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  • पानी, नमी और फटने से सुरक्षित होंगे नए बैंक नोट, प्लास्टिक करेंसी को लेकर भारत में नई पहल तेज

    पानी, नमी और फटने से सुरक्षित होंगे नए बैंक नोट, प्लास्टिक करेंसी को लेकर भारत में नई पहल तेज

    नई दिल्ली । भारत की मौद्रिक प्रणाली में एक बड़े बदलाव की संभावना पर चर्चा तेज हो गई है, जहां भारतीय रिजर्व बैंक देश में प्लास्टिक आधारित बैंक नोटों को शुरू करने की दिशा में आगे बढ़ सकता है। यह कदम करीब 14 साल पुराने प्रस्ताव को फिर से सक्रिय करने के रूप में देखा जा रहा है, जिस पर हाल के उच्च स्तरीय बैठकों में गंभीर विचार-विमर्श हुआ है। मध्य प्रदेश सहित देश के विभिन्न हिस्सों में इस संभावित बदलाव को लेकर लोगों और वित्तीय विशेषज्ञों के बीच उत्सुकता बढ़ गई है। यदि यह योजना लागू होती है तो भारतीय करेंसी के स्वरूप और उपयोग प्रणाली में एक ऐतिहासिक परिवर्तन देखने को मिल सकता है।

    सूत्रों के अनुसार, आरबीआई की हालिया बैठकों में प्लास्टिक नोटों को लेकर पायलट प्रोजेक्ट शुरू करने की संभावना पर चर्चा की गई है। इसका मुख्य उद्देश्य मौजूदा कागजी नोटों की छपाई और रखरखाव पर होने वाले भारी खर्च को कम करना बताया जा रहा है। वर्तमान में हर साल बड़ी संख्या में नोट खराब होकर चलन से बाहर हो जाते हैं, जिन्हें फिर से छापने में हजारों करोड़ रुपये का खर्च आता है। इस आर्थिक बोझ को कम करने के लिए पॉलीमर आधारित नोटों को एक व्यावहारिक विकल्प माना जा रहा है, जो लंबे समय तक टिकाऊ हो सकते हैं।

    प्लास्टिक नोटों की सबसे बड़ी खासियत उनकी मजबूती और टिकाऊपन मानी जा रही है। ये नोट पानी, नमी और सामान्य गंदगी से प्रभावित नहीं होते, जिससे इनकी उम्र कागज के नोटों की तुलना में काफी अधिक हो सकती है। इसके अलावा ये नोट फटने से भी अधिक सुरक्षित होते हैं और इन्हें लंबे समय तक उपयोग में लाया जा सकता है। तकनीकी दृष्टि से इनमें आधुनिक सुरक्षा फीचर्स शामिल किए जाने की संभावना है, जिससे जालसाजी पर भी प्रभावी रोक लगाई जा सकेगी।

    भारत में इससे पहले वर्ष 2012 में कुछ चुनिंदा शहरों में 10 रुपये के प्लास्टिक नोटों का सीमित परीक्षण किया गया था, लेकिन उस समय तकनीकी और परिचालन चुनौतियों के कारण इसे आगे नहीं बढ़ाया जा सका था। अब बदलती तकनीक और वैश्विक अनुभवों के आधार पर इस दिशा में फिर से संभावनाएं मजबूत होती दिख रही हैं। दुनिया के कई देश पहले ही प्लास्टिक मुद्रा अपना चुके हैं और इसे अधिक सुरक्षित एवं टिकाऊ विकल्प मानते हैं।

    यदि यह योजना लागू होती है तो यह भारतीय वित्तीय व्यवस्था में एक आधुनिक और तकनीक-आधारित बदलाव का संकेत होगा, जिससे न केवल लागत में कमी आएगी बल्कि मुद्रा प्रबंधन की गुणवत्ता भी बेहतर हो सकती है। आने वाले समय में इस पर आरबीआई की आधिकारिक घोषणा और आगे की रूपरेखा पर सभी की नजरें टिकी रहेंगी।