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  • राष्ट्रीय विकास और जनसंख्या नियंत्रण में उत्कृष्ट कार्य करने वाले राज्यों के प्रतिनिधित्व को सुरक्षित रखना संघीय स्थिरता के लिए आवश्यक है।

    राष्ट्रीय विकास और जनसंख्या नियंत्रण में उत्कृष्ट कार्य करने वाले राज्यों के प्रतिनिधित्व को सुरक्षित रखना संघीय स्थिरता के लिए आवश्यक है।

    नई दिल्ली:भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था में राज्यों के प्रतिनिधित्व और जनसंख्या के आधार पर सीटों के आवंटन को लेकर एक अत्यंत महत्वपूर्ण बहस छिड़ गई है। हाल ही में सदन की कार्यवाही के दौरान देश के भविष्य की राजनीतिक दिशा और संघीय ढांचे की स्थिरता को लेकर गहरी चिंताएं व्यक्त की गईं। इस चर्चा का मुख्य केंद्र आगामी परिसीमन और उसके संभावित परिणाम रहे जो आने वाले दशकों में भारतीय राजनीति के स्वरूप को पूरी तरह बदल सकते हैं।
    यह तर्क दिया गया कि यदि भविष्य में लोकसभा सीटों का निर्धारण केवल जनसंख्या वृद्धि के मानकों पर किया जाता है तो इससे उन राज्यों के राजनीतिक प्रभाव में भारी कमी आने की आशंका है जिन्होंने राष्ट्रीय लक्ष्यों जैसे परिवार नियोजन और जनसंख्या नियंत्रण को सफलतापूर्वक लागू किया है। विशेष रूप से दक्षिण भारतीय राज्यों के संदर्भ में यह एक गंभीर विषय बन गया है क्योंकि उनके बेहतर सामाजिक और शैक्षिक प्रदर्शन का परिणाम उन्हें संसद में कम प्रतिनिधित्व के रूप में भुगतना पड़ सकता है।

    संसदीय पटल पर प्रस्तुत किए गए तर्कों और विश्लेषण के अनुसार यदि भविष्य में केवल जनसंख्या को ही आधार बनाया गया तो देश के राजनीतिक मानचित्र पर एक बड़ा असंतुलन पैदा हो सकता है। आंकड़ों के माध्यम से यह रेखांकित किया गया कि यदि वर्तमान जनसंख्या वृद्धि की दर और प्रस्तावित परिसीमन का मेल होता है तो भविष्य में उत्तर भारत के केवल छह या सात प्रमुख राज्यों के सहयोग से ही केंद्र में पूर्ण बहुमत वाली सरकार का गठन संभव हो जाएगा।

    ऐसी स्थिति में देश के अन्य हिस्सों विशेषकर दक्षिण और पूर्वोत्तर भारत की राजनीतिक भागीदारी और उनकी आवाज का महत्व केंद्र सरकार के निर्णयों में काफी कम हो सकता है। यह संभावना न केवल क्षेत्रीय असंतुलन को बढ़ावा दे सकती है बल्कि भारतीय लोकतंत्र की उस मूल भावना के लिए भी चुनौती बन सकती है जो विविधता में एकता और सभी क्षेत्रों की समान भागीदारी पर आधारित है।

    चर्चा के दौरान यह बात भी प्रमुखता से रखी गई कि किसी भी लोकतांत्रिक देश में कानून निर्माण की प्रक्रिया में हर भौगोलिक और सांस्कृतिक क्षेत्र का समान महत्व होना चाहिए। संघीय शासन प्रणाली की सफलता इसी बात पर निर्भर करती है कि देश का प्रत्येक नागरिक और हर राज्य स्वयं को निर्णय लेने वाली सर्वोच्च संस्था में प्रभावी रूप से प्रतिनिधित्व पाता हुआ महसूस करे।

    यदि सीटों के पुनर्गठन के बाद राजनीतिक सत्ता का केंद्र पूरी तरह से कुछ विशिष्ट राज्यों तक सीमित हो जाता है तो इससे उन राज्यों के भीतर असुरक्षा और उपेक्षा की भावना पैदा हो सकती है जिन्होंने विकास के मानकों पर शानदार कार्य किया है। लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए यह अनिवार्य माना गया कि परिसीमन को केवल एक सांख्यिकीय प्रक्रिया के रूप में न देखकर इसे एक न्यायसंगत वितरण प्रणाली के रूप में विकसित किया जाए।

    इस विषय पर विचार करते हुए यह सुझाव दिया गया कि नीति निर्माताओं को परिसीमन के नियमों पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता है। यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि बेहतर शासन और जनसंख्या नियंत्रण करने वाले राज्यों को पुरस्कृत किया जाए न कि उनकी संसदीय शक्ति को कम करके उन्हें दंडित किया जाए।

    सदन में इस विचार पर बल दिया गया कि भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में केवल संख्या बल ही सत्ता का एकमात्र आधार नहीं होना चाहिए बल्कि क्षेत्रीय योगदान और विकास के पैमानों को भी उचित सम्मान मिलना चाहिए। यदि ऐसा नहीं होता है तो आने वाले समय में राष्ट्रीय राजनीति में एक गहरा विभाजन देखने को मिल सकता है जो संघीय सहयोग और राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया को कमजोर कर सकता है।

    अंततः यह संपूर्ण चर्चा इस निष्कर्ष की ओर इशारा करती है कि भारतीय लोकतंत्र के समक्ष आने वाले वर्षों में प्रतिनिधित्व का संकट एक बहुत बड़ी चुनौती के रूप में सामने आएगा। इस जटिल मुद्दे के समाधान के लिए सभी राजनीतिक दलों और संवैधानिक संस्थाओं को सामूहिक रूप से प्रयास करने होंगे।

    संघीय ढांचे को अटूट रखने के लिए ऐसे समाधान खोजने की आवश्यकता है जो जनसंख्या के संतुलन के साथ-साथ क्षेत्रीय अस्मिता और राज्यों के विशिष्ट योगदान को भी सुरक्षित रख सकें। भविष्य में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि भारत का नेतृत्व इस संवेदनशील मुद्दे पर किस प्रकार की आम सहमति बनाता है ताकि देश का हर हिस्सा स्वयं को राष्ट्र की मुख्यधारा का एक सशक्त और अपरिहार्य अंग समझता रहे।
  • हम दो-हमारे दो दर्जन, AIMIM यूपी अध्यक्ष शौकत अली बोले- ज्यादा जनसंख्या देश की ताकत

    हम दो-हमारे दो दर्जन, AIMIM यूपी अध्यक्ष शौकत अली बोले- ज्यादा जनसंख्या देश की ताकत


    नई दिल्ली । एआईएमआईएम के प्रदेश अध्यक्ष शौकत अली ने एक बार फिर विवादित राग छेड़ा है। जनसंख्या नियंत्रण की सरकारी नीतियों और सामाजिक विमर्श के उलट, उन्होंने आबादी बढ़ाने को देश की मजबूती से जोड़कर एक नई राजनीतिक बहस को जन्म दे दिया है।ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन के उत्तर प्रदेश अध्यक्ष शौकत अली अपने बयानों के चलते एक बार फिर विवादों के घेरे में हैं। सोमवार को मुरादाबाद के रामपुर दोराहा क्षेत्र में आयोजित एक जनसभा को संबोधित करते हुए उन्होंने जनसंख्या वृद्धि को लेकर ऐसी टिप्पणी की, जिसने राजनीतिक गलियारों में खलबली मचा दी है। शौकत अली ने मुसलमानों से अधिक बच्चे पैदा करने की अपील करते हुए नारा दिया कि “हम दो, हमारे दो नहीं, बल्कि हमारे दो दर्जन होने चाहिए।
    शौकत अली ने अपने संबोधन में जनसंख्या नियंत्रण के वैश्विक और राष्ट्रीय तर्कों को दरकिनार करते हुए दावा किया कि किसी भी देश की असली मजबूती उसकी बड़ी आबादी में निहित होती है। उन्होंने धार्मिक भावनाओं को जोड़ते हुए कहा, “जब अल्लाह बच्चों की नेमत दे रहा है, तो उसे पूरी खुशी के साथ स्वीकार करना चाहिए। बच्चे ऊपर वाले की देन हैं और उन्हें रोकने की कोशिश नहीं होनी चाहिए।” उन्होंने तर्क दिया कि आबादी बढ़ने से देश कमजोर नहीं बल्कि और अधिक ताकतवर होकर उभरेगा।
    कुंवारे नेताओं पर कसा तंज
    जनसंख्या नियंत्रण की वकालत करने वाले नेताओं पर निशाना साधते हुए शौकत अली ने तीखी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि जो लोग खुद शादी नहीं करते या जिनका अपना परिवार नहीं है, वही दूसरों को जनसंख्या नियंत्रण का ज्ञान बांटते फिर रहे हैं। उनका यह इशारा सीधे तौर पर सत्ता पक्ष के वरिष्ठ नेताओं की ओर माना जा रहा है। साथ ही, उन्होंने मुरादाबाद के मदरसों का जिक्र करते हुए नाराजगी जताई कि यहाँ मदरसों का विस्तार शिक्षा के लिए किया गया है, लेकिन कुछ लोग इन्हें जानबूझकर ‘आतंकवाद का अड्डा’ बताकर बदनाम करने की कोशिश करते हैं।
    सपा और बी टीम के आरोपों पर पलटवार
    जनसभा के दौरान शौकत अली केवल जनसंख्या तक ही सीमित नहीं रहे, बल्कि उन्होंने समाजवादी पार्टी पर भी जमकर भड़ास निकाली। सपा के एक विधायक द्वारा एआईएमआईएम को भाजपा की बी टीम बताए जाने पर पलटवार करते हुए उन्होंने कहा कि सपा खुद अपनी जमीन खो रही है और अपनी विफलताओं को छिपाने के लिए मजलिस पर झूठे आरोप मढ़ रही है। उन्होंने कहा कि मुसलमानों का सच्चा रहनुमा वही है जो उनके हक की बात डंके की चोट पर करे, न कि वह जो केवल वोट बैंक की राजनीति करे।
    बयान पर छिड़ा सियासी घमासान
    शौकत अली के इस ‘दो दर्जन’ वाले बयान के बाद भाजपा और अन्य दलों ने उन पर कड़ा प्रहार किया है। जानकारों का मानना है कि इस तरह के बयान ध्रुवीकरण की राजनीति को बढ़ावा देते हैं और विकास के मुख्य मुद्दों से ध्यान भटकाते हैं। वहीं, सोशल मीडिया पर भी इस बयान को लेकर तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं।