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  • भारत की कारोबारी गतिविधियां अक्टूबर में चार महीने के उच्च स्तर पर पहुंचीं, घरेलू मांग और निर्यात से मिली मजबूती

    भारत की कारोबारी गतिविधियां अक्टूबर में चार महीने के उच्च स्तर पर पहुंचीं, घरेलू मांग और निर्यात से मिली मजबूती

    नई दिल्ली । भारत के निजी क्षेत्र की कारोबारी गतिविधियों में अक्टूबर 2026 के दौरान तेजी दर्ज की गई है। विनिर्माण और सेवा क्षेत्र में नए ऑर्डरों की बढ़ोतरी, घरेलू मांग में मजबूती और विदेशी बाजारों से मिले बेहतर कारोबार के कारण गतिविधियां चार महीने के उच्च स्तर पर पहुंच गईं। अक्टूबर के शुरुआती सर्वेक्षण आंकड़ों के अनुसार, कंपनियों को बाजार की परिस्थितियों में सुधार का लाभ मिला। इसके साथ ही उत्पादन लागत और बिक्री कीमतों पर पड़ने वाले दबाव में भी नरमी दर्ज की गई, जबकि रोजगार वृद्धि की रफ्तार कुछ धीमी रही।

    अक्टूबर में एचएसबीसी फ्लैश इंडिया कंपोजिट आउटपुट इंडेक्स बढ़कर 56.7 पर पहुंच गया, जबकि सितंबर में यह 55.9 था। यह सूचकांक विनिर्माण और सेवा क्षेत्र की संयुक्त कारोबारी गतिविधियों का आकलन करता है। पीएमआई में 50 से ऊपर का स्तर गतिविधियों में विस्तार का संकेत देता है, जबकि इससे नीचे का स्तर संकुचन को दर्शाता है। अक्टूबर का आंकड़ा जून के बाद कारोबारी गतिविधियों में सबसे तेज वृद्धि का संकेत देता है।

    सर्वेक्षण के मुताबिक, विनिर्माण और सेवा क्षेत्र की कंपनियों ने नए ऑर्डरों में बढ़ोतरी और कारोबारी परिस्थितियों में सुधार की जानकारी दी। घरेलू बाजार से मिलने वाली मांग के साथ विदेशी ग्राहकों की ओर से भी ऑर्डर बढ़े। विशेष रूप से निर्यात ऑर्डरों में पिछले छह महीनों की सबसे तेज वृद्धि दर्ज की गई। इससे भारतीय कंपनियों को उत्पादन और सेवाओं से जुड़ी गतिविधियों में तेजी बनाए रखने में मदद मिली।

    विनिर्माण क्षेत्र में उत्पादन और नए ऑर्डरों की वृद्धि सितंबर के आसपास बनी रही, लेकिन निर्यात मांग में तेजी अक्टूबर की प्रमुख विशेषता रही। भारत की मुख्य अर्थशास्त्री प्रांजुल भंडारी के अनुसार, जून 2025 के बाद पहली बार निर्यात ऑर्डरों में इतनी मजबूत बढ़ोतरी देखी गई है। विदेशी बाजारों से मिले बेहतर संकेतों के बीच निर्माताओं ने कच्चे माल और तैयार उत्पादों का भंडार भी बढ़ाया। कंपनियों की यह गतिविधि बढ़ती मांग को पूरा करने की तैयारी के रूप में देखी जा सकती है।

    महंगाई के मोर्चे पर भी आंकड़ों में राहत के संकेत मिले हैं। उत्पादन लागत और बिक्री कीमतों पर दबाव लगातार कम होने की जानकारी सामने आई। लागत संबंधी दबाव में नरमी कंपनियों के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे उत्पादन और बिक्री से जुड़े फैसलों पर असर पड़ सकता है। हालांकि, उपलब्ध आंकड़े यह नहीं बताते कि आने वाले महीनों में महंगाई किस स्तर पर रहेगी। फिलहाल सर्वेक्षण अक्टूबर के दौरान लागत और कीमतों से जुड़े दबावों में कमी का संकेत देता है।

