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  • Pitru Paksha 2026: अचानक सपने में दिखे पितर और मांगने लगे पानी या भोजन तो क्या है इसका मतलब जानिए धार्मिक मान्यता

    Pitru Paksha 2026: अचानक सपने में दिखे पितर और मांगने लगे पानी या भोजन तो क्या है इसका मतलब जानिए धार्मिक मान्यता


    नई दिल्ली। पितृ पक्ष को हिंदू धर्म में पूर्वजों के स्मरण और उनके प्रति श्रद्धा व्यक्त करने का विशेष समय माना जाता है। इस दौरान लोग अपने पितरों की आत्मिक शांति के लिए श्राद्ध तर्पण और पिंडदान जैसे कर्म करते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार पितृ पक्ष के दौरान पूर्वजों का स्मरण करना विशेष फलदायी माना जाता है। इसी वजह से इस अवधि में आने वाले सपनों को लेकर भी लोगों के मन में कई सवाल रहते हैं। स्वप्न शास्त्र में पूर्वजों से जुड़े सपनों के अलग अलग अर्थ बताए गए हैं। हालांकि इन अर्थों को धार्मिक और पारंपरिक मान्यताओं के रूप में ही देखा जाना चाहिए।

    अगर पितृ पक्ष के दौरान सपने में कोई पूर्वज मुस्कुराते हुए दिखाई दें तो धार्मिक मान्यता में इसे शुभ संकेत माना जाता है। कहा जाता है कि पूर्वजों का प्रसन्न अवस्था में दिखाई देना उनके आशीर्वाद और संतुष्टि का प्रतीक हो सकता है। ऐसी मान्यता है कि इससे व्यक्ति को अपने जीवन में सकारात्मक ऊर्जा और परिवार के बुजुर्गों के आशीर्वाद का भाव मिलता है।

    इसके विपरीत यदि सपने में पूर्वज रोते हुए या दुखी दिखाई दें तो इसे धार्मिक मान्यताओं में चिंता का संकेत माना जाता है। ऐसी स्थिति को पितरों की ओर से ध्यान आकर्षित करने वाला संकेत बताया जाता है। मान्यता के अनुसार परिवार को अपने पूर्वजों का स्मरण करना चाहिए और उनकी शांति के लिए श्राद्ध तर्पण तथा दान जैसे धार्मिक कर्म करने चाहिए।

    कई लोगों को सपने में अपने पूर्वज भोजन या पानी मांगते हुए भी दिखाई देते हैं। स्वप्न शास्त्र से जुड़ी मान्यताओं में इसे महत्वपूर्ण संकेत माना जाता है। ऐसी स्थिति में पितृ पक्ष के दौरान पूर्वजों के नाम से तर्पण करने और अपनी सामर्थ्य के अनुसार जरूरतमंदों को भोजन या दान देने की परंपरा बताई जाती है। ब्राह्मण भोजन कराने की परंपरा का भी उल्लेख धार्मिक ग्रंथों और मान्यताओं में मिलता है।

    कभी कभी सपने में व्यक्ति अपने किसी दिवंगत परिजन के साथ बातचीत करता हुआ दिखाई देता है। स्वप्न शास्त्र की मान्यताओं के अनुसार ऐसे सपने किसी आने वाली उलझन या जीवन में चल रही चिंता से जोड़कर देखे जाते हैं। हालांकि ऐसे सपने आने पर डरने की जरूरत नहीं मानी जाती। धार्मिक दृष्टि से इस समय पितरों का स्मरण करना और उनके निमित्त दान तर्पण जैसे कर्म करना शुभ माना जाता है।

    पितृ पक्ष के दौरान पूर्वजों से जुड़े सपनों को लेकर लोगों की आस्था काफी गहरी होती है। किसी को अपने दिवंगत माता पिता दिखाई देते हैं तो किसी को दादा दादी या परिवार के दूसरे बुजुर्ग सपने में नजर आते हैं। इन सपनों का वास्तविक कारण व्यक्ति की यादें भावनाएं और मानसिक स्थिति भी हो सकती है। इसलिए इन्हें निश्चित भविष्यवाणी के तौर पर नहीं लेना चाहिए।

