Tag: Pind Daan

  • द्वितीया तिथि का श्राद्ध आज, जानें तर्पण-पिंडदान का शुभ समय और विधि

    द्वितीया तिथि का श्राद्ध आज, जानें तर्पण-पिंडदान का शुभ समय और विधि

    नई दिल्ली। पितृपक्ष के दौरान सोमवार, 28 सितंबर को द्वितीया तिथि का श्राद्ध किया जाएगा। हिंदू पंचांग के अनुसार जिन पितरों का निधन किसी भी महीने के कृष्ण या शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को हुआ हो, उनका श्राद्ध इस दिन करने की परंपरा है। पितरों की आत्मा की शांति और उनकी कृपा प्राप्त करने के लिए इस दिन श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान जैसे धार्मिक अनुष्ठान किए जाते हैं।

    धार्मिक मान्यता के अनुसार चावल, दूध, शहद, घी और काले तिल से तैयार पिंड पितरों को अर्पित करने से उन्हें शांति मिलती है और उनका आशीर्वाद परिवार पर बना रहता है।

    28 सितंबर को ही होगा द्वितीया श्राद्ध

    आश्विन कृष्ण द्वितीया तिथि की शुरुआत 27 सितंबर की रात 8 बजकर 58 मिनट पर हुई और यह 28 सितंबर की शाम 7 बजकर 13 मिनट तक रहेगी। उदिया तिथि के अनुसार द्वितीया तिथि का श्राद्ध 28 सितंबर, सोमवार को किया जाएगा।

    श्राद्ध और तर्पण का श्रेष्ठ समय

    शास्त्रों में पितरों के श्राद्ध और तर्पण के लिए कुतुप वेला को विशेष रूप से शुभ माना गया है। यह समय दोपहर के आसपास आता है। 28 सितंबर को कुतुप काल सुबह 11 बजकर 48 मिनट से दोपहर 12 बजकर 36 मिनट तक रहेगा।

    हालांकि, कुतुप वेला का समय अलग-अलग शहरों में थोड़ा अलग हो सकता है। इसलिए अपने स्थानीय पंचांग के अनुसार श्राद्ध का समय निर्धारित करना उचित माना जाता है।

    कैसे करें द्वितीया तिथि का श्राद्ध?

    द्वितीया तिथि के श्राद्ध में आटा, चावल या जौ से गोल पिंड तैयार कर पितरों को अर्पित करने की परंपरा है। पिंडदान के बाद जल में काले तिल मिलाकर पितरों का तर्पण किया जाता है।

    तर्पण करते समय हाथ में कुश रखना भी धार्मिक विधि का हिस्सा माना जाता है। कुश एक प्रकार की पवित्र घास है, जिसकी अंगूठी बनाकर दाएं हाथ की अनामिका उंगली में धारण किया जाता है।

    श्राद्ध कर्म पूरा होने के बाद जरूरतमंद ब्राह्मणों को भोजन कराने और उन्हें दान-दक्षिणा देने की परंपरा है। अंत में पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की जाती है।

    पंचबलि का भी है विशेष महत्व

    श्राद्ध के दौरान गाय, कुत्ते, कौवे और चींटियों के लिए भोजन का एक हिस्सा अलग निकालकर रखने की परंपरा है। इसे पंचबलि कहा जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इन जीवों के माध्यम से पितरों तक भोजन पहुंचता है और वे प्रसन्न होते हैं।

    मान्यता के अनुसार पंचबलि और विधि-विधान से श्राद्ध करने से पितरों को शांति मिलती है तथा पितृ दोष से मुक्ति की कामना की जाती है।

  • शिवपुरी में पितृपक्ष शुरू होते ही बाणगंगा और भदैयाकुंड पर उमड़ी भीड़, पूर्वजों के लिए हुआ तर्पण-पिंडदान

    शिवपुरी में पितृपक्ष शुरू होते ही बाणगंगा और भदैयाकुंड पर उमड़ी भीड़, पूर्वजों के लिए हुआ तर्पण-पिंडदान


    शिवपुरी । शिवपुरी में पितृपक्ष की शुरुआत के साथ ही शनिवार को धार्मिक स्थलों पर श्रद्धालुओं की आवाजाही बढ़ गई। शहर के प्रमुख बाणगंगा और भदैयाकुंड घाट पर सुबह से ही लोग अपने पूर्वजों के निमित्त पूजा और धार्मिक अनुष्ठान करने पहुंचने लगे। सुबह करीब 7 बजे से दोनों स्थानों पर श्रद्धालुओं का आना शुरू हो गया था। परिवार के लोग पूजा सामग्री लेकर घाटों पर पहुंचे और पंडितों की देखरेख में तर्पण श्राद्ध और पिंडदान की विधि पूरी की।

    पितृपक्ष को हिंदू परंपरा में पूर्वजों के स्मरण और उनके निमित्त धार्मिक कर्मकांड करने का विशेष समय माना जाता है। इसी मान्यता के चलते शिवपुरी में भी कई परिवार अपने पितरों के लिए निर्धारित तिथि के अनुसार अनुष्ठान करने पहुंचे। घाटों पर लोगों ने स्नान और पूजा के बाद पितरों को जल अर्पित किया। इसके साथ ही पिंडदान और श्राद्ध कर्म भी किए गए।

