखाई दे रहा है। उनके बयान के बाद राजनीतिक गलियारों में इस मुद्दे पर नई बहस शुरू हो गई है।

    दरअसल, पिछले कुछ समय से ईंधन की कीमतों में लगातार बदलाव देखने को मिल रहा है। वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल के बाजार में उतार-चढ़ाव और अंतरराष्ट्रीय हालात का असर घरेलू कीमतों पर भी पड़ता है। विशेषज्ञों का मानना है कि अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियां, भू-राजनीतिक तनाव और तेल आपूर्ति से जुड़े कारक ईंधन कीमतों को प्रभावित करते हैं।

    ईंधन कीमतों में बढ़ोतरी का सीधा असर आम लोगों के दैनिक खर्चों पर पड़ता है। पेट्रोल और डीजल महंगे होने से केवल वाहन चलाने की लागत ही नहीं बढ़ती, बल्कि परिवहन खर्च बढ़ने के कारण कई जरूरी वस्तुओं की कीमतों पर भी असर पड़ सकता है। यही कारण है कि पेट्रोल और डीजल की दरों में बदलाव हमेशा व्यापक चर्चा का विषय बन जाता है।

    राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि महंगाई और ईंधन मूल्य हमेशा संवेदनशील मुद्दे रहे हैं और विपक्ष इन्हें जनता से सीधे जुड़े विषयों के रूप में उठाता रहा है। आने वाले समय में भी यह मुद्दा राजनीतिक चर्चाओं में प्रमुख बना रह सकता है, क्योंकि इसका संबंध सीधे आम नागरिकों की आर्थिक स्थिति से जुड़ा है।

    फिलहाल ईंधन कीमतों को लेकर सरकार और विपक्ष के बीच बयानबाजी तेज होती दिखाई दे रही है। आने वाले दिनों में बाजार की स्थिति, अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियां और सरकारी फैसले इस मुद्दे की दिशा तय कर सकते हैं। जनता की नजर अब इस बात पर रहेगी कि आने वाले समय में ईंधन कीमतों में राहत मिलती है या बढ़ोतरी का सिलसिला जारी रहता है।

  • पेट्रोल-डीजल के रेट में तेज़ी जारी, महानगरों में नए दामों ने बढ़ाई महंगाई की मार

    पेट्रोल-डीजल के रेट में तेज़ी जारी, महानगरों में नए दामों ने बढ़ाई महंगाई की मार

    नई दिल्ली । देशभर में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में एक बार फिर बढ़ोतरी दर्ज की गई है, जिससे आम जनता पर महंगाई का दबाव और बढ़ गया है। मंगलवार को तेल कंपनियों ने ईंधन के दामों में करीब 90 पैसे प्रति लीटर तक की वृद्धि कर दी, जो पिछले कुछ दिनों में दूसरी बड़ी बढ़ोतरी मानी जा रही है। इससे पहले भी कुछ ही दिनों के अंतराल में पेट्रोल और डीजल के रेट में तेज़ इजाफा देखा गया था, जिसके बाद लगातार हो रही इस बढ़ोतरी ने उपभोक्ताओं की चिंता बढ़ा दी है।

    नई दरों के अनुसार राजधानी दिल्ली में पेट्रोल की कीमत अब 98 रुपये प्रति लीटर के करीब पहुंच गई है, जबकि डीजल भी 91 रुपये प्रति लीटर से ऊपर हो गया है। पहले की तुलना में यह बढ़ोतरी लोगों के रोजमर्रा के बजट पर सीधा असर डाल रही है। लगातार बढ़ते दामों ने खासकर मध्यम वर्ग और दैनिक यात्रा करने वाले लोगों के लिए मुश्किलें बढ़ा दी हैं।

    देश के अन्य बड़े शहरों में भी ईंधन की कीमतों में समान रूप से बढ़ोतरी देखने को मिली है। मुंबई में पेट्रोल का भाव अब 107 रुपये प्रति लीटर से अधिक हो गया है, जबकि डीजल भी महंगा होकर नए स्तर पर पहुंच गया है। कोलकाता में भी पेट्रोल की कीमतों ने नया रिकॉर्ड बनाया है और डीजल की कीमतें भी लगातार ऊपर जा रही हैं। वहीं चेन्नई में भी पेट्रोल और डीजल दोनों के दाम बढ़ने से वहां के उपभोक्ताओं पर अतिरिक्त बोझ पड़ा है।

    ईंधन की कीमतों में इस लगातार बढ़ोतरी के पीछे अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दामों में उतार-चढ़ाव को मुख्य कारण माना जा रहा है। साथ ही विदेशी मुद्रा बाजार में रुपये की स्थिति भी कीमतों पर असर डाल रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि वैश्विक स्तर पर अगर कच्चे तेल के दाम स्थिर नहीं होते, तो आने वाले समय में ईंधन और महंगा हो सकता है, जिससे घरेलू बाजार पर भी दबाव बढ़ेगा।

    पेट्रोल और डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी का सीधा असर परिवहन लागत पर पड़ता है। ट्रक, बस और टैक्सी सेवाओं की लागत बढ़ने से धीरे-धीरे रोजमर्रा की वस्तुओं जैसे सब्जी, फल और किराना सामान की कीमतों में भी वृद्धि देखने को मिल सकती है। इसी कारण व्यापारिक और परिवहन क्षेत्र से जुड़े लोग चिंता जता रहे हैं।

    विभिन्न संगठनों का मानना है कि ईंधन पर लगने वाले करों में राहत दी जानी चाहिए ताकि आम जनता को कुछ राहत मिल सके। लगातार बढ़ती कीमतों के बीच लोग सरकार से स्थिर नीति और नियंत्रण की मांग कर रहे हैं, जिससे महंगाई के दबाव को कम किया जा सके और आम जीवन पर इसका असर सीमित हो।