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  • झांसी में प्रैक्टिकल के अंक बढ़ाने का झांसा देकर छात्रा से दुष्कर्म का आरोप, स्कूल का लिपिक गिरफ्तार

    झांसी में प्रैक्टिकल के अंक बढ़ाने का झांसा देकर छात्रा से दुष्कर्म का आरोप, स्कूल का लिपिक गिरफ्तार

    नई दिल्ली । उत्तर प्रदेश के झांसी जिले में 12वीं कक्षा की नाबालिग छात्रा से कथित दुष्कर्म और धमकी देने के मामले में पुलिस ने स्कूल के लिपिक सुरेंद्र पाल को गिरफ्तार किया है। आरोपी पर आरोप है कि उसने प्रैक्टिकल परीक्षा में अंक बढ़ाने का लालच देकर छात्रा को अपने पास बुलाया और उसके साथ दुष्कर्म किया। छात्रा की शिकायत के आधार पर पुलिस ने मामला दर्ज कर जांच शुरू की थी। पुलिस के अनुसार, जांच के बाद आरोपी को गिरफ्तार कर न्यायालय में पेश किया गया है।

    यह मामला झांसी के रक्सा थाना क्षेत्र का है। पुलिस के मुताबिक, आरोपी सुरेंद्र पाल पुनावली कला गांव का निवासी है और संबंधित स्कूल में लिपिक के पद पर कार्यरत था। पीड़िता की ओर से 22 अक्टूबर 2026 को थाने में शिकायत दर्ज कराई गई थी। शिकायत में छात्रा ने आरोप लगाया कि आरोपी ने पढ़ाई और प्रैक्टिकल के अंकों से जुड़ा लालच देकर उसे बहलाया-फुसलाया और फिर उसके साथ जबरन संबंध बनाए।

    पीड़िता ने अपनी शिकायत में आरोपी पर लगातार संपर्क करने और बार-बार अपने पास आने का दबाव बनाने का भी आरोप लगाया है। इसके अलावा, छात्रा का कहना है कि आरोपी ने उसकी अश्लील तस्वीरें और वीडियो सार्वजनिक करने की धमकी दी। शिकायत के अनुसार, आरोपी ने परिवार के सदस्यों को जान से मारने की धमकी भी दी थी। इन आरोपों की गंभीरता को देखते हुए पुलिस ने संबंधित कानूनी प्रावधानों के तहत मामला दर्ज कर विवेचना शुरू की।

    पुलिस ने इस प्रकरण में भारतीय न्याय संहिता की धारा 64(1) और 351(3) के साथ लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम यानी पॉक्सो एक्ट के तहत कार्रवाई की है। धारा 64(1) दुष्कर्म से संबंधित अपराध के लिए लागू होती है, जबकि धारा 351(3) आपराधिक धमकी से जुड़ी है। नाबालिग पीड़िता से संबंधित मामले में पॉक्सो अधिनियम के प्रावधान भी शामिल किए गए हैं।

    पुलिस के अनुसार, आरोपी को 22 अक्टूबर को सुबह करीब 7:34 बजे मुखबिर से मिली सूचना के आधार पर सारमऊ तिराहे से गिरफ्तार किया गया। कार्रवाई के दौरान पुलिस टीम ने आरोपी को हिरासत में लेकर कानूनी प्रक्रिया पूरी की। इसके बाद उसे न्यायालय के समक्ष पेश किया गया। पुलिस ने बताया कि मामले में आगे की विधिक कार्रवाई जारी है।

    एसपी सिटी प्रीति सिंह के मुताबिक, छात्रा की शिकायत मिलने के बाद पुलिस ने मामले की जांच की और आरोपों से संबंधित तथ्यों की पड़ताल की। पुलिस का कहना है कि जांच के दौरान सामने आए तथ्यों के आधार पर नामजद आरोपी को गिरफ्तार किया गया है। हालांकि, मामले में लगाए गए आरोपों पर अंतिम निर्णय न्यायिक प्रक्रिया के तहत होगा।