    रोजगार के मामले में स्थिति अपेक्षाकृत मिश्रित रही। निजी क्षेत्र में कर्मचारियों की संख्या बढ़ने की गति धीमी हुई। सेवा क्षेत्र की कंपनियों ने लगातार नौ महीनों तक भर्ती बढ़ाने के बाद अक्टूबर में नई नियुक्तियों को लगभग रोक दिया। कंपनियों का मानना था कि मौजूदा कर्मचारियों की संख्या से कामकाज की जरूरतें पूरी हो रही हैं। वहीं, विनिर्माण क्षेत्र में रोजगार बढ़ा, लेकिन इसकी रफ्तार सीमित रही। इससे स्पष्ट होता है कि कारोबारी गतिविधियों में तेजी के बावजूद भर्ती में समान स्तर का विस्तार नहीं हुआ।

    सर्वेक्षण में लंबित कार्यभार में भी गिरावट दर्ज की गई। कंपनियों के पास पहले से जमा काम का स्तर लगातार तीसरी बार घटा और यह संयुक्त रूप से पिछले साढ़े छह वर्षों की सबसे तेज गिरावट रही। इससे संकेत मिलता है कि कंपनियां लंबित काम को अपेक्षाकृत तेजी से पूरा कर पा रही हैं। अक्टूबर में विनिर्माण पीएमआई 54.9 दर्ज किया गया, जो इस क्षेत्र में लगातार विस्तार को दर्शाता है।

    कुल मिलाकर, अक्टूबर के शुरुआती पीएमआई आंकड़े भारतीय अर्थव्यवस्था के निजी क्षेत्र में मजबूत कारोबारी गति का संकेत देते हैं। घरेलू मांग, निर्यात ऑर्डरों और विनिर्माण गतिविधियों से विस्तार को सहारा मिला है। हालांकि, रोजगार वृद्धि की धीमी रफ्तार यह बताती है कि कारोबार में तेजी का लाभ सभी क्षेत्रों में नई नियुक्तियों के रूप में समान रूप से दिखाई नहीं दिया है।

  • अगले हफ्ते कच्चा तेल, अमेरिका-ईरान तनाव और आर्थिक आंकड़े तय करेंगे शेयर बाजार की दिशा

    अगले हफ्ते कच्चा तेल, अमेरिका-ईरान तनाव और आर्थिक आंकड़े तय करेंगे शेयर बाजार की दिशा

    नई दिल्ली। भारतीय शेयर बाजार के लिए आने वाला कारोबारी सप्ताह कई महत्वपूर्ण घटनाक्रमों और आर्थिक आंकड़ों के लिहाज से अहम रहने वाला है। बाजार की दिशा पर कच्चे तेल की कीमतों, अमेरिका-ईरान के बीच जारी तनाव और देश के प्रमुख आर्थिक आंकड़ों का असर देखने को मिल सकता है। इसके अलावा ऑटो बिक्री, जीएसटी संग्रह, पीएमआई, औद्योगिक उत्पादन, राजकोषीय घाटे और विदेशी मुद्रा भंडार से जुड़े आंकड़े भी निवेशकों के लिए महत्वपूर्ण रहेंगे।

    मध्य पूर्व में जारी तनाव के बीच कच्चे तेल की कीमतों पर बाजार की नजर बनी हुई है। कच्चा तेल 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बना हुआ है। ऐसे में अमेरिका-ईरान तनाव से जुड़ा कोई नया घटनाक्रम बाजार की धारणा को प्रभावित कर सकता है। यदि क्षेत्र में तनाव कम होने के संकेत मिलते हैं तो कच्चे तेल की कीमतों में बदलाव के साथ भारतीय शेयर बाजार पर भी उसका असर दिखाई दे सकता है।

    घरेलू मोर्चे पर अगले सप्ताह कई महत्वपूर्ण आंकड़े जारी होने हैं। इनमें ऑटो बिक्री के आंकड़े, जीएसटी से जुड़े आंकड़े, औद्योगिक और विनिर्माण उत्पादन, पीएमआई, राजकोषीय घाटा तथा विदेशी मुद्रा भंडार शामिल हैं। इन आंकड़ों से अर्थव्यवस्था की मौजूदा स्थिति और कारोबारी गतिविधियों को लेकर संकेत मिल सकते हैं।

    अगले कारोबारी सप्ताह में गांधी जयंती के कारण बाजार में केवल चार सत्रों में कारोबार होगा। छुट्टी के चलते सप्ताह सामान्य कारोबारी सप्ताह की तुलना में छोटा रहेगा। ऐसे में उपलब्ध कारोबारी सत्रों के दौरान वैश्विक घटनाक्रम और घरेलू आंकड़ों पर निवेशकों की प्रतिक्रिया महत्वपूर्ण हो सकती है।

