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  • ‘24 घंटे में सरकार गिराने का था प्लान, लेकिन…’, ईरानी राष्ट्रपति पेजेश्कियन ने ट्रंप को सुनाया

    ‘24 घंटे में सरकार गिराने का था प्लान, लेकिन…’, ईरानी राष्ट्रपति पेजेश्कियन ने ट्रंप को सुनाया

    तेहरान। ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन ने अमेरिका की डोनाल्ड ट्रंप सरकार पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने दावा किया कि अमेरिका को उम्मीद थी कि वह महज 24 घंटे में ईरान की मौजूदा सरकार को गिराकर अपनी पसंद की नई सरकार स्थापित कर देगा, लेकिन उसका यह अनुमान पूरी तरह गलत साबित हुआ। पेजेश्कियन के मुताबिक, अमेरिका ने ईरान की सैन्य क्षमता के साथ-साथ वहां के लोगों के हौसले और एकजुटता को भी कम करके आंका।

    एक इंटरव्यू में ईरानी राष्ट्रपति ने कहा कि अमेरिका को लगता था कि ईरान के शीर्ष नेताओं, सैन्य कमांडरों और महत्वपूर्ण ठिकानों पर हमले करने के बाद जनता सरकार के खिलाफ खड़ी हो जाएगी। उनका दावा है कि इसके उलट हमलों के बाद बड़ी संख्या में लोग सरकार और देश की एकता के समर्थन में सड़कों पर उतर आए।

    वेनेजुएला और सीरिया जैसा मॉडल अपनाने का आरोप

    पेजेश्कियन ने आरोप लगाया कि अमेरिका ने ईरान के मामले में वेनेजुएला जैसा रास्ता अपनाने की कोशिश की। उन्हें लगा कि सैन्य कार्रवाई के जरिए 24 घंटे के भीतर ईरान पर नियंत्रण हासिल किया जा सकता है और इसके बाद अपनी पसंद की सरकार बनाई जा सकती है।

    उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिका को ईरान में सीरिया जैसी स्थिति पैदा होने की उम्मीद थी। अमेरिकी आकलन था कि ईरान के सुप्रीम लीडर, सैन्य कमांडरों और वरिष्ठ अधिकारियों की मौत के बाद सरकार कमजोर पड़ जाएगी और कुछ ही दिनों में सत्ता परिवर्तन हो जाएगा। हालांकि, पेजेश्कियन के मुताबिक ऐसा नहीं हुआ।

    हमलों के बाद और मजबूत हुई एकजुटता

    ईरानी राष्ट्रपति ने दावा किया कि अमेरिकी हमलों के बाद देश के लोग पहले की तुलना में और अधिक एकजुट हो गए। यहां तक कि सरकार से नाराज रहने वाले कुछ लोगों ने भी देश की जमीन और राष्ट्रीय एकता की रक्षा के लिए सरकार का साथ दिया।

    पेजेश्कियन ने कहा कि इस संघर्ष ने ईरान के भीतर एकता को मजबूत किया है। उन्होंने यह भी दावा किया कि विदेशों में रह रहे कुछ ईरानी नागरिक हमलों के बाद अपने देश वापस लौट आए।

    उनके मुताबिक, ईरान की सरकार, सेना और जनता ने मिलकर अमेरिका के दबाव का सामना किया और देश के खिलाफ बनाई गई रणनीति को सफल नहीं होने दिया।

    सैन्य ताकत के बावजूद ईरान के सामने नहीं झुका

    पेजेश्कियन ने कहा कि अमेरिका ने शुरुआत में सैन्य शक्ति के दम पर ईरान की सरकार को गिराने की कोशिश की, लेकिन वह इसमें सफल नहीं हुआ। इसके बाद ईरान के महत्वपूर्ण ढांचे और ठिकानों को निशाना बनाया गया, फिर भी अमेरिका अपने लक्ष्य हासिल नहीं कर सका।

    उन्होंने कहा कि ईरान ने अत्याधुनिक सैन्य तकनीक से लैस ताकत के सामने भी मुकाबला जारी रखा। पेजेश्कियन ने जोर देकर कहा कि किसी देश की ताकत का आकलन केवल उसके हथियारों और सैन्य तकनीक के आधार पर नहीं किया जा सकता।

    अमेरिका पर खाद्य और दवाओं की सप्लाई रोकने का आरोप

    ईरानी राष्ट्रपति ने अमेरिका पर ईरान में जरूरी सामान, भोजन और दवाओं की आवाजाही बाधित करने का भी आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि अमेरिका समुद्री रास्तों को रोकने की कोशिश कर रहा है और जमीन के रास्तों को भी बंद करने का प्रयास किया जा रहा है।

    पेजेश्कियन के मुताबिक, इन तमाम दबावों के बावजूद ईरान की सरकार, सेना और जनता ने मिलकर परिस्थितियों का सामना किया और देश की एकता को बनाए रखा।

  • मोदी-पेजेशकियन की मुलाकात पर अमेरिका बोला-भारत-ईरान के बीच कोई व्यापार समझौता नहीं….

