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  • दिल्ली में आज से पुराने वाहनों की एंट्री बंद, नियम तोड़ने पर लगेगा 20 हजार रुपये तक जुर्माना…

    दिल्ली में आज से पुराने वाहनों की एंट्री बंद, नियम तोड़ने पर लगेगा 20 हजार रुपये तक जुर्माना…


    नई दिल्ली ।
    दिल्ली-NCR में लगातार बढ़ते वायु प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए वाहनों की आवाजाही पर सख्ती बढ़ा दी गई है। 1 नवंबर 2026 से राजधानी में दूसरे राज्यों में पंजीकृत BS-6 से कम उत्सर्जन मानक वाले वाहनों के प्रवेश पर प्रतिबंध लागू किया गया है। इस फैसले का सीधा असर नोएडा और ग्रेटर नोएडा से दिल्ली जाने वाले वाहन चालकों पर भी पड़ेगा। नियमों का उल्लंघन करने पर वाहन चालकों को 20 हजार रुपये तक का जुर्माना भरना पड़ सकता है।

    प्रदूषण की स्थिति को देखते हुए गौतमबुद्धनगर ट्रैफिक पुलिस ने वाहन चालकों के लिए विशेष एडवाइजरी जारी की है। इसमें लोगों से दिल्ली जाने से पहले अपने वाहन का उत्सर्जन मानक जांचने और लागू प्रतिबंधों की जानकारी लेने की अपील की गई है। ट्रैफिक पुलिस के अनुसार, दूसरे राज्यों में पंजीकृत BS-6 से कम मानक वाले वाहनों को दिल्ली में प्रवेश की अनुमति नहीं होगी। ऐसे में नोएडा और ग्रेटर नोएडा से राजधानी जाने वाले लोगों को अपनी गाड़ी के दस्तावेज और श्रेणी की जांच करना जरूरी होगा।

    नए प्रतिबंधों के तहत यात्री बसों और भारी माल ढोने वाले ट्रकों की आवाजाही पर भी पाबंदियां लगाई गई हैं। वहीं, BS-6 मानक वाले वाहनों के साथ CNG और इलेक्ट्रिक वाहनों को निर्धारित शर्तों के अनुसार दिल्ली में प्रवेश की अनुमति रहेगी। इससे पहले वाहन चालकों को यह सुनिश्चित करना होगा कि उनकी गाड़ी संबंधित नियमों के दायरे में आती है या नहीं।

    पुराने पेट्रोल और डीजल वाहनों को लेकर भी सख्ती बरती जा रही है। जारी एडवाइजरी के मुताबिक, 10 साल से अधिक पुराने डीजल और 15 साल से ज्यादा पुराने पेट्रोल वाहनों के संचालन पर प्रतिबंध का पालन कराया जाएगा। यह व्यवस्था ग्रेडेड रिस्पॉन्स एक्शन प्लान (GRAP) के तहत लागू प्रतिबंधों से जुड़ी है। नियमों का उल्लंघन करने वाले वाहनों को जब्त किया जा सकता है और उनके खिलाफ नियमानुसार कानूनी कार्रवाई भी की जा सकती है। हालांकि, आपातकालीन सेवाओं से जुड़े वाहनों को इस प्रतिबंध से छूट दी गई है।

    BS-3 पेट्रोल और BS-4 डीजल श्रेणी के ऐसे पुराने वाहन, जो दूसरे राज्यों में पंजीकृत हैं, यदि प्रतिबंध के बावजूद दिल्ली की सड़कों पर चलते पाए जाते हैं तो उन पर 20 हजार रुपये तक का जुर्माना लगाया जा सकता है। इसलिए वाहन चालकों को केवल अपनी गाड़ी की उम्र ही नहीं, बल्कि उसका BS उत्सर्जन मानक भी जांचना होगा। दोनों के आधार पर लागू नियम अलग-अलग हो सकते हैं।

    दिल्ली से होकर दूसरे राज्यों की ओर जाने वाले वाहन चालकों के लिए वैकल्पिक मार्ग भी सुझाए गए हैं। ट्रैफिक पुलिस के अनुसार, नोएडा-ग्रेटर नोएडा एक्सप्रेसवे या यमुना एक्सप्रेसवे का इस्तेमाल करके वाहन चालक जीरो पॉइंट, परी चौक, कस्बा कासना और सिरसा होते हुए ईस्टर्न पेरिफेरल एक्सप्रेसवे (EPE) तक पहुंच सकते हैं। इसके बाद वहां से अपने गंतव्य की ओर रवाना हो सकते हैं। इस मार्ग से दिल्ली के प्रतिबंधित रास्तों पर जाने की जरूरत नहीं पड़ेगी।

    ट्रैफिक पुलिस ने लोगों से अनावश्यक रूप से निजी वाहनों का इस्तेमाल नहीं करने और संभव होने पर सार्वजनिक परिवहन अपनाने की अपील की है। इससे सड़कों पर वाहनों का दबाव और प्रदूषण कम करने में मदद मिल सकती है। यातायात संबंधी जानकारी या परेशानी के लिए लोग हेल्पलाइन नंबर 9971009001 पर संपर्क कर सकते हैं। इसके अलावा व्हाट्सऐप नंबर 7065100100 और आधिकारिक एक्स हैंडल @noidatraffic के जरिए भी जानकारी प्राप्त की जा सकती है।