    धार्मिक मान्यता के अनुसार पितृ पक्ष का मूल उद्देश्य अपने पूर्वजों को श्रद्धापूर्वक याद करना और उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना है। ऐसे में सपने में पूर्वज दिखाई दें तो घबराने के बजाय अपनी परंपरा और आस्था के अनुसार उनका स्मरण करना तर्पण करना तथा जरूरतमंदों की सहायता करना एक सकारात्मक भाव माना जाता है।

  • शिवपुरी में पितृपक्ष शुरू होते ही बाणगंगा और भदैयाकुंड पर उमड़ी भीड़, पूर्वजों के लिए हुआ तर्पण-पिंडदान

    शिवपुरी में पितृपक्ष शुरू होते ही बाणगंगा और भदैयाकुंड पर उमड़ी भीड़, पूर्वजों के लिए हुआ तर्पण-पिंडदान


    शिवपुरी । शिवपुरी में पितृपक्ष की शुरुआत के साथ ही शनिवार को धार्मिक स्थलों पर श्रद्धालुओं की आवाजाही बढ़ गई। शहर के प्रमुख बाणगंगा और भदैयाकुंड घाट पर सुबह से ही लोग अपने पूर्वजों के निमित्त पूजा और धार्मिक अनुष्ठान करने पहुंचने लगे। सुबह करीब 7 बजे से दोनों स्थानों पर श्रद्धालुओं का आना शुरू हो गया था। परिवार के लोग पूजा सामग्री लेकर घाटों पर पहुंचे और पंडितों की देखरेख में तर्पण श्राद्ध और पिंडदान की विधि पूरी की।

    पितृपक्ष को हिंदू परंपरा में पूर्वजों के स्मरण और उनके निमित्त धार्मिक कर्मकांड करने का विशेष समय माना जाता है। इसी मान्यता के चलते शिवपुरी में भी कई परिवार अपने पितरों के लिए निर्धारित तिथि के अनुसार अनुष्ठान करने पहुंचे। घाटों पर लोगों ने स्नान और पूजा के बाद पितरों को जल अर्पित किया। इसके साथ ही पिंडदान और श्राद्ध कर्म भी किए गए।

    सुबह के समय बाणगंगा और भदैयाकुंड दोनों स्थानों पर श्रद्धालुओं की संख्या लगातार बढ़ती गई। अलग अलग क्षेत्रों से परिवारों के पहुंचने का सिलसिला जारी रहा। कई लोग अपने साथ पूजा सामग्री लेकर पहुंचे थे। घाटों पर पंडितों की मौजूदगी में मंत्रोच्चार के साथ कर्मकांड संपन्न कराया गया। परिवार के सदस्यों ने पूर्वजों को याद करते हुए उनकी आत्मा की शांति और परिवार की सुख समृद्धि की कामना की।

    पंडित शिव नारायण शर्मा के अनुसार पितृपक्ष में अपनी परंपरा और पूर्वजों की तिथि के अनुसार श्राद्ध और तर्पण करने की धार्मिक मान्यता है। इस दौरान परिवार अपने पितरों के निमित्त जल अर्पित करते हैं और निर्धारित विधि से पूजा करते हैं। उन्होंने बताया कि पितृपक्ष के दौरान अलग अलग तिथियों पर पूर्वजों के लिए कर्मकांड किए जाते हैं।

    इस वर्ष पितृपक्ष की शुरुआत 26 सितंबर से हुई है और यह 10 अक्टूबर तक चलेगा। इस अवधि में श्रद्धालु अपने पूर्वजों की मृत्यु तिथि के अनुसार संबंधित श्राद्ध तिथि पर तर्पण और अन्य धार्मिक अनुष्ठान कर सकते हैं। कई परिवारों के लिए पितृपक्ष का पहला दिन विशेष महत्व रखता है और इसी वजह से पहले दिन भी घाटों पर अच्छी संख्या में श्रद्धालु पहुंचे।

    शिवपुरी के बाणगंगा और भदैयाकुंड पर सुबह से बढ़ती भीड़ के बीच धार्मिक वातावरण बना रहा। घाटों पर परिवारों के समूह दिखाई दिए जो अपने पूर्वजों के निमित्त पूजा करते नजर आए। जैसे जैसे दिन आगे बढ़ा वैसे वैसे दोनों स्थानों पर लोगों की आवाजाही बढ़ती गई।