    सुबह के समय बाणगंगा और भदैयाकुंड दोनों स्थानों पर श्रद्धालुओं की संख्या लगातार बढ़ती गई। अलग अलग क्षेत्रों से परिवारों के पहुंचने का सिलसिला जारी रहा। कई लोग अपने साथ पूजा सामग्री लेकर पहुंचे थे। घाटों पर पंडितों की मौजूदगी में मंत्रोच्चार के साथ कर्मकांड संपन्न कराया गया। परिवार के सदस्यों ने पूर्वजों को याद करते हुए उनकी आत्मा की शांति और परिवार की सुख समृद्धि की कामना की।

    पंडित शिव नारायण शर्मा के अनुसार पितृपक्ष में अपनी परंपरा और पूर्वजों की तिथि के अनुसार श्राद्ध और तर्पण करने की धार्मिक मान्यता है। इस दौरान परिवार अपने पितरों के निमित्त जल अर्पित करते हैं और निर्धारित विधि से पूजा करते हैं। उन्होंने बताया कि पितृपक्ष के दौरान अलग अलग तिथियों पर पूर्वजों के लिए कर्मकांड किए जाते हैं।

    इस वर्ष पितृपक्ष की शुरुआत 26 सितंबर से हुई है और यह 10 अक्टूबर तक चलेगा। इस अवधि में श्रद्धालु अपने पूर्वजों की मृत्यु तिथि के अनुसार संबंधित श्राद्ध तिथि पर तर्पण और अन्य धार्मिक अनुष्ठान कर सकते हैं। कई परिवारों के लिए पितृपक्ष का पहला दिन विशेष महत्व रखता है और इसी वजह से पहले दिन भी घाटों पर अच्छी संख्या में श्रद्धालु पहुंचे।

    शिवपुरी के बाणगंगा और भदैयाकुंड पर सुबह से बढ़ती भीड़ के बीच धार्मिक वातावरण बना रहा। घाटों पर परिवारों के समूह दिखाई दिए जो अपने पूर्वजों के निमित्त पूजा करते नजर आए। जैसे जैसे दिन आगे बढ़ा वैसे वैसे दोनों स्थानों पर लोगों की आवाजाही बढ़ती गई।

    पितृपक्ष के दौरान शिवपुरी में आने वाले दिनों में भी इन धार्मिक स्थलों पर श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ने की संभावना है। अलग अलग तिथियों पर लोग अपने पूर्वजों के लिए निर्धारित श्राद्ध कर्म करेंगे। इस दौरान तर्पण पिंडदान और श्राद्ध जैसे अनुष्ठानों के जरिए परिवार अपने पितरों का स्मरण करेंगे और उनकी आत्मा की शांति की कामना करेंगे।

  • गरुड़ पुराण के रहस्य: जानिए मृत्यु के बाद 13 दिन तक क्यों निभाए जाते हैं सूतक और पिंडदान के नियम?

    गरुड़ पुराण के रहस्य: जानिए मृत्यु के बाद 13 दिन तक क्यों निभाए जाते हैं सूतक और पिंडदान के नियम?

    नई दिल्ली। सनातन धर्म में मृत्यु को जीवन का अटल सत्य माना गया है, जिसे कोई टाल नहीं सकता। लेकिन मृत्यु के बाद आत्मा की यात्रा कैसी होती है, यह जिज्ञासा हर व्यक्ति के मन में रहती है। गरुड़ पुराण में मृत्यु और उसके बाद की स्थिति को विस्तार से बताया गया है। इसके अनुसार, जैसे ही शरीर से प्राण निकलते हैं, आत्मा की यात्रा शुरू हो जाती है। यही कारण है कि मृत्यु के बाद 13 दिनों तक सूतक और पिंडदान से जुड़े नियमों का पालन करना आवश्यक माना गया है।

    मृत्यु के बाद आत्मा की पहली अवस्था

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मृत्यु के तुरंत बाद यमदूत आत्मा को यमलोक ले जाते हैं, जहां उसे उसके कर्मों का लेखा-जोखा दिखाया जाता है। कुछ समय बाद आत्मा को वापस उसके घर लाया जाता है, ताकि वह अपने परिजनों को देख सके और अपने अंतिम संस्कार की प्रक्रिया का साक्षी बन सके।

    13 दिनों तक घर-परिवार के पास रहती है आत्मा
    गरुड़ पुराण के अनुसार, मृत्यु के बाद 13 दिनों तक आत्मा अपने घर और परिवार के आसपास ही रहती है। इस दौरान वह अपने प्रियजनों को देखती और उनकी बातें सुनती है, लेकिन उनसे संवाद नहीं कर पाती। यह समय आत्मा के लिए मोह और आत्मचिंतन का होता है, जिसमें वह अपने जीवन के कर्मों पर विचार करती है।