    आरोपी की गिरफ्तारी करने वाली पुलिस टीम में उपनिरीक्षक सूरज सिंह, हेड कांस्टेबल अजमत उल्ला और कांस्टेबल रविकांत शामिल थे। पुलिस अब मामले से जुड़े अन्य पहलुओं की जांच कर रही है। नाबालिग की पहचान और उससे जुड़ी निजी जानकारी को सार्वजनिक करना कानून के तहत प्रतिबंधित हो सकता है, इसलिए पीड़िता की पहचान उजागर करने वाले विवरण सामने नहीं रखे गए हैं।

    यह मामला शैक्षणिक संस्थान में विद्यार्थियों की सुरक्षा और अंक बढ़ाने के नाम पर कथित रूप से दबाव बनाए जाने के आरोपों से जुड़ा है। पुलिस की ओर से की गई गिरफ्तारी के बाद अब आगे की कार्रवाई न्यायालय में होने वाली कार्यवाही और जांच में सामने आने वाले तथ्यों के आधार पर आगे बढ़ेगी।

  • इंदौर गरबा विवाद में बीजेपी नेता कमल सिंह चौहान पर पॉक्सो की धाराएं, एफआईआर में नाबालिग ने लगाए गंभीर आरोप

    इंदौर गरबा विवाद में बीजेपी नेता कमल सिंह चौहान पर पॉक्सो की धाराएं, एफआईआर में नाबालिग ने लगाए गंभीर आरोप


    मध्य प्रदेश:
    के इंदौर में गरबा आयोजन के दौरान नाबालिग लड़की के साथ कथित अभद्रता का मामला सामने आने के बाद भारतीय जनता पार्टी के मंडल अध्यक्ष कमल सिंह चौहान की मुश्किलें बढ़ गई हैं। उनके खिलाफ पॉक्सो एक्ट की धारा 7 और 8 के साथ भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 74 और 75(2) के तहत मामला दर्ज किया गया है। शिकायत में लड़की ने आरोप लगाया है कि चौहान ने उसका हाथ पकड़ा, खींचा और सीने पर हाथ मारते हुए धक्का दिया। दूसरी ओर, चौहान ने अपने ऊपर लगे आरोपों पर सफाई देते हुए पूरे मामले की जांच कराने की मांग की है।

    यह मामला विधानसभा क्षेत्र क्रमांक दो में आयोजित मां कनकेश्वरी गरबा उत्सव से जुड़ा है। घटना 15 और 16 अक्टूबर की दरमियानी रात की बताई गई है। शिकायत 17 वर्षीय लड़की ने 17 अक्टूबर को दर्ज कराई। आयोजन के दौरान लड़की को धक्का दिए जाने का वीडियो सामने आने के बाद मामला चर्चा में आया। इसके बाद पार्टी ने भी चौहान से जवाब मांगा और उन्हें तीन दिन के भीतर अपना पक्ष रखने के लिए नोटिस जारी किया।

    एफआईआर में दर्ज शिकायत के मुताबिक, लड़की की छोटी बहन गरबा आयोजन में शामिल थी। गरबा करते समय उसे प्यास लगी तो बड़ी बहन ने उसे पानी पिलाया। इस दौरान छोटी बहन का पास बड़ी बहन के पास ही रह गया। वह पास लौटाने के लिए अपनी बहन को आवाज लगा रही थी। इसी बीच कमल सिंह चौहान वहां पहुंचे और उससे पूछने लगे कि वह पास क्यों बदल रही है।

    लड़की ने शिकायत में बताया कि उसने चौहान को स्पष्ट किया कि वह पास नहीं बदल रही, बल्कि उसकी बहन का पास उसके पास रह गया है। आरोप है कि इसके बाद चौहान ने उसका हाथ गलत तरीके से पकड़ा और खींचा। लड़की के मुताबिक, उन्होंने उसके सीने पर हाथ मारते हुए जोर से धक्का भी दिया। शिकायत में यह भी आरोप लगाया गया है कि चौहान ने कहा कि यहां हजारों लड़कियां आती हैं और उन्हें मालूम है कि वे क्या करती हैं। लड़की ने कहा कि इस तरह छुआ जाना उसे अच्छा नहीं लगा। उसने अपने पिता के साथ भी गलत व्यवहार किए जाने का आरोप लगाते हुए पुलिस से कार्रवाई की मांग की।

