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  • भारतीय राजनीति के 5 सबसे चौंकाने वाले गठबंधन, जब सत्ता के लिए धुर विरोधियों ने मिलाया हाथ

    भारतीय राजनीति के 5 सबसे चौंकाने वाले गठबंधन, जब सत्ता के लिए धुर विरोधियों ने मिलाया हाथ

    नई दिल्ली। भारतीय राजनीति में स्थायी दोस्ती या स्थायी दुश्मनी जैसी कोई चीज नहीं मानी जाती। यहां समीकरण बदलते देर नहीं लगती और अक्सर वही नेता, जो कल तक एक-दूसरे पर तीखे हमले कर रहे होते हैं, आज सत्ता की जरूरत में साथ खड़े नजर आते हैं। विचारधाराएं पीछे छूट जाती हैं और कुर्सी सबसे आगे आ जाती है। देश के राजनीतिक इतिहास में ऐसे कई उदाहरण हैं जिन्होंने जनता को हैरान कर दिया।

    1. आम आदमी पार्टी और कांग्रेस: 49 दिन का अनोखा साथ
    दिल्ली की राजनीति में साल 2013 के बाद एक अप्रत्याशित मोड़ आया। अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व वाली आम आदमी पार्टी ने भ्रष्टाचार के मुद्दे पर कांग्रेस को सबसे बड़ा विरोधी बनाया था। लेकिन विधानसभा चुनाव में बहुमत से दूर रहने के बाद कांग्रेस के 8 विधायकों के बाहरी समर्थन से केजरीवाल पहली बार मुख्यमंत्री बने। यह गठबंधन ज्यादा दिन नहीं चला और महज 49 दिनों में सरकार गिर गई।

    2. भाजपा और पीडीपी: जम्मू-कश्मीर का अप्रत्याशित मेल
    जम्मू-कश्मीर में 2015 से 2018 तक का समय भी राजनीतिक दृष्टि से बेहद चौंकाने वाला रहा, जब महबूबा मुफ्ती की पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी ने भारतीय जनता पार्टी के साथ मिलकर सरकार बनाई। वैचारिक रूप से दोनों दलों के बीच गहरा अंतर था, लेकिन सत्ता की मजबूरी में यह गठबंधन बना। 2018 में मतभेद बढ़ने पर यह सरकार गिर गई।

    3. नीतीश-लालू की जोड़ी: बिहार की सियासी करवटें
    बिहार की राजनीति में नीतीश कुमार और लालू प्रसाद यादव की साझेदारी और टकराव दोनों ही बार-बार देखने को मिले हैं। एक समय नीतीश ने लालू की राजनीति का विरोध कर अलग राह बनाई, लेकिन 2015 में दोनों ने साथ मिलकर सरकार बनाई। बाद में फिर गठबंधन टूटा और नीतीश ने कई बार राजनीतिक पाला बदला, जिससे यह राज्य गठबंधन राजनीति का सबसे बड़ा उदाहरण बन गया।

    4. महाराष्ट्र में शिवसेना, कांग्रेस और एनसीपी का साथ
    महाराष्ट्र की राजनीति में 2019 के बाद बड़ा उलटफेर हुआ, जब शिवसेना ने वैचारिक रूप से विपरीत मानी जाने वाली कांग्रेस और एनसीपी के साथ मिलकर महा विकास अघाड़ी सरकार बनाई। दशकों तक बीजेपी के साथ रही शिवसेना का यह कदम राजनीति में बड़ा यू-टर्न माना गया।

    5. उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा गठबंधन
    2019 के लोकसभा चुनाव में अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी और मायावती की बहुजन समाज पार्टी ने लंबे समय की दुश्मनी भुलाकर गठबंधन किया। दोनों दलों का उद्देश्य भाजपा को रोकना था, हालांकि यह गठबंधन चुनावी सफलता में बड़ा असर नहीं डाल सका, लेकिन राजनीतिक रूप से बेहद चर्चा में रहा।

  • तमिलनाडु राजनीति: विजय की टीवीके ने NDA से गठबंधन की अटकलें खारिज कीं, कहा भाजपा हमारी वैचारिक प्रतिद्वंद्वी

    तमिलनाडु राजनीति: विजय की टीवीके ने NDA से गठबंधन की अटकलें खारिज कीं, कहा भाजपा हमारी वैचारिक प्रतिद्वंद्वी


    नई दिल्ली । तमिलनाडु की राजनीति में हाल के दिनों में अभिनेता विजय की पार्टी तमिलगा वेट्ट्री कझगम और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के बीच संभावित गठबंधन को लेकर चल रही अटकलों पर शनिवार को पार्टी ने साफ तौर पर विराम लगा दिया। टीवीके के नेताओं ने स्पष्ट किया कि पार्टी का एनडीए के साथ किसी भी प्रकार का चुनावी गठबंधन करने का कोई इरादा नहीं है और इस तरह की खबरें पूरी तरह से अफवाह हैं।

    पार्टी के संयुक्त महासचिव सी. टी. आर. निर्मल कुमार ने मीडिया से बातचीत में कहा कि एनडीए के साथ गठबंधन की कोई गुंजाइश नहीं है। उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा कि भारतीय जनता पार्टी उनकी पार्टी की वैचारिक प्रतिद्वंद्वी है और टीवीके पहले भी यह विषय पर अपना रुख स्पष्ट कर चुकी है। उन्होंने कहा कि हाल के दिनों में मीडिया और सोशल मीडिया पर टीवीके को लेकर कई तरह की अटकलें और खबरें प्रसारित की जा रही हैं, जिनका वास्तविकता से कोई संबंध नहीं है।

    निर्मल कुमार ने बताया कि 13 मार्च को पार्टी के जिला सचिवों के साथ एक ऑनलाइन बैठक आयोजित की गई थी। इस बैठक का उद्देश्य आगामी राजनीतिक परिस्थितियों को देखते हुए पार्टी की संगठनात्मक ताकत का आकलन करना और संभावित चुनावी रणनीतियों पर चर्चा करना था। हालांकि, इस बैठक को लेकर कुछ मीडिया रिपोर्टों में यह दावा किया गया कि टीवीके एनडीए के साथ गठबंधन पर विचार कर रही है। उन्होंने इन दावों को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि बैठक का गठबंधन से कोई संबंध नहीं था।

    उन्होंने पार्टी कार्यकर्ताओं और समर्थकों से अपील की कि वे अफवाहों पर ध्यान न दें और केवल पार्टी की ओर से जारी आधिकारिक घोषणाओं पर ही भरोसा करें। निर्मल कुमार ने कहा कि टीवीके के बारे में अटकलों पर आधारित कई खबरें रोजाना प्रसारित की जा रही हैं, जिनका उद्देश्य जनता के असली मुद्दों से ध्यान भटकाना है।

    इधर, तमिलनाडु भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष नैनार नागेंद्रन ने भी इस मुद्दे पर सीधे तौर पर कोई स्पष्ट टिप्पणी नहीं की। पत्रकारों द्वारा टीवीके के साथ संभावित गठबंधन को लेकर पूछे गए सवाल पर उन्होंने कहा कि मीडिया गठबंधन को लेकर ज्यादा चिंतित है, जबकि उनका ध्यान राज्य के वास्तविक मुद्दों पर है। नागेंद्रन ने कहा कि तमिलनाडु में कानून-व्यवस्था की स्थिति और महिलाओं की सुरक्षा जैसे गंभीर मुद्दे अधिक महत्वपूर्ण हैं और इन्हीं विषयों पर ध्यान दिया जाना चाहिए।

    राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अभिनेता विजय की पार्टी टीवीके के सक्रिय राजनीति में आने के बाद तमिलनाडु की राजनीतिक तस्वीर में नई हलचल देखने को मिल रही है। ऐसे में विभिन्न दलों के साथ संभावित गठबंधनों को लेकर समय-समय पर अटकलें लगना स्वाभाविक है। हालांकि पार्टी नेतृत्व ने साफ कर दिया है कि फिलहाल एनडीए के साथ किसी भी तरह की चुनावी साझेदारी का सवाल ही नहीं उठता। इस बयान के बाद तमिलनाडु की राजनीति में चल रही अटकलों पर काफी हद तक विराम लग गया है और टीवीके ने यह संकेत दे दिया है कि वह अपनी राजनीतिक रणनीति स्वतंत्र रूप से तय करने की दिशा में आगे बढ़ रही है।

  • तमिलनाडु विधानसभा चुनाव को लेकर कांग्रेस की 45 सीट की मांग, DMK केवल 25 सीट देने को तैयार

    तमिलनाडु विधानसभा चुनाव को लेकर कांग्रेस की 45 सीट की मांग, DMK केवल 25 सीट देने को तैयार


    नई दिल्ली। आगामी तमिलनाडु विधानसभा चुनाव के लिए कांग्रेस ने अपनी सहयोगी द्रविड़ मुनेत्र कषगम DMK से 45 सीटों की मांग की है जबकि मुख्यमंत्री एमके स्टालिन की पार्टी इस बार भी पिछले चुनाव की तरह केवल 25 सीट देने को तैयार है। इस साल अप्रैल मई में राज्य में चुनाव होने की संभावना है।

    कांग्रेस ने बढ़ाई मांग
    कांग्रेस के संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल और अन्य नेताओं ने सीट बंटवारे को लेकर स्टालिन से चर्चा की लेकिन अभी तक कोई सहमति नहीं बनी है। कांग्रेस का तर्क है कि 2021 के चुनाव परिणामों की समीक्षा के आधार पर उन्हें अधिक सीटें मिलनी चाहिए।

    स्रोतों के अनुसार पिछले चुनाव में DMK ने कुल 234 सीटों में से 173 पर चुनाव लड़ा जिसमें 133 जीत और 40 हार मिली। अधिकांश हार AIADMK और बीजेपी से हुई थी।

    कांग्रेस का मानना है कि अगर उन्हें अधिक सीटें दी जाएं तो पिछली बार हारी हुई कम से कम 20 सीटें जीती जा सकती हैं। पार्टी के सूत्रों ने कहा कि 45 सीट की मांग का उद्देश्य जीत की संभावनाओं में सुधार गठबंधन को मजबूत करना और 2026 से पहले संतुलित सीट-बंटवारे का फॉर्मूला सुनिश्चित करना है।

    बातचीत का दौर जारी

    रविवार को चेन्नई में स्टालिन और वेणुगोपाल के बीच बैठक हुई जिसमें दोनों दलों के वरिष्ठ नेता भी शामिल थे। इसके अलावा इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग IUML के कादर मोहिदीन ने प्रतिनिधिमंडल के साथ DMK नेताओं से मुलाकात की।
  • UP Politics: यूपी की सियासत से बड़ी खबर, AIMIM से बसपा अलायंस करेगी या नहीं? मायावती ने साफ कर दी तस्वीर

    UP Politics: यूपी की सियासत से बड़ी खबर, AIMIM से बसपा अलायंस करेगी या नहीं? मायावती ने साफ कर दी तस्वीर


    नई दिल्ली । उत्तर प्रदेश में आगामी वर्ष 2027 में प्रस्तावित विधानसभा चुनाव से पहले दावा किया जा रहा था कि बहुजन समाज पार्टी किसी दल के साथ गठबंधन कर सकती है. इस रेस में सबसे पहले नाम हैदराबाद के सांसद असदुद्दीन ओवैसी की अध्यक्षता वाली ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन का चल रहा था. अब इस पर राज्य की पूर्व सीएम और बसपा सुप्रीमो मायावती ने तस्वीर साफ कर दी है.

    बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष और यूपी की पूर्व सीएम मायावती ने कहा है कि जैसे-जैसे UP में चुनाव पास आएंगे, जो लोग हमारे खिलाफ हैं, वे हमें सत्ता से दूर रखने की और भी कोशिश करेंगे और हमारे खिलाफ साजिश करेंगे. सिर्फ UP में ही नहीं बल्कि पूरे देश में सभी अंबेडकरवादियों को डॉ. बाबासाहेब अंबेडकर के आत्म-सम्मान पाने के आंदोलन को मजबूत करने के लिए काम करते रहना चाहिए.पूर्व सीएम ने कहा कि आप सबको पता है कि इन दिनों AI को सफलता की पूंजी बताने की स्वार्थी बताने के बीच मीडिया में एक और चर्चा है कि विधानसभा 2027 चुनाव बसपा गठबंधन में लड़ेगी जो कि बिल्कुल झूठ है. ये फेक न्यूज है. मीडिया को ऐसी खबरों से बचना चाहिए.

    एक प्रेस वार्ता में मायावती ने कहा कि हम पहले ही घोषणा कर चुके हैं कि हम विधानसभा चुनाव अकेले लडेंगे, लेकिन कुछ लोग और मीडिया घिनौनी साजिश में पड़कर अपनी इमेज खराब करते हैं. ये बसपा विरोधी एजेंडा है. लोगों को ऐसी खबरों पर ध्यान नहीं देना. कांग्रेस, सपा और बीजेपी की सोच संकीर्ण और बाबा साहेब की विरोधी है.

    मायावती ने क्यों किया अलायंस से इनकार?

    उन्होंने कहा कि इनसे गठबन्धन करके बसपा को नुकसान होता है. बसपा के लोग अकेले चुनाव लड़ने के लिए जी जान से लगे हुए हैं. बसपा, 2007 की तरह अकेले चुनाव लड़ेगी और चुनाव जीतेगी. बसपा सुप्रीमो को सिक्युरिटी दृष्टिगत टाइप 8 का बंगला मिलने के सवाल पर मायावती ने कहा कि जब यह मिला तो उसमें भी षडयंत्र के तहत ग़लत खबरें चलाई गई हैं एजेंडा के तहत. अब सुरक्षा के दृष्टिगत टाइप 8 का बंगला मिला जिसे मैने स्वीकार किया
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    उत्तर प्रदेश में 2027 के प्रस्तावित विधानसभा चुनाव से पहले यह चर्चा जोर पकड़ रही थी कि बहुजन समाज पार्टी किसी दल के साथ गठबंधन कर सकती है। सियासी गलियारों में सबसे ज्यादा जिस नाम की चर्चा थी, वह हैदराबाद के सांसदअसदुद्दीन ओवैसी की पार्टी ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन का था।
    उन्होंने आरोप लगाया कि सपा सरकार और उनके सुप्रीमो के कहने पर 2 जून 1995 गेस्ट हाउस में मुझपर हमला हुआ था जिसके अगले दिन भारत सरकार द्वारा मुझे सुरक्षा दी गई थी और सुरक्षित आवास भी लेकिन अब इतने समय के बाद भी सुरक्षा ख़तरा बड़ा है. पहले भी मुझे टाइप 8 का बंगला ही मिला था. चुनाव के नजदीक आते ही बसपा को सत्ता से दूर रखने के लिए विपक्षियों के हथकंडे बढ़ते जाएंगे.