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  • इजरायल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू के बेटे ने बदला नाम, वजह को लेकर उठे सवाल

    इजरायल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू के बेटे ने बदला नाम, वजह को लेकर उठे सवाल


    नई दिल्ली। इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के बड़े बेटे यायर नेतन्याहू को लेकर नया विवाद सामने आया है। रिपोर्ट्स के अनुसार, यायर नेतन्याहू ने अपना नाम बदलकर ‘योनातन हुन’ कर लिया है। लीक हुए डेटा के आधार पर दावा किया जा रहा है कि यह बदलाव पिछले दो वर्षों के दौरान किया गया।

    जानकारी के मुताबिक, 2024 में टैक्स फाइलिंग के दौरान उन्होंने अपने जन्म नाम यायर नेतन्याहू का ही इस्तेमाल किया था, जबकि 2026 में टैक्स संबंधी दस्तावेजों में उनका नाम ‘योनातन हुन’ दर्ज किया गया। हालांकि, नाम बदलने के पीछे की वास्तविक वजह को लेकर अभी तक कोई आधिकारिक जानकारी सामने नहीं आई है।

    इजरायली मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, नेतन्याहू परिवार पहले से ही टैक्स और भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों को लेकर चर्चा में रहा है। ऐसे में यायर नेतन्याहू के नाम परिवर्तन को लेकर भी कई तरह की अटकलें लगाई जा रही हैं। हालांकि, अभी यह स्पष्ट नहीं है कि उन्होंने यह बदलाव किस उद्देश्य से किया।

    रिपोर्ट्स के मुताबिक, नाम में यह परिवर्तन उनके मौजूदा नेशनल आइडेंटिफिकेशन नंबर के तहत किए गए रेगुलेटरी अपडेट का हिस्सा है। दस्तावेजों में उनका रेसिडेंशियल एड्रेस ‘बाल्फोर 0’ दर्ज किया गया है, जिसे इजरायल के प्रधानमंत्री आवास से जोड़कर देखा जा रहा है।

    नाम बदलने के उद्देश्य को लेकर बहस तेज
    इजरायल में प्रधानमंत्री के बेटे के नाम बदलने के फैसले को लेकर चर्चा शुरू हो गई है। कुछ लोग इसे टैक्स से जोड़कर देख रहे हैं, जबकि कुछ इसे सैन्य सेवा से संबंधित विवादों के संदर्भ में देख रहे हैं।

    दरअसल, 2023 से योनातन हुन के फ्लोरिडा में रहने को लेकर भी आलोचना होती रही है। युद्ध के दौरान जब इजरायल ने रिजर्व सैनिकों को बुलाया, तब विदेश में रहने को लेकर कई लोगों ने सवाल उठाए थे। कुछ आलोचकों का कहना है कि नाम बदलने का संबंध युद्ध से बचने की कोशिश से हो सकता है, जबकि कुछ इसे टैक्स संबंधी कारणों से जोड़ रहे हैं।

    ‘योनातन हुन’ नाम के पीछे ऐतिहासिक कनेक्शन
    इजरायली मीडिया के अनुसार, ‘योनातन’ नाम का संबंध नेतन्याहू परिवार के एक ऐतिहासिक व्यक्ति से है। यह नाम बेंजामिन नेतन्याहू के भाई योनी नेतन्याहू को श्रद्धांजलि के तौर पर देखा जा रहा है, जो 1976 में युगांडा में एक मिशन के दौरान मारे गए थे। उन्हें इजरायल में एक राष्ट्रीय नायक के रूप में देखा जाता है।

    वहीं, ‘हुन’ उपनाम को नेतन्याहू परिवार की पुरानी पारिवारिक जड़ों से जोड़कर देखा जा रहा है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, परिवार के बुजुर्ग बेन आर्टजी जब इजरायल आए थे, तब उनका नाम सैमुअल हुन था और बाद में उन्होंने अपना नाम बदला था। इसी पारिवारिक इतिहास से प्रेरित होकर यायर ने अपने नए नाम में ‘हुन’ शब्द शामिल किया है।

    हालांकि, इससे पहले भी यायर नेतन्याहू अपने एक पॉडकास्ट में ‘यायर हुन’ नाम का इस्तेमाल कर चुके हैं, लेकिन सरकारी दस्तावेजों में शामिल होने के बाद यह नाम आधिकारिक रूप से दर्ज हो गया है। फिलहाल प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू, उनके बेटे यायर नेतन्याहू या प्रधानमंत्री कार्यालय की ओर से नाम बदलने के कारणों को लेकर कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया गया है।