    मामले में पॉक्सो एक्ट की धारा 7 और 8 लगाए जाने की वजह भी शिकायत में दर्ज आरोपों से जुड़ी है। धारा 7 के तहत बच्चे के साथ यौन मंशा से शारीरिक संपर्क बनाने या ऐसा कृत्य करने का आरोप आने पर कार्रवाई हो सकती है। इसमें कपड़ों के ऊपर से किया गया संपर्क भी परिस्थितियों और कथित मंशा के आधार पर शामिल हो सकता है। धारा 8 में इस अपराध के लिए सजा का प्रावधान है। दोष सिद्ध होने पर तीन से पांच साल तक की कैद और जुर्माना लगाया जा सकता है।

    इसके अलावा, बीएनएस की धारा 74 महिला की गरिमा को ठेस पहुंचाने की नीयत से हमला करने या आपराधिक बल के इस्तेमाल से संबंधित है। धारा 75 यौन उत्पीड़न से जुड़े कृत्यों को परिभाषित करती है, जब
    कि इसकी उपधारा 75(2) में संबंधित अपराध के लिए सजा का प्रावधान है। इन धाराओं के तहत कार्रवाई का आधार शिकायत में लगाए गए आरोप हैं। आरोप सही हैं या नहीं, इसका अंतिम निर्धारण जांच और न्यायिक प्रक्रिया के बाद होगा।

    उधर, कमल सिंह चौहान ने वीडियो जारी कर अपनी सफाई दी है। उन्होंने कहा कि वह पिछले दस वर्षों से गरबा आयोजन में सेवा दे रहे हैं और अब तक ऐसी घटना नहीं हुई। चौहान का दावा है कि लड़की के पिता शराब पीकर आयोजन में आए थे। उनके मुताबिक, वह पिता को समझाने पहुंचे थे, तभी लड़की बीच में आ गई और उनसे बहस करने लगी। उन्होंने आरोप लगाया कि लड़की ने गाली भी दी और समझाने के बावजूद नहीं मानी। चौहान ने कहा कि जब उन्होंने उसे बाहर निकाला, तब यह घटना हुई।

    चौहान ने यह भी कहा कि यदि उनके व्यवहार से किसी को बुरा लगा है तो वह माफी मांगते हैं। उन्होंने लड़की से भी माफी मांगने की बात कही और मुख्यमंत्री, भाजपा प्रदेश अध्यक्ष तथा नगर अध्यक्ष से मामले की जांच कराने की मांग की। उन्होंने कहा कि यदि जांच में वह दोषी पाए जाते हैं तो उन्हें फांसी पर चढ़ा दिया जाए। फिलहाल, मामला दर्ज होने के बाद आरोपों की जांच और दोनों पक्षों के बयानों के आधार पर आगे की कार्रवाई महत्वपूर्ण होगी।

  • जमुई नाबालिग की तस्वीर विवाद पर तेजस्वी ने CM सम्राट चौधरी के खिलाफ सजा की मांग की, जानिए POCSO के कड़े प्रावधान

    जमुई नाबालिग की तस्वीर विवाद पर तेजस्वी ने CM सम्राट चौधरी के खिलाफ सजा की मांग की, जानिए POCSO के कड़े प्रावधान

    नई दिल्ली ।बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी से जुड़े एक सोशल मीडिया पोस्ट को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। आरोप है कि जमुई की एक नाबालिग पीड़िता और उसके परिवार से मुलाकात के दौरान ली गई तस्वीर को इस तरह सार्वजनिक किया गया, जिससे बच्ची की पहचान उजागर होने की स्थिति बनी। विवाद सामने आने के बाद पोस्ट को हटा दिया गया। इस मामले को लेकर विपक्ष की ओर से मुख्यमंत्री के खिलाफ कार्रवाई और सजा की मांग की गई है।

    नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने इस मामले में पॉक्सो यानी बच्चों को यौन अपराधों से संरक्षण देने वाले कानून का हवाला दिया है। उनका कहना है कि नाबालिग पीड़िता की पहचान सार्वजनिक करना कानून के प्रावधानों के दायरे में आता है और इसके लिए जिम्मेदारी तय की जानी चाहिए। हालांकि, किसी व्यक्ति के खिलाफ कानूनी दोष सिद्ध होना जांच और न्यायिक प्रक्रिया पर निर्भर करता है।

