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  • जनगणना 2027 : दूसरे चरण में होगी जनसंख्या की गणना… जानिए कब से शुरू होगी प्रक्रिया?

    जनगणना 2027 : दूसरे चरण में होगी जनसंख्या की गणना… जानिए कब से शुरू होगी प्रक्रिया?


    नई दिल्ली।
    आपके घर भी कुछ महीने पहले जनगणना (Census 2027) के अधिकारी आए होंगे और मकान (House) से लेकर पानी, बिजली और इंटरनेट (Internet) तक के बारे में सवाल पूछे होंगे। अब सरकार ने जनगणना 2027 (Census 2027) के अगले चरण (Second Phase) की तारीखों का एलान कर दिया है।


    जनगणना 2027 का पूरा शेड्यूल क्या है?

    जनगणना की प्रक्रिया दो चरणों में पूरी की जा रही है। पहले चरण में मकान सूचीकरण और आवास जनगणना का काम अप्रैल से सितंबर 2026 के बीच पूरा किया गया। अब दूसरे चरण यानी जनसंख्या गणना की प्रक्रिया होगी।

    गृह मंत्रालय की अधिसूचना के मुताबिक, ज्यादातर राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में जनसंख्या गणना 25 जनवरी से 28 फरवरी 2027 तक होगी। इसके बाद 1 से 5 मार्च 2027 तक पुनरीक्षण का दौर चलेगा। इससे पहले 10 से 24 जनवरी 2027 तक लोगों को ऑनलाइन स्व-गणना का विकल्प मिलेगा। हालांकि, कुछ राज्यों और क्षेत्रों में जनगणना का कार्यक्रम अलग रखा गया है।


    अगर आप इन राज्यों में रहते हैं तो जनवरी-फरवरी में नहीं होगी जनगणना

    मणिपुर, गोवा, उत्तर प्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड के साथ ही लद्दाख, हिमाचल प्रदेश और जम्मू कश्मीर के बर्फीले क्षेत्रों में सामान्य कार्यक्रम के अनुसार जनगणना नहीं होगी। मणिपुर में जातीय हिंसा के कारण हालात सामान्य नहीं होने की वजह से जनगणना अगली अधिसूचना तक टाल दी गई है। वहीं, गोवा, उत्तर प्रदेश, पंजाब और उत्तराखंड में 2027 की शुरुआत में विधानसभा चुनाव होने होने है, इसे देखते हुए इन राज्यों में अलग कार्यक्रम रखा गया है।

    इसके अलावा लद्दाख, जम्मू-कश्मीर और हिमाचल प्रदेश के बर्फीले इलाकों में भी अलग समय पर जनगणना होगी। इनमें लाहौल-स्पीति और किन्नौर के ऊंचाई वाले इलाके शामिल हैं। यहां सर्दियों में बर्फबारी के कारण रास्ते बंद हो जाते हैं, जिससे कर्मचारियों को घर-घर पहुंचने में परेशानी होती है। इनमें से उत्तर प्रदेश के लिए जनगणना का कार्यक्रम घोषित कर दिया गया है। बाकी राज्यों और क्षेत्रों की तारीखों के लिए अलग अधिसूचना का इंतजार है।


    उत्तर प्रदेश में कब आएंगे जनगणना अधिकारी?

    अगर आप उत्तर प्रदेश में रहते हैं तो आपके यहां जनगणना का दूसरा चरण दिसंबर 2026 में शुरू होगा। प्रदेश में 1 दिसंबर 2026 से 4 जनवरी 2027 तक कर्मचारी घर-घर जाकर परिवार के सदस्यों की जानकारी जुटाएंगे। इससे पहले 16 नवंबर से 30 नवंबर 2026 तक ऑनलाइन स्व-गणना का विकल्प मिलेगा। इसके बाद गणनाकर्मी घर पहुंचकर ऑनलाइन भरी गई जानकारी का सत्यापन करेंगे। प्रदेश में पुनरीक्षण दौर 5 से 9 जनवरी 2027 तक चलेगा।


    क्या घर बैठे खुद भर सकते हैं जनगणना का फॉर्म?

    हां, इस बार सरकार ने लोगों को स्व-गणना यानी सेल्फ एन्यूमरेशन की सुविधा दी है। इसके जरिए आप घर बैठे अपने मकान और परिवार से जुड़ी जानकारी ऑनलाइन दर्ज कर सकते हैं। इसके लिए आपको गणनाकर्मी के घर आने का इंतजार करने की जरूरत नहीं होगी।


    ऑनलाइन स्व-गणना फॉर्म कैसे भरें? समझिए पूरा तरीका
    स्टेप 1: पोर्टल खोलें

    सबसे पहले अपने मोबाइल या कंप्यूटर के ब्राउजर में Census India Self Enumeration Portal खोलें। इसके अलावा जणगणना पोर्टल पर जाकर सेल्फ एन्यूमरेशन के विकल्प पर क्लिक कर सकते हैं।


    स्टेप 2: लॉग इन करें

    पोर्टल पर अपना राज्य या केंद्रशासित प्रदेश चुनें। इसके बाद स्क्रीन पर दिया गया कैप्चा भरें। अब परिवार के मुखिया का नाम और मोबाइल नंबर दर्ज करें। आपके मोबाइल पर एक ओटीपी (OTP) आएगा। इसे भरकर अपना सत्यापन पूरा करें।


    स्टेप 3: घर की लोकेशन दर्ज करें

    लॉग इन करने के बाद जिला, गांव या शहर और पिनकोड जैसी जानकारी भरें। इसके बाद स्क्रीन पर दिखाई देने वाले नक्शे यानी मैप पर अपने घर की सही लोकेशन मार्क करें।


    स्टेप 4: पूछे गए सवालों के जवाब भरें

    पहले चरण में भी आपके घर से संबंधित 33 सवाल इसमें दिए गए थे। अब फिर से नए 40 सवाल इसमें दिए जाएंगे।

    स्टेप 5: जानकारी चेक करके सबमिट करें
    फॉर्म भरने के बाद Preview विकल्प पर क्लिक करके सभी जानकारियां जांच लें। अगर कोई गलती है तो उसे ठीक करें। इसके बाद Final Submit पर क्लिक करें। फॉर्म जमा होने के बाद आपको 11 अंकों की एक विशेष पहचान संख्या मिलेगी। इसे SE ID कहा जाता है।


    SE ID मिलने के बाद क्या करना होगा?

    फॉर्म जमा करने के बाद मिली 11 अंकों की SE ID को सुरक्षित रखें। इसका स्क्रीनशॉट ले सकते हैं या प्रिंट निकालकर रख सकते हैं। जब जनगणना कर्मचारी आपके घर आएंगे तो उन्हें यह आईडी दिखानी होगी। इसके आधार पर वे ऑनलाइन भरी गई जानकारी का सत्यापन करेंगे।


    ऑनलाइन फॉर्म भरते समय इन बातों का रखें ध्यान

    – एक मोबाइल नंबर से केवल एक घर का स्व-गणना फॉर्म भरा जा सकता है।
    – सभी जानकारियां सही और सच्ची भरें।
    – फॉर्म सबमिट करने से पहले सभी जवाब दोबारा जांच लें।
    – स्व-गणना करना वैकल्पिक है। आप चाहें तो गणनाकर्मी के घर आने पर भी जानकारी दे सकते हैं।


    दूसरे चरण में क्या-क्या सवाल पूछे जाएंगे?

    पहले चरण में मकान और सुविधाओं से जुड़ी जानकारी ली गई थी, जबकि दूसरे चरण में परिवार के प्रत्येक सदस्य की व्यक्तिगत जानकारी जुटाई जाएगी। इस बार कुल 40 सवाल पूछे जाएंगे, जबकि 2011 की जनगणना में 29 सवाल पूछे गए थे। यानी इस बार 11 नए सवाल जोड़े गए हैं। इन सवालों में जाति, धर्म, माता-पिता और पति या पत्नी का नाम, घोषित राष्ट्रीयता और स्थायी पता जैसी जानकारियां शामिल हैं। इसके अलावा डिजिटल साक्षरता, शिक्षा का स्तर और परिवार के कुल बैंक खातों की संख्या के बारे में भी पूछा जाएगा। मोबाइल नंबर, आधार और वोटर आईडी नंबर, कोविड-19 टीकाकरण की जगह, पासपोर्ट नंबर और ड्राइविंग लाइसेंस की उपलब्धता से जुड़े सवाल भी इस चरण का हिस्सा होंगे।

  • दुनिया के 64 देशों में आबादी का ग्राफ नीचे, चीन-जापान से लेकर यूरोप तक असर, भारत के लिए भी बड़ा संकेत

    दुनिया के 64 देशों में आबादी का ग्राफ नीचे, चीन-जापान से लेकर यूरोप तक असर, भारत के लिए भी बड़ा संकेत


    नई दिल्ली। कभी बढ़ती आबादी को दुनिया की सबसे बड़ी चुनौती माना जाता था। आशंका थी कि लगातार बढ़ते इंसानों के दबाव में धरती के संसाधन कम पड़ जाएंगे। लेकिन अब जनसंख्या को लेकर तस्वीर तेजी से बदल रही है। दुनिया के 64 देश और क्षेत्र ऐसे हैं, जहां आबादी अपने उच्चतम स्तर यानी ‘पीक पॉपुलेशन’ को पार कर चुकी है और अब लगातार घट रही है। यह बदलाव किसी महामारी, युद्ध या प्राकृतिक आपदा का नतीजा नहीं, बल्कि लोगों की जीवनशैली, परिवार और बच्चों को लेकर बदलती सोच का परिणाम है।

    इन 64 देशों में केवल छोटे या संकटग्रस्त देश ही नहीं हैं। चीन जैसी दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्था भी इस बदलाव का सामना कर रही है। दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी आबादी वाला चीन अपने जनसंख्या शिखर को पार कर चुका है और अब वहां आबादी हर साल कम हो रही है। दक्षिण कोरिया में फर्टिलिटी रेट करीब 0.72 रह गई है। मौजूदा रुझान जारी रहा तो इस सदी के अंत तक उसकी आबादी आधे से भी कम रह सकती है। जापान और थाईलैंड भी इसी दिशा में तेजी से बढ़ रहे हैं।

    कौन-कौन से देश आबादी के शिखर से आगे निकल चुके?