    ऐसे में नोएडा और ग्रेटर नोएडा से दिल्ली जाने की योजना बना रहे लोगों के लिए जरूरी है कि वे घर से निकलने से पहले अपने वाहन का BS मानक, पंजीकरण और लागू प्रतिबंधों की जानकारी जरूर जांच लें। लापरवाही की स्थिति में जुर्माने के साथ वाहन जब्त होने की कार्रवाई का सामना भी करना पड़ सकता है।

  • प्रदूषण जागरूकता अभियान के लिए फीस मांगने वाले सेलिब्रिटीज पर बॉम्बे हाई कोर्ट नाराज, BMC और पुलिस को दिए सख्त निर्देश

    प्रदूषण जागरूकता अभियान के लिए फीस मांगने वाले सेलिब्रिटीज पर बॉम्बे हाई कोर्ट नाराज, BMC और पुलिस को दिए सख्त निर्देश


    नई दिल्ली । महाराष्ट्र में त्योहारों और धार्मिक आयोजनों के दौरान बढ़ते वायु और ध्वनि प्रदूषण को रोकने के लिए चलाए जा रहे प्रयासों के बीच बॉम्बे हाई कोर्ट ने जागरूकता अभियान में सहयोग के लिए फीस मांगने वाले सेलिब्रिटीज पर नाराजगी जताई है। अदालत ने कहा कि प्रदूषण के खिलाफ अभियान में योगदान देने के लिए ऐसे लोगों से संपर्क करने की जरूरत नहीं है, जो इसके बदले भुगतान की मांग करते हैं। पीठ ने उम्मीद जताई कि फिल्मी हस्तियां अपने शहर के प्रति जुड़ाव और सामाजिक जिम्मेदारी दिखाते हुए इस तरह के जनहित अभियान में सहयोग करेंगी।

    सोमवार को सुनवाई के दौरान अतिरिक्त सरकारी वकील ज्योति चव्हाण ने अदालत को बताया कि अधिकारियों ने प्रदूषण के खिलाफ जागरूकता फैलाने के लिए कुछ सेलिब्रिटीज से संपर्क किया था, लेकिन उन्होंने अभियान में शामिल होने के लिए फीस मांगी। इस पर जस्टिस जीएस कुलकर्णी और जस्टिस नीला गोखले की पीठ ने नाराजगी जताई। अदालत ने कहा कि यदि सेलिब्रिटीज अपने ही शहर के प्रति जागरूक नहीं हैं और केवल फीस लेकर अभियान में शामिल होना चाहते हैं, तो यह खेदजनक है।

    पीठ ने यह भी सवाल किया कि जब फिल्मी हस्तियां पुलिस विभाग के कार्यक्रमों में शामिल हो सकती हैं, तो प्रदूषण के खिलाफ जागरूकता अभियान में सहयोग क्यों नहीं कर सकतीं। अदालत ने स्पष्ट किया कि जनहित से जुड़े संदेशों के प्रचार का खर्च सरकारी खजाने पर नहीं डाला जाना चाहिए। सुनवाई के दौरान प्रदूषण नियंत्रण के लिए जारी निर्देशों को लोगों तक पहुंचाने और उनके प्रभावी पालन पर भी चर्चा हुई।

    यह मामला त्योहारों और धार्मिक जुलूसों के दौरान होने वाले वायु तथा ध्वनि प्रदूषण को रोकने के लिए अदालत की ओर से स्वत: संज्ञान लेकर शुरू की गई जनहित याचिका से जुड़ा है। हाई कोर्ट ने 22 सितंबर को आदेश दिया था कि त्योहारों के दौरान सार्वजनिक सड़कों और रास्तों पर पटाखे नहीं फोड़े जाएंगे। अदालत ने लेजर लाइट और तेज रोशनी वाली बीम लाइट के इस्तेमाल पर भी रोक लगाई थी। सुनवाई के दौरान पीठ ने अधिकारियों से पूछा कि गणपति उत्सव और नवरात्रि के समय इन आदेशों के बारे में लोगों को जागरूक करने के लिए क्या कदम उठाए गए।

    सुनवाई में शिकायत दर्ज कराने की व्यवस्था का मुद्दा भी उठा। अदालत की सहायता कर रहे एमिकस क्यूरी अस्पी चिनॉय ने प्रशासन की ओर से दाखिल हलफनामों में शिकायतों के लिए समर्पित और रिकॉर्ड की जाने वाली हेल्पलाइन का स्पष्ट विवरण नहीं होने की बात कही। इसके जवाब में बृहन्मुंबई महानगरपालिका की ओर से पेश वकील जोएल कार्लोस ने बताया कि ध्वनि प्रदूषण से जुड़ी शिकायतें 24 घंटे चालू रहने वाली आपदा हेल्पलाइन 1916 पर दर्ज कराई जा सकती हैं।

