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  • तीसरे विश्व युद्ध की आशंकाओं के बीच कई देशों में आपातकालीन तैयारी पर जोर, नागरिकों को जरूरी सामान जुटाने की सलाह

    तीसरे विश्व युद्ध की आशंकाओं के बीच कई देशों में आपातकालीन तैयारी पर जोर, नागरिकों को जरूरी सामान जुटाने की सलाह


    नई दिल्ली ।
    दुनिया के कई देशों में संभावित आपातकालीन परिस्थितियों से निपटने के लिए नागरिकों को पहले से तैयार रहने की सलाह दी जा रही है। अमेरिका, ब्रिटेन, जापान और यूरोप के कई देशों ने लोगों से घरों में पर्याप्त भोजन, पीने का पानी, जरूरी दवाएं और अन्य आवश्यक वस्तुएं रखने पर जोर दिया है। इन तैयारियों का उद्देश्य किसी संकट के दौरान सामान्य आपूर्ति व्यवस्था बाधित होने पर लोगों को शुरुआती दिनों में जरूरी सुविधाएं उपलब्ध कराना है।

    जर्मनी, नॉर्वे, फिनलैंड, फ्रांस, स्विट्जरलैंड, आयरलैंड, स्वीडन, चेकिया और लिथुआनिया सहित कई देशों में आपातकालीन तैयारियों को लेकर जागरूकता बढ़ाई जा रही है। यूरोपीय संघ भी संकट प्रबंधन और नागरिकों की तैयारी को मजबूत करने पर ध्यान दे रहा है। सरकारों की इन सलाहों में प्राकृतिक आपदाओं के साथ-साथ साइबर हमले, बिजली संकट और संभावित सैन्य संघर्ष जैसी परिस्थितियों को ध्यान में रखा गया है।

    अलग-अलग देशों में जरूरी सामान जमा रखने की अवधि को लेकर अलग-अलग सुझाव दिए गए हैं। कुछ देशों में कम से कम तीन दिन की जरूरतों के लिए तैयारी करने को कहा गया है, जबकि अन्य जगहों पर सात से दस दिनों तक का भोजन, पानी और दवाएं उपलब्ध रखने पर जोर दिया जा रहा है। इसका मकसद यह है कि किसी आपात स्थिति में बाजार, परिवहन या अन्य आपूर्ति सेवाएं प्रभावित होने पर परिवारों को तत्काल परेशानी का सामना न करना पड़े।

    अमेरिका में भी आपातकालीन तैयारियों को लेकर चर्चा हो रही है। हालांकि, सैन्य ठिकानों को 90 दिनों तक बाहरी आपूर्ति पर निर्भरता कम रखते हुए काम करने में सक्षम बनाने की योजना का उल्लेख नागरिकों के लिए 90 दिनों का राशन जमा करने के निर्देश के रूप में नहीं किया जा सकता। सैन्य प्रतिष्ठानों की यह तैयारी रक्षा व्यवस्था से संबंधित है और इसे आम नागरिकों के लिए जारी किसी समान निर्देश से अलग समझना जरूरी है।

    ब्रिटेन ने अपने ‘बी रेडी’ अभियान के माध्यम से नागरिकों को आपातकालीन परिस्थितियों के लिए जरूरी सामान तैयार रखने की सलाह दी है। इस तैयारी में पीने का पानी, लंबे समय तक सुरक्षित रहने वाला भोजन, आवश्यक दवाएं, टॉर्च, अतिरिक्त बैटरियां, रेडियो, पावर बैंक और कुछ नकदी शामिल हैं। इसका उद्देश्य यह है कि बिजली, संचार या अन्य सार्वजनिक सेवाएं बाधित होने की स्थिति में लोग कुछ समय तक अपनी बुनियादी जरूरतें खुद पूरी कर सकें।

    जापान में भी आपदा प्रबंधन और नागरिकों की तैयारी को विशेष महत्व दिया जा रहा है। भूकंप की आशंका और उसके बाद बिजली, पानी तथा परिवहन सेवाओं में संभावित रुकावट को ध्यान में रखते हुए लोगों को कम से कम तीन दिन और संभव हो तो एक सप्ताह तक के जरूरी सामान का इंतजाम रखने की सलाह दी जाती है। जापान में प्राकृतिक आपदाओं के दौरान आपूर्ति व्यवस्था प्रभावित होने की संभावना को देखते हुए ऐसी तैयारियों को नागरिक सुरक्षा का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है।

