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  • होर्मुज संकट के बीच भारत का बड़ा आर्थिक कदम, पेट्रोल-डीजल निर्यात शुल्क में बदलाव से वैश्विक तेल बाजार पर असर की उम्मीद

    होर्मुज संकट के बीच भारत का बड़ा आर्थिक कदम, पेट्रोल-डीजल निर्यात शुल्क में बदलाव से वैश्विक तेल बाजार पर असर की उम्मीद

    नई दिल्ली । वैश्विक ऊर्जा बाजार में बढ़ते दबाव और होर्मुज क्षेत्र में तनावपूर्ण स्थिति के बीच भारत सरकार ने पेट्रोलियम उत्पादों के निर्यात से जुड़े नियमों में अहम बदलाव करते हुए निर्यात शुल्क में संशोधन का निर्णय लिया है। इस कदम को अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल कीमतों के उतार-चढ़ाव और घरेलू आपूर्ति को स्थिर बनाए रखने की रणनीति के रूप में देखा जा रहा है। सरकार ने स्पष्ट किया है कि पेट्रोल, डीजल और विमानन टरबाइन ईंधन पर नई दरें 1 जून से प्रभावी होंगी, जिससे ऊर्जा व्यापार और निर्यात नीति पर सीधा असर पड़ेगा।

    इस निर्णय के बाद पेट्रोल पर निर्यात शुल्क घटकर 1.5 रुपये प्रति लीटर तय किया गया है, जबकि डीजल पर यह 13.5 रुपये प्रति लीटर रहेगा। विमानन टरबाइन ईंधन पर 9.5 रुपये प्रति लीटर का शुल्क लागू किया गया है। यह बदलाव विशेष अतिरिक्त उत्पाद शुल्क के रूप में लागू होगा और इसके तहत रोड एंड इंफ्रास्ट्रक्चर सेस को शामिल नहीं किया जाएगा, जिससे कर ढांचे में आंशिक सरलता देखने को मिलेगी।

    सरकार का कहना है कि निर्यात शुल्क की समीक्षा हर पखवाड़े की जाती है, जिसमें अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों और वैश्विक आपूर्ति स्थिति का आकलन शामिल होता है। पिछले संशोधन के बाद अब नई दरों की घोषणा मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों और ऊर्जा बाजार की अस्थिरता को ध्यान में रखकर की गई है।

    पश्चिम एशिया में जारी तनाव और ऊर्जा आपूर्ति मार्गों पर अनिश्चितता के चलते सरकार का फोकस इस बात पर है कि देश में पेट्रोलियम उत्पादों की पर्याप्त उपलब्धता बनी रहे और किसी भी प्रकार का घरेलू संकट उत्पन्न न हो। इसी उद्देश्य से निर्यात नीति में समय-समय पर संशोधन किया जाता है ताकि घरेलू जरूरतों और अंतरराष्ट्रीय व्यापार के बीच संतुलन बना रहे।

    इससे पहले भी इसी वर्ष मार्च में निर्यात शुल्क प्रणाली को लागू किया गया था, जिसका उद्देश्य निर्यात प्रवाह को नियंत्रित करना और घरेलू खपत के लिए पर्याप्त भंडार सुनिश्चित करना था। मई में हुए पिछले संशोधन के बाद अब एक बार फिर नई दरों की घोषणा की गई है, जो अंतरराष्ट्रीय बाजार की मौजूदा परिस्थितियों के अनुरूप मानी जा रही हैं।

    विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे नीतिगत निर्णय भारत की ऊर्जा सुरक्षा रणनीति को मजबूत करते हैं और वैश्विक बाजार में अस्थिरता के बीच घरेलू अर्थव्यवस्था को सुरक्षित रखने में मदद करते हैं। आने वाले समय में तेल कीमतों और अंतरराष्ट्रीय हालात के आधार पर इस नीति में और बदलाव संभव हैं, क्योंकि सरकार हर पखवाड़े समीक्षा प्रक्रिया के जरिए स्थिति पर लगातार नजर बनाए रखती है।

  • 10 दिनों में तीसरी बढ़ोतरी: CNG 81 रुपये के पार, पेट्रोल-डीजल भी हुआ महंगा, ट्रांसपोर्ट सेक्टर पर असर

    10 दिनों में तीसरी बढ़ोतरी: CNG 81 रुपये के पार, पेट्रोल-डीजल भी हुआ महंगा, ट्रांसपोर्ट सेक्टर पर असर