    दरअसल, जमुई जिले में 19 सितंबर को दसवीं कक्षा की एक नाबालिग छात्रा और उसके दोस्त के साथ युवकों द्वारा कथित तौर पर छेड़खानी और बदसलूकी की घटना सामने आई थी। घटना से जुड़ा वीडियो भी सोशल मीडिया पर प्रसारित हुआ था। मामले ने कानून-व्यवस्था और नाबालिग पीड़िता की सुरक्षा को लेकर सवाल खड़े किए।

    इसी मामले के बाद मुख्यमंत्री ने पीड़िता और उसके परिवार से मुलाकात की थी। मुलाकात के बाद जारी किए गए पोस्ट में बच्ची और उसके परिवार को न्याय का भरोसा दिलाने की बात कही गई थी। पोस्ट में यह भी कहा गया था कि मामले में दोषियों के खिलाफ स्पीडी ट्रायल के जरिए एक महीने के भीतर कठोर सजा सुनिश्चित करने की कोशिश की जाएगी। विवाद इस बात को लेकर हुआ कि पोस्ट में पीड़िता की पहचान छिपाने के पर्याप्त इंतजाम नहीं किए गए थे।

    POCSO कानून वर्ष 2012 में बच्चों को यौन अपराधों से सुरक्षा देने के उद्देश्य से लागू किया गया था। इसके तहत 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को संरक्षण दिया जाता है। कानून में बच्चों के खिलाफ होने वाले विभिन्न यौन अपराधों की पहचान, जांच और न्यायिक प्रक्रिया के दौरान उनके हितों की सुरक्षा के लिए विशेष प्रावधान किए गए हैं।

    इस कानून में नाबालिग पीड़ित या पीड़िता की पहचान और निजता को लेकर भी विशेष सुरक्षा दी गई है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी बच्चे को कानूनी कार्रवाई के दौरान ऐसी स्थिति का सामना न करना पड़े, जिससे उसकी पहचान सार्वजनिक हो या उसकी गरिमा प्रभावित हो।

    POCSO की धारा 23 इसी विषय से संबंधित है। इसके तहत बच्चे से जुड़े मामले की रिपोर्टिंग या टिप्पणी करते समय उसकी निजता और सम्मान का ध्यान रखना जरूरी है। ऐसी जानकारी सार्वजनिक करने पर रोक है, जिससे बच्चे की पहचान सामने आ सकती है।

    पहचान के दायरे में बच्चे का नाम, पता, तस्वीर, परिवार से जुड़ी जानकारी, स्कूल, पड़ोस या ऐसी कोई अन्य जानकारी शामिल हो सकती है, जिससे उसकी पहचान का पता लगाया जा सके। कानून का उद्देश्य विशेष रूप से यह है कि यौन अपराध से प्रभावित बच्चे की पहचान सार्वजनिक न हो और उसकी निजता सुरक्षित रहे।

    धारा 23 के प्रावधानों के उल्लंघन पर छह महीने से एक वर्ष तक की जेल, जुर्माना या दोनों का प्रावधान बताया गया है। हालांकि किसी विशेष मामले में यह धारा लागू होती है या नहीं, यह संबंधित तथ्यों, जांच और कानूनी प्रक्रिया के आधार पर तय किया जाता है।

    जमुई मामले में तस्वीर को लेकर उठे विवाद के बाद अब मुख्य मुद्दा यही है कि नाबालिग की पहचान सार्वजनिक होने के आरोप की कानूनी जांच किस तरह आगे बढ़ती है। राजनीतिक स्तर पर इस मामले को लेकर आरोप-प्रत्यारोप जारी हैं, जबकि कानूनी जिम्मेदारी का निर्धारण संबंधित प्रक्रिया के बाद ही किया जा सकता है।

  • नाबालिग रेप पीड़िता के स्वास्थ्य और हितों को प्राथमिकता, बॉम्बे हाईकोर्ट ने 27 सप्ताह की गर्भावस्था समाप्त करने की दी मंजूरी

