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  • ईरान के दुश्मन बढ़े! युद्ध में उतर सकते हैं खाड़ी के ताकतवर देश; इस बात का सता रहा डर

    ईरान के दुश्मन बढ़े! युद्ध में उतर सकते हैं खाड़ी के ताकतवर देश; इस बात का सता रहा डर

    तेहरान। खाड़ी अरब देश ईरान के खिलाफ अमेरिका-इजरायल युद्ध में शामिल होने पर विचार कर रहे हैं। यदि तेहरान उनके महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे पर हमला करता है, तो उन्हें इसमें कूदने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है। मामले की जानकारी रखने वाले कई लोगों के हवाले से ब्लूमबर्ग ने अपनी रिपोर्ट में यह जानकारी दी है।
    सऊदी यूएई धैर्य खो रहे

    नाम न छापने की शर्त पर इन लोगों ने बताया कि खाड़ी के सबसे शक्तिशाली देश, विशेष रूप से सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई), ईरानी हमलों से अपना धैर्य खो रहे हैं।

    ईरान ने इन देशों में पहले ही बंदरगाहों, ऊर्जा सुविधाओं और हवाई अड्डों को निशाना बनाया है। हालांकि, उन्होंने जोड़ा कि वे युद्ध में तभी शामिल होंगे जब तेहरान खाड़ी के महत्वपूर्ण बिजली और पानी के बुनियादी ढांचे पर हमला करने की अपनी धमकियों को हकीकत में बदल देगा।
    अधिकांश खाड़ी देश युद्ध में शामिल होने के पक्ष में

    सूत्रों के अनुसार, ओमान जैसे कुछ अपवादों को छोड़कर अधिकांश खाड़ी देश इसी दिशा में बढ़ रहे हैं। फिर भी, वे युद्ध में शामिल होने से कतरा रहे हैं क्योंकि ईरान उन पर हमले तेज कर सकता है। एक यूरोपीय राजनयिक ने कहा कि वे ऐसी स्थिति में भी नहीं फंसना चाहते जहां अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप तेहरान के साथ कोई समझौता कर लें और उन्हें एक घायल व गुस्से से भरे ईरानी शासन के साथ अकेले निपटना पड़े।
    खाड़ी देशों पर ड्रोन और मिसाइल हमले

    पिछले 24 घंटों में बहरीन, कुवैत, सऊदी अरब और यूएई सभी ने ईरान द्वारा दागे गए ड्रोन और मिसाइलों को बीच में ही मार गिराया है। ईरान का दावा है कि खाड़ी देश वैध लक्ष्य हैं क्योंकि अमेरिका उनके हवाई क्षेत्र और क्षेत्रों का उपयोग उस पर हमला करने के लिए करता है।

    सूत्रों ने कहा कि सऊदी अरब की राजधानी रियाद में पिछले सप्ताह हुई विदेश मंत्रियों की बैठक में सैन्य कार्रवाई का विकल्प मेज पर था।

    इस बैठक में मिस्र, पाकिस्तान और तुर्की जैसे क्षेत्रीय देश भी शामिल थे।

    मंगलवार को कतर के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता माजेद अल-अंसारी ने प्रेस ब्रीफिंग में कहा कि खाड़ी देशों को ईरान के साथ मिल-जुलकर रहने के तरीके खोजने होंगे। उन्होंने कहा, यह युद्ध के बाद ईरानियों पर निर्भर करेगा कि वे विश्वास को फिर से कैसे बहाल करते हैं।
    खार्ग द्वीप पर खतरा

    सुरक्षा तंत्र के करीबी एक वरिष्ठ ईरानी अधिकारी के अनुसार, यदि ट्रंप खार्ग द्वीप पर कब्जा करने की अपनी धमकी पर आगे बढ़ते हैं तो इससे पूरे क्षेत्र में तेहरान की ओर से और भी बड़ी जवाबी कार्रवाई होगी।