    नई दिल्ली । राजधानी दिल्ली और एनसीआर में ईंधन की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी का सिलसिला जारी है। शनिवार को सीएनजी के दामों में 1 रुपये प्रति किलो की बढ़ोतरी की गई, जिसके बाद नई कीमत 81 रुपये प्रति किलो से ऊपर पहुंच गई है। यह पिछले कुछ दिनों में तीसरी बार है जब सीएनजी के रेट में बदलाव किया गया है, जिससे आम उपभोक्ताओं और ट्रांसपोर्ट सेक्टर पर सीधा असर देखने को मिल रहा है।

    Indraprastha Gas Limited के अनुसार दिल्ली में सीएनजी की नई कीमत 80.09 रुपये से बढ़कर 81.09 रुपये प्रति किलो हो गई है। वहीं नोएडा, ग्रेटर नोएडा और गाजियाबाद में कीमतें और अधिक बढ़कर करीब 89.70 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गई हैं। गुरुग्राम में भी सीएनजी के दाम 86 रुपये से अधिक हो गए हैं।

    पिछले 10 दिनों में ईंधन की कीमतों में यह तीसरी बार बढ़ोतरी है। इससे पहले 15 मई को 2 रुपये और 17 मई को 1 रुपये प्रति किलो की बढ़ोतरी की गई थी। लगातार हो रही इस वृद्धि ने ऑटो, टैक्सी और कमर्शियल वाहनों के संचालन पर दबाव बढ़ा दिया है।

    सीएनजी के साथ-साथ पेट्रोल और डीजल की कीमतों में भी बढ़ोतरी दर्ज की गई है। पेट्रोल में करीब 87 पैसे प्रति लीटर और डीजल में 91 पैसे प्रति लीटर की वृद्धि हुई है। दिल्ली में पेट्रोल की कीमत अब लगभग 99.51 रुपये प्रति लीटर और डीजल 92.49 रुपये प्रति लीटर तक पहुंच गया है।

    इस बढ़ोतरी का असर देश के अन्य बड़े शहरों में भी देखने को मिला है, जहां कोलकाता और मुंबई में भी ईंधन के दाम बढ़े हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव का सीधा असर घरेलू ईंधन कीमतों पर पड़ रहा है।

    ईंधन महंगा होने से परिवहन लागत बढ़ने की संभावना है, जिसका असर अंततः रोजमर्रा की वस्तुओं की कीमतों और महंगाई पर पड़ सकता है। वहीं सरकार की ओर से कहा गया है कि वैश्विक परिस्थितियों के बावजूद कीमतों को संतुलित रखने की कोशिश की जा रही है।

  • पेट्रोल-डीजल कीमतों में बढ़ोतरी पर सियासत तेज, राहुल गांधी बोले—गलती सरकार की, बोझ जनता पर

    पेट्रोल-डीजल कीमतों में बढ़ोतरी पर सियासत तेज, राहुल गांधी बोले—गलती सरकार की, बोझ जनता पर

    नई दिल्ली । पेट्रोल और डीजल की कीमतों में हाल ही में हुई बढ़ोतरी के बाद देश में राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है। ईंधन के दाम बढ़ने को लेकर विपक्ष ने सरकार पर तीखा हमला बोला है और इसे सीधे तौर पर आम जनता पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ बताया है। इस मुद्दे पर कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं ने सरकार की नीतियों पर सवाल उठाते हुए कहा है कि इसका सीधा असर देश की महंगाई पर पड़ेगा और इसका खामियाजा आम लोगों को उठाना पड़ेगा।

    कांग्रेस के वरिष्ठ नेता राहुल गांधी ने इस बढ़ोतरी को लेकर सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि फैसले सरकार के होते हैं, लेकिन उसकी कीमत जनता को चुकानी पड़ती है। उन्होंने यह भी टिप्पणी की कि ईंधन की कीमतों में पहले से ही असर दिखना शुरू हो गया है और आगे चलकर इसका बोझ और बढ़ सकता है। उनके अनुसार, इस तरह के फैसले आम नागरिकों की जेब पर सीधा असर डालते हैं और महंगाई को और बढ़ाते हैं।

    इसी मुद्दे पर कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने भी सरकार की आर्थिक नीतियों की आलोचना की। उन्होंने आरोप लगाया कि देश में आर्थिक चुनौतियों के पीछे नेतृत्व की कमी और दीर्घकालिक दृष्टिकोण का अभाव है। उनके मुताबिक, ईंधन की कीमतों में बढ़ोतरी से आम जनता पर अतिरिक्त दबाव बनता है और यह स्थिति सरकार की नीतिगत विफलता को दर्शाती है।