    पितृपक्ष के दौरान शिवपुरी में आने वाले दिनों में भी इन धार्मिक स्थलों पर श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ने की संभावना है। अलग अलग तिथियों पर लोग अपने पूर्वजों के लिए निर्धारित श्राद्ध कर्म करेंगे। इस दौरान तर्पण पिंडदान और श्राद्ध जैसे अनुष्ठानों के जरिए परिवार अपने पितरों का स्मरण करेंगे और उनकी आत्मा की शांति की कामना करेंगे।

  • Pitru Paksha 2026: पितरों को प्रसन्न करने के लिए करें इन 7 चीजों का दान जानें सही समय और धार्मिक महत्व

    Pitru Paksha 2026: पितरों को प्रसन्न करने के लिए करें इन 7 चीजों का दान जानें सही समय और धार्मिक महत्व


    नई दिल्ली। हिंदू धर्म में पितृ पक्ष का समय पूर्वजों को याद करने और उनके प्रति श्रद्धा व्यक्त करने के लिए विशेष माना जाता है। इस दौरान श्राद्ध तर्पण और पिंडदान जैसे धार्मिक कर्म किए जाते हैं। साथ ही जरूरतमंद लोगों को दान देने की परंपरा भी रही है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पितृ पक्ष के दौरान श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार किया गया दान पुण्यकारी माना जाता है। मान्यता है कि इससे पितरों की तृप्ति होती है और परिवार में सुख शांति तथा समृद्धि बनी रहती है।

    पितृ पक्ष में अन्न दान को विशेष महत्व दिया गया है। गेहूं चावल जौ काले चने और अन्य जरूरत की खाद्य सामग्री का दान किया जा सकता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार अन्न का दान करने से घर में अन्न की कमी नहीं रहती और परिवार में बरकत बनी रहती है। इसलिए श्राद्ध कर्म के साथ जरूरतमंद व्यक्ति को भोजन या राशन सामग्री देना शुभ माना जाता है।

    दूसरे महत्वपूर्ण दानों में काले तिल का नाम लिया जाता है। श्राद्ध और तर्पण की परंपराओं में काले तिल का इस्तेमाल किया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार काले तिल का दान पितरों की प्रसन्नता के लिए शुभ माना जाता है। तर्पण के दौरान भी इसका विशेष उपयोग किया जाता है।

    गौ सेवा को भी पितृ पक्ष से जोड़कर देखा जाता है। सामर्थ्य के अनुसार गौशाला में हरा चारा गुड़ या भूसा दान किया जा सकता है। धार्मिक मान्यता है कि गौ सेवा से पुण्य की प्राप्ति होती है और पितरों का आशीर्वाद मिलता है। जो लोग गौदान करने में सक्षम नहीं हैं वे गौशाला में जाकर सेवा या चारे का दान कर सकते हैं।

    वस्त्र दान भी पितृ पक्ष में किया जाने वाला प्रमुख दान माना जाता है। जरूरतमंद व्यक्ति को धोती कुर्ता गमछा चादर या अन्य उपयोगी कपड़े दिए जा सकते हैं। मान्यता के अनुसार वस्त्र दान से जीवन में सुख और सम्मान की प्राप्ति होती है। हालांकि दान करते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि वस्त्र साफ और उपयोग के योग्य हों।

    घी और गुड़ का दान भी धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाता है। पितृ पक्ष में जरूरतमंद लोगों को शुद्ध घी या गुड़ देना शुभ माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं में इसे घर में सुख शांति और पारिवारिक सौहार्द से जोड़कर देखा गया है।

    सामर्थ्य के अनुसार चांदी या सोने का दान भी किया जा सकता है। हालांकि यह जरूरी नहीं है कि हर व्यक्ति महंगी धातु का दान ही करे। अपनी क्षमता के अनुसार किया गया दान और जरूरतमंद की सहायता अधिक महत्वपूर्ण मानी जाती है। इसके अलावा नमक का दान भी कुछ धार्मिक परंपराओं में शुभ माना गया है। मान्यता है कि इससे नकारात्मकता दूर करने और सकारात्मक ऊर्जा बनाए रखने में मदद मिलती है।