    नाबालिग रेप पीड़िता के स्वास्थ्य और हितों को प्राथमिकता, बॉम्बे हाईकोर्ट ने 27 सप्ताह की गर्भावस्था समाप्त करने की दी मंजूरी

    नई दिल्ली । बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर खंडपीठ ने एक महत्वपूर्ण और संवेदनशील मामले में 16 वर्षीय रेप पीड़िता को 27 सप्ताह की गर्भावस्था समाप्त कराने की अनुमति प्रदान की है। अदालत ने यह फैसला मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट और पीड़िता की शारीरिक तथा मानसिक स्थिति का विस्तृत मूल्यांकन करने के बाद सुनाया। न्यायालय ने माना कि इस मामले में पीड़िता के सर्वोत्तम हित, स्वास्थ्य और भविष्य को प्राथमिकता देना आवश्यक है।

    मामले के अनुसार नाबालिग लड़की यौन शोषण की शिकार हुई थी, जिसके परिणामस्वरूप वह गर्भवती हो गई। गर्भावस्था 27 सप्ताह तक पहुंच चुकी थी। गर्भावस्था की इस अवधि में चिकित्सकीय गर्भसमापन के लिए न्यायालय की अनुमति आवश्यक होती है। इसी कारण पीड़िता की ओर से अदालत का दरवाजा खटखटाया गया, जहां पूरे मामले पर संवेदनशीलता के साथ सुनवाई की गई।

    सुनवाई के दौरान अदालत के समक्ष मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट प्रस्तुत की गई। रिपोर्ट में पीड़िता की उम्र, स्वास्थ्य और गर्भावस्था जारी रहने से उसके शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ने वाले संभावित प्रभावों का उल्लेख किया गया। न्यायालय ने रिपोर्ट का अध्ययन करने के बाद माना कि इस परिस्थिति में गर्भावस्था को जारी रखना पीड़िता के लिए गंभीर जोखिम पैदा कर सकता है। इसी आधार पर अदालत ने चिकित्सकीय गर्भसमापन की अनुमति देने का निर्णय लिया।

    हाईकोर्ट ने अपने आदेश में संबंधित अस्पताल को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया कि पूरी चिकित्सकीय प्रक्रिया निर्धारित नियमों और विशेषज्ञों की निगरानी में संपन्न हो। अदालत ने विशेष रूप से कहा कि उपचार के दौरान पीड़िता की सुरक्षा, गरिमा और गोपनीयता का पूर्ण संरक्षण किया जाए। साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाए कि उसे आवश्यक चिकित्सकीय और मनोवैज्ञानिक सहायता उपलब्ध कराई जाए।

    इस फैसले को नाबालिग यौन उत्पीड़न पीड़ितों से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण न्यायिक निर्णय माना जा रहा है। अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में केवल कानूनी प्रक्रिया ही नहीं, बल्कि पीड़िता के जीवन, स्वास्थ्य और मानसिक स्थिति का समग्र मूल्यांकन भी आवश्यक है। न्यायालय का उद्देश्य पीड़िता के अधिकारों और हितों की रक्षा करना है ताकि उसे भविष्य में अनावश्यक शारीरिक और मानसिक कठिनाइयों का सामना न करना पड़े।

    विशेषज्ञों का मानना है कि इस प्रकार के मामलों में मेडिकल बोर्ड की राय महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। अदालतें प्रत्येक मामले के तथ्यों, चिकित्सकीय स्थिति और कानूनी प्रावधानों के आधार पर अलग-अलग निर्णय लेती हैं। इसलिए ऐसे मामलों में कोई भी फैसला परिस्थितियों और उपलब्ध चिकित्सा साक्ष्यों को ध्यान में रखकर ही लिया जाता है।

    इस मामले में हाईकोर्ट के आदेश के बाद संबंधित अस्पताल अब न्यायालय के निर्देशों के अनुरूप चिकित्सकीय प्रक्रिया पूरी करेगा। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि पूरी प्रक्रिया के दौरान पीड़िता की पहचान और निजी जानकारी पूरी तरह गोपनीय रखी जाए। न्यायालय का यह निर्णय नाबालिग पीड़ितों के अधिकारों, स्वास्थ्य सुरक्षा और न्यायिक संवेदनशीलता के संतुलन का महत्वपूर्ण उदाहरण माना जा रहा है।