    पार्टी के अन्य नेताओं ने भी इस मुद्दे पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव का असर आम उपभोक्ताओं तक सही तरीके से नहीं पहुंचाया गया है। उनका दावा है कि जब वैश्विक स्तर पर कीमतें कम थीं, तब उसका लाभ जनता को नहीं मिला, और अब जब कीमतें बढ़ रही हैं, तो उसका बोझ सीधे लोगों पर डाला जा रहा है।

    सरकारी तेल कंपनियों द्वारा लंबे समय के बाद ईंधन कीमतों में संशोधन किए जाने के बाद यह मुद्दा और अधिक गर्म हो गया है। दिल्ली समेत कई शहरों में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी दर्ज की गई है, जिससे आम उपभोक्ताओं के बजट पर असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है।

    विपक्ष का कहना है कि ईंधन की कीमतों में इस तरह की बढ़ोतरी का सीधा असर परिवहन लागत और रोजमर्रा की वस्तुओं की कीमतों पर पड़ता है, जिससे महंगाई और अधिक बढ़ सकती है। वहीं सरकार की ओर से इस पर आर्थिक परिस्थितियों और वैश्विक बाजार के प्रभावों को कारण बताया जा रहा है।

  • पीएम की अपील पर सवाल: 9 BJP नेताओं ने निकाले काफिले, एक पर कार्रवाई से उठा विवाद

    पीएम की अपील पर सवाल: 9 BJP नेताओं ने निकाले काफिले, एक पर कार्रवाई से उठा विवाद


    नई दिल्ली । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा देश में ईंधन के संयमित उपयोग और पब्लिक ट्रांसपोर्ट अपनाने की अपील के बाद मध्य प्रदेश में सियासी हलचल तेज हो गई है। पीएम ने हाल ही में देशवासियों से कार पूलिंग, मेट्रो और सार्वजनिक परिवहन के अधिक उपयोग की बात कही थी, ताकि वैश्विक परिस्थितियों में संसाधनों की बचत की जा सके।

    हालांकि, इस अपील के बाद भी राज्य में कई नेताओं के बड़े-बड़े काफिले निकलते नजर आए हैं। रिपोर्ट के अनुसार, प्रदेश के अलग-अलग जिलों से ऐसे कई मामले सामने आए हैं जहां दर्जनों से लेकर सैकड़ों वाहनों के काफिले के साथ नेताओं ने शक्ति प्रदर्शन किया।

    कुछ मामलों में पार्टी स्तर पर कार्रवाई भी हुई है। भिंड में किसान मोर्चा के जिला अध्यक्ष को पद से हटा दिया गया, क्योंकि वे लगभग 100 वाहनों के काफिले और बग्घी के साथ कार्यक्रम में पहुंचे थे। वहीं, पाठ्यपुस्तक निगम के अध्यक्ष पर भी कार्रवाई करते हुए उनका अधिकार सीमित कर दिया गया, जब उन्होंने उज्जैन से भोपाल तक करीब 700 वाहनों का काफिला निकाला, जिससे लंबा ट्रैफिक जाम लग गया।

    लेकिन कई अन्य मामलों में अब तक कोई बड़ी कार्रवाई नहीं की गई है। कुछ विधायकों और मोर्चा पदाधिकारियों पर भी इसी तरह के काफिलों के आरोप लगे हैं, जहां 200 से अधिक गाड़ियों के साथ रैलियां निकाली गईं। इनमें मंदिर दर्शन, स्वागत कार्यक्रम और पार्टी आयोजनों के दौरान शक्ति प्रदर्शन के दृश्य सामने आए हैं।

    वहीं दूसरी ओर कुछ उदाहरण ऐसे भी सामने आए हैं जो अलग संदेश देते हैं, जैसे एक मंत्री द्वारा बस से यात्रा कर आम लोगों के बीच पहुंचना और ईंधन बचत की अपील को समर्थन देना।

    इस पूरे मामले ने राजनीतिक बहस को जन्म दे दिया है। विपक्ष का आरोप है कि जहां एक तरफ जनता से संयम की अपील की जा रही है, वहीं दूसरी तरफ वीआईपी संस्कृति में कोई बदलाव नहीं दिख रहा। सोशल मीडिया पर भी यह मुद्दा तेजी से वायरल हो रहा है और लोग नेताओं के इस दोहरे रवैये पर सवाल उठा रहे हैं।

    अब देखना होगा कि सरकार और पार्टी संगठन इस पर आगे क्या सख्त कदम उठाते हैं, या यह विवाद सिर्फ नोटिस और बयानबाजी तक सीमित रह जाता है।