संसदीय पटल पर प्रस्तुत किए गए तर्कों और विश्लेषण के अनुसार यदि भविष्य में केवल जनसंख्या को ही आधार बनाया गया तो देश के राजनीतिक मानचित्र पर एक बड़ा असंतुलन पैदा हो सकता है। आंकड़ों के माध्यम से यह रेखांकित किया गया कि यदि वर्तमान जनसंख्या वृद्धि की दर और प्रस्तावित परिसीमन का मेल होता है तो भविष्य में उत्तर भारत के केवल छह या सात प्रमुख राज्यों के सहयोग से ही केंद्र में पूर्ण बहुमत वाली सरकार का गठन संभव हो जाएगा।
चर्चा के दौरान यह बात भी प्रमुखता से रखी गई कि किसी भी लोकतांत्रिक देश में कानून निर्माण की प्रक्रिया में हर भौगोलिक और सांस्कृतिक क्षेत्र का समान महत्व होना चाहिए। संघीय शासन प्रणाली की सफलता इसी बात पर निर्भर करती है कि देश का प्रत्येक नागरिक और हर राज्य स्वयं को निर्णय लेने वाली सर्वोच्च संस्था में प्रभावी रूप से प्रतिनिधित्व पाता हुआ महसूस करे।
इस विषय पर विचार करते हुए यह सुझाव दिया गया कि नीति निर्माताओं को परिसीमन के नियमों पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता है। यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि बेहतर शासन और जनसंख्या नियंत्रण करने वाले राज्यों को पुरस्कृत किया जाए न कि उनकी संसदीय शक्ति को कम करके उन्हें दंडित किया जाए।
अंततः यह संपूर्ण चर्चा इस निष्कर्ष की ओर इशारा करती है कि भारतीय लोकतंत्र के समक्ष आने वाले वर्षों में प्रतिनिधित्व का संकट एक बहुत बड़ी चुनौती के रूप में सामने आएगा। इस जटिल मुद्दे के समाधान के लिए सभी राजनीतिक दलों और संवैधानिक संस्थाओं को सामूहिक रूप से प्रयास करने होंगे।