    महाद्वीपों के हिसाब से देखें तो पूर्वी और दक्षिण-पूर्वी एशिया में चीन, हांगकांग, ताइवान, जापान, दक्षिण कोरिया और थाईलैंड इस चरण में पहुंच चुके हैं।

    यूरोप में इटली, जर्मनी, स्पेन, पोलैंड, यूक्रेन, रूस और ऑस्ट्रिया की आबादी अपने उच्चतम स्तर को पार कर चुकी है। कैरिबियन और लैटिन अमेरिका में क्यूबा, प्यूर्टो रिको, जमैका, उरुग्वे, डोमिनिका, मार्टिनिक, गुआदेलूप, कुराकाओ, मोंटसेराट, सेंट किट्स एंड नेविस, सेंट मार्टिन, सेंट विंसेंट एंड द ग्रेनेडींस, यूएस वर्जिन आइलैंड्स और फॉकलैंड आइलैंड्स जैसे क्षेत्र भी इस सूची में शामिल हैं।

    यूरोप और जापान इस बदलाव को काफी पहले महसूस करना शुरू कर चुके थे। जापान में बुजुर्गों की बढ़ती संख्या का असर बाजार तक में दिखाई देता है। वहां बच्चों के खिलौनों और डायपर की तुलना में बुजुर्गों के डायपर की बिक्री अधिक हो गई है। बच्चों की संख्या घटने से हजारों स्कूल बंद हो चुके हैं। पोलैंड, रोमानिया और बुल्गारिया जैसे पूर्वी यूरोपीय देशों में कम जन्मदर के साथ युवाओं का दूसरे देशों की ओर पलायन भी आबादी घटने की बड़ी वजह है।

    2.1 बच्चे भी नहीं हो रहे पैदा

    किसी देश की आबादी को लंबे समय तक स्थिर बनाए रखने के लिए प्रति महिला औसतन 2.1 बच्चों की जरूरत मानी जाती है। इसे ‘रिप्लेसमेंट रेट’ कहा जाता है। लेकिन दुनिया की आधी से ज्यादा आबादी ऐसे देशों में रह रही है, जहां प्रजनन दर इस स्तर से काफी नीचे जा चुकी है।

    इसके पीछे आर्थिक और सामाजिक दोनों कारण हैं। महानगरों में घर, बच्चों की परवरिश, शिक्षा और स्वास्थ्य पर बढ़ता खर्च परिवारों के फैसलों को प्रभावित कर रहा है। कई दंपती एक से ज्यादा बच्चे की जिम्मेदारी उठाने से बच रहे हैं। दूसरी ओर महिलाओं की शिक्षा और रोजगार के अवसर बढ़े हैं। करियर को प्राथमिकता देना, देर से शादी करना या बच्चे न पैदा करने का फैसला अब पहले की तुलना में अधिक स्वीकार्य हो रहा है। इन सामाजिक बदलावों का सीधा असर जनसंख्या के आंकड़ों पर पड़ रहा है।

    बाकी दुनिया के लिए खतरे की घंटी

    आज जिन देशों में आबादी बढ़ रही है, उनके लिए यह बदलाव भविष्य का संकेत है। संयुक्त राष्ट्र के अनुमानों के अनुसार 2050 का दशक आते-आते ब्राजील, मैक्सिको और अर्जेंटीना जैसे दक्षिण अमेरिकी देश भी अपने जनसंख्या शिखर के करीब पहुंच जाएंगे।

    भारत के लिए यह मोड़ 2060 के दशक में आने का अनुमान है। वर्तमान में दुनिया का सबसे ज्यादा आबादी वाला देश भारत उस दशक में करीब 170 करोड़ की आबादी के साथ अपने उच्चतम स्तर पर पहुंच सकता है। इसके बाद यहां भी आबादी घटने का दौर शुरू होने का अनुमान है।

    पूरी दुनिया के स्तर पर जनसंख्या का शिखर करीब 2084 में दिखाई दे सकता है। तब वैश्विक आबादी लगभग 10.3 अरब तक पहुंचकर अपने उच्चतम स्तर पर होगी और इसके बाद मानव इतिहास में पहली बार दुनिया की कुल आबादी का ग्राफ लगातार नीचे जाने लगेगा।

    अमेरिका की आबादी क्यों नहीं घट रही?