  • इजरायल में संवैधानिक संकट: नेतन्याहू सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का आदेश ठुकराया, विपक्ष ने बताया ‘लोकतंत्र पर खतरा’

    इजरायल में संवैधानिक संकट: नेतन्याहू सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का आदेश ठुकराया, विपक्ष ने बताया ‘लोकतंत्र पर खतरा’


    नई दिल्ली। इजरायल में प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की सरकार और देश की सुप्रीम कोर्ट के बीच टकराव अब गंभीर संवैधानिक संकट का रूप लेता दिख रहा है। रविवार को इजरायली कैबिनेट ने सर्वसम्मति से निर्णय लेते हुए सुप्रीम कोर्ट के उस आदेश को मानने से इनकार कर दिया, जिसमें कमर्शियल मीडिया रेगुलेटर सेकेंड अथॉरिटी फॉर टेलीविजन एंड रेडियो को अपना काम जारी रखने की अनुमति दी गई थी। पूर्व प्रधानमंत्री नफ्ताली बेनेट ने इस घटनाक्रम को ‘जंगल राज की आहट’ बताया है।

    पहली बार सरकार ने कोर्ट आदेश को नकारा
    इजरायल के इतिहास में यह पहली बार है जब किसी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश को औपचारिक रूप से अस्वीकार किया है। विवाद की शुरुआत तब हुई जब पिछले महीने सुप्रीम कोर्ट ने सरकार के उन फैसलों पर रोक लगा दी थी, जिनके तहत मीडिया रेगुलेटर की नई परिषद के गठन की प्रक्रिया शुरू की गई थी।

    अदालत ने निर्देश दिया था कि मौजूदा परिषद ही अपना काम जारी रखे, क्योंकि कुछ सदस्यों के इस्तीफे पर राजनीतिक दबाव की आशंका जताई गई थी।

    सरकार का कड़ा रुख
    प्रधानमंत्री नेतन्याहू सरकार ने अदालत के फैसले को खारिज करते हुए कहा कि उसे कानून को बदलने या रद्द करने का अधिकार नहीं है। संचार मंत्री श्लोमो कारही और न्याय मंत्री यारिव लेविन ने संयुक्त बयान में कहा कि सरकार उन आदेशों को स्वीकार नहीं करेगी जो उनके अनुसार कानून के विरुद्ध हैं, और ऐसे आदेशों के आधार पर लिए गए निर्णय अमान्य माने जाएंगे।

    सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि मीडिया रेगुलेटर परिषद के भविष्य के किसी भी फैसले को वह मान्यता नहीं देगी, क्योंकि उसके अनुसार परिषद के पास आवश्यक कानूनी सदस्य संख्या नहीं है।

    विपक्ष और विशेषज्ञों की चेतावनी
    सरकार के इस कदम की विपक्ष और कानूनी विशेषज्ञों ने कड़ी आलोचना की है। डिप्टी अटॉर्नी जनरल गिल लिमोन ने चेतावनी दी कि यदि सरकार चयनात्मक रूप से अदालत के आदेशों का पालन करेगी तो यह कानून के शासन को कमजोर करने की दिशा में गंभीर कदम होगा।

    पूर्व प्रधानमंत्री नफ्ताली बेनेट ने कहा कि अदालत के आदेशों की अवहेलना से देश में अराजकता फैल सकती है और लोकतांत्रिक व्यवस्था कमजोर होगी।

    डेमोक्रेट्स पार्टी के नेता यायर गोलान ने आरोप लगाया कि सरकार चुनाव से पहले न्यायपालिका की शक्ति को कमजोर करने की कोशिश कर रही है, ताकि भविष्य में राजनीतिक फैसलों को प्रभावित किया जा सके।

    मीडिया और लोकतंत्र पर बहस तेज
    पत्रकार संगठनों और लोकतंत्र समर्थक समूहों ने भी सरकार के फैसले पर चिंता जताई है। उनका कहना है कि यह मामला केवल एक मीडिया रेगुलेटर का नहीं, बल्कि इजरायल में प्रेस की स्वतंत्रता, लोकतंत्र और कानून के शासन पर सीधा प्रभाव डालने वाला मुद्दा बन चुका है।