    इन देशों में बढ़ती सतर्कता के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के तीसरे विश्व युद्ध को लेकर दिए गए बयान ने भी अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा संबंधी चर्चाओं को ध्यान आकर्षित किया है। हालांकि, विभिन्न देशों की ओर से जारी आपातकालीन तैयारियों की सलाह को सीधे तौर पर विश्व युद्ध की शुरुआत या किसी निश्चित सैन्य टकराव का संकेत नहीं माना जा सकता। इन निर्देशों का दायरा प्राकृतिक आपदाओं से लेकर तकनीकी और सुरक्षा संबंधी संकटों तक फैला हुआ है।

    सरकारों की चिंता केवल युद्ध तक सीमित नहीं है। बाढ़, भीषण मौसम, भूकंप, लंबे समय तक बिजली गुल रहने, इंटरनेट सेवाओं में रुकावट और साइबर हमलों जैसी घटनाएं भी जनजीवन को प्रभावित कर सकती हैं। ऐसी परिस्थितियों में खाद्य सामग्री की आपूर्ति, पेयजल उपलब्धता, स्वास्थ्य सेवाओं और संचार व्यवस्था पर असर पड़ सकता है। पहले से जरूरी सामान रखने से परिवारों को संकट के शुरुआती दौर में राहत मिल सकती है।

    आपातकालीन तैयारी को लेकर अलग-अलग देशों के निर्देशों में स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार अंतर है। इसलिए नागरिकों को अपने देश और क्षेत्र में जारी आधिकारिक दिशा-निर्देशों के मुताबिक तैयारी करने की सलाह दी जाती है। कुल मिलाकर, कई देशों में नागरिक सुरक्षा को लेकर बढ़ता जोर इस बात को दर्शाता है कि सरकारें अब केवल आपदा आने के बाद राहत पहुंचाने के बजाय लोगों को पहले से तैयार करने पर भी ध्यान दे रही हैं।

  • नेपाल बाढ़ के बाद हिमालयी राज्यों में ग्लेशियल झीलों और हिमस्खलन के खतरे पर केंद्र सरकार ने तैयारियां तेज कीं

    नेपाल बाढ़ के बाद हिमालयी राज्यों में ग्लेशियल झीलों और हिमस्खलन के खतरे पर केंद्र सरकार ने तैयारियां तेज कीं

    नई दिल्ली ।नेपाल में पिछले सप्ताह आई भयावह बाढ़ के बाद भारत सरकार ने हिमालयी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में संभावित प्राकृतिक आपदाओं को लेकर सतर्कता बढ़ा दी है। ग्लेशियल झीलों के फटने से आने वाली बाढ़ और हिमस्खलन के खतरे को देखते हुए केंद्र ने बचाव और तैयारी की मौजूदा व्यवस्था की व्यापक समीक्षा की है।

    गुरुवार को केंद्रीय गृह सचिव गोविंद मोहन की अध्यक्षता में उच्चस्तरीय बैठक हुई। इसमें हिमालयी क्षेत्रों में मौजूद संवेदनशील स्थानों की पहचान, निगरानी व्यवस्था और किसी संभावित आपदा से पहले चेतावनी जारी करने के उपायों पर चर्चा की गई।

    बैठक में उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर के मुख्य सचिवों तथा संबंधित राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरणों के प्रतिनिधि शामिल हुए। इसके अलावा केंद्र सरकार के विभिन्न विभागों और वैज्ञानिक संस्थानों के वरिष्ठ अधिकारियों ने भी तैयारियों की जानकारी साझा की।

    ग्लेशियल झीलों की लगातार निगरानी को बैठक में प्रमुख प्राथमिकता के तौर पर रखा गया। अधिकारियों से संवेदनशील ग्लेशियल झीलों और बर्फ से ढके क्षेत्रों पर लगातार नजर रखने को कहा गया, ताकि वहां होने वाले बदलावों का समय रहते पता लगाया जा सके।