    पिछले कारोबारी सप्ताह में भारतीय शेयर बाजार दबाव में रहा। सेंसेक्स 399.22 अंक यानी 0.54 प्रतिशत की गिरावट के साथ 73,895.74 अंक पर बंद हुआ। वहीं निफ्टी 205.90 अंक यानी 0.88 प्रतिशत कमजोर होकर 23,140.50 अंक पर रहा।

    21 से 25 सितंबर के दौरान बड़े शेयरों के साथ मिडकैप और स्मॉलकैप सूचकांकों में भी गिरावट दर्ज की गई। निफ्टी मिडकैप 100 इंडेक्स 1,285.25 अंक यानी 2.07 प्रतिशत गिरकर 60,906 अंक पर बंद हुआ। निफ्टी स्मॉलकैप 100 इंडेक्स में 160.45 अंक यानी 0.81 प्रतिशत की कमजोरी रही और यह 19,715.25 अंक पर बंद हुआ।

    क्षेत्रीय प्रदर्शन की बात करें तो पिछले सप्ताह कुछ सेक्टरों में बढ़त रही। निफ्टी रियल्टी में 2.98 प्रतिशत, कंज्यूमर ड्यूरेबल्स में 1.14 प्रतिशत, फार्मा में 1.10 प्रतिशत, एफएमसीजी में 1.04 प्रतिशत, इंडिया डिफेंस में 0.53 प्रतिशत और हेल्थकेयर में 0.39 प्रतिशत की तेजी दर्ज की गई।

    दूसरी ओर आईटी क्षेत्र में 2.40 प्रतिशत की गिरावट रही। निफ्टी फाइनेंशियल सर्विसेज 1.63 प्रतिशत, सर्विसेज 1.53 प्रतिशत, प्राइवेट बैंक 1.49 प्रतिशत, इंफ्रा 1.26 प्रतिशत और एनर्जी 0.88 प्रतिशत कमजोर रहे।

    अब अगले सप्ताह बाजार की नजर वैश्विक तनाव, कच्चे तेल और घरेलू आर्थिक आंकड़ों पर रहेगी। इन घटनाक्रमों के साथ चार कारोबारी सत्रों में होने वाली गतिविधियां शेयर बाजार की दिशा के लिए महत्वपूर्ण रहेंगी।

  • सितंबर में भारत की निजी अर्थव्यवस्था ने पकड़ी रफ्तार, कंपोजिट पीएमआई बढ़कर 56.5 पर पहुंचा

    सितंबर में भारत की निजी अर्थव्यवस्था ने पकड़ी रफ्तार, कंपोजिट पीएमआई बढ़कर 56.5 पर पहुंचा

    नई दिल्ली ।भारत के निजी क्षेत्र में सितंबर के दौरान आर्थिक गतिविधियों में मजबूती देखने को मिली है। मैन्युफैक्चरिंग और सर्विस सेक्टर में बेहतर प्रदर्शन के चलते कंपोजिट पीएमआई बढ़कर 56.5 पर पहुंच गया। अगस्त में यह आंकड़ा 54.3 था। सितंबर का स्तर जून के बाद निजी क्षेत्र की गतिविधियों में सबसे तेज विस्तार को दर्शाता है।

    एचएसबीसी फ्लैश इंडिया कंपोजिट पीएमआई में देश के मैन्युफैक्चरिंग और सर्विस दोनों क्षेत्रों की गतिविधियों को शामिल किया जाता है। सितंबर के आंकड़ों के अनुसार, दोनों क्षेत्रों की कंपनियों ने कारोबार में विस्तार दर्ज किया। नए ऑर्डर और रोजगार में भी बढ़ोतरी हुई, जबकि महंगाई का दबाव कम होने और कारोबारी भरोसे में सुधार के संकेत मिले।

    आंकड़ों के मुताबिक, सितंबर में निजी क्षेत्र की कारोबारी गतिविधियां अपने दीर्घकालिक औसत से ऊपर पहुंच गईं। मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र की मजबूती ने संयुक्त गतिविधियों की रफ्तार बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस दौरान उत्पादन और घरेलू नए ऑर्डर में तेज वृद्धि दर्ज की गई।

    सितंबर में कंपनियों के कुल नए कारोबार में भी मजबूत बढ़ोतरी हुई। मैन्युफैक्चरिंग और सर्विस दोनों क्षेत्रों में मांग बढ़ी, लेकिन सामान बनाने वाली कंपनियों में इसका असर ज्यादा स्पष्ट रहा। मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों की बिक्री में वृद्धि सात महीनों के उच्चतम स्तर तक पहुंच गई।

    सर्विस सेक्टर की कंपनियों ने नए ऑर्डर हासिल करने में मार्केटिंग गतिविधियों को उपयोगी बताया। सर्वेक्षण के गुणात्मक हिस्से में प्रॉपर्टी सेवाओं, परिवहन सेवाओं और नई यात्रा बुकिंग से जुड़ी मांग में बढ़ोतरी का उल्लेख किया गया।

    मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र में भी कई उत्पादों की मांग बढ़ने की जानकारी सामने आई। कंपनियों ने एल्युमीनियम उत्पादों, इलेक्ट्रॉनिक सामान, खाद्य एवं पेय पदार्थों और फार्मास्युटिकल उत्पादों के साथ नए मॉडलों की मांग में बढ़ोतरी दर्ज की।

    सितंबर के दौरान रोजगार के मोर्चे पर भी सकारात्मक गतिविधि देखने को मिली। कंपनियों ने उत्पादन और नए ऑर्डर में लगातार वृद्धि के बीच अपनी स्टाफिंग क्षमता बढ़ाई। मैन्युफैक्चरिंग और सर्विस दोनों क्षेत्रों में नई नौकरियां पैदा हुईं। दोनों क्षेत्रों में रोजगार विस्तार की दर लगभग समान रही।

    आर्थिक गतिविधियों में तेजी के साथ कंपनियों ने भविष्य की जरूरतों को देखते हुए इनपुट खरीद भी बढ़ाई। तैयार माल के स्टॉक से जुड़े सूचकांक में भी उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की गई। यह सूचकांक करीब साढ़े 11 साल के उच्चतम स्तर पर पहुंच गया।

    हालांकि, मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों के लिए लागत से जुड़ा दबाव बढ़ने के संकेत भी मिले। इनपुट कीमतों में बढ़ोतरी के बीच कंपनियों ने अपने मार्जिन को सुरक्षित रखने के लिए आउटपुट की कीमतों में भी वृद्धि की। इससे उत्पादों की कीमतों पर महंगाई का दबाव बढ़ने की स्थिति बनी।

    आर्थिक गतिविधियों के मजबूत रहने के बावजूद कंपनियों ने वैश्विक स्तर पर मौजूद अनिश्चितताओं को ध्यान में रखते हुए अपनी तैयारियां बढ़ाईं। मध्य पूर्व में बढ़े तनाव के बीच कंपनियों ने संभावित परिस्थितियों से निपटने के लिए बफर तैयार करने पर ध्यान दिया।

    सितंबर के पीएमआई आंकड़ों से निजी क्षेत्र में उत्पादन, नए कारोबार और रोजगार के स्तर पर व्यापक सुधार के संकेत मिले हैं। मैन्युफैक्चरिंग और सर्विस दोनों क्षेत्रों की गतिविधियों में विस्तार के चलते संयुक्त पीएमआई अगस्त के मुकाबले काफी ऊपर रहा और जून के बाद सबसे मजबूत स्तर दर्ज किया गया।

  • ईरान-अमेरिका तनाव और कच्चे तेल की कीमतों के बीच घरेलू आंकड़े तय करेंगे अगले हफ्ते बाजार की दिशा

    ईरान-अमेरिका तनाव और कच्चे तेल की कीमतों के बीच घरेलू आंकड़े तय करेंगे अगले हफ्ते बाजार की दिशा

    नई दिल्ली । भारतीय शेयर बाजार के लिए 22 सितंबर से शुरू होने वाला अगला कारोबारी सप्ताह कई वैश्विक और घरेलू घटनाक्रमों के लिहाज से महत्वपूर्ण रहने वाला है। निवेशकों की नजर मध्यपूर्व में ईरान-अमेरिका तनाव, कच्चे तेल की कीमतों, अमेरिकी टैरिफ से जुड़े फैसलों, बॉन्ड यील्ड, रुपये की चाल और घरेलू आर्थिक आंकड़ों पर रहेगी। इन संकेतकों में होने वाले बदलाव का असर बाजार के उतार-चढ़ाव पर दिखाई दे सकता है।

    मध्यपूर्व में ईरान और अमेरिका के बीच तनाव बाजार के लिए प्रमुख वैश्विक जोखिमों में बना हुआ है। इस क्षेत्र से जुड़ी किसी भी नई खबर का असर निवेशकों की धारणा पर पड़ सकता है। खासकर कच्चे तेल की कीमतों में तेज बदलाव का असर भारत जैसे बड़े तेल आयातक देश के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।

    अमेरिकी टैरिफ से जुड़े घटनाक्रम भी भारतीय बाजार के लिए अहम रहेंगे। अमेरिका में रूस पर प्रतिबंध लगाने से संबंधित एक विधेयक को प्रतिनिधि सभा से मंजूरी मिलने के बाद इस पर नजर बनी हुई है। प्रस्तावित व्यवस्था के तहत राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को रूस से तेल और गैस खरीदने वाले देशों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का अधिकार मिल सकता है।

    इस तरह के किसी कदम का प्रभाव भारत और चीन जैसे बड़े ऊर्जा आयातकों पर पड़ सकता है। इससे वैश्विक व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति से जुड़े समीकरण प्रभावित होने की आशंका भी बनी रहेगी। इसलिए निवेशक अमेरिकी व्यापार नीति और उससे जुड़े अगले कदमों को करीब से देखेंगे।

    कच्चे तेल की कीमतें भारतीय शेयर बाजार के लिए एक अन्य महत्वपूर्ण संकेतक रहेंगी। तेल की लागत में बढ़ोतरी से महंगाई पर दबाव बढ़ सकता है और इससे आर्थिक विकास को लेकर चिंताएं भी पैदा हो सकती हैं। बीते सप्ताह बाजार की धारणा पर ऊर्जा लागत को लेकर ऐसी ही चिंताओं का असर दिखाई दिया।

    विदेशी संस्थागत निवेशकों की गतिविधियां भी बाजार की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी। 18 सितंबर को विदेशी संस्थागत निवेशक भारतीय नकद बाजार में शुद्ध खरीदार रहे और उन्होंने 599.54 करोड़ रुपये की खरीदारी की। इसी दिन घरेलू संस्थागत निवेशकों ने भी 1,019.69 करोड़ रुपये की शुद्ध खरीदारी की।

    रुपये और अमेरिकी डॉलर की चाल पर भी निवेशकों की नजर रहेगी। मुद्रा बाजार में उतार-चढ़ाव का असर कंपनियों की लागत, आयात और विदेशी निवेश के प्रवाह पर पड़ सकता है। इसके अलावा अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में बदलाव भी वैश्विक निवेश प्रवाह को प्रभावित करने वाला प्रमुख संकेतक बना रहेगा।

    घरेलू मोर्चे पर पीएमआई और बुनियादी ढांचे से जुड़े आंकड़े अगले सप्ताह जारी होने हैं। इन आंकड़ों से देश की आर्थिक गतिविधियों की स्थिति का संकेत मिलेगा। निवेशक इन आंकड़ों को आर्थिक वृद्धि की गति और कारोबारी माहौल के आकलन के लिए देख सकते हैं।

    भारतीय शेयर बाजार ने पिछला सप्ताह कमजोर स्तर पर समाप्त किया। सेंसेक्स 0.65 प्रतिशत की गिरावट के साथ 74,294.46 अंक पर बंद हुआ, जबकि निफ्टी 0.22 प्रतिशत फिसलकर 23,346.40 अंक पर रहा। ऐसे में अगले सप्ताह वैश्विक तनाव, तेल की कीमत, टैरिफ और घरेलू आंकड़ों के बीच बाजार की गतिविधियों पर निवेशकों की नजर बनी रहेगी।

  • जुलाई में भारत के निजी क्षेत्र की रफ्तार धीमी, कंपोजिट पीएमआई 54.3 पर; निर्यात मांग ने मैन्युफैक्चरिंग को दिया मजबूत सहारा

