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  • EPF और EPS में क्या है अंतर? रिटायरमेंट से पहले समझ लें पूरा गणित

    EPF और EPS में क्या है अंतर? रिटायरमेंट से पहले समझ लें पूरा गणित


    नई दिल्ली। नौकरीपेशा लोगों की सैलरी स्लिप में हर महीने PF यानी प्रोविडेंट फंड की कटौती जरूर दिखाई देती है, लेकिन ज्यादातर कर्मचारियों को यह नहीं पता होता कि यह पैसा आखिर कहां जमा होता है और रिटायरमेंट के समय इससे कितना फायदा मिलता है। दरअसल, PF केवल एक सेविंग स्कीम नहीं, बल्कि भविष्य की आर्थिक सुरक्षा और पेंशन का मजबूत आधार है। यही वजह है कि लंबे समय तक नौकरी करने वालों के लिए EPF और EPS दोनों बेहद महत्वपूर्ण माने जाते हैं।

    कर्मचारियों की बेसिक सैलरी और डीए का 12 प्रतिशत हिस्सा हर महीने PF के रूप में काटा जाता है। इतनी ही राशि कंपनी की ओर से भी जमा की जाती है। हालांकि, कंपनी का पूरा 12 प्रतिशत सीधे EPF खाते में नहीं जाता। यही वह हिस्सा है जिसे लेकर अधिकांश कर्मचारियों के मन में भ्रम रहता है।

    कर्मचारी के योगदान का पूरा 12 प्रतिशत Employees’ Provident Fund यानी EPF खाते में जमा होता है। वहीं कंपनी के 12 प्रतिशत योगदान में से केवल 3.67 प्रतिशत EPF में जाता है, जबकि 8.33 प्रतिशत हिस्सा Employees’ Pension Scheme यानी EPS में ट्रांसफर कर दिया जाता है। EPS का मकसद कर्मचारियों को रिटायरमेंट के बाद हर महीने पेंशन उपलब्ध कराना होता है।

    अगर किसी कर्मचारी की बेसिक सैलरी 25 हजार रुपये है, तो कर्मचारी की ओर से हर महीने 3 हजार रुपये EPF में जमा होंगे। कंपनी भी 3 हजार रुपये देगी, लेकिन इसमें से करीब 1,250 रुपये EPS में चले जाएंगे और बाकी राशि EPF खाते में जुड़ जाएगी। यानी कर्मचारी के EPF अकाउंट में हर महीने कर्मचारी और कंपनी दोनों के हिस्से मिलाकर रकम जमा होती रहती है, जिस पर सालाना ब्याज भी मिलता है।

    फिलहाल EPFO कर्मचारियों के EPF बैलेंस पर करीब 8.25 प्रतिशत वार्षिक ब्याज दे रहा है। यही वजह है कि लंबे समय तक लगातार नौकरी करने पर PF का फंड लाखों से बढ़कर करोड़ों तक पहुंच सकता है। कंपाउंडिंग का फायदा इसमें सबसे बड़ा रोल निभाता है।

    वहीं EPS में जमा राशि पर ब्याज नहीं मिलता, क्योंकि यह पेंशन स्कीम के तहत संचालित होती है। हालांकि, 10 साल या उससे अधिक नौकरी करने वाले कर्मचारियों को 58 साल की उम्र के बाद मासिक पेंशन का लाभ मिलता है। पेंशन की राशि नौकरी की अवधि और सैलरी के आधार पर तय की जाती है।

    आजकल सोशल मीडिया और Reddit जैसे प्लेटफॉर्म्स पर भी लोग EPS को लेकर सवाल पूछते नजर आते हैं। कई कर्मचारियों को लगता है कि उनका EPS बैलेंस दिखाई क्यों नहीं देता। विशेषज्ञों के मुताबिक EPS राशि सीधे पेंशन फंड में मैनेज होती है, इसलिए यह सामान्य EPF बैलेंस की तरह अलग से नहीं दिखती।

    कुल मिलाकर, PF केवल सैलरी से होने वाली कटौती नहीं, बल्कि रिटायरमेंट के बाद आर्थिक मजबूती का बड़ा सहारा है। सही जानकारी और लंबी अवधि तक नियमित निवेश से यही छोटी कटौती भविष्य में बड़ी वित्तीय सुरक्षा में बदल सकती है।

  • EPFO ने बदले नियम: नौकरी बदलने और बीमा राशि में बड़ा बदलाव, कर्मचारियों को मिलेगा सीधा लाभ

    EPFO ने बदले नियम: नौकरी बदलने और बीमा राशि में बड़ा बदलाव, कर्मचारियों को मिलेगा सीधा लाभ