    पितृ पक्ष में दान करने के समय को लेकर भी विशेष मान्यता है। श्राद्ध कर्म और दान के लिए दोपहर का समय महत्वपूर्ण माना जाता है। कुतप काल को भी श्राद्ध से जुड़े कर्मों के लिए उपयुक्त बताया गया है। हालांकि अलग अलग परंपराओं और स्थानों के अनुसार समय में अंतर हो सकता है इसलिए श्राद्ध या तर्पण की विधि करते समय स्थानीय पंचांग या विद्वान की सलाह लेना उचित रहता है।

    कुल मिलाकर पितृ पक्ष केवल दान करने का अवसर नहीं बल्कि पूर्वजों को श्रद्धापूर्वक याद करने और जरूरतमंदों की मदद करने का समय भी माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस अवधि में श्रद्धा से किया गया अन्न दान काले तिल का दान गौ सेवा वस्त्र दान घी और गुड़ का दान चांदी या सोने का दान तथा नमक का दान विशेष पुण्यकारी माना जाता है।

  • 60 साल बाद बन रहा दुर्लभ ग्रह संयोग, 26 सितंबर से उज्जैन में शुरू होगा श्राद्ध पक्ष, सिद्धवट और रामघाट पर उमड़ेगी श्रद्धालुओं की भीड़

    60 साल बाद बन रहा दुर्लभ ग्रह संयोग, 26 सितंबर से उज्जैन में शुरू होगा श्राद्ध पक्ष, सिद्धवट और रामघाट पर उमड़ेगी श्रद्धालुओं की भीड़


    उज्जैन । उज्जैन में पितरों के तर्पण और पिंडदान के लिए विशेष महत्व रखने वाला श्राद्ध पक्ष 26 सितंबर से शुरू होने जा रहा है। इसके साथ ही सिद्धवट रामघाट और शिप्रा नदी के दूसरे घाटों पर श्रद्धालुओं की आवाजाही बढ़ने लगेगी। देश के अलग अलग हिस्सों से लोग पितरों की शांति के लिए उज्जैन पहुंचेंगे। इसे देखते हुए प्रशासन और मंदिर प्रबंधन की ओर से घाटों की सफाई सहित अन्य व्यवस्थाओं को अंतिम रूप दिया जा रहा है। शिप्रा नदी में पानी की स्थिति पर भी लगातार नजर रखी जा रही है।

    इस बार का श्राद्ध पक्ष इसलिए भी खास माना जा रहा है क्योंकि ज्योतिषाचार्यों के अनुसार करीब 60 साल बाद विशेष ग्रह संयोग बन रहा है। उनका कहना है कि 1966 के बाद 2026 में सूर्य चंद्र मंगल बुध गुरु और शनि की विशेष स्थिति फिर बन रही है। इसी वजह से इस बार श्राद्ध पक्ष को धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। हालांकि ग्रहों के इस संयोग को लेकर ज्योतिषीय मान्यताएं अलग अलग हो सकती हैं।

    महालय श्राद्ध की शुरुआत भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा के दिन 26 सितंबर से होगी। इसका समापन 10 अक्टूबर को आश्विन कृष्ण अमावस्या यानी सर्वपितृ अमावस्या के साथ होगा। इस बार श्राद्ध पक्ष की शुरुआत और इसका समापन दोनों शनिवार को होने की बात कही गई है। इस दौरान श्रद्धालु अपनी परंपरा और मान्यता के अनुसार पितरों का तर्पण पिंडदान और श्राद्ध कर्म करेंगे।

    उज्जैन का सिद्धवट पितृ कर्म के लिए प्रमुख धार्मिक स्थल माना जाता है। सिद्धवट मंदिर के पुजारी राघवेंद्र चतुर्वेदी के अनुसार यहां स्थित वटवृक्ष को भगवान शिव के स्वरूप के रूप में पूजा जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार माता पार्वती ने त्रेतायुग में इस वटवृक्ष को लगाया था। यही वजह है कि सिद्धवट पर पितरों की शांति और सद्गति की कामना के लिए विशेष पूजा की जाती है।

    श्राद्ध पक्ष के दौरान सिद्धवट पर देशभर से श्रद्धालु पहुंचते हैं। यहां लोग अपने पूर्वजों के नाम से पिंडदान और तर्पण करते हैं। कई परिवार अपनी कई पीढ़ियों के पूर्वजों की शांति के लिए भी पूजा करवाते हैं। पूजा के बाद पितरों का स्मरण करते हुए सिद्धवट पर कच्चा दूध चढ़ाने की परंपरा भी बताई गई है। धार्मिक मान्यताओं के कारण श्राद्ध पक्ष में इस स्थान पर विशेष भीड़ देखने को मिलती है।

    सिद्धवट का धार्मिक महत्व प्रयागराज के अक्षयवट गया के बोधिवट और वृंदावन के वंशीवट से भी जोड़ा जाता है। पुजारी के अनुसार उज्जैन का सिद्धवट कल्पवृक्ष के रूप में भी पूजनीय माना जाता है। यही कारण है कि श्राद्ध पक्ष के दौरान यहां होने वाले तर्पण और पिंडदान को लेकर श्रद्धालुओं में विशेष आस्था रहती है।

    26 सितंबर से शुरू होने वाले श्राद्ध पक्ष को देखते हुए उज्जैन में घाटों पर व्यवस्थाएं बढ़ाई जा रही हैं। रामघाट और शिप्रा के अन्य घाटों पर भी श्रद्धालुओं की सुविधा को ध्यान में रखते हुए तैयारियां की जा रही हैं। आने वाले दिनों में देशभर से श्रद्धालुओं के उज्जैन पहुंचने की उम्मीद है। विशेष ग्रह स्थिति और पितृ कर्म की धार्मिक मान्यताओं के कारण इस बार श्राद्ध पक्ष को लेकर श्रद्धालुओं में खास उत्साह देखने को मिल रहा है।

  • शनिवार से शनिवार तक रहेगा पितृ पक्ष जानें किस दिन किस तिथि का होगा श्राद्ध और क्या हैं जरूरी नियम

    शनिवार से शनिवार तक रहेगा पितृ पक्ष जानें किस दिन किस तिथि का होगा श्राद्ध और क्या हैं जरूरी नियम


    नई दिल्ली । हिंदू धर्म में पितृ पक्ष का विशेष धार्मिक महत्व माना जाता है। यह समय पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता व्यक्त करने के साथ तर्पण और श्राद्ध कर्म के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। वर्ष 2026 में पितृ पक्ष को लेकर 26 और 27 सितंबर की तारीखों को लेकर लोगों के बीच भ्रम बना हुआ है। पंचांग की गणना के अनुसार 26 सितंबर शनिवार को पूर्णिमा श्राद्ध होगा जबकि प्रतिपदा श्राद्ध 27 सितंबर रविवार से शुरू होगा। इसके बाद 10 अक्टूबर शनिवार को सर्वपितृ अमावस्या के साथ पितृ पक्ष का समापन होगा। इस तरह पूर्णिमा श्राद्ध को शामिल करने पर यह अवधि 16 दिनों की मानी जा रही है।

    इस बार पितृ पक्ष की शुरुआत और समाप्ति दोनों शनिवार को होने का संयोग बताया जा रहा है। 26 सितंबर को भाद्रपद पूर्णिमा का श्राद्ध किया जाएगा। इसके अगले दिन 27 सितंबर को प्रतिपदा श्राद्ध होगा। इसके बाद 28 सितंबर को द्वितीया श्राद्ध और 29 सितंबर को तृतीया श्राद्ध किया जाएगा। 30 सितंबर को चतुर्थी और पंचमी श्राद्ध रहेगा। इसके बाद 1 अक्टूबर को षष्ठी श्राद्ध और 2 अक्टूबर को सप्तमी श्राद्ध किया जाएगा।

    3 अक्टूबर शनिवार को अष्टमी श्राद्ध होगा जबकि 4 अक्टूबर रविवार को नवमी श्राद्ध किया जाएगा। 5 अक्टूबर को दशमी श्राद्ध और 6 अक्टूबर को एकादशी श्राद्ध रहेगा। 7 अक्टूबर को द्वादशी श्राद्ध के साथ मघा नक्षत्र से जुड़ा श्राद्ध भी बताया गया है। 8 अक्टूबर को त्रयोदशी श्राद्ध और 9 अक्टूबर को चतुर्दशी श्राद्ध होगा। इसके बाद 10 अक्टूबर शनिवार को सर्वपितृ अमावस्या मनाई जाएगी। यही पितृ पक्ष का अंतिम दिन होगा।

    पितृ पक्ष में जिस तिथि को किसी पूर्वज का निधन हुआ हो उस तिथि के अनुसार श्राद्ध करने की परंपरा है। यदि किसी व्यक्ति की मृत्यु की तिथि ज्ञात नहीं हो तो सर्वपितृ अमावस्या के दिन श्राद्ध करने की मान्यता है। इस दिन उन सभी पूर्वजों का स्मरण किया जाता है जिनकी मृत्यु तिथि परिवार को ज्ञात नहीं होती या जिनका नियमित श्राद्ध किसी कारण से नहीं हो पाता।

    श्राद्ध कर्म में तर्पण पिंडदान और भोजन दान जैसे कर्मों का विशेष महत्व माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार तर्पण के दौरान जल और तिल का प्रयोग किया जाता है। कई परंपराओं में कुशा का इस्तेमाल भी किया जाता है। श्राद्ध का भोजन तैयार करने के बाद गाय कुत्ते कौए और अन्य जीवों के लिए भोजन निकालने की परंपरा भी कई परिवारों में निभाई जाती है।

    श्राद्ध कर्म के समय को लेकर भी धार्मिक परंपराओं में विशेष नियम बताए गए हैं। सामान्य तौर पर श्राद्ध कर्म दिन के उस हिस्से में करने की परंपरा है जिसे कुतप काल कहा जाता है। हालांकि स्थानीय पंचांग और परिवार की परंपरा के अनुसार तर्पण और श्राद्ध के समय में अंतर हो सकता है। इसलिए किसी विशेष तिथि का श्राद्ध करने से पहले स्थानीय पंचांग या विद्वान से सही समय की जानकारी लेना उचित माना जाता है।

    कुल मिलाकर वर्ष 2026 का पितृ पक्ष तारीखों के लिहाज से खास माना जा रहा है। 26 सितंबर को पूर्णिमा श्राद्ध से इसकी शुरुआत होगी और 10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या के साथ समापन होगा। इस दौरान अलग अलग तिथियों के अनुसार पूर्वजों का श्राद्ध और तर्पण किया जाएगा। धार्मिक मान्यता के अनुसार पितृ पक्ष पूर्वजों के प्रति सम्मान व्यक्त करने और परिवार की परंपराओं को निभाने का महत्वपूर्ण अवसर है।

  • Pitru Paksha 2026: कब करें पूर्वजों का श्राद्ध और तर्पण, 15 दिनों की पूरी तिथि सूची के साथ जानें मातृ नवमी और सर्वपितृ अमावस्या का महत्व

    Pitru Paksha 2026: कब करें पूर्वजों का श्राद्ध और तर्पण, 15 दिनों की पूरी तिथि सूची के साथ जानें मातृ नवमी और सर्वपितृ अमावस्या का महत्व


    नई दिल्ली । सनातन धर्म में पितृपक्ष को पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और सम्मान व्यक्त करने का अत्यंत महत्वपूर्ण समय माना जाता है। इस दौरान लोग अपने दिवंगत माता पिता और पूर्वजों का स्मरण करते हुए श्राद्ध तर्पण पिंडदान और दान पुण्य जैसे धार्मिक कर्म करते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार श्रद्धापूर्वक किए गए इन कर्मों से पितरों की आत्मा को शांति मिलती है और परिवार को उनका आशीर्वाद प्राप्त होता है। साल 2026 में पितृपक्ष सितंबर के अंतिम सप्ताह में शुरू होगा और अक्टूबर में सर्वपितृ अमावस्या के साथ समाप्त होगा। ऐसे में परिवारों के लिए श्राद्ध पक्ष की सभी तिथियों की जानकारी रखना बेहद जरूरी है ताकि वे अपने पूर्वजों का श्राद्ध सही दिन पर कर सकें।

    वर्ष 2026 में पितृपक्ष की शुरुआत 26 सितंबर शनिवार से होगी। इस दिन भाद्रपद पूर्णिमा तिथि का श्राद्ध किया जाएगा। इसके बाद 27 सितंबर रविवार को प्रतिपदा श्राद्ध होगा और क्रमशः अलग अलग तिथियों पर पूर्वजों के निमित्त धार्मिक कर्म किए जाएंगे। पितृपक्ष का समापन 10 अक्टूबर शनिवार को सर्वपितृ अमावस्या के साथ होगा। सर्वपितृ अमावस्या का विशेष महत्व माना जाता है क्योंकि इस दिन उन सभी पितरों का श्राद्ध किया जा सकता है जिनकी मृत्यु तिथि ज्ञात नहीं है या किसी कारणवश निर्धारित तिथि पर उनका श्राद्ध नहीं हो पाया हो।

    पितृपक्ष की प्रमुख तिथियों की बात करें तो 26 सितंबर को पूर्णिमा श्राद्ध होगा जबकि 27 सितंबर को प्रतिपदा और 28 सितंबर को द्वितीया श्राद्ध किया जाएगा। 29 सितंबर को तृतीया श्राद्ध होगा। इस बार 30 सितंबर बुधवार को एक विशेष स्थिति बनेगी क्योंकि इसी दिन चतुर्थी और पंचमी दोनों तिथियों का श्राद्ध किया जाएगा। जिन परिवारों में किसी पूर्वज का निधन चतुर्थी या पंचमी तिथि को हुआ था वे इस दिन उनका श्राद्ध कर्म कर सकेंगे।

    इसके बाद 1 अक्टूबर को षष्ठी 2 अक्टूबर को सप्तमी 3 अक्टूबर को अष्टमी और 4 अक्टूबर को नवमी तिथि का श्राद्ध होगा। 4 अक्टूबर को मातृ नवमी भी मानी जाएगी जिसका अपना विशेष धार्मिक महत्व है। इस दिन दिवंगत माताओं और परिवार की अन्य महिलाओं के निमित्त श्राद्ध तर्पण और पिंडदान करने की परंपरा है। श्रद्धालु इस दिन मातृ पक्ष के पूर्वजों का स्मरण कर उनके प्रति सम्मान और श्रद्धा प्रकट करते हैं।

    पितृपक्ष की आगे की तिथियों में 5 अक्टूबर को दशमी 6 अक्टूबर को एकादशी 7 अक्टूबर को द्वादशी 8 अक्टूबर को त्रयोदशी और 9 अक्टूबर को चतुर्दशी का श्राद्ध किया जाएगा। इसके बाद 10 अक्टूबर को अमावस्या के दिन सर्वपितृ श्राद्ध के साथ इस पावन पक्ष का समापन होगा।

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पितृपक्ष में श्राद्ध करने के लिए सबसे महत्वपूर्ण आधार मृत्यु की तिथि होती है। जिस तिथि को किसी व्यक्ति का निधन हुआ हो पितृपक्ष में उसी तिथि पर उसका श्राद्ध करना उचित माना जाता है। उदाहरण के तौर पर यदि किसी पूर्वज की मृत्यु प्रतिपदा तिथि को हुई थी तो पितृपक्ष में प्रतिपदा के दिन उनका श्राद्ध किया जाता है। वहीं जिन लोगों को अपने पूर्वजों की मृत्यु तिथि की जानकारी नहीं होती उनके लिए सर्वपितृ अमावस्या विशेष अवसर मानी जाती है।

    पितृपक्ष केवल धार्मिक कर्मकांड का समय नहीं बल्कि अपनी जड़ों और पूर्वजों को याद करने का भी अवसर है। इस अवधि में श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार तर्पण पिंडदान भोजन और दान पुण्य करने की परंपरा रही है। वर्ष 2026 में 26 सितंबर से शुरू होकर 10 अक्टूबर तक चलने वाला यह पितृपक्ष श्रद्धालुओं को अपने पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता और सम्मान व्यक्त करने का महत्वपूर्ण अवसर प्रदान करेगा।