    जुलाई में भारत के निजी क्षेत्र की रफ्तार धीमी, कंपोजिट पीएमआई 54.3 पर; निर्यात मांग ने मैन्युफैक्चरिंग को दिया मजबूत सहारा

    नई दिल्ली । जुलाई महीने में भारत के निजी क्षेत्र की आर्थिक गतिविधियों में वृद्धि का क्रम जारी रहा, हालांकि इसकी रफ्तार जून की तुलना में कुछ धीमी दर्ज की गई। ताजा आंकड़ों के अनुसार जुलाई में कंपोजिट परचेजिंग मैनेजर्स इंडेक्स (पीएमआई) 54.3 रहा। यह स्तर इस बात का संकेत है कि देश की आर्थिक गतिविधियां अब भी विस्तार के चरण में हैं, क्योंकि पीएमआई का 50 से ऊपर रहना आर्थिक वृद्धि का संकेत माना जाता है। हालांकि जून में यह सूचकांक 57.1 था, जिससे स्पष्ट है कि जुलाई में विकास की गति कुछ कम हुई है।

    जुलाई के दौरान निजी क्षेत्र के प्रदर्शन में सर्विस सेक्टर की सुस्ती प्रमुख कारण रही। कारोबार से जुड़े नए ऑर्डरों की रफ्तार कमजोर पड़ी और ग्राहकों की ओर से पूछताछ में कमी देखने को मिली। कई कंपनियों ने मांग में नरमी और कुछ ऑर्डर रद्द होने की वजह से सेवा गतिविधियों में अपेक्षाकृत धीमी बढ़ोतरी दर्ज की। इसके चलते सर्विस सेक्टर का बिजनेस एक्टिविटी इंडेक्स घटकर 53.1 पर पहुंच गया, जो पिछले 53 महीनों का सबसे निचला स्तर माना जा रहा है।

    इसके विपरीत मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर ने अपेक्षाकृत बेहतर प्रदर्शन किया। वैश्विक बाजारों से लगातार मिल रही मजबूत मांग और निर्यात ऑर्डरों में बढ़ोतरी के कारण उत्पादन गतिविधियां मजबूत बनी रहीं। मुख्य मैन्युफैक्चरिंग पीएमआई में मामूली गिरावट के बावजूद फैक्ट्री उत्पादन सूचकांक में सुधार दर्ज किया गया। इससे संकेत मिलता है कि औद्योगिक उत्पादन की गति बनी हुई है और विनिर्माण क्षेत्र देश की आर्थिक गतिविधियों को सहारा देता रहा।

    व्यापारिक संस्थानों ने भविष्य की संभावित चुनौतियों को देखते हुए अपनी तैयारियां भी तेज कर दी हैं। वैश्विक स्तर पर बढ़ती अनिश्चितताओं और आपूर्ति श्रृंखला पर पड़ने वाले संभावित असर को ध्यान में रखते हुए कंपनियों ने कच्चे माल की खरीद बढ़ाई है। इसके साथ ही तैयार माल और इनपुट इन्वेंट्री में भी वृद्धि दर्ज की गई है, ताकि किसी भी आपूर्ति व्यवधान की स्थिति में उत्पादन प्रभावित न हो।

    सर्वेक्षण के अनुसार लागत का दबाव भी जुलाई में बढ़ा है। कच्चे माल और अन्य इनपुट की कीमतों में वृद्धि के कारण कंपनियों की लागत बढ़ी, जिसका असर उत्पादों और सेवाओं की कीमतों पर भी दिखाई दिया। कई कंपनियों ने बढ़ती लागत के बीच अपने लाभ मार्जिन को सुरक्षित रखने के लिए कीमतों में आवश्यक बदलाव किए। इसके बावजूद रोजगार के मोर्चे पर स्थिति सकारात्मक बनी रही और कंपनियों ने कर्मचारियों की नियुक्ति जारी रखी।

    विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक परिस्थितियों में उतार-चढ़ाव और क्षेत्रीय तनाव के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था का निजी क्षेत्र अभी भी मजबूती का संकेत दे रहा है। निर्यात आधारित मांग, उत्पादन गतिविधियों की स्थिरता और रोजगार सृजन जैसे कारक आर्थिक विस्तार को समर्थन दे रहे हैं। हालांकि घरेलू मांग में सुधार और सर्विस सेक्टर की गति बढ़ाना आने वाले महीनों में आर्थिक विकास के लिए महत्वपूर्ण रहेगा।

    कुल मिलाकर जुलाई के आंकड़े यह संकेत देते हैं कि भारत की अर्थव्यवस्था विस्तार के मार्ग पर बनी हुई है, लेकिन विकास की गति को बनाए रखने के लिए घरेलू मांग को मजबूत करना, निवेश बढ़ाना और वैश्विक अनिश्चितताओं के प्रभाव को सीमित करना आवश्यक होगा। यदि आने वाले महीनों में मांग और कारोबारी विश्वास में सुधार होता है तो निजी क्षेत्र की आर्थिक गतिविधियां फिर से तेज रफ्तार पकड़ सकती हैं।

  • भारतीय मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में स्थिर सुधार, अप्रैल में PMI ने दिखाया मजबूत प्रदर्शन

    भारतीय मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में स्थिर सुधार, अप्रैल में PMI ने दिखाया मजबूत प्रदर्शन

    नई दिल्ली।भारत का मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर लगातार मजबूती की ओर बढ़ रहा है और ताजा आंकड़े इस बात की पुष्टि करते हैं कि औद्योगिक गतिविधियों में स्थिर सुधार देखा जा रहा है। अप्रैल महीने में मैन्युफैक्चरिंग परचेजिंग मैनेजर्स इंडेक्स यानी पीएमआई बढ़कर 54.7 पर पहुंच गया, जो पिछले महीने के 53.9 की तुलना में बेहतर प्रदर्शन को दर्शाता है। यह वृद्धि मुख्य रूप से नए ऑर्डर में बढ़ोतरी, उत्पादन में तेजी और रोजगार के अवसरों में सुधार के कारण सामने आई है।
    अप्रैल के आंकड़ों से यह स्पष्ट होता है कि देश के मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में मांग अभी भी मजबूत बनी हुई है। खासकर निर्यात के क्षेत्र में सुधार देखने को मिला है, जहां पिछले कई महीनों की तुलना में सबसे तेज वृद्धि दर्ज की गई है। इसका संकेत है कि अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भारतीय उत्पादों की मांग बढ़ रही है, जिससे उद्योग जगत को नई ऊर्जा मिल रही है।
    हालांकि, इस सकारात्मक रुझान के साथ कुछ चुनौतियां भी सामने आई हैं। वैश्विक स्तर पर जारी तनाव और अनिश्चितताओं, विशेषकर मध्य पूर्व में चल रहे हालात, का असर लागत पर दिखाई दे रहा है। इनपुट कॉस्ट में बढ़ोतरी हुई है, जिससे उत्पादन खर्च में भी इजाफा दर्ज किया गया है। इसके साथ ही आउटपुट कीमतों में भी तेजी देखी गई है, जो पिछले कई महीनों में सबसे अधिक मानी जा रही है।
    इसके बावजूद उत्पादन गतिविधियां स्थिर बनी हुई हैं। कंपनियों ने बताया है कि घरेलू मांग और विज्ञापन गतिविधियों ने बिक्री और उत्पादन को समर्थन दिया है। हालांकि, प्रतिस्पर्धा का दबाव और कुछ ग्राहकों द्वारा ऑर्डर को अंतिम रूप देने में देरी के कारण विकास की गति थोड़ी प्रभावित हुई है।
    उद्योग जगत के प्रतिभागियों का मानना है कि मौजूदा परिस्थितियों के बावजूद भविष्य को लेकर भरोसा बना हुआ है। कंपनियां आने वाले महीनों में बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद कर रही हैं और नए निवेश तथा उत्पादन क्षमता बढ़ाने पर ध्यान दे रही हैं। हालांकि, इस विश्वास में पिछले महीने की तुलना में हल्की कमी जरूर देखी गई है, लेकिन यह अभी भी एक सकारात्मक स्तर पर बना हुआ है।
    कुल मिलाकर भारत का मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर एक स्थिर और मजबूत विकास पथ पर आगे बढ़ रहा है। घरेलू मांग, निर्यात में सुधार और उत्पादन गतिविधियों की निरंतरता इस वृद्धि के प्रमुख आधार हैं। यदि वैश्विक परिस्थितियां अनुकूल रहती हैं, तो आने वाले समय में इस क्षेत्र में और भी मजबूती देखने को मिल सकती है।