  • इंस्टाग्राम पर नाबालिग छात्राओं को जाल में फंसाने का आरोप, अश्लील चैट और वीडियो भेजकर बनाता था दबाव, POCSO के तहत मामला दर्ज

    इंस्टाग्राम पर नाबालिग छात्राओं को जाल में फंसाने का आरोप, अश्लील चैट और वीडियो भेजकर बनाता था दबाव, POCSO के तहत मामला दर्ज

    मध्य प्रदेश: के इंदौर में सोशल मीडिया के दुरुपयोग का एक गंभीर मामला सामने आया है। इंस्टाग्राम के माध्यम से दो नाबालिग छात्राओं से कथित रूप से दोस्ती कर उन्हें अश्लील संदेश और वीडियो भेजने तथा मिलने के लिए दबाव बनाने के आरोप में एक 25 वर्षीय युवक के खिलाफ मामला दर्ज किया गया है। पुलिस ने आरोपी के विरुद्ध POCSO एक्ट सहित विभिन्न प्रासंगिक धाराओं में प्रकरण दर्ज कर जांच शुरू कर दी है।

    प्रारंभिक जांच के अनुसार आरोपी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म इंस्टाग्राम के जरिए दोनों छात्राओं से संपर्क स्थापित किया। पहले सामान्य बातचीत के माध्यम से विश्वास जीतने का प्रयास किया गया और बाद में कथित रूप से आपत्तिजनक चैट, अश्लील वीडियो और अनुचित संदेश भेजे जाने लगे। आरोप है कि इसके बाद आरोपी ने छात्राओं पर व्यक्तिगत रूप से मिलने और शारीरिक संबंध बनाने का दबाव भी बनाया।

    मामले का खुलासा तब हुआ जब छात्राओं के परिजनों ने उनके सोशल मीडिया अकाउंट की चैट देखी। बातचीत की सामग्री संदिग्ध लगने पर परिजनों ने तत्काल पुलिस से संपर्क किया। शिकायत मिलने के बाद पुलिस ने पूरे मामले की गंभीरता को देखते हुए संबंधित धाराओं के तहत मामला दर्ज कर लिया और आरोपी के डिजिटल रिकॉर्ड की जांच शुरू कर दी।

    पुलिस के अनुसार आरोपी पिछले कुछ वर्षों से इंदौर में रह रहा था और पढ़ाई के सिलसिले में अलग-अलग स्थानों पर किराये के मकानों में रह चुका है। जांच के दौरान उसके मोबाइल फोन की प्राथमिक पड़ताल में अन्य युवतियों से जुड़ी वीडियो चैट और तस्वीरें भी मिलने की जानकारी सामने आई है। अब पुलिस यह पता लगाने का प्रयास कर रही है कि कहीं इसी तरह की गतिविधियों का दायरा अन्य लोगों तक भी तो नहीं फैला हुआ था।

    जांच एजेंसियां आरोपी के मोबाइल फोन, सोशल मीडिया अकाउंट और डिजिटल संचार के अन्य माध्यमों की फॉरेंसिक जांच कराने की तैयारी कर रही हैं। पुलिस यह भी पता लगा रही है कि आरोपी ने कितने लोगों से संपर्क किया था और क्या उसने किसी अन्य नाबालिग को भी इसी प्रकार निशाना बनाने की कोशिश की थी। जांच के आधार पर आगे की कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

    इस घटना ने एक बार फिर बच्चों और किशोरों की ऑनलाइन सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ा दी है। विशेषज्ञों का कहना है कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर अनजान लोगों से संपर्क करते समय विशेष सावधानी बरतना आवश्यक है। नाबालिगों को डिजिटल सुरक्षा के बारे में जागरूक करना और अभिभावकों द्वारा उनकी ऑनलाइन गतिविधियों पर संतुलित निगरानी रखना समय की महत्वपूर्ण आवश्यकता बन गई है।