    पिंडदान का आध्यात्मिक महत्व
    धार्मिक मान्यता है कि परलोक की यात्रा लंबी और कठिन होती है। ऐसे में पिंडदान आत्मा के लिए उस यात्रा का आहार माना जाता है। जैसे कोई व्यक्ति लंबी यात्रा पर भोजन साथ ले जाता है, वैसे ही पिंडदान आत्मा को ऊर्जा और सहारा प्रदान करता है, जिससे वह यमलोक तक की यात्रा पूरी कर सके।

    तेरहवीं के बाद आत्मा को मिलती है मुक्ति की राह

    मृत्यु के 13वें दिन होने वाला तेरहवीं संस्कार बेहद महत्वपूर्ण माना गया है। इन 13 दिनों तक आत्मा सांसारिक मोह में बंधी रहती है। तेरहवीं के अनुष्ठान के बाद आत्मा को आगे बढ़ने की अनुमति मिलती है और वह इस संसार के बंधनों को छोड़कर अपनी अगली यात्रा पर निकल पड़ती है।

    शोक काल में गरुड़ पुराण पाठ की परंपरा

    मृत्यु के बाद शोक के दिनों में गरुड़ पुराण का पाठ करना परंपरा का हिस्सा है। माना जाता है कि इससे आत्मा को मोह त्यागने और आगे बढ़ने की प्रेरणा मिलती है, जिससे उसे शांति और मोक्ष की प्राप्ति होती है। साथ ही यह पाठ परिवार के सदस्यों को इस कठिन समय में मानसिक संबल भी देता है।

    (डिस्क्लेमर: यह जानकारी धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं पर आधारित है। हम इसकी पुष्टि नहीं करते हैं।)

  • चैत्र अमावस्या 2026: क्यों होगा पितरों का श्राद्ध एक दिन पहले? जानिए तारीख, मुहूर्त और महत्व

    चैत्र अमावस्या 2026: क्यों होगा पितरों का श्राद्ध एक दिन पहले? जानिए तारीख, मुहूर्त और महत्व


    नई दिल्ली । हिंदू धर्म में चैत्र अमावस्या का दिन धार्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। यह महीने की कृष्ण पक्ष की अमावस्या तिथि को आता है और इस दिन स्नान दान तर्पण पिंडदान और श्राद्ध जैसे कार्य पितरों के लिए किए जाते हैं। इस वर्ष विशेष बात यह है कि पितरों के लिए श्राद्ध कर्म चैत्र अमावस्या से एक दिन पहले यानी 18 मार्च बुधवार को किए जाएंगे।

    वैदिक पंचांग के अनुसार 2026 में चैत्र अमावस्या तिथि की शुरुआत 18 मार्च सुबह 8:25 बजे से हो रही है और समाप्ति 19 मार्च गुरुवार को सुबह 6:52 बजे होगी। अमावस्या तिथि 19 मार्च को सुबह 6:52 बजे समाप्त हो जाने के कारण पितरों के श्राद्ध और तर्पण का मुहूर्त 18 मार्च के दिन ही आता है। इसे दर्श अमावस्या कहा जाता है। इस समय में 11:30 बजे से लेकर दोपहर 2:30 बजे के बीच श्राद्ध पिंडदान और दान आदि किए जा सकते हैं।

    चैत्र अमावस्या के दिन का ब्रह्म मुहूर्त सुबह 4:51 बजे से 5:39 बजे तक है जो स्नान और धार्मिक क्रियाओं के लिए उत्तम माना जाता है। अभिजीत मुहूर्त दोपहर 12:05 बजे से 12:53 बजे तक रहेगा। इस बार अमावस्या शुक्ल योग और उत्तर भाद्रपद नक्षत्र में है। शुक्ल योग प्रातः से देर रात 1:17 बजे तक रहेगा जबकि उत्तर भाद्रपद नक्षत्र प्रातः से 20 मार्च को सुबह 4:05 बजे तक रहेगा।

    चैत्र अमावस्या और दर्श अमावस्या दोनों ही दिन राज पंचक में आते हैं। राज पंचक इस वर्ष 16 मार्च सोमवार शाम 6:14 बजे से प्रारंभ होकर 19 मार्च तक चलेगा। इसे शुभ फलदायी पंचक माना जाता है जो दान और धार्मिक कार्यों के लिए बेहद लाभकारी है।

    धार्मिक मान्यता है कि चैत्र अमावस्या के दिन पितरों के लिए तर्पण और श्राद्ध करने से पितृ दोष की शांति होती है। इससे परिवार में सुख-शांति और समृद्धि आती है। वहीं जो लोग पितरों को तृप्त नहीं करते उन्हें जीवन में कई प्रकार की समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है।

    स्नान और दान करना इस दिन विशेष पुण्य का कार्य माना जाता है। इस दिन लोग पितरों को तृप्त कर पुण्य अर्जित करते हैं और अपने जीवन में सुख-समृद्धि और आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। इस प्रकार इस वर्ष चैत्र अमावस्या और दर्श अमावस्या का यह समय पितृ पूजा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है।