    मोदी-पेजेशकियन की मुलाकात पर अमेरिका बोला-भारत-ईरान के बीच कोई व्यापार समझौता नहीं….


    वॉशिंगटन
    । अमेरिका (America) के विदेश मंत्री मार्को रूबियो (Foreign Minister Marco Rubio) ने बुधवार को कहा कि उन्हें नहीं लगता कि भारत और ईरान (India and Iran) के बीच किसी व्यापार समझौते (Trade Agreement) को लेकर बातचीत हो रही है। उन्होंने कहा कि दुनिया के कई देश ईरान की सरकार से बातचीत करते हैं। रूबियो ने यह टिप्पणी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Prime Minister Narendra Modi) और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन (Iranian President Masoud Pezeshkian) के बीच बिश्केक में शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) शिखर सम्मेलन से इतर हुई मुलाकात को लेकर पूछे गए सवाल के जवाब में की। यह सवाल फॉक्स न्यूज रेडियो के ‘द ब्रायन किल्मीड शो’ में उनसे पूछा गया था।

    कार्यक्रम के दौरान प्रस्तोता ब्रायन किल्मीड ने कहा कि पीएम मोदी और पेजेशकियन की मुलाकात में ऐसा लगा कि दोनों देशों के बीच व्यापार समझौते की तैयारी हो रही है। इसके जवाब में रूबियो ने कहा, ”खैर, मुझे नहीं लगता कि भारत और ईरान के बीच कोई व्यापार समझौता है। जाहिर तौर पर, सभी देश अपनी-अपनी विदेश नीति तय करते हैं और दुनिया के कई देश ईरान की सरकार से बातचीत करते हैं।”


    ईरान की मदद करने वाले देशों पर अमेरिका क्या करेगा कार्रवाई?

    अमेरिकी विदेश मंत्री ने कहा, ”मेरा मतलब है कि हम भी ईरान की सरकार के कुछ लोगों के साथ मिले हैं। कुछ चर्चाओं के संदर्भ में हमारी उनसे बातचीत और संपर्क हुआ है।” रूबियो ने कहा कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने यह स्पष्ट कर दिया है कि किसी भी देश को ईरान को अमेरिकी प्रतिबंधों से बचने में मदद नहीं करनी चाहिए।

    उन्होंने कहा, ”किसी भी देश को ऐसे तंत्र बनाने में उनकी मदद नहीं करनी चाहिए, जिनके जरिए वे राजस्व जुटा सकें और फिर उसका इस्तेमाल आतंकवाद को बढ़ावा देने के साथ परमाणु हथियार बनाने की कोशिश में कर सकें। और अगर देश ऐसा करने का फैसला करते हैं, तो हमें उन पर भी प्रतिबंध लगाना पड़ेगा।”


    पीएम मोदी से पेजेशकियन ने क्यों की मुलाकात?

    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 31 अगस्त को किर्गिस्तान की राजधानी बिश्केक में शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) शिखर सम्मेलन से इतर ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन के साथ बैठक की थी। ईरान की अर्द्ध सरकारी एजेंसी की रिपोर्ट के मुताबिक, बैठक के दौरान दोनों पक्षों ने आपसी रिश्तों की मौजूदा स्थिति का जायजा लिया और दोनों देशों के लिए अहम क्षेत्रों में ईरान और भारत के बीच आपसी सहयोग को मजबूत करने की जरूरत पर बल दिया गया।

    पश्चिम एशिया संकट के बीच दोनों शीर्ष नेताओं में संवाद कायम रहा है। जून में, पीएम मोदी और पेजेशकियन के बीच फोन पर बातचीत हुई थी, जिसमें ईरानी राष्ट्रपति ने भारतीय पीएम को पश्चिम एशिया में हो रही घटनाओं और आगे की राह के बारे में जानकारी दी थी। बातचीत के दौरान, पीएम मोदी ने संघर्ष खत्म करने के लिए बनी सहमति का स्वागत किया था और स्थायी शांति और स्थिरता के लिए लगातार कोशिशों की जरूरत को दोहराया।

  • होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर ईरान में बढ़े मतभेद, सैन्य नेतृत्व और सरकार के अलग-अलग रुख से पश्चिम एशिया में तनाव गहराने के संकेत

    होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर ईरान में बढ़े मतभेद, सैन्य नेतृत्व और सरकार के अलग-अलग रुख से पश्चिम एशिया में तनाव गहराने के संकेत

    नई दिल्ली । पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर ईरान के भीतर नीतिगत मतभेदों की चर्चाओं ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय का ध्यान अपनी ओर खींचा है। विश्लेषकों का मानना है कि एक ओर ईरान के सैन्य प्रतिष्ठान का रुख अधिक सख्त दिखाई दे रहा है, जबकि दूसरी ओर राजनीतिक नेतृत्व कूटनीतिक प्रयासों के जरिए तनाव कम करने की दिशा में आगे बढ़ने की वकालत कर रहा है। इन अलग-अलग संकेतों के कारण क्षेत्र की सुरक्षा स्थिति और वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को लेकर चिंताएं बढ़ गई हैं।

    होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापारिक मार्गों में गिना जाता है। खाड़ी क्षेत्र से निकलने वाले कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस का बड़ा हिस्सा इसी मार्ग से होकर अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंचता है। ऐसे में इस जलमार्ग से जुड़ी किसी भी संभावित बाधा का प्रभाव केवल क्षेत्रीय देशों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि एशिया, यूरोप और अन्य प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं पर भी पड़ सकता है।

    राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार ईरान के भीतर सुरक्षा और विदेश नीति को लेकर अलग-अलग दृष्टिकोण देखने को मिल रहे हैं। एक पक्ष का मानना है कि होर्मुज जलडमरूमध्य पर रणनीतिक नियंत्रण बनाए रखना देश की सुरक्षा और क्षेत्रीय प्रभाव के लिए महत्वपूर्ण है। वहीं दूसरा पक्ष क्षेत्रीय तनाव को कम करने, संवाद को प्राथमिकता देने और कूटनीतिक समाधान तलाशने की आवश्यकता पर जोर देता है ताकि व्यापक संघर्ष की आशंका को टाला जा सके।

    विशेषज्ञों का कहना है कि यदि क्षेत्र में तनाव और बढ़ता है तथा समुद्री व्यापार प्रभावित होता है, तो वैश्विक ऊर्जा बाजार में अस्थिरता बढ़ सकती है। कच्चे तेल की आपूर्ति बाधित होने की स्थिति में अंतरराष्ट्रीय कीमतों में तेजी आने की संभावना रहती है। इसका असर ऊर्जा आयात पर निर्भर देशों की अर्थव्यवस्था, परिवहन लागत और महंगाई पर भी पड़ सकता है।

    अमेरिका पहले भी स्पष्ट कर चुका है कि होर्मुज जलडमरूमध्य वैश्विक समुद्री व्यापार के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण मार्ग है और इसके निर्बाध संचालन को बनाए रखना आवश्यक माना जाता है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी अधिकांश देश इस समुद्री मार्ग में किसी प्रकार की बाधा से बचने और क्षेत्र में स्थिरता बनाए रखने की आवश्यकता पर बल देते रहे हैं।

    भारत जैसे देशों के लिए भी यह जलमार्ग विशेष महत्व रखता है क्योंकि देश अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं का बड़ा हिस्सा आयात के माध्यम से पूरा करता है। पश्चिम एशिया से आने वाला पर्याप्त मात्रा में कच्चा तेल और गैस इसी समुद्री मार्ग से भारत सहित अन्य एशियाई देशों तक पहुंचता है। ऐसे में यदि किसी कारण से आपूर्ति प्रभावित होती है तो इसका असर घरेलू ईंधन कीमतों, उद्योगों और आर्थिक गतिविधियों पर भी देखने को मिल सकता है।

    अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकारों का मानना है कि मौजूदा परिस्थितियों में सभी पक्षों के लिए संवाद और कूटनीतिक प्रयास सबसे प्रभावी विकल्प हो सकते हैं। यदि बातचीत के जरिए तनाव कम करने की दिशा में प्रगति होती है तो क्षेत्रीय स्थिरता बनाए रखने में मदद मिल सकती है। वहीं किसी भी प्रकार का सैन्य टकराव या समुद्री मार्ग में व्यवधान वैश्विक व्यापार और ऊर्जा सुरक्षा के लिए नई चुनौतियां खड़ी कर सकता है।