    साइबर अपराध के मामलों में लगातार बढ़ोतरी के बीच पुलिस भी लोगों से सतर्क रहने की अपील कर रही है। किसी भी संदिग्ध प्रोफाइल, आपत्तिजनक संदेश, ब्लैकमेल या दबाव बनाने जैसी स्थिति सामने आने पर तत्काल पुलिस या साइबर हेल्पलाइन से संपर्क करने की सलाह दी जा रही है। समय रहते शिकायत दर्ज कराने से ऐसे मामलों में त्वरित कार्रवाई संभव हो सकती है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म का सुरक्षित उपयोग सुनिश्चित करने के लिए केवल कानूनी कार्रवाई ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि परिवार, विद्यालय और समाज को भी मिलकर बच्चों को ऑनलाइन जोखिमों के प्रति जागरूक करना होगा। तकनीक का जिम्मेदारी के साथ उपयोग और समय पर सतर्कता ही इस प्रकार के साइबर अपराधों को रोकने में सबसे प्रभावी उपाय साबित हो सकती है।

  • प्रयागराज में अविमुक्तेश्वरानंद पर बाल यौन शोषण FIR, पुलिस ने शुरू की गहन जांच

    प्रयागराज में अविमुक्तेश्वरानंद पर बाल यौन शोषण FIR, पुलिस ने शुरू की गहन जांच


    प्रयागराज। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती और उनके शिष्य मुकुंदानंद ब्रह्मचारी के खिलाफ बाल यौन शोषण के गंभीर आरोपों पर FIR दर्ज होने के बाद पुलिस ने गहन जांच शुरू कर दी है। मामला POCSO कोर्ट के आदेश पर दर्ज किया गया है। शिकायतकर्ता आशुतोष ब्रह्मचारी महाराज और पीड़ित शिष्यों ने अदालत में बच्चों के कथित शोषण के बयानों को दर्ज कराया था, जिनके आधार पर पुलिस ने देर रात FIR को औपचारिक रूप दिया।

    पुलिस की पांच सदस्यीय टीम, जिसका नेतृत्व डीसीपी मनीष कुमार शांडिल्य कर रहे हैं, ने घटना स्थल का नक्शा तैयार कर लिया है और पीड़ितों के मेडिकल परीक्षण के बाद साक्ष्य जुटाने की प्रक्रिया तेज़ कर दी है। टीम ने माघ मेला शिविर और अन्य कथित घटनास्थलों का निरीक्षण भी किया है। पुलिस का मुख्य फोकस अब उन पीड़ितों और शिकायतकर्ता तक पहुंचकर कलम बंद बयान और सबूत दर्ज करना है, ताकि आगे की कानूनी कार्रवाई और संभावित गिरफ्तारी सुनिश्चित हो सके।

    अविमुक्तेश्वरानंद ने FIR दर्ज होने के बाद कहा कि वे जांच से भागेंगे नहीं और उनके मठ के दरवाजे पुलिस के लिए हमेशा खुले हैं। उन्होंने बताया कि कई वकीलों ने उनका केस मुफ्त में लड़ने का प्रस्ताव दिया है और उनकी लीगल टीम अब अग्रिम कानूनी कार्रवाई पर विचार कर रही है। वहीं, उन्होंने शिकायतकर्ता आशुतोष ब्रह्मचारी के आपराधिक इतिहास पर सवाल उठाया और दावा किया कि वह कांधला थाना क्षेत्र का हिस्ट्रीशीटर है, जिस पर 25 हजार रुपये का इनाम भी रह चुका है।

    इस हाई‑प्रोफाइल मामले में पुलिस ने स्पेशल टीम बनाई है जिसमें एसीपी और इंस्पेक्टर झूंसी समेत पांच वरिष्ठ अधिकारी शामिल हैं। टीम निष्पक्ष और तेज़ जांच सुनिश्चित कर रही है। POCSO Act के तहत यह मामला तीव्र और संवेदनशील माना जा रहा है, इसलिए पुलिस मेडिकल, फोरेंसिक और गवाह सबूत के आधार पर अगली कानूनी कार्रवाई तय करेगी।

    इस बीच समाज और धार्मिक जगत में भी इस मामले पर बहस जारी है। स्वामी ने आरोपों को झूठा और साजिशपूर्ण बताया है और कहा कि न्याय जल्द ही दोनों न्यायालयों में सही रूप से होगा। समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव के बयानों का उन्होंने समर्थन करते हुए उन्हें जनता की आवाज बताया।