    नई दिल्ली । कर्मचारी भविष्य निधि संगठन ने हाल ही में नौकरी बदलने से संबंधित नियमों में महत्वपूर्ण बदलाव किए हैं जिसका असर लाखों कर्मचारियों और उनके परिवारों पर पड़ेगा। EPFO ने स्पष्ट किया है कि अब दो नौकरियों के बीच 60 दिनों तक का अंतराल होने पर भी कर्मचारी की सेवा को निरंतर माना जाएगा यानी नौकरी छोड़ने के बाद यदि कोई कर्मचारी 60 दिनों के भीतर दूसरी नौकरी जॉइन करता है तो उसकी सेवा को ब्रेक नहीं माना जाएगा।

    नौकरी बदलते वक्त अक्सर कर्मचारियों को डर रहता है कि कहीं उनका पीएफ सर्विस रिकॉर्ड या बीमा लाभ प्रभावित न हो जाए। पहले दो-चार दिन के गैप या वीकेंड की छुट्टियों के कारण कर्मचारियों को कई बार नुकसान उठाना पड़ा था। अब EPFO ने इस चिंता को दूर करते हुए नए नियम जारी किए हैं जो कर्मचारियों के लिए एक बड़ी राहत हैं।

    बीमा लाभ में मिली राहत

    नए नियमों के तहत अगर किसी EPFO सदस्य की मृत्यु आखिरी पीएफ योगदान मिलने के 60 दिनों के भीतर हो जाती है और वह कर्मचारी कंपनी के रिकॉर्ड में दर्ज था तो उसके परिवार को बीमा लाभ मिलेगा। पहले ऐसे मामलों में सेवा ब्रेक का हवाला देकर बीमा दावे को खारिज कर दिया जाता था लेकिन अब यह फायदा कर्मचारियों के परिवारों को मिलेगा।

    वीकेंड ब्रेक को खत्म किया

    EPFO ने यह भी स्पष्ट किया है कि नौकरी बदलते वक्त आने वाले शनिवार रविवार या अन्य राजपत्रित अवकाश को अब सेवा ब्रेक नहीं माना जाएगा। इसका मतलब यह है कि अगर कर्मचारी किसी शुक्रवार को पुरानी कंपनी छोड़ता है और वीकेंड या छुट्टी के बाद नई कंपनी जॉइन करता है तो इस अंतराल को भी लगातार सेवा में गिना जाएगा। पहले ऐसे मामलों में कर्मचारियों के परिवारों को EDLI योजना का लाभ नहीं मिलता था लेकिन अब यह समस्या हल हो गई है।

    न्यूनतम बीमा राशि बढ़ी

    EPFO ने न्यूनतम बीमा राशि को लेकर भी महत्वपूर्ण बदलाव किए हैं। अब ऐसे कर्मचारियों के आश्रितों को भी कम से कम 50000 रुपये का बीमा लाभ मिलेगा जिन्होंने मृत्यु से पहले लगातार 12 महीने काम नहीं किया था या जिनके पीएफ खाते में 50000 रुपये से कम बैलेंस था। पहले इन मामलों में परिवारों को बहुत कम या कोई बीमा लाभ नहीं मिल पाता था लेकिन अब यह राशि बढ़ा दी गई है।

    मंत्रालय की पहल

    यह बदलाव श्रम और रोजगार मंत्रालय की पहल पर हुआ है। मंत्रालय को कई ऐसे मामले मिले थे जहां नौकरी बदलने के दौरान कर्मचारी की मृत्यु हो जाने के बावजूद तकनीकी कारणों से उनके परिवारों को बीमा लाभ से वंचित रहना पड़ा था। मंत्रालय ने इस मुद्दे को गंभीरता से लिया और EPFO द्वारा नियमों में बदलाव किए गए।

    इन बदलावों से कर्मचारियों को काफी राहत मिलेगी और उनके परिवारों को बीमा लाभ प्राप्त करने में किसी तरह की परेशानी का सामना नहीं करना पड़ेगा। यह कदम सामाजिक सुरक्षा की दिशा में एक मजबूत कदम माना जा रहा है जो नौकरीपेशा लोगों के लिए एक बड़ी राहत साबित होगा। इस बदलाव के बाद कर्मचारी नौकरी बदलते वक्त अब पहले से अधिक सुरक्षित महसूस करेंगे खासकर जब बीमा और पीएफ जैसे महत्वपूर्ण लाभ की बात आती है। EPFO द्वारा किया गया यह कदम कर्मचारियों की सामाजिक सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए उठाया गया है।