    ईरानी अधिकारी ने कहा कि इस मिशन के लिए आवश्यक अमेरिकी सैनिकों को संभवतः यूएई से भेजा जाएगा, जहां अल धफरा एयर बेस स्थित है। अधिकारी ने चेतावनी दी कि यदि अमीरात ने इसकी अनुमति दी, तो ईरान इस खाड़ी देश पर भीषण हमला करेगा। अधिकारी ने यह भी जोड़ा कि यदि अमेरिका द्वीप पर कब्जा कर लेता है, तो ईरान इसे बम से उड़ाने में संकोच नहीं करेगा और जलडमरूमध्य व फारस की खाड़ी में बारूदी सुरंगें बिछा देगा।

    दुबई पब्लिक पॉलिसी रिसर्च सेंटर के निदेशक मोहम्मद बहारून ने कहा, यह हमारा युद्ध नहीं है, लेकिन ईरान इसे हमारा बना रहा है। उन्होंने सुझाव दिया कि यदि ईरान यही रवैया जारी रखता है, तो क्षेत्रीय देशों को तेहरान के राज्य प्रायोजित आतंकवाद का मुकाबला करने के लिए एक गठबंधन बनाना पड़ सकता है, जैसा कि ‘इस्लामिक स्टेट’ के खिलाफ बनाया गया था।
    5 हजार मिसाइलें दागी

    युद्ध की शुरुआत से अब तक ईरान ने खाड़ी देशों पर लगभग 5000 मिसाइलें और ड्रोन दागे हैं। इसमें तेल-गैस सुविधाओं, अमेरिकी ठिकानों और रिहायशी इलाकों को निशाना बनाया गया है, जिसमें यूएई ने सबसे ज्यादा मार झेली है। खाड़ी अरब देशों में अब तक कम से कम 20 लोग मारे जा चुके हैं।

  • US Iran War : कितना पावरफुल है अमेरिका का USS अब्राहम लिंकन जंगी जहाज,

    US Iran War : कितना पावरफुल है अमेरिका का USS अब्राहम लिंकन जंगी जहाज,

    अमेरिका और इजरायल से चल रही जंग के बीज ईरान ने एक बड़ा दावा किया है. ईरान की रिवोल्यूशनरी गार्ड ने दावा किया है कि उसने अमेरिका के फाइटर जेट ले जाने में सक्षम जंगी जहाज USS अब्राहम लिंकन (CVN-72) पर चार बैलिस्टिक मिसाइलों से हमला किया है. अमेरिका ने इसे झूठ बताया है और कहा है कि यह विमानवाहक जहाज पूरी तरह से काम कर रहा है.
    इस बयानबाजी ने दुनिया का ध्यान उस पावरफुट जंगी जहाज की ओर खींच लिया है, जो तीन दशकों से भी अधिक समय से अमेरिकी सैन्य ताकत दिखाने के केंद्र में रहा है.

    क्यों इतना पावरफुल है USS अब्राहम लिंकन?
    USS अब्राहम लिंकन का हुल नंबर CVN-72 है. हुल नंबर (Hull Number) एक विशिष्ट पहचान कोड होता है, जो जहाज के प्रकार और विशिष्ट पहचान को दर्शाता है. USS अब्राहम लिंकन ने अमेरिकी नौसेना में अपना करियर नवंबर 1989 में शुरू किया था. यह परमाणु ऊर्जा से चलने वाले विमानवाहक जहाज़ों की श्रृंखला का पांचवां जहाज है. यह निमित्ज श्रेणी (Nimitz-class) का विमानवाहक जहाज है.

  • अमेरिका नहीं चाहता भारत बने ताकतवर, ईरानी अधिकारी का बड़ा आरोप

    अमेरिका नहीं चाहता भारत बने ताकतवर, ईरानी अधिकारी का बड़ा आरोप

    वाशिंगटन। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के बीच ईरान के एक वरिष्ठ अधिकारी ने अमेरिका पर गंभीर आरोप लगाए हैं। भारत में ईरानी सुप्रीम लीडर के विशेष प्रतिनिधि Abdul Majid Hakim Elahi ने कहा कि अमेरिका अपने वैश्विक वर्चस्व को बनाए रखने के लिए दुनिया में जानबूझकर युद्ध जैसी स्थितियां पैदा करता है। उनका दावा है कि ईरान के साथ मौजूदा संघर्ष के पीछे भी अमेरिका की यही रणनीति है, ताकि भारत और चीन जैसे देशों को उभरने से रोका जा सके।

    खास बातचीत में इलाही ने कहा कि अमेरिका नहीं चाहता कि भारत या चीन जैसे देश वैश्विक ताकत के रूप में सामने आएं। उनके मुताबिक, अमेरिका की कोशिश रहती है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में उसकी ताकत को कोई चुनौती न दे और इसी वजह से वह विभिन्न क्षेत्रों में युद्ध की स्थितियां पैदा करता है।

    भविष्य में भारत भी होगा बड़ी ताकत

    इलाही ने कहा कि आने वाले समय में भारत, चीन, रूस और अमेरिका दुनिया के सबसे प्रभावशाली देशों में शामिल होंगे। हालांकि, उनका आरोप है कि अमेरिका किसी भी कीमत पर अपनी ताकत को साझा नहीं करना चाहता और इसी कारण वह वैश्विक स्तर पर टकराव की स्थितियां बनाए रखता है।

    ईरान ने नहीं, अमेरिका ने शुरू किया संघर्ष

    ईरानी अधिकारी ने यह भी कहा कि मौजूदा युद्ध की शुरुआत ईरान ने नहीं की, बल्कि अमेरिका और इजरायल ने सैन्य कार्रवाई कर इसे शुरू किया। इससे पहले ईरान के वरिष्ठ सुरक्षा अधिकारी Ali Larijani ने भी कहा था कि ईरान केवल अपनी रक्षा कर रहा है। उनके अनुसार अमेरिका और इजरायल के हमलों में ईरानी नागरिकों और ठिकानों को निशाना बनाया गया है, जिसके जवाब में ईरान प्रतिक्रिया दे रहा है।

    लारिजानी ने यह भी कहा कि चूंकि संघर्ष की शुरुआत अमेरिका की ओर से हुई है, इसलिए इसे खत्म करने की जिम्मेदारी भी उसी की है।

    लंबा खिंच सकता है संघर्ष

    इस बीच विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान के परमाणु ठिकानों, सैन्य ढांचे और नौसैनिक अड्डों पर किए गए हमलों के बाद यह संघर्ष लंबा चल सकता है। इन हमलों में ईरान के कुछ वरिष्ठ नेताओं के मारे जाने की खबरें भी सामने आई हैं।

    जवाब में ईरान ने खाड़ी क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी ठिकानों पर मिसाइल और ड्रोन हमले किए। इन हमलों में तीन अमेरिकी सैनिकों की मौत होने और कई अन्य के घायल होने की जानकारी सामने आई है।

  • कितनी ताकतवर है लैटिन अमेरिकी सेना? US को नाकों चने चबा सकते हैं ये देश

    कितनी ताकतवर है लैटिन अमेरिकी सेना? US को नाकों चने चबा सकते हैं ये देश


    वाशिंगटन । हाल ही में वेनेजुएला पर अमेरिकी हमले और राष्ट्रपति निकोलस मादुरो के ‘अपहरण’ के बाद लैटिन अमेरिका में तनाव चरम पर है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अब कोलंबिया, क्यूबा और मैक्सिको को भी सैन्य कार्रवाई की चेतावनी दी है। ट्रंप ने कहा कि यदि ये देश अपना रवैया नहीं सुधारते हैं तो अमेरिका कार्रवाई करेगा। उन्होंने इस रुख को मादक पदार्थों की तस्करी के खिलाफ कदम और पश्चिमी गोलार्ध में अमेरिकी हितों की सुरक्षा से जोड़ा। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या इन देशों की सेनाएं दुनिया की सबसे बड़ी महाशक्ति अमेरिका का सामना करने में सक्षम हैं?

    सैन्य शक्ति में भारी असमानता
    इन बयानों ने लैटिन अमेरिका में अमेरिकी दखल को लेकर पुराने तनावों को फिर जीवित कर दिया है।

    जिन देशों को चेतावनी दी गई है, वे वॉशिंगटन के हस्तक्षेप के पक्षधर नहीं हैं, लेकिन उनकी सेनाओं की क्षमता अमेरिका के मुकाबले बेहद सीमित है। अमेरिका की सैन्य ताकत दुनिया में सबसे अधिक मानी जाती है। 2025 में उसका रक्षा बजट 895 अरब डॉलर रहा- जो सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 3.1 प्रतिशत है। 2025 की ग्लोबल फायरपावर रैंकिंग के अनुसार ब्राजील लैटिन अमेरिका की सबसे शक्तिशाली सेना है और वैश्विक स्तर पर 11वें स्थान पर है। सक्रिय सैनिकों की संख्या, लड़ाकू विमान, टैंक, नौसैनिक संसाधन और सैन्य बजट- हर पैमाने पर ये देश अमेरिका से काफी पीछे हैं। पारंपरिक युद्ध में अमेरिकी बढ़त स्पष्ट है। लैटिन अमेरिकी सेनाएं अमेरिकी हस्तक्षेप का प्रभावी मुकाबला करने में असमर्थ हैं। हालांकि, कुछ देशों में पैरामिलिट्री फोर्सेस (अर्द्धसैनिक बल) मजबूत हैं, जो असममित युद्ध (गुरिल्ला टैक्टिक्स) में इस्तेमाल हो सकते हैं।

    अर्धसैनिक बल: लैटिन अमेरिका का गुप्त हथियार
    ऊपर कुछ प्रमुख लैटिन अमेरिकी देशों के नाम दिए गए हैं। लेकिन मुख्य खतरा केवल चार देशों- क्यूबा, कोलंबिया, वेनेजुएला और मेक्सिको पर मंडरा रहा है। इनमें वेनेजुएला पर अमेरिका पहले ही हमला कर उसके राष्ट्रपति को पकड़ लाया है। हालांकि एक क्षेत्र ऐसा है जहां इन देशों के पास तुलनात्मक बढ़त मानी जाती है और वे अमेरिका को नाकों चने चबा सकते हैं।

    ये हैं उनके अर्धसैनिक (पैरामिलिट्री) बल। ये समूह अक्सर नियमित सेनाओं के समानांतर काम करते हैं और असममित युद्ध व अपरंपरागत रणनीतियों का सहारा लेते हैं।

    क्यूबा के पास दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा अर्धसैनिक बल बताया जाता है- करीब 11.4 लाख सदस्य। इनमें देश-नियंत्रित मिलिशिया और पड़ोस आधारित रक्षा समितियां शामिल हैं। सबसे बड़ा संगठन ‘टेरिटोरियल ट्रूप्स मिलिशिया’ है, जो बाहरी खतरों या आंतरिक संकट में नियमित सेना की सहायता के लिए नागरिक रिजर्व के रूप में काम करता है।

    वेनेजुएला में सरकार समर्थक नागरिक सशस्त्र समूह- जिन्हें “कोलेक्टिवोस” कहा जाता है पर राजनीतिक नियंत्रण लागू करने और विरोधियों को डराने के आरोप लगते रहे हैं। औपचारिक रूप से ये सशस्त्र बलों का हिस्सा नहीं हैं, लेकिन व्यापक रूप से माना जाता है कि राष्ट्रपति मादुरो के शासन में इन्हें राज्य का संरक्षण मिलता रहा है।

    कोलंबिया में 1980 के दशक में दक्षिणपंथी अर्धसैनिक समूह उभरे थे, जिनका उद्देश्य वामपंथी विद्रोहियों से लड़ना था। 2000 के दशक के मध्य में इनके औपचारिक विमोचन के बावजूद, कई समूह बाद में आपराधिक या नियो-पैरामिलिट्री संगठनों के रूप में फिर सक्रिय हो गए। शुरुआती दौर में इनका गठन शीत युद्ध के दौरान अमेरिकी काउंटर-इंसर्जेंसी सलाहकारों के मार्गदर्शन में कोलंबियाई सेना की भागीदारी से हुआ था।

    मेक्सिको में भारी हथियारों से लैस ड्रग कार्टेल- जैसे जेटास व्यवहार में अर्धसैनिक ताकत की तरह काम करते हैं।

    पूर्व सैनिकों द्वारा बनाए गए इन समूहों के पास सैन्य-स्तरीय हथियार हैं और वे कई इलाकों में क्षेत्रीय नियंत्रण रखते हैं, जिससे स्थानीय पुलिस पर भारी पड़ते हैं। इसी कारण मैक्सिकन सेना को कानून-व्यवस्था में तैनात करना पड़ा है।
    किस देश के पास कितने अर्द्धसैनिक बल?
    क्यूबा, वेनेजुएला, कोलंबिया और मैक्सिको दुनिया के कुछ सबसे बड़े अर्द्धसैनिक बलों (पैरामिलिट्री फोर्सेस) वाले देशों में शामिल हैं। ग्लोबल फायरपावर 2025 के आंकड़ों के अनुसार, दुनिया में सबसे बड़ी पैरामिलिट्री फोर्सेस इस प्रकार हैं: सबसे ज्यादा बांग्लादेश में 68 लाख, भारत में 25.27 लाख, क्यूबा में 11.45 लाख, चीन में 6.25 लाख, सर्बिया में 6 लाख, पाकिस्तान में 5 लाख, मिस्र में 3 लाख, इंडोनेशिया में 2.5 लाख, रूस में 2.5 लाख, वियतनाम में 2.5 लाख, ईरान में 2.2 लाख, वेनेजुएला में 2.2 लाख, ब्राजील में 2 लाख, अल्जीरिया में 1.5 लाख, कोलंबिया में 1.5 लाख, फ्रांस में 1.5 लाख, सऊदी अरब में 1.5 लाख, तुर्की में 1.5 लाख, लाओस में 1.2 लाख और मैक्सिको में 1.2 लाख सदस्य हैं। इनमें क्यूबा की टेरिटोरियल ट्रूप्स मिलिशिया जैसी इकाइयां, वेनेजुएला के प्रो-गवर्नमेंट कोलेक्टिवोस, कोलंबिया के विभिन्न पैरामिलिट्री ग्रुप्स और मैक्सिको की सुरक्षा बल प्रमुख हैं, जो आंतरिक सुरक्षा और रक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
    अमेरिकी हस्तक्षेप का लंबा इतिहास
    पिछले दो सौ वर्षों में अमेरिका ने कई बार लैटिन अमेरिका में हस्तक्षेप किया है। 19वीं सदी के अंत और 20वीं सदी की शुरुआत में ‘बनाना वॉर्स’ के दौरान अमेरिकी सेनाएं मध्य अमेरिका में कॉरपोरेट हितों की सुरक्षा के लिए तैनात रहीं।
    1934 में राष्ट्रपति फ्रैंकलिन डी रूजवेल्ट ने ‘गुड नेबर पॉलिसी’ के तहत गैर-हस्तक्षेप का वादा किया।

    लेकिन शीत युद्ध के दौरान स्थिति बदली। 1947 में स्थापित अमेरिकी खुफिया एजेंसी CIA के समन्वय से अमेरिका ने कई निर्वाचित सरकारों को गिराने के अभियानों को फंड किया। पनामा एकमात्र लैटिन अमेरिकी देश है, जहां अमेरिका ने औपचारिक रूप से सैन्य हमला किया। इसने 1989 में राष्ट्रपति जॉर्ज एच डब्ल्यू बुश के नेतृत्व में Operation Just Cause चलाया गया। इसका उद्देश्य राष्ट्रपति मैनुअल नोरिएगा को हटाना था, जिन्हें बाद में ड्रग तस्करी सहित अन्य अपराधों में दोषी ठहराया गया।

    विशेषज्ञों का मानना है कि यदि पूर्ण युद्ध होता है, तो लैटिन अमेरिकी देशों की नियमित सेनाएं अमेरिकी तकनीक और वायु सेना का मुकाबला नहीं कर पाएंगी। हालांकि, इन देशों में मौजूद विशाल अर्धसैनिक नेटवर्क और छापामार लड़ाके अमेरिका के लिए किसी भी जमीनी कार्रवाई को बेहद जटिल और खूनी बना सकते हैं।