    अदालत ने मुंबई की बड़ी झुग्गी बस्तियों में प्रदूषण संबंधी नियमों के उल्लंघन पर भी चिंता जताई। पीठ के मुताबिक, इन इलाकों में देर रात तक पटाखे फोड़ने की घटनाएं सामने आ रही हैं। ऐसे क्षेत्रों में विशेष जागरूकता अभियान चलाने की जरूरत बताई गई। जस्टिस जीएस कुलकर्णी ने स्पष्ट किया कि अदालत किसी समुदाय के खिलाफ नहीं है, लेकिन कानून का पालन सभी के लिए जरूरी है। पीठ ने नागरिक अधिकारियों को स्थानीय वार्ड पार्षदों को भी जागरूकता अभियान में सक्रिय रूप से शामिल करने का निर्देश दिया।

    हाई कोर्ट ने BMC, पुलिस और प्रदूषण नियंत्रण से जुड़े अधिकारियों को आपसी समन्वय के साथ निगरानी जारी रखने और नियमों को प्रभावी ढंग से लागू करने को कहा है। मामले की अगली सुनवाई 25 नवंबर को होगी। उस दौरान प्रदूषण रोकने और अदालत के निर्देशों का पालन सुनिश्चित करने के लिए प्रशासन की ओर से उठाए गए कदमों पर विचार किया जाएगा।

  • पराली जलाने के मामलों में मध्य प्रदेश देश में पहले नंबर पर, 2025 में दर्ज हुए 17 हजार से ज्यादा मामले

    पराली जलाने के मामलों में मध्य प्रदेश देश में पहले नंबर पर, 2025 में दर्ज हुए 17 हजार से ज्यादा मामले


    मध्य प्रदेश। में पराली जलाने की घटनाओं में लगातार बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है। वर्ष 2025 के आंकड़ों के अनुसार, राज्य देशभर में पराली जलाने के मामलों में पहले स्थान पर रहा। पूरे देश में इस साल कुल 33,028 घटनाएं दर्ज की गईं, जिनमें अकेले मध्य प्रदेश की हिस्सेदारी 17,067 मामलों की रही। यह राष्ट्रीय आंकड़े का आधे से भी अधिक है। उपग्रह आधारित आंकड़ों से सामने आई इस स्थिति ने खेतों में फसल अवशेष जलाने और उससे होने वाले प्रदूषण को लेकर चिंता बढ़ा दी है।
    उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, मध्य प्रदेश में वर्ष 2021 से पहले पराली जलाने की घटनाएं सालाना पांच हजार से कम रहती थीं। हालांकि, पिछले कुछ वर्षों में इनकी संख्या में बड़ा उतार-चढ़ाव देखने के साथ बढ़ोतरी भी दर्ज की गई है। वर्ष 2024 में प्रदेश में पराली जलाने के 16,074 मामले सामने आए थे, जबकि 2025 में यह संख्या बढ़कर 17,067 हो गई। इस तरह एक साल में 993 घटनाओं की वृद्धि दर्ज की गई।

    वर्तमान सीजन में भी पराली जलाने की घटनाएं सामने आ रही हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, 15 सितंबर से 15 अक्टूबर 2026 के बीच मध्य प्रदेश में 350 घटनाएं दर्ज की गईं। यह आंकड़ा फसल कटाई के बाद खेतों में बचे अवशेषों के निपटान से जुड़ी चुनौती को दर्शाता है। यदि खेतों में बचे अवशेषों को जलाने के बजाय उनके प्रबंधन के प्रभावी उपाय उपलब्ध नहीं होते, तो ऐसी घटनाओं पर नियंत्रण करना मुश्किल हो सकता है।

    राज्यवार आंकड़ों में मध्य प्रदेश के साथ उत्तर प्रदेश और राजस्थान में भी पराली जलाने के मामलों में बढ़ोतरी दिखाई देती है। उत्तर प्रदेश में वर्ष 2024 में 5,769 घटनाएं दर्ज की गई थीं, जो 2025 में बढ़कर 7,290 हो गईं। राजस्थान में भी इनकी संख्या 2024 के 2,762 मामलों से बढ़कर 2025 में 2,890 हो गई।

    इसके विपरीत, पंजाब और हरियाणा में पराली जलाने की घटनाओं में कमी दर्ज की गई। पंजाब में वर्ष 2021 में 71,304 मामले सामने आए थे, जबकि 2025 में यह संख्या घटकर 5,114 रह गई। हरियाणा में भी 2021 के 6,984 मामलों की तुलना में 2025 में 662 घटनाएं दर्ज की गईं। इन आंकड़ों से अलग-अलग राज्यों में पराली प्रबंधन की स्थिति में आए बदलाव का पता चलता है।

    देशभर में पराली जलाने की कुल घटनाओं में भी पिछले वर्षों के मुकाबले कमी आई है। वर्ष 2021 में कुल 92,407 मामले दर्ज किए गए थे। वर्ष 2022 में यह संख्या घटकर 56,157 और 2023 में 57,242 रही। वर्ष 2024 में कुल 36,893 मामले सामने आए, जबकि 2025 में यह संख्या घटकर 33,028 हो गई। इसके बावजूद मध्य प्रदेश में बढ़ते मामले राज्य के लिए चुनौती बने हुए हैं।

    पराली जलाने से निकलने वाला धुआं वातावरण में प्रदूषक कणों की मात्रा बढ़ा सकता है। सर्दियों में जब धुआं और कोहरा एक साथ मौजूद रहते हैं, तो स्मॉग की स्थिति बन सकती है। इससे वायु गुणवत्ता प्रभावित होती है और सांस लेने में परेशानी बढ़ सकती है। कई क्षेत्रों में प्रदूषण का स्तर खराब या बहुत खराब श्रेणी तक पहुंचने की आशंका रहती है, हालांकि इसका वास्तविक स्तर स्थान और मौसम की परिस्थितियों पर निर्भर करता है।

    चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार, प्रदूषित हवा के लंबे समय तक संपर्क में रहने से श्वसन तंत्र प्रभावित हो सकता है। सांस की एलर्जी, अस्थमा और फेफड़ों से संबंधित समस्याओं से जूझ रहे लोगों के लिए धुएं के संपर्क में आना विशेष रूप से नुकसानदेह हो सकता है। लंबे समय तक वायु प्रदूषण के संपर्क में रहने से फेफड़ों की कार्यक्षमता पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। हालांकि, फेफड़ों की कार्यक्षमता में किसी निश्चित प्रतिशत की कमी या अस्पतालों में मरीजों की संख्या बढ़ने का आकलन करने के लिए संबंधित अध्ययन और स्वास्थ्य आंकड़ों की पुष्टि आवश्यक है।

    पराली जलाने पर रोक लगाने के लिए प्रशासनिक स्तर पर कार्रवाई, जुर्माने और जागरूकता संबंधी प्रयास किए जाते हैं। लेकिन किसानों को फसल अवशेषों के निपटान के लिए किफायती और व्यावहारिक विकल्प उपलब्ध कराना भी जरूरी है। खेतों में बचे अवशेषों का उपयोग और उनका उचित प्रबंधन पराली जलाने की घटनाओं को कम करने में मदद कर सकता है। मध्य प्रदेश में बढ़ते मामलों को देखते हुए प्रभावी रोकथाम और किसानों के लिए उपलब्ध विकल्पों पर ध्यान देना महत्वपूर्ण है।

  • नो कार डे पर ई-व्हीकल से निकले इंदौर कलेक्टर और अपर कलेक्टर, वीडियो हुआ वायरल

    नो कार डे पर ई-व्हीकल से निकले इंदौर कलेक्टर और अपर कलेक्टर, वीडियो हुआ वायरल

    मध्यप्रदेश: के इंदौर में नो कार डे के अवसर पर जिला कलेक्टर शिवम वर्मा और अपर कलेक्टर नवजीवन पवार ई-व्हीकल से फील्ड में नजर आए। दोनों अधिकारियों ने कार के बजाय इलेक्ट्रिक वाहन का इस्तेमाल किया। ई-व्हीकल से सफर करते हुए उनका वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है।

    नो कार डे के मौके पर अधिकारियों की यह पहल शहर में पर्यावरण संरक्षण और प्रदूषण कम करने के संदेश से जुड़ी रही। अधिकारियों ने ई-व्हीकल के जरिए लोगों को रोजमर्रा के आवागमन में पर्यावरण के अनुकूल परिवहन साधनों को अपनाने के लिए प्रेरित करने का संदेश दिया।

    इंदौर में आयोजित इस पहल के दौरान जिला कलेक्टर शिवम वर्मा और अपर कलेक्टर नवजीवन पवार ने खुद ई-व्हीकल का इस्तेमाल किया। दोनों अधिकारियों के सड़क पर इलेक्ट्रिक वाहन से सफर करने का वीडियो सामने आने के बाद यह चर्चा का विषय बन गया।

    नो कार डे का उद्देश्य निजी वाहनों के इस्तेमाल को कम करने और लोगों को वैकल्पिक परिवहन साधनों के प्रति जागरूक करना है। इस दौरान सार्वजनिक परिवहन, साइकिल और इलेक्ट्रिक वाहनों जैसे विकल्पों को बढ़ावा देने पर जोर दिया जाता है।

    अधिकारियों की ओर से ई-व्हीकल का इस्तेमाल इसी संदेश को आगे बढ़ाने की पहल के तौर पर देखा गया। इलेक्ट्रिक वाहनों को अपनाने से पारंपरिक ईंधन से चलने वाले वाहनों की तुलना में प्रदूषण कम करने में मदद मिल सकती है।

    इंदौर में पर्यावरण संरक्षण और स्वच्छ परिवहन को लेकर समय-समय पर जागरूकता गतिविधियां आयोजित की जाती रही हैं। नो कार डे के दौरान लोगों से निजी कारों का इस्तेमाल कम करने और जरूरत के अनुसार वैकल्पिक परिवहन साधनों का उपयोग करने की अपील की गई।

    कलेक्टर और अपर कलेक्टर के ई-व्हीकल से फील्ड में पहुंचने की तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर सामने आने के बाद लोगों का ध्यान इस पहल की ओर गया। अधिकारियों ने स्वयं इलेक्ट्रिक वाहन का इस्तेमाल कर ग्रीन ट्रांसपोर्ट को लेकर जागरूकता का संदेश दिया।

    नो कार डे जैसी पहल का फोकस शहर में वाहनों से होने वाले प्रदूषण को कम करने और पर्यावरण के प्रति लोगों की जिम्मेदारी बढ़ाने पर रहता है। इसके साथ ही ऐसे प्रयासों के जरिए नागरिकों को परिवहन के अधिक टिकाऊ विकल्पों के बारे में जानकारी देने की कोशिश की जाती है।

    इंदौर में अधिकारियों की यह पहल लोगों को अपने दैनिक आवागमन के विकल्पों पर विचार करने का संदेश देती है। ई-व्हीकल का इस्तेमाल कर अधिकारियों ने पर्यावरण के अनुकूल परिवहन को बढ़ावा देने की जरूरत को रेखांकित किया।

  • ट्रंप प्रशासन के भव्य स्वतंत्रता दिवस समारोह का पर्यावरण पर असर: 8.5 लाख पटाखे दागने के दावे के बीच वॉशिंगटन में 'कोड पर्पल' अलर्ट, पीएम 2.5 का स्तर मानकों से कई गुना ऊपर पहुंचा

    ट्रंप प्रशासन के भव्य स्वतंत्रता दिवस समारोह का पर्यावरण पर असर: 8.5 लाख पटाखे दागने के दावे के बीच वॉशिंगटन में 'कोड पर्पल' अलर्ट, पीएम 2.5 का स्तर मानकों से कई गुना ऊपर पहुंचा

    नई दिल्ली । संयुक्त राज्य अमेरिका के 250वें स्वतंत्रता दिवस के ऐतिहासिक अवसर पर राजधानी वॉशिंगटन डीसी में आयोजित एक भव्य समारोह के बाद वहां की वायु गुणवत्ता में ऐतिहासिक गिरावट दर्ज की गई है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में आयोजित इस भव्य जश्न के दौरान हुई अत्यधिक आतिशबाजी के कारण पर्यावरण को भारी नुकसान उठाना पड़ा। इस आतिशबाजी से उत्पन्न हुए सघन धुएं और हानिकारक कणों के चलते कुछ घंटों के लिए अमेरिकी राजधानी वॉशिंगटन दुनिया का सबसे अधिक प्रदूषित प्रमुख शहर बन गया, जिसने पर्यावरणविदों और स्वास्थ्य विशेषज्ञों की चिंताओं को अत्यधिक बढ़ा दिया है।

    इस विशाल आयोजन की जिम्मेदारी व्हाइट हाउस की ‘फ्रीडम 250’ पहल के तहत ‘पायरोटेक्निको’ नामक कंपनी को सौंपी गई थी। इस कंपनी ने समारोह के दौरान लगभग 8.5 लाख आतिशबाजियां एक साथ दागकर एक नया विश्व रिकॉर्ड स्थापित करने का लक्ष्य रखा था। वायु गुणवत्ता की निगरानी करने वाली वैश्विक संस्था ‘आईक्यूएयर’ (IQAir) द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार, इस विशाल और सघन आतिशबाजी के प्रदर्शन के तुरंत बाद ही शहर का वायु प्रदूषण सूचकांक अप्रत्याशित रूप से बढ़ गया, जिसने वॉशिंगटन को वैश्विक प्रदूषण रैंकिंग में शीर्ष पर पहुंचा दिया।

    यह पूरा आयोजन प्रतिकूल मौसमी परिस्थितियों के बीच संपन्न हुआ। 4 जुलाई को क्षेत्र में भीषण गर्मी का प्रकोप था और शाम के समय आए तेज गरज-चमक वाले तूफान के कारण मुख्य आतिशबाजी कार्यक्रम अपने निर्धारित समय से एक घंटे से अधिक की देरी से, मध्यरात्रि के आसपास शुरू हो सका। स्थानीय स्तर पर पहले से ही आतिशबाजी के कारण हवा खराब हो रही थी, लेकिन मुख्य शो शुरू होते ही आसमान में धुएं का गुबार छा गया। हवा के रुख के कारण यह हानिकारक धुआं सीधे दर्शकों की ओर फैल गया, जिससे कई प्रमुख इलाकों में दृश्यता बेहद कम हो गई।

    शहर के विभिन्न वायु निगरानी केंद्रों से प्राप्त आंकड़ों के मुताबिक, वातावरण में बेहद सूक्ष्म और हानिकारक प्रदूषक कणों यानी पीएम 2.5 (PM2.5) का स्तर एक समय पर 200 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर से भी ऊपर दर्ज किया गया। अमेरिकी पर्यावरण संरक्षण एजेंसी (EPA) द्वारा तय किए गए 24 घंटे के सुरक्षित औसत मानक 35 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर की तुलना में यह स्तर कई गुना अधिक और बेहद चिंताजनक था। ये सूक्ष्म कण मानव स्वास्थ्य, विशेषकर फेफड़ों और श्वसन तंत्र के लिए अत्यंत घातक माने जाते हैं।

    प्रदूषण के इस खतरनाक स्तर को देखते हुए प्रशासन को वॉशिंगटन और उसके आस-पास के क्षेत्रों में ‘कोड पर्पल’ श्रेणी का अलर्ट जारी करना पड़ा। इसका सीधा अर्थ यह है कि हवा की गुणवत्ता इतनी खराब हो चुकी थी कि वह सामान्य नागरिकों के स्वास्थ्य को भी गंभीर रूप से प्रभावित कर सकती थी। इस वायु प्रदूषण का व्यापक असर न केवल राजधानी तक सीमित रहा, बल्कि इसके पड़ोसी राज्यों वर्जीनिया और मैरीलैंड के कई हिस्सों में भी हवा की गुणवत्ता बेहद खराब श्रेणी में पहुंच गई।

    वैज्ञानिकों और मौसम विशेषज्ञों का मानना है कि यदि रविवार को समय पर बारिश नहीं हुई होती, तो स्थिति और भी अधिक गंभीर हो सकती थी। यूनिवर्सिटी ऑफ मैरीलैंड के वायुमंडलीय वैज्ञानिक रसेल डिकरसन के अनुसार, बारिश ने वातावरण में फैले इस अत्यधिक धुएं और प्रदूषण को साफ करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिससे रविवार दोपहर तक वायु गुणवत्ता पुनः सामान्य स्तर पर आ सकी। इसके बाद वॉशिंगटन प्रदूषण रैंकिंग में नीचे खिसक गया। वहीं दूसरी ओर, इस आतिशबाजी के जरिए पूर्व में फिलीपींस द्वारा बनाए गए 8.11 लाख आतिशबाजी के रिकॉर्ड को तोड़ने के दावे पर ‘गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड्स’ ने कहा है कि साक्ष्यों की पूरी समीक्षा के बाद ही आधिकारिक पुष्टि की जाएगी।

  • प्रदूषण से जूझते मध्य प्रदेश में विकास की भारी कीमत, 15 लाख पेड़ों की कटाई पर उठे गंभीर सवाल

    प्रदूषण से जूझते मध्य प्रदेश में विकास की भारी कीमत, 15 लाख पेड़ों की कटाई पर उठे गंभीर सवाल


    मध्य प्रदेश में एक ओर वायु प्रदूषण लगातार खतरनाक स्तर पर पहुंच रहा है, वहीं दूसरी ओर विकास परियोजनाओं के नाम पर बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई प्रस्तावित है। राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण एनजीटीद्वारा राज्य के आठ शहरों को गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट की श्रेणी में रखे जाने के बावजूद इन्हीं क्षेत्रों में लाखों पेड़ों को काटने की तैयारी ने पर्यावरण और जनस्वास्थ्य दोनों को लेकर चिंता बढ़ा दी है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार केवल इन आठ शहरों में ही करीब 6.50 लाख पेड़ों के कटने का प्रस्ताव है, जबकि पूरे प्रदेश में विभिन्न परियोजनाओं के चलते लगभग 15 लाख पेड़ संकट में हैं।

    जिन शहरों को एनजीटी और प्रदूषण नियंत्रण एजेंसियों ने सबसे अधिक प्रदूषित माना है, उनमें भोपाल, इंदौर, ग्वालियर, जबलपुर, उज्जैन, सिंगरौली, सागर और देवास शामिल हैं। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड सीपीसीबीके अनुसार इन शहरों में पीएम-10 का औसत स्तर 130 से 190 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर और पीएम-2.5 का स्तर 80 से 100 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर तक दर्ज किया गया है, जो सुरक्षित सीमा से कई गुना अधिक है। इसके बावजूद इन्हीं इलाकों में सड़क, मेट्रो, कोयला, ऊर्जा और परिवहन से जुड़ी परियोजनाओं के लिए पुराने और परिपक्व पेड़ों को हटाने की योजनाएं आगे बढ़ाई जा रही हैं।

    सबसे बड़ा पर्यावरणीय खतरा सिंगरौली जिले में प्रस्तावित धिरौली कोल ब्लॉक परियोजना से जुड़ा माना जा रहा है। इस परियोजना के लिए करीब 1,397 हेक्टेयर वन भूमि आवंटित की गई है, जिसमें अधिकांश हिस्सा घने जंगल का है। जानकारी के अनुसार अब तक लगभग 35 हजार पेड़ काटे जा चुके हैं, जबकि करीब 5.70 लाख और पेड़ों के कटने की आशंका जताई जा रही है। सिंगरौली पहले से ही कोयला खनन और ताप विद्युत संयंत्रों के कारण गंभीर प्रदूषण झेल रहा है।राजधानी भोपाल में अयोध्या बायपास को फोरलेन से 10 लेन में तब्दील करने की योजना के तहत लगभग 7,800 पेड़ों को हटाने की अनुमति दी गई है। इसके अलावा कोलार बायपास और बंगरसिया से भोजपुर तक सड़क निर्माण कार्यों में भी बड़ी संख्या में पेड़ पहले ही काटे जा चुके हैं। इंदौर में रीगल चौराहे पर मेट्रो स्टेशन निर्माण के लिए 1,200 से अधिक पेड़ों पर संकट है, जबकि इंदौर-उज्जैन मार्ग के चौड़ीकरण में करीब 3,000 पेड़ प्रभावित होंगे।

    ग्वालियर में थाटीपुर रीडेंसिफिकेशन योजना और अन्य सड़क परियोजनाओं के चलते हजारों पुराने पेड़ हटाए जा चुके हैं या हटाने की प्रक्रिया में हैं। मंडला जिले में बसनिया डेम और उससे जुड़ी नहर व पावर परियोजनाओं से लगभग 2,100 हेक्टेयर वन क्षेत्र प्रभावित होगा, जहां करीब 5 लाख पेड़ों के कटने का अनुमान है। डिंडोरी में नर्मदा पर प्रस्तावित राघवपुर बांध और महू-खंडवा रेलवे लाइन परियोजना भी बड़े पैमाने पर वन कटाई का कारण बन रही हैं।पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि प्रदूषण से जूझ रहे शहरों में हरित आवरण का इस तरह कम होना सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट को और गहरा सकता है। वहीं सरकार का तर्क है कि इन परियोजनाओं के बदले बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण किया जाएगा, लेकिन विशेषज्ञ सवाल उठा रहे हैं कि क्या नए पौधे दशकों पुराने पेड़ों की भरपाई कर पाएंगे।

  • ठंड और बढ़ता वायु प्रदूषण बना सेहत के लिए खतरा, आयुर्वेदिक उपाय बन सकते हैं सुरक्षा कवच

    ठंड और बढ़ता वायु प्रदूषण बना सेहत के लिए खतरा, आयुर्वेदिक उपाय बन सकते हैं सुरक्षा कवच


    नई दिल्ली  /प्रदेश में जैसे-जैसे ठंड बढ़ रही है, वैसे-वैसे वायु प्रदूषण का स्तर भी चिंताजनक होता जा रहा है। राजधानी समेत कई जिलों में हवा की गुणवत्ता खराब हो चुकी है, जिसका सीधा असर लोगों की सेहत पर दिखाई दे रहा है। अस्पतालों में छींक, खांसी, गले में खराश, सांस लेने में दिक्कत, कब्ज और एलर्जी के मरीजों की संख्या तेजी से बढ़ रही है।

    विशेषज्ञों के अनुसार, यह मौसम खासतौर पर उन लोगों के लिए ज्यादा जोखिम भरा है, जिनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर है या जो पहले से ही अस्थमा, ब्रोंकाइटिस, एलर्जी और अन्य श्वसन संबंधी बीमारियों से ग्रस्त हैं। ऐसे में आयुर्वेदिक उपाय ठंड और प्रदूषण दोनों से बचाव का प्रभावी, सुरक्षित और किफायती विकल्प बनकर सामने आ रहे हैं।

    सही दिनचर्या से मिलेगा दोहरी सुरक्षा
    राजकीय आयुर्वेदिक कॉलेज के रोग एवं विकृति विभाग के विशेषज्ञ डॉ. अमरेंद्र कुमार सिंह बताते हैं कि सर्दियों में यदि ऋतु के अनुसार दिनचर्या और भोजन अपनाया जाए, तो ठंड और प्रदूषण से होने वाले दुष्प्रभावों को काफी हद तक रोका जा सकता है। उनके अनुसार, रोजाना सरसों के तेल से हल्की मालिश सिर से पांव तक करने से शरीर में गर्माहट बनी रहती है और त्वचा भी सुरक्षित रहती है। इसके साथ ही सुबह नाक में अणु तेल या सरसों तेल की 1–2 बूंद डालने से नाक और फेफड़ों को प्रदूषण से होने वाले नुकसान से बचाया जा सकता है।

    सूर्यस्नान, योग और भाप के लाभ

    सर्दियों में रोजाना कम से कम 30 मिनट धूप में बैठना शरीर को प्राकृतिक ऊर्जा देता है और इम्यून सिस्टम को मजबूत बनाता है। विशेषज्ञों की सलाह से अनुलोम-विलोम, कपालभाति और भ्रामरी प्राणायाम करने से श्वसन तंत्र सशक्त होता है और फेफड़े बेहतर तरीके से काम करते हैं। रात में भाप लेना भी बेहद फायदेमंद माना गया है। इससे नाक और सांस की नलियां साफ होती हैं, बलगम निकलता है और सर्दी-जुकाम में राहत मिलती है।

    सर्दियों में सही भोजन बनेगा सेहत की ढाल
    आयुर्वेद में हेमंत और शिशिर ऋतु में उष्ण, तरल और स्नेही आहार को लाभकारी बताया गया है। बाल रोग विभाग के विशेषज्ञ डॉ. अरविंद कुमार चौरसिया के अनुसार बच्चों को रोज हल्दी वाला दूध देना चाहिए, जिससे उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। इस मौसम में आसानी से मिलने वाला आंवला विटामिन-सी और आयरन का बेहतरीन स्रोत है। इसके अलावा गुड़, अदरक, कच्ची हल्दी, तिल और सोंठ से बने व्यंजन शरीर को अंदर से गर्म रखते हैं और ठंड के असर को कम करते हैं।

    पाचन ठीक रहेगा तो बीमारियां रहेंगी दूर
    प्रभारी अधीक्षक डॉ. अरुण कुमार सिंह बताते हैं कि ठंड के मौसम में पाचन शक्ति कमजोर पड़ जाती है, जिससे कब्ज, गैस और अपच की समस्या बढ़ जाती है। इससे बचने के लिए दिनभर गुनगुना पानी पीना, रात को दूध में एक चम्मच घी लेना और सुबह भिगोया हुआ मेथी दाना खाना फायदेमंद होता है।

    आयुर्वेदिक जीवनशैली है सबसे आसान समाधान
    विशेषज्ञों का मानना है कि यदि लोग नियमित योग, संतुलित आहार और आयुर्वेदिक उपायों को अपनी दिनचर्या में शामिल करें, तो ठंड और प्रदूषण के संयुक्त प्रभाव से खुद को सुरक्षित रख सकते हैं। यह न केवल बीमारी से बचाव करता है, बल्कि शरीर को अंदर से मजबूत भी बनाता है।

  • जयपुर के खेतों में फैक्ट्री का जहर, मिट्टी हो रही काली, सब्जियां बन गईं 'स्लो पॉइजन'

    जयपुर के खेतों में फैक्ट्री का जहर, मिट्टी हो रही काली, सब्जियां बन गईं 'स्लो पॉइजन'


    जयपुर । जयपुर(Jaipur) में फैक्ट्रियों से निकल रहा केमिकल (Chemical)और ब्लीच मिला पानी लोगों की सेहत के लिए बड़ा खतरा बनता जा रहा है. सवाल यह है कि जो हरी सब्जियां(green vegetables) और फल लोग सेहत के लिए खाते हैं, क्या वे सच में उन्हें स्वस्थ बना रहे हैं या धीरे-धीरे बीमार कर रहे हैं.

    अगर इन सब्जियों और फलों की खेती ऐसे पानी से हो रही हो, जिसमें फैक्ट्रियों का जहरीला कचरा और रसायन मिले हों, तो इसका सीधा असर आम लोगों की सेहत पर पड़ता है. ऐसा पानी किडनी फेल होने, दिल की बीमारियों और यहां तक कि कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों का कारण बन सकता है.

    स्लो पॉइजन का काम कर रही सब्जियां
    जयपुर के सांगानेर इलाके में सांगानेर से चांदलई तक करीब 20 किलोमीटर के दायरे में दो दर्जन से ज्यादा गांव आते हैं. यहां कपड़ों की रंगाई, छपाई और ब्लीच का काम करने वाली फैक्ट्रियां आसपास के जल स्रोतों में केमिकल और ब्लीच वाला पानी छोड़ रही हैं. इससे पूरे इलाके में भारी प्रदूषण फैल गया है. जानकारी के मुताबिक, इस दूषित पानी से उगाई गई फसलें धीमे जहर की तरह काम कर रही हैं, जो समय के साथ गंभीर बीमारियों की वजह बन सकती हैं.

    काली हो चुकी है खेतों की मिट्टी
    मीडिया की टीम जब जयपुर की सांगानेर तहसील के शिकारपुरा और मुहाना समेत कई इलाकों में पहुंची, तो वहां काले रंग का पानी खेतों में पंप किया जा रहा था. इन खेतों में पत्तागोभी, बैंगन, पालक और लगभग हर तरह की मौसमी सब्जियों की खेती हो रही थी. कई जगहों पर इस गंदे पानी की वजह से मिट्टी का रंग भी ग्रे और काला हो चुका है. किसान सीताराम का कहना है कि इससे खाने वाली सभी फसलों को नुकसान हो रहा है, लेकिन जांच के लिए अब तक कोई अधिकारी नहीं आया है.

    ‘कई साल से छोड़ा जा रहा पानी, कोई कार्रवाई नहीं’
    जानकारी यह भी है कि कुछ फैक्ट्रियों में गंदे पानी को साफ करने की व्यवस्था जरूर है, लेकिन ज्यादातर फैक्ट्रियां बिना किसी सफाई के केमिकल और रंग मिला पानी सीधे नालों और जल स्रोतों में छोड़ रही हैं. इसका असर सीधे खेतों और फसलों पर पड़ रहा है.

    स्थानीय लोगों का कहना है कि सालों से फैक्ट्रियों का जहरीला पानी इन खेतों में छोड़ा जा रहा है, लेकिन अब तक इस पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई है. एक फैक्ट्री कर्मचारी सिकंदर का दावा है कि उनके यहां गंदे पानी को साफ करने की व्यवस्था है और फिल्टर के बाद ही पानी बाहर छोड़ा जाता है. हालांकि, जमीनी हालात कुछ और ही कहानी बयान कर रहे हैं.