    हिमालयी क्षेत्रों में ग्लेशियल झीलों के फटने से अचानक बड़ी मात्रा में पानी नीचे की ओर आने का खतरा रहता है। ऐसे में प्रभावित होने वाले संभावित क्षेत्रों और पानी के प्रवाह के रास्तों की पहले से पहचान करना आपदा प्रबंधन की तैयारी का महत्वपूर्ण हिस्सा माना गया।

    बैठक में अत्यधिक जोखिम वाले स्थानों को चिह्नित करने और संभावित जलप्रवाह मार्गों का निर्धारण करने पर भी जोर दिया गया। इसका उद्देश्य खतरे की स्थिति में संबंधित प्रशासन को समय रहते सूचना देना और प्रभावित आबादी को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाने की कार्रवाई शुरू करना है।

    केंद्रीय गृह सचिव ने जोखिम बढ़ने की स्थिति में संवेदनशील ग्लेशियल झीलों और हिमस्खलन संभावित क्षेत्रों की सक्रिय निगरानी को जरूरी बताया। समय पर चेतावनी मिलने से प्रशासन को राहत और बचाव के लिए आवश्यक संसाधन जुटाने तथा निकासी की प्रक्रिया शुरू करने का अवसर मिल सकता है।

    बैठक में राज्यों ने अपने-अपने क्षेत्रों में आपदा से निपटने की तैयारियों और रणनीतियों की जानकारी दी। इसके बाद राज्य एजेंसियों, जिला प्रशासन तथा वैज्ञानिक और तकनीकी संस्थानों के बीच बेहतर समन्वय बनाए रखने पर विशेष जोर दिया गया।

    सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि संभावित ग्लेशियल झील विस्फोट या हिमस्खलन जैसी घटनाओं से निपटने की तैयारी केवल आपदा आने के बाद राहत और बचाव तक सीमित नहीं होनी चाहिए। जोखिम की पहले पहचान, निवारक कदम और स्थानीय समुदायों की तैयारी को भी योजना का हिस्सा बनाया जाना चाहिए।

    राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को अपनी आपदा प्रबंधन तैयारियों की नियमित समीक्षा करने की सलाह दी गई। साथ ही प्रारंभिक चेतावनी और निकासी व्यवस्था में मौजूद कमियों को पहचानकर उनमें समय रहते सुधार करने को कहा गया।

    इस पूरी कवायद का उद्देश्य हिमालयी क्षेत्रों में प्राकृतिक आपदाओं के संभावित प्रभाव को कम करना और प्रशासन की प्रतिक्रिया क्षमता को मजबूत करना है। खास तौर पर संवेदनशील इलाकों में निगरानी, चेतावनी और स्थानीय स्तर पर समन्वित कार्रवाई को मजबूत करने पर ध्यान दिया जा रहा है।

  • देश में हेल्थ रिसर्च पर बड़े निवेश की तैयारी… गंभीर बीमारियों पर फोकस, 6 गुना बढ़ेगा खर्च

    देश में हेल्थ रिसर्च पर बड़े निवेश की तैयारी… गंभीर बीमारियों पर फोकस, 6 गुना बढ़ेगा खर्च


    नई दिल्ली।
    कैंसर, टीबी, मधुमेह, दिल की बीमारियों और मानसिक स्वास्थ्य जैसी गंभीर चुनौतियों से निपटने के लिए केंद्र सरकार (Central government) स्वास्थ्य अनुसंधान (Health Research) पर बड़ा निवेश करने की तैयारी कर रही है। राष्ट्रीय स्वास्थ्य अनुसंधान नीति-2026 (National Health Research Policy-2026) (ड्राफ्ट) में 2047 तक स्वास्थ्य अनुसंधान पर खर्च को मौजूदा स्तर से करीब 6.25 गुना बढ़ाने का लक्ष्य रखा गया है। अभी देश स्वास्थ्य अनुसंधान पर सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 0.024 फीसदी खर्च करता है, जिसे 2037 तक बढ़ाकर 0.072 फीसदी और 2047 तक 0.15 फीसदी करने की योजना है।

    नई नीति में सरकार ने कहा है कि अब सिर्फ शोध पत्र प्रकाशित करना उद्देश्य नहीं, बल्कि ऐसी रिसर्च को बढ़ावा देना है, जिससे नई दवाएं, वैक्सीन, जांच तकनीक और इलाज आम लोगों तक तेजी से पहुंच सके। ड्राफ्ट नीति के अनुसार, आने वाले कुछ वर्षों में स्वास्थ्य अनुसंधान का पूरा फोकस उन बीमारियों पर रहेगा, जिनका देश में सबसे ज्यादा बोझ है। इनमें कैंसर, टीबी, मधुमेह, हृदय रोग, मानसिक स्वास्थ्य, मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य, कुपोषण, एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस, संक्रामक रोग और बुजुर्गों की बीमारियां शामिल हैं। सरकार समय-समय पर राष्ट्रीय स्वास्थ्य अनुसंधान एजेंडा तैयार करेगी, ताकि जरूरत के मुताबिक प्राथमिकताएं तय की जा सकें।


    मेडिकल कॉलेज बनेंगे रिसर्च हब

    नीति के तहत देशभर के मेडिकल कॉलेजों में मल्टीडिसिप्लिनरी रिसर्च यूनिट (एमआरयू) का विस्तार किया जाएगा। साथ ही, अभी तक वायरस की जांच और रिसर्च करने वाली वायरल रिसर्च एंड डायग्नोस्टिक लैब (वीआरडीएल) को अपग्रेड कर इन्फेक्शियस डिजीज रिसर्च एंड डायग्नोस्टिक लैब (आईआरडीएल) बनाया जाएगा। इससे बैक्टीरिया, फंगस और परजीवी जनित बीमारियों पर भी व्यापक रिसर्च हो सकेगी। ड्राफ्ट नीति में भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) के संस्थानों को देश के स्वास्थ्य अनुसंधान की रीढ़ बनाने की बात कही गई है। इसके लिए अत्याधुनिक लैब, नई तकनीक और राज्यों के साथ बेहतर समन्वय विकसित किया जाएगा, ताकि देशभर में एक मजबूत रिसर्च नेटवर्क तैयार हो सके।


    देश में बनेंगी नई दवाएं और वैक्सीन

    सरकार ने नीति में स्टार्टअप, उद्योग, मेडिकल कॉलेज और रिसर्च संस्थानों के सहयोग से स्वदेशी दवाओं, वैक्सीन, मेडिकल डिवाइस, डायग्नोस्टिक किट के विकास पर जोर दिया है। नई नीति में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई), जीनोमिक्स, डिजिटल हेल्थ डाटा और राष्ट्रीय रोग रजिस्ट्रियों का उपयोग बढ़ाने का प्रस्ताव है।

    नई नीति का एक बड़ा बदलाव यह है कि अब शोध का मूल्यांकन केवल प्रकाशित शोध पत्रों के आधार पर नहीं होगा। यह भी देखा जाएगा कि रिसर्च से नई दवा या तकनीक विकसित हुई या नहीं, सरकारी नीतियों में बदलाव आया या नहीं और मरीजों तक उसका वास्तविक लाभ पहुंचा या नहीं। इसके लिए आईसीएमआर-आईआरआईएस नाम का नया मूल्यांकन ढांचा तैयार किया जाएगा। नीति में राज्यों से भी स्वास्थ्य अनुसंधान के लिए अलग फंड बनाने और निवेश बढ़ाने की अपील की गई है। केंद्र और राज्यों के कुल निवेश की नियमित समीक्षा की जाएगी, ताकि तय लक्ष्यों को समय पर हासिल किया जा सके।

  • भारत की विकास यात्रा मजबूत लेकिन चुनौतियां बरकरार, निर्मला सीतारमण बोलीं- सतत प्रगति के लिए सुधार, नवाचार और तैयारी जरूरी

    भारत की विकास यात्रा मजबूत लेकिन चुनौतियां बरकरार, निर्मला सीतारमण बोलीं- सतत प्रगति के लिए सुधार, नवाचार और तैयारी जरूरी

    नई दिल्ली । भारत की अर्थव्यवस्था वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच मजबूती के साथ आगे बढ़ रही है, लेकिन दीर्घकालिक और सतत विकास सुनिश्चित करने के लिए निरंतर प्रयासों की आवश्यकता बनी हुई है। केंद्रीय वित्त एवं कॉर्पोरेट मामलों की मंत्री निर्मला सीतारमण ने सोमवार को कहा कि देश ने आर्थिक मोर्चे पर उल्लेखनीय उपलब्धियां हासिल की हैं, फिर भी विकास की इस गति को स्थायी बनाए रखने के लिए आत्मसंतोष की बजाय निरंतर सुधार, नवाचार और संस्थागत मजबूती पर ध्यान देना होगा।

    एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए वित्त मंत्री ने कहा कि किसी भी बड़ी और जटिल अर्थव्यवस्था के लिए केवल विकास दर हासिल करना पर्याप्त नहीं होता। वास्तविक सफलता तब मानी जाती है जब आर्थिक प्रगति का लाभ समाज के सभी वर्गों तक पहुंचे और विकास समावेशी तथा टिकाऊ स्वरूप ग्रहण करे। उन्होंने कहा कि मजबूत संस्थानों, प्रभावी नीतियों और सक्षम प्रशासनिक व्यवस्थाओं के बिना दीर्घकालिक आर्थिक विकास को बनाए रखना कठिन हो सकता है।

    सीतारमण ने कहा कि भारत वर्तमान में कई आर्थिक संकेतकों पर बेहतर प्रदर्शन कर रहा है, लेकिन यह स्थिति स्थायी रूप से सुनिश्चित नहीं मानी जा सकती। उनके अनुसार समय-समय पर नीतियों का मूल्यांकन करना और उन क्षेत्रों की पहचान करना आवश्यक है जहां सुधार की गुंजाइश अभी भी मौजूद है। उन्होंने कहा कि बदलती घरेलू और वैश्विक परिस्थितियों के अनुरूप नीतिगत ढांचे को लगातार अद्यतन करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

    वित्त मंत्री ने इस बात पर जोर दिया कि विकास को गति देने के लिए देश की उत्पादन क्षमता, कार्यकुशलता और प्रतिस्पर्धात्मकता को मजबूत करना होगा। उन्होंने कहा कि कई क्षेत्रों ने उल्लेखनीय प्रदर्शन किया है, लेकिन कुछ सेक्टर ऐसे भी हैं जिन्हें अतिरिक्त नीति समर्थन और संरचनात्मक सुधारों की आवश्यकता है। विशेष रूप से जटिल विनिर्माण, मध्यवर्ती उत्पादों और विशिष्ट सेवाओं से जुड़े क्षेत्रों में नई रणनीतियों की जरूरत महसूस की जा रही है।

    उन्होंने कहा कि लंबे समय से जिन चुनौतियों पर चर्चा होती रही है, अब उनके व्यावहारिक समाधान तलाशने का समय है। इसके लिए बेहतर क्रियान्वयन, संस्थागत क्षमता निर्माण और आवश्यकतानुसार नई नीतियों का निर्माण महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। सरकार लगातार इस दिशा में काम कर रही है ताकि भविष्य की आर्थिक चुनौतियों का प्रभावी ढंग से सामना किया जा सके।

    वैश्विक आर्थिक परिदृश्य का उल्लेख करते हुए सीतारमण ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियां तेजी से बदल रही हैं। ऐसे में भारत को भी अपनी नीतियों को लचीला और परिस्थितियों के अनुरूप बनाए रखना होगा। उन्होंने कहा कि विकास की प्रक्रिया स्वतः संचालित नहीं होती, बल्कि इसके लिए निरंतर निगरानी, सुधार और दूरदर्शी योजना की आवश्यकता होती है।

    कोविड-19 महामारी के प्रभावों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि महामारी से जुड़े कुछ असर अब भी आर्थिक योजना और अपेक्षाओं को प्रभावित करते हैं। हालांकि वर्तमान समय में किसी बड़े व्यवधान की आशंका नहीं है, फिर भी सरकार संभावित जोखिमों पर नजर बनाए हुए है और आवश्यक तैयारियां कर रही है।

    वित्त मंत्री ने मौसम संबंधी चुनौतियों पर भी चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि एल नीनो प्रभाव के कारण सामान्य से कमजोर मानसून की संभावना को ध्यान में रखते हुए सरकार पहले से तैयारी कर रही है। कुछ क्षेत्रों में सूखे जैसी स्थिति और कुछ इलाकों में अत्यधिक वर्षा की आशंका को देखते हुए संबंधित विभागों को सतर्क रहने के निर्देश दिए गए हैं।

    उन्होंने विश्वास जताया कि उचित नीतियों, मजबूत संस्थागत ढांचे और निरंतर सुधारों के माध्यम से भारत अपनी दीर्घकालिक विकास संभावनाओं को और अधिक सशक्त बना सकेगा तथा वैश्विक अर्थव्यवस्था में अपनी स्थिति को और मजबूत करेगा।

  • 50 कंपनियों पर नए प्रतिबंध लगाने की तैयारी में EU…. युद्ध में रूस की आर्थिक मदद का आरोप

    50 कंपनियों पर नए प्रतिबंध लगाने की तैयारी में EU…. युद्ध में रूस की आर्थिक मदद का आरोप


    ब्रूसेल्स।
    यूरोपीय यूनियन (European Union- EU) ने यूक्रेन (Ukraine) पर हमले को लेकर रूस (Russia) के खिलाफ अपने प्रतिबंधों का दायरा और बढ़ाने की तैयारी कर ली है। इसके तहत यूरोपीय संघ ने रूस की ‘वॉर इकोनॉमी’ को कमजोर करने के लिए अपना 21वां प्रतिबंध पैकेज प्रस्तावित किया है। इस नए पैकेज की जद में भारत (India) स्थित कुछ कंपनियां भी आ सकती हैं। रूसी अर्थव्यवस्था की कथित तौर पर मदद करने के आरोप में यूरोपीय यूनियन करीब 50 कंपनियों पर नए एक्सपोर्ट कंट्रोल यानी निर्यात प्रतिबंध लगाने जा रहा है।

    यूरोपीय आयोग की उपाध्यक्ष काजा कलास (Vice President Kaja Kalas) ने इन नए प्रतिबंधों का ऐलान करते हुए कहा कि ब्रुसेल्स पिछले दो सालों में अब तक का सबसे बड़ा और कड़ा प्रतिबंध लगाने की तैयारी कर रहा है। उन्होंने बताया कि इस कदम का मुख्य मकसद रूस की युद्ध अर्थव्यवस्था की नींव को ढहाना है। बता दें कि काजा कलास हाल ही में पाकिस्तान का दौरा कर यूरोप लौटी हैं।

    किन देशों की कंपनियों पर लटकी तलवार?
    नए प्रतिबंध पैकेज का मुख्य फोकस रूस के सैन्य-औद्योगिक ढांचे को सीमित करना और युद्ध के लिए हो रही उसकी फाइनेंसिंग को रोकना है। एक्सपोर्ट प्रतिबंधों वाली 50 कंपनियों की सूची में भारत के अलावा चीन, तुर्किये, किर्गिस्तान, कजाकिस्तान और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) की कंपनियां शामिल हैं। इसके अलावा ड्रोन निर्माण से जुड़ी 30 से ज्यादा नई संस्थाओं/कंपनियों को भी इस सूची में जोड़ा गया है।

    बैंकों और क्रिप्टोकरेंसी पर बड़ा ऐक्शन
    नए प्रस्तावों में उन देशों के बैंकों, हथियार बनाने वाली कंपनियों, तेल व्यापारियों, रिफाइनरियों और क्रिप्टोकरेंसी ऑपरेटरों को भी सीधे तौर पर निशाना बनाया गया है, जिन पर रूस को मौजूदा प्रतिबंधों से बचने में मदद करने का आरोप है। करीब 90 बैंकों की संपत्ति फ्रीज की जा सकती है। इसके अलावा रूस और अन्य जगहों के 30 से अधिक बैंकों के ट्रांजैक्शन पर कड़ी निगरानी और नियंत्रण लागू किए जाएंगे। इस पैकेज के तहत 11 क्रिप्टोकरेंसी प्लेटफॉर्म्स के लेनदेन पर भी बैन लगाने की तैयारी है।

    रूस की कमाई और ट्रांसपोर्ट को भी टारगेट किया गया
    रूस को आर्थिक मोर्चे पर घेरने के लिए यूरोपीय संघ ने उसके एनर्जी रेवेन्यू (ऊर्जा राजस्व) पर भी चोट की है। तेल (Oil) और लिक्विफाइड नेचुरल गैस (LNG) से जुड़ी गतिविधियों पर पहले से ज्यादा सख्त पाबंदियां लगाई जाएंगी। रूस के ‘शैडो फ्लीट’ से जुड़े 30 अतिरिक्त जहाजों पर भी प्रतिबंध लगाने का प्रस्ताव दिया गया है। इसके साथ ही 2 रूसी बंदरगाहों और 4 हवाई अड्डों पर भी ट्रांजैक्शन बैन का प्रस्ताव है।

    यूरोपीय आयोग की ओर से पेश किए गए इस 21वें प्रतिबंध पैकेज को अभी लागू नहीं किया गया है। इन सभी प्रस्तावों पर कोई भी अंतिम फैसला या मंजूरी देने से पहले इन्हें यूरोपीय संघ (EU) के सदस्य देशों के सामने विचार-विमर्श के लिए रखा जाएगा।

    पाकिस्तान का दौरा कर लौटीं काजा कलास
    यूरोपीय संघ (EU) की शीर्ष कूटनीतिज्ञ काजा कलास अपनी हालिया पाकिस्तान यात्रा पूरी कर वापस यूरोप लौट आई हैं। उनकी इस महत्वपूर्ण कूटनीतिक यात्रा के दौरान यूरोपीय संघ और पाकिस्तान के बीच द्विपक्षीय संबंधों, व्यापार (विशेषकर GSP+ व्यापार दर्जे), मानवाधिकारों की स्थिति और क्षेत्रीय सुरक्षा जैसे अहम मुद्दों पर व्यापक चर्चा हुई। यह दौरा ऐसे समय में हुआ है जब यूरोप, दक्षिण एशिया में क्षेत्रीय स्थिरता- विशेष रूप से अफगानिस्तान के हालात और जलवायु परिवर्तन जैसी वैश्विक चुनौतियों को लेकर अपनी रणनीतिक साझेदारी को मजबूत करने की कोशिश कर रहा है। पाकिस्तान के लिए भी यूरोपीय संघ एक प्रमुख निर्यात बाजार है, ऐसे में कलास की यह यात्रा दोनों पक्षों के बीच कूटनीतिक और आर्थिक संवाद को बेहतर बनाने की दिशा में एक अहम कदम मानी जा रही है।

    भारत-ईयू का ऐतिहासिक फ्री ट्रेड एग्रीमेंट
    बता दें कि भारत की कंपनियों पर यह ऐक्शन ऐसे समय में लेने की तैयारी है जब भारत और यूरोपीय यूनियन के बीच एक ऐतिहासिक समझौता हुआ है। भारत और यूरोपीय यूनियन के बीच जनवरी 2026 में हुआ ऐतिहासिक फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) दोनों अर्थव्यवस्थाओं के लिए एक बड़ा कदम साबित हो सकता है, जिसे यूरोपीय आयोग द्वारा ‘मदर ऑफ ऑल डील्स’ का नाम दिया गया है। इस समझौते के तहत भारत से कपड़ा, समुद्री उत्पाद, फार्मा और ज्वेलरी जैसे 90% से अधिक उत्पादों को यूरोपीय बाजार में टैक्स-फ्री (जीरो-ड्यूटी) एंट्री मिलेगी। वहीं दूसरी ओर, यूरोप से आने वाली लग्जरी कारों पर भी टैरिफ 110% से घटाकर मात्र 10% (एक तय कोटे के तहत) कर दिया गया है। इसके साथ ही, एक बड़ा ताजा अपडेट यह भी है कि ईयू ने अपने नए और सख्त क्वालिटी नियमों के बावजूद सितंबर 2026 के बाद भी भारत से मछली (एक्वाकल्चर), अंडे और शहद के आयात को जारी रखने की आधिकारिक मंजूरी दे दी है। इस हालिया फैसले से भारत के करीब 1.59 अरब डॉलर के समुद्री निर्यात सेक्टर को बड़ी राहत मिली है। बदलती वैश्विक सियासत और अमेरिका-चीन पर सप्लाई चैन की निर्भरता कम करने के लिहाज से यह ऐतिहासिक डील भारत के लिए एक बड़ा कूटनीतिक और आर्थिक मास्टरस्ट्रोक मानी जा रही है।