    कम जन्मदर के बावजूद अमेरिका फिलहाल इस संकट से उसी तरह प्रभावित नहीं है। संयुक्त राष्ट्र के अनुमानों के मुताबिक इस सदी के अंत तक भी अमेरिका अपनी आबादी के शिखर पर नहीं पहुंचेगा। इसकी बड़ी वजह इमिग्रेशन है। अमेरिका में हर साल बड़ी संख्या में विदेशी युवा पहुंचते हैं और वहां बसते हैं। इससे कम जन्मदर के कारण पैदा हुई आबादी की कमी काफी हद तक पूरी हो जाती है।

    कम लोग, लेकिन ज्यादा बुजुर्ग

    आबादी घटने का सबसे बड़ा असर रोजगार बाजार पर पड़ेगा। कामकाजी उम्र की आबादी कम होने पर कंपनियों को कर्मचारियों की कमी का सामना करना पड़ेगा। ऐसे में रोबोटिक्स, ऑटोमेशन और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का इस्तेमाल तेजी से बढ़ेगा।

    दूसरी चुनौती पेंशन और हेल्थकेयर की होगी। टैक्स देने वाले युवा कम होंगे, जबकि पेंशन और इलाज पर निर्भर बुजुर्गों की संख्या बढ़ेगी। इसका मतलब सरकारों के राजस्व पर दबाव और सामाजिक सुरक्षा पर बढ़ता खर्च होगा।

    इमिग्रेशन बनेगा आर्थिक ताकत का आधार

    भविष्य में वे देश ज्यादा मजबूत स्थिति में रह सकते हैं, जो विदेशी युवाओं और कुशल कामगारों को अपने यहां आने और बसने के अवसर देंगे। इसके उलट जिन देशों की सीमाएं प्रवासियों के लिए बंद रहेंगी, उन्हें कामकाजी आबादी की कमी और आर्थिक दबाव का सामना करना पड़ सकता है।

    भारत के पास डेमोग्राफिक डिविडेंड का सीमित समय

    भारत और अफ्रीकी देशों के लिए यह बदलाव खास संदेश लेकर आया है। युवा आबादी इन देशों की सबसे बड़ी ताकत है, लेकिन इस ताकत का फायदा हमेशा नहीं रहेगा। अगले 20-30 साल डेमोग्राफिक डिविडेंड का लाभ उठाने के लिहाज से बेहद अहम हैं।

    अगर इस अवधि में युवाओं को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, जरूरी स्किल और पर्याप्त रोजगार नहीं मिल पाया, तो आबादी घटने का दौर शुरू होने से पहले देश अपेक्षित आर्थिक समृद्धि हासिल नहीं कर पाएंगे।

    दुनिया के 64 देशों में खाली होते स्कूल, बुजुर्ग होती आबादी और बदलती शहरों की तस्वीर बता रही है कि 21वीं सदी की चुनौती अब केवल जनसंख्या को नियंत्रित करना नहीं है। असली चुनौती ऐसी दुनिया के लिए तैयारी करना है, जहां इंसान कम और उम्रदराज आबादी ज्यादा होगी। जिन देशों की नीतियां इस बदलाव के मुताबिक समय रहते बदल जाएंगी, उनके लिए घटती आबादी संकट के बजाय नई आर्थिक ताकत बन सकती है।

  • MP में 100 साल पहले विलुप्त हुए जंगली भैसों का कुनबा बढ़ा… काजीरंगा से कान्हा आए 4 नए भैंसे

    MP में 100 साल पहले विलुप्त हुए जंगली भैसों का कुनबा बढ़ा… काजीरंगा से कान्हा आए 4 नए भैंसे


    मंडला।
    मध्यप्रदेश (Madhya Pradesh) अब जंगली भैंसों (Wild Buffaloes) को दोबारा बसाने को लेकर एक नया कीर्तिमान रच रहा है. असम के काजीरंगा नेशनल पार्क (Kaziranga National Park, Assam) से लाए गए 4 और जंगली भैंसों को शुक्रवार को कान्हा टाइगर रिजर्व (Kanha Tiger Reserve.-KTR) के सुपखर रेंज में विशेष रूप से तैयार किए गए बाड़े में छोड़ दिया गया।

    मध्यप्रदेश के जंगलों से जंगली भैंस लगभग 100 साल पहले ही विलुप्त हो गए थे. सुपखर क्षेत्र, जहां इन भैंसों को छोड़ा गया है, ऐतिहासिक रूप से इनका प्राकृतिक आवास रहा है. इस पुनर्वास कार्यक्रम का उद्देश्य इस अहम प्रजाति को एक बार फिर मध्यप्रदेश के ईकोसिस्टम का हिस्सा बनाना है।


    72 घंटे का चुनौतीपूर्ण सफर

    इन जंगली भैंसों को काजीरंगा से कान्हा तक लाना किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं था. करीब 2220 किमी की लंबी यात्रा को विशेष वाहनों में इस सफर को पूरा करने में 72 घंटे लगे. यात्रा के दौरान दो विशेषज्ञ वन्यजीव पशु चिकित्सकों की टीम ने इन पशुओं के स्वास्थ्य की पल-पल निगरानी की।


    कान्हा में बढ़ा कुनबा

    इससे पहले, 28 अप्रैल 2026 को मुख्यमंत्री मोहन यादव ने पहले चरण के तहत चार जंगली भैंसों (1 नर और 3 मादा) को बाड़े में छोड़ा था. अब चार नए सदस्यों के आने के बाद कान्हा में इनकी कुल संख्या 8 हो गई है. अधिकारियों के मुताबिक, आने वाले समय में और भी भैंसों को यहां लाया जाएगा.

    ईकोसिस्टम के लिए क्यों हैं अहम?
    जंगली भैंस भारतीय वन्यजीव विरासत का गौरव हैं. वन अधिकारियों के अनुसार, वन पारिस्थितिकी तंत्र का संतुलन बनाए रखने में इनकी भूमिका बेहद अहम है.

    प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन्यजीव) समिता राजोरा और अतिरिक्त प्रधान मुख्य वन संरक्षक एल. कृष्णमूर्ति ने इस अभियान को मध्यप्रदेश की वन्यजीव संरक्षण पहलों में एक और मील का पत्थर बताया है। इस अवसर पर KTR के निदेशक रविंद्र मणि त्रिपाठी और उप निदेशकों सहित अन्य सीनियर अधिकारी भी मौजूद रहे।

  • पश्चिम बंगाल: मुस्लिम बहुल सीटों पर टिके हैं चुनाव के नतीजे, 85 क्षेत्रों में 30% आबादी निर्णायक भूमिका में

    पश्चिम बंगाल: मुस्लिम बहुल सीटों पर टिके हैं चुनाव के नतीजे, 85 क्षेत्रों में 30% आबादी निर्णायक भूमिका में


    कोलकाता।
    पश्चिम बंगाल (West Bengal) के 2026 विधानसभा चुनाव (2026 Assembly Elections) के नतीजे राज्य के जनसांख्यिकीय गणित, खासकर ‘मुस्लिम बहुल’ सीटों (Muslim-majority seats) पर टिके हैं। राज्य की 294 सदस्यीय विधानसभा में सत्ता की चाबी उन निर्वाचन क्षेत्रों में छिपी है, जहां अल्पसंख्यक मतदाता निर्णायक भूमिका में हैं। राजनीतिक हलकों में सबसे बड़ा सवाल यह है कि 2021 में इस वोट बैंक के बंपर समर्थन से सत्ता बचाने वाली ममता बनर्जी (Mamata Banerjee) की तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) क्या इस बार बहुकोणीय मुकाबले में अपना एकाधिकार कायम रख पाएगी?


    2021 का एकतरफा समीकरण और टीएमसी का क्लीन स्वीप

    भारत की चुनावी प्रणाली में, अगर किसी निर्वाचन क्षेत्र में एक ही समुदाय की 30% से अधिक सघन आबादी हो, तो वह नतीजे तय करने की ताकत रखती है। आंकड़ों के अनुसार, पश्चिम बंगाल की 294 सीटों में से 89 सीटें ऐसी हैं जहां मुस्लिम आबादी 30% के महत्वपूर्ण मानक को पार करती है। कुछ अनुमानों के अनुसार राज्य की कुल 294 सीटों में से लगभग 85 से 110 विधानसभा सीटें ऐसी हैं जहां मुस्लिम आबादी इस 30% के महत्वपूर्ण वैचारिक और सांख्यिकीय मानक के पार है। वहीं करीब 112 निर्वाचन क्षेत्रों में यह 25% से अधिक है।

    पश्चिम बंगाल के राजनीति इतिहास पर गौर करें तो इन क्षेत्रों पर दशकों तक वाम मोर्चे और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का निर्विवाद राजनीतिक एकाधिकार रहा था। हालांकि, 2011 में सत्ता परिवर्तन के बाद से, मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस ने इस विशाल अल्पसंख्यक वोट बैंक पर अपना एकछत्र रणनीतिक प्रभुत्व स्थापित कर लिया, जिसने उन्हें 2011, 2016 और 2021 में लगातार तीन बार भारी बहुमत के साथ सत्ता में बनाए रखा।

    2021 के विधानसभा चुनावों में टीएमसी ने 30% से अधिक मुस्लिम आबादी वाली करीब 85 में से 75 सीटों पर एकतरफा जीत दर्ज करते हुए लगभग क्लीन स्वीप किया था। ‘एक्सिस माय इंडिया’ के 2021 एग्जिट पोल के अनुसार, उस दौरान लगभग 75% मुस्लिम मतदाताओं ने एकजुट होकर टीएमसी को वोट दिया था। इसी एकमुश्त समर्थन ने भाजपा के आक्रामक अभियान को रोक दिया था। 2021 के विधानसभा चुनाव के आंकड़ों के अनुसार मुस्लिम बाहुल्य सीटों पर टीएमसी ने दबदबा दिखाया था। मुर्शिदाबाद की 22 में से 20 सीटों पर टीएमसी जीती, दो सीटें बीजेपी को मिलीं। कांग्रेस और लेफ्ट का खाता नहीं खुला। मालदा की 12 सीटों में टीएमसी ने आठ और बीजेपी ने चार सीटें जीतीं। उत्तर दिनाजपुर में टीएमसी को सात और बीजेपी को दो सीटें मिलीं। बीरभूम की 11 में से 10 सीटें टीएमसी ने जीतीं, एक बीजेपी के पास गई। दक्षिण 24 परगना की 31 में से 30 सीटों पर टीएमसी ने जीत दर्ज की।


    भाजपा के लिए यह दीवार अभेद्य क्यों?

    भाजपा के लिए ये मुस्लिम बहुल सीटें एक दीवार की तरह काम करती हैं। 2021 में, 30% से अधिक मुस्लिम आबादी वाली इन सीटों पर भाजपा केवल एक सीट जीत सकी थी। इसके विपरीत, जिन सीटों पर मुस्लिम आबादी 10% तक थी, वहां भाजपा का ‘स्ट्राइक रेट’ 42% था (77 में से 33 सीटें जीतीं)। जैसे-जैसे मुस्लिम आबादी का प्रतिशत बढ़ा, भाजपा का प्रदर्शन गिरता गया।

    2026: बहुकोणीय मुकाबला और वोटों के बिखराव का खतरा

    2026 का परिदृश्य 2021 के सीधे दो दलों के मुकाबले से पूरी तरह अलग और जटिल है। इस बार अल्पसंख्यक बहुल सीटों पर टीएमसी के वोट बैंक में सेंधमारी के कई मोर्चे खुल गए हैं:

    वाम-आईएसएफ गठबंधन: वाम मोर्चे ने पीरजादा अब्बास सिद्दीकी की ‘इंडियन सेक्युलर फ्रंट’ (ISF) से गठबंधन किया है। 2026 में आईएसएफ को गठबंधन के तहत 30 सीटें आवंटित की गई हैं। आईएसएफ दक्षिण 24 परगना (जैसे भांगड़) में टीएमसी को सीधी चुनौती दे रही है।

    कांग्रेस का स्वतंत्र अभियान: दशकों बाद कांग्रेस बिना वामदलों के समर्थन के अकेले चुनाव लड़ रही है। कांग्रेस का मुख्य लक्ष्य मालदा और मुर्शिदाबाद जैसे अपने पुराने गढ़ वापस पाना है (जैसे मालतीपुर में मौसमी नूर की उम्मीदवारी), जो टीएमसी के आधार में सीधे सेंध लगाएगी।

    एआईएमआईएम की एंट्री: उत्तर दिनाजपुर जैसे उर्दू/सुरजापुरी भाषी बेल्ट में असदुद्दीन ओवैसी की एआईएमआईएम भी आक्रामक प्रयास कर रही है।


    मार्जिन की राजनीति और भाजपा का गणित

    भाजपा को बंगाल जीतने के लिए इस मुस्लिम किले को भेदना होगा या हिंदू बहुल सीटों पर भारी बढ़त बनानी होगी। चुनावी विश्लेषकों के अनुसार, यदि स्वतंत्र रूप से लड़ रही कांग्रेस या आईएसएफ इन अल्पसंख्यक सीटों पर केवल 5% से 10% वोटों का भी बिखराव करने में सफल होते हैं, तो टीएमसी का वोट शेयर कम हो जाएगा। इस त्रिकोणीय लड़ाई का सीधा गणितात्मक लाभ भाजपा को मिलेगा, जो अपने 38% के स्थिर बहुसंख्यक (हिंदू) वोट बैंक पर मजबूती से टिकी हुई है।


    क्या होगा इस बार?

    चुनाव आयोग के’विशेष सघन पुनरीक्षण (एआईआर) अभियान के कारण मतदाता सूची से नाम कटने और नागरिकता खोने के डर ने इस बार मुस्लिम बहुल सीटों पर 96% तक का अभूतपूर्व मतदान सुनिश्चित किया है। चाणक्य स्ट्रेटीजीज के एग्जिट पोल के अनुसार, 71% मुस्लिम मतदाता टीएमसी के साथ मजबूती से लामबंद दिख रहे हैं।

    अगर यह एकमुश्त मतदान वास्तविकता में परिवर्तित होता है, तो टीएमसी लगातार चौथी बार सरकार बना सकती है। लेकिन अगर कांग्रेस, आईएसएफ और अन्य दलों के कारण इस वोट बैंक में जरा भी सेंधमारी हुई है, तो चुनाव परिणाम एक त्रिशंकु विधानसभा की ओर बढ़ सकते हैं। ऐसे में, मालदा और मुर्शिदाबाद में कांग्रेस और आईएसएफ द्वारा जीती गई चंद सीटें अगली सरकार बनाने में किंगमेकर की भूमिका निभाएंगी।

  • Bangladesh में हिंदुओं की आबादी 8% … मगर चुनाव में 300 सीटों में से मात्र 3 हिंदू चुने गए सांसद

    Bangladesh में हिंदुओं की आबादी 8% … मगर चुनाव में 300 सीटों में से मात्र 3 हिंदू चुने गए सांसद


    ढाका।
    बांग्लादेश चुनाव (Bangladesh Election) पूरा हो गया है. बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (Bangladesh Nationalist Party) को 209 सीटों पर जीत हासिल हुई है. तारिक रहमान (Tariq Rahman) पीएम बन सकते हैं. जमात-ए-इस्लामी (Jamaat-e-Islami) को 68 और छात्रों वाली पार्टी NCP को सिर्फ 6 सीटों पर वोट मिला. चुनाव के बाद अब जो आंकड़े आए हैं, वह हैरान करने वाले हैं. खासकर हिंदुओं की जीत को लेकर. दरअसल बांग्लादेश की कुल आबादी करीब 16.5 करोड़ है. 2022 की जनगणना के मुताबिक इनमें 1 करोड़ 31 लाख से ज्यादा हिंदू हैं. यानी देश की करीब 8 प्रतिशत आबादी हिंदू समुदाय से आती है. यह कोई छोटी संख्या नहीं है. लेकिन 2026 के ताजा संसदीय चुनाव में हिंदू समुदाय का प्रतिनिधित्व बेहद कम रह गया है. 300 सीटों वाली संसद में इस बार सिर्फ 3 हिंदू सांसद चुने गए हैं. यह आंकड़ा तब आया है जब हाल के दिनों में हिंदुओं के खिलाफ हिंसा देखी गई है।


    बांग्लादेश चुनाव में कितने हिंदू जीते?

    पहले हिंदुओं की बड़ी संख्या अवामी लीग (AL) से होती थी. AL क्योंकि बैन है, इसलिए तीनों हिंदू उम्मीदवार बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) से जीते हैं.
    गायेश्वर चंद्र रॉय- ढाका-3 सीट से
    निताई रॉय चौधरी – मगरी-2 सीट से
    एडवोकेट दिपेन देवान – रंगामाटी सीट से
    इसके अलावा साचिंग प्रू नाम के एक और अल्पसंख्यक उम्मीदवार ने बंदरबन से जीत दर्ज की, लेकिन कुल संख्या फिर भी बहुत कम है.


    जमात का हिंदू कैंडिडेट हारा

    ध्यान देने वाली बात यह है कि जमात-ए-इस्लामी ने इस बार एक हिंदू उम्मीदवार कृष्णा नंदी को खुलना-1 सीट से मैदान में उतारा था. लेकिन वे चुनाव हार गए. इसका मतलब यह हुआ कि जमात के टिकट पर कोई भी अल्पसंख्यक उम्मीदवार जीत नहीं पाया.


    पहले क्या स्थिति थी?

    रिपोर्ट्स के मुताबिक शेख हसीना के लंबे कार्यकाल के दौरान संसद में हिंदू सांसदों की संख्या इससे कहीं ज्यादा रही थी.
    2009-2014 की संसद में 16 हिंदू सांसद थे
    2014-2019 में यह संख्या बढ़कर 17 (और आरक्षित सीटों के साथ 20 तक) पहुंची
    2019-2024 में करीब 14 अल्पसंख्यक सांसद थे
    यानी पहले जहां 14 से 20 के बीच हिंदू सांसद होते थे, अब संख्या घटकर सिर्फ 3 रह गई है. 2006-09 तक बांग्लादेश में केयरटेकर सरकार रही. ऐसे में हम कह सकते हैं कि यह 20 साल में सबसे कम संख्या है. यह गिरावट काफी बड़ी मानी जा रही है।


    कितने हिंदू उम्मीदवार मैदान में थे?

    इस चुनाव में कुल 79 अल्पसंख्यक उम्मीदवार मैदान में थे. इनमें 10 महिलाएं भी शामिल थीं. 60 में से 22 राजनीतिक दलों ने अल्पसंख्यक उम्मीदवार उतारे थे. BNP ने 6 अल्पसंख्यक उम्मीदवार उतारे, जिनमें से 4 जीत पाए. लेकिन कुल संख्या फिर भी बहुत कम रही.


    सवाल क्यों उठ रहे हैं?

    देश की लगभग 8 प्रतिशत आबादी होने के बावजूद संसद में 1 प्रतिशत से भी कम प्रतिनिधित्व होना चिंता का विषय माना जा रहा है. राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि अल्पसंख्यक समुदाय कई इलाकों में निर्णायक भूमिका निभाता है, लेकिन टिकट वितरण और चुनावी गणित में उनकी हिस्सेदारी सीमित रह जाती है. इसके अलावा चुनाव के दौरान सांप्रदायिक तनाव और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा का मुद्दा भी चर्चा में रहा।

    बांग्लादेश चुनाव में कितनी महिलाएं जीतीं?
    इस बार चुनाव में महिला उम्मीदवारों की संख्या भी बहुत कम रही. हालांकि 7 महिलाओं ने जीत दर्ज की, जिनमें ज्यादातर बीएनपी से थीं. जमात-ए-इस्लामी के कुछ बयानों ने महिलाओं की भागीदारी पर भी विवाद खड़ा किया था।

  • हम दो-हमारे दो दर्जन, AIMIM यूपी अध्यक्ष शौकत अली बोले- ज्यादा जनसंख्या देश की ताकत

    हम दो-हमारे दो दर्जन, AIMIM यूपी अध्यक्ष शौकत अली बोले- ज्यादा जनसंख्या देश की ताकत


    नई दिल्ली । एआईएमआईएम के प्रदेश अध्यक्ष शौकत अली ने एक बार फिर विवादित राग छेड़ा है। जनसंख्या नियंत्रण की सरकारी नीतियों और सामाजिक विमर्श के उलट, उन्होंने आबादी बढ़ाने को देश की मजबूती से जोड़कर एक नई राजनीतिक बहस को जन्म दे दिया है।ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन के उत्तर प्रदेश अध्यक्ष शौकत अली अपने बयानों के चलते एक बार फिर विवादों के घेरे में हैं। सोमवार को मुरादाबाद के रामपुर दोराहा क्षेत्र में आयोजित एक जनसभा को संबोधित करते हुए उन्होंने जनसंख्या वृद्धि को लेकर ऐसी टिप्पणी की, जिसने राजनीतिक गलियारों में खलबली मचा दी है। शौकत अली ने मुसलमानों से अधिक बच्चे पैदा करने की अपील करते हुए नारा दिया कि “हम दो, हमारे दो नहीं, बल्कि हमारे दो दर्जन होने चाहिए।
    शौकत अली ने अपने संबोधन में जनसंख्या नियंत्रण के वैश्विक और राष्ट्रीय तर्कों को दरकिनार करते हुए दावा किया कि किसी भी देश की असली मजबूती उसकी बड़ी आबादी में निहित होती है। उन्होंने धार्मिक भावनाओं को जोड़ते हुए कहा, “जब अल्लाह बच्चों की नेमत दे रहा है, तो उसे पूरी खुशी के साथ स्वीकार करना चाहिए। बच्चे ऊपर वाले की देन हैं और उन्हें रोकने की कोशिश नहीं होनी चाहिए।” उन्होंने तर्क दिया कि आबादी बढ़ने से देश कमजोर नहीं बल्कि और अधिक ताकतवर होकर उभरेगा।
    कुंवारे नेताओं पर कसा तंज
    जनसंख्या नियंत्रण की वकालत करने वाले नेताओं पर निशाना साधते हुए शौकत अली ने तीखी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि जो लोग खुद शादी नहीं करते या जिनका अपना परिवार नहीं है, वही दूसरों को जनसंख्या नियंत्रण का ज्ञान बांटते फिर रहे हैं। उनका यह इशारा सीधे तौर पर सत्ता पक्ष के वरिष्ठ नेताओं की ओर माना जा रहा है। साथ ही, उन्होंने मुरादाबाद के मदरसों का जिक्र करते हुए नाराजगी जताई कि यहाँ मदरसों का विस्तार शिक्षा के लिए किया गया है, लेकिन कुछ लोग इन्हें जानबूझकर ‘आतंकवाद का अड्डा’ बताकर बदनाम करने की कोशिश करते हैं।
    सपा और बी टीम के आरोपों पर पलटवार
    जनसभा के दौरान शौकत अली केवल जनसंख्या तक ही सीमित नहीं रहे, बल्कि उन्होंने समाजवादी पार्टी पर भी जमकर भड़ास निकाली। सपा के एक विधायक द्वारा एआईएमआईएम को भाजपा की बी टीम बताए जाने पर पलटवार करते हुए उन्होंने कहा कि सपा खुद अपनी जमीन खो रही है और अपनी विफलताओं को छिपाने के लिए मजलिस पर झूठे आरोप मढ़ रही है। उन्होंने कहा कि मुसलमानों का सच्चा रहनुमा वही है जो उनके हक की बात डंके की चोट पर करे, न कि वह जो केवल वोट बैंक की राजनीति करे।
    बयान पर छिड़ा सियासी घमासान
    शौकत अली के इस ‘दो दर्जन’ वाले बयान के बाद भाजपा और अन्य दलों ने उन पर कड़ा प्रहार किया है। जानकारों का मानना है कि इस तरह के बयान ध्रुवीकरण की राजनीति को बढ़ावा देते हैं और विकास के मुख्य मुद्दों से ध्यान भटकाते हैं। वहीं, सोशल मीडिया पर भी इस बयान को लेकर तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं।