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  • चूहों को बिना मारे घर से भगाने के आसान उपाय, खाने की चीजें सुरक्षित रखने और प्रवेश के रास्ते बंद करने से घटेगा खतरा

    चूहों को बिना मारे घर से भगाने के आसान उपाय, खाने की चीजें सुरक्षित रखने और प्रवेश के रास्ते बंद करने से घटेगा खतरा

    नई दिल्ली । घर में चूहों की मौजूदगी छोटी परेशानी से शुरू होकर धीरे धीरे बड़ी समस्या बन सकती है। चूहे खाने की चीजों को दूषित करने के अलावा कपड़ों, फर्नीचर और बिजली के तारों को भी नुकसान पहुंचा सकते हैं। ऐसे में कई लोग उन्हें मारने के बजाय घर से दूर रखने के घरेलू उपाय तलाशते हैं। हालांकि, हर इंटरनेट आधारित नुस्खा सुरक्षित नहीं होता और किसी भी जहरीले या रासायनिक पदार्थ को खाने वाली चीज में मिलाकर चूहों को खिलाना नुकसानदायक हो सकता है।

    चूहों से बचाव का सबसे प्रभावी तरीका उनके लिए घर में भोजन और सुरक्षित ठिकाने की उपलब्धता कम करना है। रसोई में खुले में रखे अनाज, बिस्किट, सूखे मेवे और अन्य खाद्य पदार्थों को ढक्कन वाले मजबूत डिब्बों में रखना चाहिए। खाने के बाद बचे टुकड़ों को तुरंत साफ करना और रात में रसोई को अच्छी तरह साफ करके रखना भी जरूरी है।

    चूहे अक्सर सिंक के नीचे, रसोई की अलमारियों के पीछे, स्टोर रूम, पाइप के आसपास और दरवाजों के नीचे मौजूद छोटे रास्तों से घर में प्रवेश कर सकते हैं। इसलिए इन स्थानों की नियमित जांच करनी चाहिए। दीवार में दिखाई देने वाले छोटे छेद, दरार या पाइप के आसपास की खाली जगह को उपयुक्त सामग्री से बंद करना घर में उनकी आवाजाही रोकने का महत्वपूर्ण उपाय है।

    घर में बेकार सामान, पुराने डिब्बे, कागज और कबाड़ लंबे समय तक जमा रहने पर चूहों को छिपने की जगह मिल सकती है। स्टोर रूम और रसोई के आसपास अनावश्यक सामान को व्यवस्थित रखना चाहिए। सफाई के दौरान उन कोनों और जगहों पर भी ध्यान देना जरूरी है, जहां आमतौर पर पहुंचना मुश्किल होता है।

    कुछ घरेलू उपायों में तेज गंध वाली चीजों का इस्तेमाल चूहों को किसी स्थान से दूर रखने के लिए किया जाता है, लेकिन इनकी प्रभावशीलता हर स्थिति में समान नहीं होती। खासकर फिनाइल, डिटर्जेंट या अन्य रासायनिक पदार्थों को आटे, चीनी या घी जैसी खाने की चीजों में मिलाकर चूहों के लिए रखना सुरक्षित तरीका नहीं माना जाना चाहिए। ऐसे मिश्रण बच्चों और पालतू जानवरों के लिए भी जोखिम पैदा कर सकते हैं।

    यदि चूहे पहले से घर में मौजूद हैं, तो उन्हें पकड़कर सुरक्षित तरीके से बाहर छोड़ने वाले उपयुक्त मानवीय ट्रैप का इस्तेमाल किया जा सकता है। ट्रैप को ऐसी जगह रखना चाहिए जहां बच्चे या पालतू जानवर आसानी से न पहुंच सकें। समस्या ज्यादा होने पर प्रशिक्षित कीट नियंत्रण विशेषज्ञ की सहायता लेना बेहतर विकल्प हो सकता है।

    घर में चूहों की संख्या कम करने के लिए केवल उन्हें भगाने पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं है। यदि भोजन आसानी से उपलब्ध रहेगा और प्रवेश के रास्ते खुले रहेंगे, तो चूहे दोबारा घर में आ सकते हैं। इसलिए सफाई, भोजन का सुरक्षित भंडारण और प्रवेश मार्गों को बंद करना एक साथ जरूरी है।

    रसोई की नियमित सफाई के अलावा कूड़ेदान को खुला नहीं छोड़ना चाहिए। रातभर सिंक में गंदे बर्तन और खाने के अवशेष पड़े रहने से भी चूहों को आकर्षण मिल सकता है। घर के बाहर भी कचरा और भोजन के अवशेष जमा नहीं होने देने चाहिए।

    इस तरह चूहों को बिना मारे दूर रखने के लिए सबसे सुरक्षित रणनीति उनके भोजन, पानी और छिपने की जगहों को सीमित करना है। साथ ही घर में मौजूद संभावित प्रवेश मार्गों को बंद करके समस्या की पुनरावृत्ति रोकी जा सकती है। रासायनिक पदार्थों वाले ऐसे घरेलू नुस्खों से बचना बेहतर है जिनसे चूहों, बच्चों या पालतू जानवरों को नुकसान पहुंचने का खतरा हो।

  • एचआईवी से बचाव के लिए लेनाकैपाविर इंजेक्शन को भारत में मंजूरी, ज्यादा जोखिम वाले वयस्कों और किशोरों को मिलेगा लाभ

    एचआईवी से बचाव के लिए लेनाकैपाविर इंजेक्शन को भारत में मंजूरी, ज्यादा जोखिम वाले वयस्कों और किशोरों को मिलेगा लाभ

    नई दिल्ली ।एचआईवी संक्रमण से बचाव की दिशा में भारत में एक महत्वपूर्ण कदम उठाया गया है। देश में पहली बार एचआईवी संक्रमण के ज्यादा जोखिम वाले लोगों के लिए लेनाकैपाविर इंजेक्शन के इस्तेमाल को मंजूरी मिली है। यह इंजेक्शन एचआईवी-1 संक्रमण से बचाव के लिए प्री-एक्सपोजर प्रोफाइलेक्सिस यानी PrEP के रूप में इस्तेमाल किया जाएगा। केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन की विशेषज्ञ समितियों ने इसके निर्माण और बिक्री से जुड़े प्रस्ताव पर अहम सिफारिशें की हैं।

    लेनाकैपाविर का विकल्प खास तौर पर उन वयस्कों और किशोरों के लिए प्रस्तावित है जिनका वजन कम से कम 35 किलोग्राम है और जिनमें एचआईवी-1 संक्रमण का खतरा अधिक है। इसका उद्देश्य संक्रमण होने से पहले शरीर में दवा की मौजूदगी के जरिए एचआईवी के जोखिम को कम करना है। ऐसे लोगों के लिए यह रोकथाम के उपलब्ध विकल्पों में एक नया विकल्प जोड़ सकता है।

    हालांकि, लेनाकैपाविर शुरू करने से पहले एचआईवी जांच का निगेटिव होना जरूरी होगा। इसका कारण यह है कि PrEP का इस्तेमाल संक्रमण से पहले बचाव के लिए किया जाता है। यदि किसी व्यक्ति में पहले से एचआईवी संक्रमण मौजूद है, तो उसके लिए केवल रोकथाम वाली दवा का इस्तेमाल उचित उपचार का विकल्प नहीं माना जाता।

    एचआईवी से बचाव के लिए PrEP उन लोगों को दिया जाता है जिनमें संक्रमण का जोखिम अपेक्षाकृत ज्यादा हो सकता है। जोखिम की स्थिति व्यक्ति की परिस्थितियों और स्वास्थ्य संबंधी कारकों पर निर्भर करती है। ऐसे लोगों में चिकित्सकीय मूल्यांकन और एचआईवी जांच के बाद ही यह तय किया जाता है कि PrEP उनके लिए उपयुक्त है या नहीं।

    लेनाकैपाविर एक लंबे समय तक असर करने वाली एंटीरेट्रोवायरल दवा है। इसकी खासियत यह है कि इसे नियमित रूप से रोजाना गोली लेने के बजाय लंबे अंतराल पर दिए जाने वाले इंजेक्शन के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। यही वजह है कि एचआईवी रोकथाम के क्षेत्र में इस दवा को महत्वपूर्ण विकल्प के तौर पर देखा जा रहा है।

    विशेषज्ञ समिति की सिफारिशें भारत में एचआईवी रोकथाम की रणनीति के लिए महत्वपूर्ण मानी जा रही हैं। लंबे समय तक असर करने वाले विकल्प उन लोगों के लिए उपयोगी हो सकते हैं जिन्हें रोजाना दवा लेने में परेशानी होती है या नियमित रूप से दवा लेना व्यावहारिक रूप से कठिन लगता है।

    हालांकि लेनाकैपाविर को एचआईवी का इलाज या वैक्सीन नहीं माना जाना चाहिए। इसका इस्तेमाल संक्रमण से पहले बचाव के लिए किया जाता है। इंजेक्शन लेने वाले व्यक्ति को चिकित्सकीय सलाह के अनुसार एचआईवी जांच और आवश्यक स्वास्थ्य निगरानी करानी होगी। इसके साथ सुरक्षित व्यवहार और अन्य उपलब्ध रोकथाम उपायों की भूमिका भी बनी रहेगी।

    इसी प्रक्रिया के दौरान अन्य दवाओं से जुड़े प्रस्तावों पर भी विशेषज्ञ समिति ने विचार किया है। एटॉपिक डर्मेटाइटिस के हल्के से मध्यम मामलों में गैर-प्रतिरक्षा-कमजोर वयस्कों के लिए रक्सोलिटिनिब 1.5 प्रतिशत क्रीम के निर्माण और बिक्री की अनुमति की सिफारिश की गई है। इसके अलावा पेट और आंत से जुड़ी बीमारी में इस्तेमाल होने वाली रिफैक्सिमिन को 400 और 550 मिलीग्राम के सैशे में उपलब्ध कराने की दिशा में भी सिफारिश की गई है।

    लेनाकैपाविर की मंजूरी से एचआईवी रोकथाम के क्षेत्र में एक नया चिकित्सकीय विकल्प जुड़ा है। अब इसके प्रभावी और सुरक्षित इस्तेमाल के लिए निर्धारित चिकित्सकीय प्रक्रिया, एचआईवी जांच और पात्र लोगों की पहचान महत्वपूर्ण होगी। ज्यादा जोखिम वाले लोगों तक रोकथाम के प्रभावी विकल्प पहुंचाना एचआईवी संक्रमण को नियंत्रित करने की व्यापक रणनीति का अहम हिस्सा रहेगा।

  • डेंगू के बढ़ते खतरे के बीच बरतें सावधानी, तेज बुखार के साथ पेट दर्द, रक्तस्राव या सांस फूलने पर तुरंत डॉक्टर से मिलें

    डेंगू के बढ़ते खतरे के बीच बरतें सावधानी, तेज बुखार के साथ पेट दर्द, रक्तस्राव या सांस फूलने पर तुरंत डॉक्टर से मिलें

    नई दिल्ली । बारिश के मौसम में मच्छरों से होने वाली बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। जुलाई से अक्तूबर के बीच डेंगू और मलेरिया जैसे संक्रमण के मामले बढ़ने की आशंका रहती है। डेंगू की शुरुआत कई बार सामान्य वायरल बुखार जैसी ही दिखाई देती है, इसलिए मरीज और परिवार के लोग शुरुआती लक्षणों को नजरअंदाज कर देते हैं। तेज बुखार, सिरदर्द, शरीर में दर्द, कमजोरी, जी मिचलाना और उल्टी जैसी शिकायतें डेंगू में देखी जा सकती हैं। हालांकि केवल लक्षणों के आधार पर डेंगू की पुष्टि नहीं की जा सकती और जरूरत पड़ने पर चिकित्सकीय जांच कराना जरूरी होता है।

    डेंगू संक्रमित एडीज मच्छर के काटने से फैलता है। बारिश के बाद घरों और आसपास जमा साफ पानी मच्छरों के प्रजनन के लिए अनुकूल वातावरण तैयार कर सकता है। ऐसे में पानी जमा होने वाली जगहों की नियमित सफाई और मच्छरों से बचाव के उपाय बेहद महत्वपूर्ण हो जाते हैं। दिन के समय भी मच्छरों से बचने के लिए शरीर को ढककर रखना और आवश्यकता के अनुसार मच्छररोधी उपाय अपनाना उपयोगी हो सकता है।

    डेंगू के मरीज में कमजोरी और शरीर में दर्द होना आम लक्षण हो सकते हैं, लेकिन अगर कमजोरी अचानक बहुत ज्यादा बढ़ जाए और मरीज को उठने-बैठने में परेशानी होने लगे तो इसे सामान्य मानकर घर पर इंतजार नहीं करना चाहिए। अत्यधिक सुस्ती, बेचैनी या तेजी से बिगड़ती तबीयत भी चिकित्सकीय मदद लेने का संकेत हो सकती है।

    तेज बुखार के साथ पेट में गंभीर दर्द या पेट दबाने पर अधिक दर्द होना भी चिंता का कारण है। डेंगू के गंभीर मामलों में शरीर में तरल संतुलन और रक्तसंचार से जुड़ी जटिलताएं हो सकती हैं। इसलिए लगातार पेट दर्द या असामान्य बेचैनी होने पर डॉक्टर से तत्काल संपर्क करना जरूरी है।

    सांस सामान्य से बहुत तेज चलना या सांस लेने में परेशानी होना भी गंभीर संकेत माना जाता है। ऐसी स्थिति में मरीज को घर पर केवल सामान्य बुखार समझकर इलाज करते रहना उचित नहीं है। चिकित्सकीय जांच के बाद ही स्थिति की गंभीरता और आवश्यक उपचार तय किया जा सकता है।

    नाक या मसूड़ों से खून आना, उल्टी में खून दिखाई देना अथवा मल में रक्त आना भी डेंगू के गंभीर चेतावनी संकेतों में शामिल हो सकते हैं। बुखार के साथ इनमें से कोई लक्षण दिखाई दे तो तत्काल चिकित्सा सहायता लेनी चाहिए। अत्यधिक रक्तस्राव गंभीर स्थिति पैदा कर सकता है।

    डेंगू के इलाज में आमतौर पर लक्षणों को नियंत्रित करने, शरीर में पर्याप्त तरल बनाए रखने और जटिलताओं की निगरानी पर ध्यान दिया जाता है। बुखार या दर्द के लिए दवा डॉक्टर की सलाह के अनुसार ही लेनी चाहिए। एस्पिरिन और आइबुप्रोफेन जैसी दवाओं का इस्तेमाल चिकित्सकीय सलाह के बिना नहीं करना चाहिए, क्योंकि कुछ परिस्थितियों में रक्तस्राव का खतरा बढ़ सकता है। तेज बुखार होने पर स्वयं दवा लेने के बजाय डॉक्टर से परामर्श करना अधिक सुरक्षित है।

    बरसात में डेंगू से बचाव के लिए घर और आसपास पानी जमा न होने दें, कूलर, गमले, टंकियों और अन्य पात्रों की नियमित सफाई करें तथा मच्छरों से बचाव के उपाय अपनाएं। बुखार आने पर पर्याप्त आराम और तरल पदार्थ लेना महत्वपूर्ण है, लेकिन गंभीर चेतावनी संकेत दिखाई देने पर घरेलू देखभाल तक सीमित रहना उचित नहीं है। समय पर चिकित्सकीय सलाह और आवश्यक जांच से स्थिति को गंभीर होने से रोकने में मदद मिल सकती है।

  • डेंगू और स्वाइन फ्लू के मामलों में बढ़ोतरी, स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने दोनों संक्रामक बीमारियों के लक्षणों और बचाव के तरीके बताए।

    डेंगू और स्वाइन फ्लू के मामलों में बढ़ोतरी, स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने दोनों संक्रामक बीमारियों के लक्षणों और बचाव के तरीके बताए।

    नई दिल्ली । मौसम में बदलाव और संक्रामक बीमारियों के प्रसार के साथ ही देश के विभिन्न हिस्सों में डेंगू और स्वाइन फ्लू अर्थात एच1एन1 इन्फ्लूएंजा के मामले सामने आ रहे हैं। दोनों ही बीमारियों में तेज बुखार, सिरदर्द और शारीरिक दर्द जैसे शुरुआती लक्षण एक समान प्रतीत होते हैं। इस कारण आम नागरिकों के लिए शुरुआती चरण में इनके बीच अंतर समझ पाना कठिन हो जाता है। हालांकि, चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार इन दोनों बीमारियों के फैलने के कारण और इनके संक्रमण का माध्यम पूरी तरह से भिन्न हैं।

    डेंगू और स्वाइन फ्लू के बीच सबसे बड़ा बुनियादी अंतर इनके संचरण की प्रक्रिया में निहित है। डेंगू का प्रसार संक्रमित एडीज मच्छर के काटने से होता है, जो मुख्य रूप से साफ और ठहरे हुए पानी में पनपते हैं। इसके विपरीत, स्वाइन फ्लू एक श्वसन संबंधी वायरस संक्रमण है जो किसी संक्रमित व्यक्ति के खांसने अथवा छींकने से निकलने वाली सूक्ष्म बूंदों के माध्यम से हवा में आसानी से फैलता है। इसी वजह से दोनों बीमारियों की रोकथाम के लिए अलग-अलग सावधानियां बरतनी आवश्यक होती हैं।

    स्वास्थ्य संगठन के मानकों के अनुसार, डेंगू के मुख्य लक्षणों में अचानक तेज बुखार आना, आंखों के पिछले हिस्से में तीव्र दर्द, मांसपेशियों तथा जोड़ों में ऐंठन, उल्टी आना और त्वचा पर लाल चकत्ते पड़ना शामिल हैं। इसके लक्षण आमतौर पर मच्छर के काटने के चार से दस दिनों के भीतर दिखाई देने लगते हैं और यह स्थिति एक सप्ताह तक बनी रह सकती है। गंभीर स्थिति में पेट दर्द, मसूड़ों या नाक से रक्तस्राव और सांस लेने में तकलीफ जैसे चेतावनी संकेत भी उभर सकते हैं।

    दूसरी ओर, स्वाइन फ्लू के लक्षणों में अचानक बुखार के साथ सूखी खांसी, गले में खराश, ठंड लगना, अत्यधिक थकान और नाक बहना शामिल हैं। कुछ मरीजों में पेट से जुड़ी समस्याएं जैसे उल्टी या दस्त भी देखे जा सकते हैं। यदि समय पर इस स्थिति का प्रबंधन न किया जाए तो यह बढ़कर निमोनिया का रूप ले सकती है, जिससे श्वसन तंत्र पर गंभीर असर पड़ता है।

    दोनों ही बीमारियों के उपचार में सटीक चिकित्सीय परीक्षण अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। डेंगू की पुष्टि के लिए विशिष्ट रक्त जांच की आवश्यकता होती है, जिससे प्लेटलेट्स की संख्या और एंटीजन की स्थिति का पता चलता है। वहीं स्वाइन फ्लू का निदान रोगी के क्लिनिकल मूल्यांकन और स्वाब टेस्ट के आधार पर किया जाता है। विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी प्रकार का लक्षण उभरने पर स्वयं दवा लेने के बजाय तत्काल योग्य चिकित्सक से संपर्क करना चाहिए।

    संक्रमण से बचाव के लिए व्यक्तिगत और पर्यावरणीय स्वच्छता बनाए रखना बेहद जरूरी है। डेंगू से बचने के लिए घरों और आसपास जलभराव न होने देना और मच्छर रोधी उपायों का प्रयोग करना प्रभावी होता है। मध्य प्रदेश सहित देश के विभिन्न राज्यों में स्वास्थ्य विभाग द्वारा इस दिशा में जागरूकता अभियान चलाए जा रहे हैं। स्वाइन फ्लू से सुरक्षा के लिए हाथों की नियमित सफाई, भीड़भाड़ वाले स्थानों पर सावधानी और चिकित्सकीय परामर्श के अनुसार टीकाकरण कराने की सलाह दी जाती है।

  • मानसून में स्वाइन फ्लू का बढ़ता खतरा, जानिए किन लोगों में संक्रमण गंभीर होने की आशंका रहती है और कब लें चिकित्सा मदद

    मानसून में स्वाइन फ्लू का बढ़ता खतरा, जानिए किन लोगों में संक्रमण गंभीर होने की आशंका रहती है और कब लें चिकित्सा मदद

    नई दिल्ली ।देश के कुछ हिस्सों में मानसून और बदलते मौसम के बीच इन्फ्लूएंजा ए H1N1, जिसे आमतौर पर स्वाइन फ्लू कहा जाता है, के मामलों में बढ़ोतरी देखने को मिल रही है। दिल्ली में भी इस साल संक्रमण के मामलों में वृद्धि दर्ज की गई है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, 6 अगस्त 2026 तक राजधानी में H1N1 के 1,349 पुष्ट मामले सामने आ चुके थे। इसके बाद कुछ अस्पतालों में भी ऐसे मरीजों की संख्या बढ़ने की जानकारी सामने आई है।

    स्वाइन फ्लू एक वायरल श्वसन संक्रमण है, जिसके लक्षण सामान्य फ्लू जैसे दिखाई दे सकते हैं। मानसून के दौरान मौसम में बदलाव, तापमान में उतार-चढ़ाव और लोगों के बीच संपर्क बढ़ने जैसी परिस्थितियां श्वसन संक्रमण के फैलाव के लिए अनुकूल वातावरण बना सकती हैं। हालांकि, ज्यादातर मामलों में बीमारी हल्की रहती है और उचित आराम, निगरानी तथा चिकित्सकीय सलाह से मरीज ठीक हो जाते हैं।

    स्वाइन फ्लू का खतरा सभी लोगों को हो सकता है, लेकिन कुछ समूहों में संक्रमण गंभीर रूप ले सकता है। छोटे बच्चे, बुजुर्ग, गर्भवती महिलाएं और कमजोर रोग प्रतिरोधक क्षमता वाले लोग विशेष सावधानी की श्रेणी में आते हैं। इनके अलावा पहले से फेफड़ों की बीमारी, हृदय रोग, डायबिटीज या किडनी से जुड़ी गंभीर समस्या वाले मरीजों में भी जटिलताओं का जोखिम अधिक हो सकता है।

    H1N1 संक्रमण होने पर अचानक बुखार, खांसी, गले में खराश, सिरदर्द, शरीर में दर्द, थकान और नाक से संबंधित परेशानी जैसे लक्षण सामने आ सकते हैं। कुछ मरीजों में लक्षण अपेक्षाकृत हल्के होते हैं, जबकि जोखिम वाले लोगों में बीमारी तेजी से गंभीर हो सकती है। इसलिए लगातार बने रहने वाले या बढ़ते लक्षणों को सामान्य वायरल समझकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।

    विशेष रूप से सांस लेने में परेशानी, ऑक्सीजन का स्तर कम होना, सीने में बेचैनी, अत्यधिक कमजोरी, असामान्य रूप से ज्यादा नींद आना या तेजी से बिगड़ती तबीयत गंभीर स्थिति के संकेत हो सकते हैं। ऐसे लक्षण दिखाई देने पर मरीज को जल्द चिकित्सकीय सहायता लेनी चाहिए। बच्चों, बुजुर्गों, गर्भवती महिलाओं और पहले से गंभीर बीमारी वाले मरीजों में लक्षण दिखने पर डॉक्टर से सलाह लेने में देरी नहीं करनी चाहिए।

    स्वाइन फ्लू के उपचार में मरीज की स्थिति और लक्षणों के आधार पर चिकित्सा प्रबंधन किया जाता है। कुछ परिस्थितियों में डॉक्टर शुरुआती चरण में ओसेल्टामिविर जैसी एंटीवायरल दवा की सलाह दे सकते हैं। हालांकि, दवा की जरूरत, उसकी मात्रा और उपचार की अवधि मरीज की स्थिति देखकर चिकित्सक तय करते हैं। केवल लक्षणों के आधार पर खुद से एंटीवायरल या अन्य दवाएं लेना उचित नहीं है।

    संक्रमण से बचाव के लिए हाथों को नियमित रूप से साबुन से धोना, खांसते या छींकते समय मुंह और नाक ढकना तथा बीमार व्यक्ति के संपर्क में अनावश्यक रूप से आने से बचना महत्वपूर्ण है। भीड़भाड़ वाली जगहों पर विशेष सावधानी बरतनी चाहिए। संक्रमित व्यक्ति को भी दूसरों से दूरी बनाए रखनी चाहिए ताकि संक्रमण फैलने का खतरा कम किया जा सके।

    फ्लू से बचाव के लिए टीकाकरण भी एक विकल्प हो सकता है, लेकिन इसे लेकर डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है। बदलते मौसम के दौरान सावधानी, शुरुआती लक्षणों पर निगरानी और जोखिम वाले लोगों की समय पर चिकित्सकीय जांच संक्रमण को गंभीर होने से रोकने में मदद कर सकती है।

  • मोबाइल का लगातार बढ़ता इस्तेमाल बन रहा टेक्स्ट नेक सिंड्रोम की वजह, समय से पहले कमजोर हो सकती है गर्दन

    मोबाइल का लगातार बढ़ता इस्तेमाल बन रहा टेक्स्ट नेक सिंड्रोम की वजह, समय से पहले कमजोर हो सकती है गर्दन

    नई दिल्ली ।डिजिटल तकनीक ने लोगों की जिंदगी को पहले की तुलना में अधिक आसान बनाया है, लेकिन इसके लगातार और गलत तरीके से इस्तेमाल के कारण कई नई स्वास्थ्य समस्याएं भी सामने आ रही हैं। इनमें टेक्स्ट नेक सिंड्रोम तेजी से बढ़ने वाली ऐसी समस्या है, जो लंबे समय तक मोबाइल, टैबलेट या लैपटॉप की स्क्रीन पर झुककर देखने की आदत से जुड़ी मानी जाती है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि यदि समय रहते सही सावधानी नहीं बरती गई, तो यह समस्या गर्दन और रीढ़ की हड्डी पर दीर्घकालिक प्रभाव डाल सकती है।

    टेक्स्ट नेक सिंड्रोम मुख्य रूप से गर्दन और सर्वाइकल स्पाइन से संबंधित समस्या है। जब कोई व्यक्ति लंबे समय तक सिर को आगे झुकाकर मोबाइल या अन्य डिजिटल स्क्रीन देखता है, तो गर्दन की मांसपेशियों और रीढ़ पर सामान्य से कई गुना अधिक दबाव पड़ने लगता है। सामान्य स्थिति में सिर का भार सीमित रहता है, लेकिन जैसे-जैसे सिर आगे की ओर झुकता है, गर्दन को अधिक वजन संभालना पड़ता है। यही अतिरिक्त दबाव धीरे-धीरे मांसपेशियों में थकान, दर्द और संरचनात्मक बदलाव का कारण बन सकता है।

    विशेषज्ञों के अनुसार, लगातार मोबाइल देखने की आदत गर्दन की मांसपेशियों को तनावग्रस्त बनाए रखती है। लंबे समय तक यह स्थिति बनी रहने पर मांसपेशियां कमजोर होने लगती हैं और रीढ़ की प्राकृतिक बनावट भी प्रभावित हो सकती है। यही कारण है कि इसे डिजिटल युग से जुड़ी ऐसी समस्या माना जा रहा है, जो समय से पहले गर्दन को कमजोर और कम लचीला बना सकती है।

    इस समस्या के कई शुरुआती संकेत दिखाई दे सकते हैं। गर्दन में लगातार दर्द या अकड़न, कंधों में जकड़न, पीठ के ऊपरी हिस्से में दर्द, बार-बार सिरदर्द, गर्दन घुमाने में कठिनाई, मांसपेशियों में खिंचाव तथा हाथों या उंगलियों में सुन्नपन जैसे लक्षण इसके प्रमुख संकेत माने जाते हैं। कुछ लोगों में लंबे समय तक गलत पोश्चर बनाए रखने के कारण कंधे झुकने और गर्दन आगे की ओर निकलने जैसी शारीरिक स्थिति भी विकसित हो सकती है। ऐसे लक्षण लगातार बने रहने पर चिकित्सकीय सलाह लेना आवश्यक माना जाता है।

    स्वास्थ्य विशेषज्ञ बताते हैं कि टेक्स्ट नेक सिंड्रोम का सबसे बड़ा कारण आधुनिक जीवनशैली और स्क्रीन के सामने बिताया जाने वाला लंबा समय है। बिना ब्रेक लिए लगातार मोबाइल चलाना, लैपटॉप पर गलत मुद्रा में काम करना, लंबे समय तक एक ही स्थिति में बैठे रहना और कार्यस्थल पर उचित एर्गोनॉमिक व्यवस्था का अभाव इस समस्या के जोखिम को बढ़ा सकता है। बच्चों और युवाओं में बढ़ता स्क्रीन टाइम भी चिंता का विषय माना जा रहा है।

    इस समस्या से बचाव के लिए कुछ सरल आदतों को अपनाना प्रभावी हो सकता है। मोबाइल या टैबलेट का उपयोग करते समय स्क्रीन को आंखों के स्तर के करीब रखने का प्रयास करना चाहिए, ताकि गर्दन को बार-बार नीचे न झुकाना पड़े। बैठते समय रीढ़ को सीधा रखना और कंधों को संतुलित स्थिति में रखना भी जरूरी है। लगातार स्क्रीन देखने के बजाय नियमित अंतराल पर छोटे-छोटे ब्रेक लेना, गर्दन और ऊपरी पीठ की हल्की स्ट्रेचिंग करना तथा शारीरिक गतिविधि को दैनिक दिनचर्या का हिस्सा बनाना भी लाभदायक माना जाता है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि डिजिटल उपकरणों का संतुलित और सही तरीके से उपयोग करने के साथ-साथ सही पोश्चर अपनाकर टेक्स्ट नेक सिंड्रोम के खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है। शुरुआती लक्षणों को नजरअंदाज करने के बजाय समय रहते सुधारात्मक कदम उठाना लंबे समय तक गर्दन और रीढ़ के स्वास्थ्य को सुरक्षित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

  • बारिश में भीग गया स्मार्टफोन? घबराने की बजाय तुरंत अपनाएं ये आसान उपाय, सही समय पर उठाया कदम बचा सकता है आपका मोबाइल

    बारिश में भीग गया स्मार्टफोन? घबराने की बजाय तुरंत अपनाएं ये आसान उपाय, सही समय पर उठाया कदम बचा सकता है आपका मोबाइल

    नई दिल्ली । मानसून के मौसम में अचानक होने वाली बारिश अक्सर लोगों के स्मार्टफोन के लिए बड़ी परेशानी बन जाती है। बाहर निकलते समय जेब या बैग में रखा मोबाइल कई बार पानी की चपेट में आ जाता है। ऐसे में घबराकर जल्दबाजी में उठाया गया एक गलत कदम फोन को हमेशा के लिए खराब कर सकता है। इसलिए मोबाइल भीगने के बाद सही तरीके अपनाना बेहद जरूरी होता है।

    अगर फोन बारिश में भीग जाए तो सबसे पहले उसे तुरंत स्विच ऑफ कर देना चाहिए। यदि डिवाइस पहले से बंद है तो उसे चालू करने की कोशिश बिल्कुल नहीं करनी चाहिए। पानी के संपर्क में आने के बाद फोन के अंदर शॉर्ट सर्किट का खतरा बढ़ जाता है। ऐसे में फोन ऑन रहने या बार-बार चालू करने का प्रयास करने से मदरबोर्ड और अन्य इलेक्ट्रॉनिक पार्ट्स को गंभीर नुकसान पहुंच सकता है।

    भीगे हुए मोबाइल को तुरंत चार्जिंग पर लगाना भी नुकसानदायक साबित हो सकता है। कई लोग यह जांचने के लिए कि फोन काम कर रहा है या नहीं, उसे चार्जर से जोड़ देते हैं। ऐसा करने से शॉर्ट सर्किट का खतरा बढ़ जाता है और फोन पूरी तरह खराब हो सकता है। इसलिए जब तक फोन पूरी तरह सूख न जाए, उसे चार्जिंग से दूर रखना ही सुरक्षित माना जाता है।

    फोन बंद करने के बाद सिम कार्ड और मेमोरी कार्ड को बाहर निकाल लेना चाहिए। यदि मोबाइल की बैटरी निकालना संभव हो तो उसे भी अलग कर देना बेहतर रहता है। इससे डिवाइस के अंदर हवा का प्रवाह बढ़ता है और नमी जल्दी सूखने में मदद मिलती है। साथ ही सिम और मेमोरी कार्ड को भी संभावित नुकसान से बचाया जा सकता है।

    इसके बाद फोन के बाहरी हिस्से को साफ और सूखे सूती कपड़े या टिश्यू पेपर से धीरे-धीरे पोंछना चाहिए। स्क्रीन, बैक पैनल और किनारों पर मौजूद पानी को सावधानी से हटाएं। इस दौरान फोन को जोर से हिलाने या झटकने से बचना चाहिए, क्योंकि इससे पानी अंदर तक पहुंच सकता है और नुकसान बढ़ सकता है।

    मोबाइल को सुखाने के लिए हेयर ड्रायर या किसी अन्य गर्म हवा वाले उपकरण का उपयोग नहीं करना चाहिए। तेज गर्म हवा फोन के अंदर मौजूद प्लास्टिक और अन्य संवेदनशील हिस्सों को नुकसान पहुंचा सकती है। इसके अलावा हवा का दबाव पानी को बाहर निकालने के बजाय अंदर की ओर धकेल सकता है, जिससे समस्या और गंभीर हो सकती है।

    मानसून के दौरान मोबाइल को सुरक्षित रखने के लिए वॉटरप्रूफ कवर या सुरक्षित पाउच का इस्तेमाल करना एक अच्छा विकल्प हो सकता है। यदि फोन लंबे समय तक पानी में रहा हो या पूरी तरह सूखने के बाद भी सामान्य रूप से काम न करे, तो उसे स्वयं खोलने की बजाय सर्विस सेंटर में जांच कराना बेहतर रहेगा। सही समय पर बरती गई सावधानियां स्मार्टफोन को गंभीर नुकसान से बचाने के साथ उसकी कार्यक्षमता बनाए रखने में भी मदद करती हैं।

  • थकी हुई आंखें और गहरे काले घेरे बन रहे हैं परेशानी, एक्सपर्ट्स ने बताए कारण और आसान बचाव

    थकी हुई आंखें और गहरे काले घेरे बन रहे हैं परेशानी, एक्सपर्ट्स ने बताए कारण और आसान बचाव

    नई दिल्ली । गर्मियों का मौसम केवल त्वचा पर ही नहीं बल्कि आंखों के आसपास की नाजुक त्वचा पर भी गहरा प्रभाव डालता है। इस दौरान कई लोगों को आंखों के नीचे सूजन, काले घेरे और चेहरे पर लगातार थकान जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। अक्सर लोग इसे केवल कम नींद का परिणाम मानते हैं, लेकिन स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार इसके पीछे कई अन्य कारण भी जिम्मेदार हो सकते हैं। बढ़ता तापमान, शरीर में पानी की कमी, अत्यधिक स्क्रीन टाइम और धूप के सीधे संपर्क जैसी स्थितियां आंखों के आसपास की त्वचा को प्रभावित करती हैं।

    आंखों के नीचे मौजूद त्वचा शरीर के अन्य हिस्सों की तुलना में अधिक पतली और संवेदनशील होती है। यही वजह है कि शरीर में होने वाले छोटे बदलाव भी यहां जल्दी दिखाई देने लगते हैं। गर्मियों में अधिक पसीना निकलने से शरीर में पानी की कमी होने लगती है। जब शरीर पर्याप्त रूप से हाइड्रेट नहीं रहता, तब आंखों के आसपास की त्वचा बेजान और थकी हुई दिखाई देने लगती है। इसके साथ ही सूजन की समस्या भी बढ़ सकती है।

    विशेषज्ञ बताते हैं कि आंखों के आसपास होने वाली सूजन को चिकित्सकीय भाषा में पेरिऑर्बिटल पफीनेस कहा जाता है। इस स्थिति में आंखों के आसपास के ऊतकों में अतिरिक्त द्रव जमा हो जाता है। अधिक नमक का सेवन, पर्याप्त आराम न मिलना, लगातार मोबाइल या कंप्यूटर स्क्रीन का उपयोग और मौसम संबंधी प्रभाव इस समस्या को बढ़ा सकते हैं। कई बार सुबह उठने के बाद यह सूजन अधिक स्पष्ट दिखाई देती है।

    डार्क सर्कल की समस्या भी आज बड़ी संख्या में लोगों को प्रभावित कर रही है। इसके पीछे केवल थकान ही जिम्मेदार नहीं होती। शरीर में पानी की कमी, अनियमित नींद, तनाव, बढ़ती उम्र और धूप के कारण होने वाला पिगमेंटेशन भी इसके प्रमुख कारणों में शामिल हैं। गर्मियों में तेज अल्ट्रावायलेट किरणों के संपर्क में आने से आंखों के नीचे की त्वचा में मेलानिन का उत्पादन बढ़ सकता है, जिससे काले घेरे अधिक गहरे दिखाई देने लगते हैं।

    स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि कुछ सरल उपायों को अपनाकर इस समस्या को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है। आंखों पर ठंडी सिकाई करने से सूजन कम करने में मदद मिलती है। ठंडे खीरे के टुकड़े, ठंडे चम्मच या ठंडे जेल आई मास्क का उपयोग आंखों को आराम पहुंचा सकता है। इससे रक्त वाहिकाएं सिकुड़ती हैं और सूजन में राहत मिलती है।

    ग्रीन टी या ब्लैक टी बैग्स का उपयोग भी लाभदायक माना जाता है। इनमें मौजूद एंटीऑक्सीडेंट और कैफीन आंखों के आसपास की सूजन को अस्थायी रूप से कम करने में सहायक हो सकते हैं। हालांकि इनका उपयोग करने से पहले उन्हें अच्छी तरह ठंडा करना आवश्यक है।

    गर्मियों में पर्याप्त मात्रा में पानी पीना सबसे महत्वपूर्ण उपायों में से एक है। विशेषज्ञ दिनभर नियमित अंतराल पर पानी पीने और पानी से भरपूर फलों को आहार में शामिल करने की सलाह देते हैं। खीरा, तरबूज, संतरा और नारियल पानी शरीर को हाइड्रेट रखने में मदद करते हैं। इससे त्वचा में नमी बनी रहती है और आंखों के नीचे की थकान कम दिखाई देती है।

    संतुलित आहार और सीमित नमक सेवन भी आंखों की सूजन को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। अत्यधिक नमक शरीर में द्रव को रोककर सूजन बढ़ा सकता है। इसके अलावा प्रतिदिन सात से आठ घंटे की गुणवत्तापूर्ण नींद लेना भी आवश्यक माना जाता है। पर्याप्त नींद त्वचा की मरम्मत और रक्त संचार को बेहतर बनाने में मदद करती है।

    धूप से बचाव भी बेहद जरूरी है। बाहर निकलते समय UV सुरक्षा वाले सनग्लासेस और उपयुक्त सनस्क्रीन का उपयोग आंखों के आसपास की त्वचा को नुकसान से बचा सकता है। इससे पिगमेंटेशन और समय से पहले त्वचा की उम्र बढ़ने जैसी समस्याओं का खतरा भी कम होता है।

    विशेषज्ञों के अनुसार यदि आंखों की सूजन लंबे समय तक बनी रहे, दर्द, लालिमा, खुजली या अचानक एक आंख में अधिक सूजन दिखाई दे तो इसे सामान्य समस्या मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। ऐसे लक्षण किसी एलर्जी, संक्रमण, थायराइड संबंधी परेशानी या अन्य स्वास्थ्य समस्या का संकेत हो सकते हैं, जिनके लिए चिकित्सकीय सलाह आवश्यक होती है।

  • स्टोर रूम की सफाई से लेकर वन विभाग की मदद तक, बारिश के मौसम में इन जरूरी घरेलू सुरक्षा नियमों का करें पालन

    स्टोर रूम की सफाई से लेकर वन विभाग की मदद तक, बारिश के मौसम में इन जरूरी घरेलू सुरक्षा नियमों का करें पालन


    नई दिल्ली । देश के विभिन्न हिस्सों में मानसून की सक्रियता बढ़ने के साथ ही आम नागरिकों के लिए मौसमी बीमारियों के अलावा एक और बड़ा और गंभीर खतरा पैदा हो जाता है। भारी बारिश, जलभराव और जमीन के भीतर नमी बढ़ने के कारण सांप, बिच्छू और अन्य जहरीले रेंगने वाले जीव अपने प्राकृतिक आवासों यानी बिलों से बाहर निकलने के लिए मजबूर हो जाते हैं। सुरक्षित और सूखी जगहों की तलाश में ये जीव अक्सर इंसानी बस्तियों, घरों के बगीचों, स्टोर रूम और बेसमेंट जैसी जगहों पर शरण ले लेते हैं। इस स्थिति से निपटने और अपने परिवार को पूरी तरह सुरक्षित रखने के लिए गृह स्वामियों को कुछ विशेष और महत्वपूर्ण सुरक्षा उपायों को अमल में लाने की तत्काल आवश्यकता है।

    घरेलू सुरक्षा के दृष्टिकोण से सबसे पहला और बुनियादी कदम घर के आसपास के बाहरी वातावरण को पूरी तरह से साफ-सुथरा रखना है। घर के परिसर या बगीचे में जमा होने वाले कचरे, सूखी लकड़ियों के गट्ठर, पुरानी ईंटों के ढेर और बेतरतीब उगी झाड़ियों को तुरंत साफ किया जाना चाहिए, क्योंकि ये स्थान सांप और बिच्छुओं के छिपने के लिए सबसे अनुकूल माने जाते हैं। इसके अतिरिक्त, यदि घर के लॉन या आसपास के मैदान में घास अधिक बढ़ गई है, तो उसकी नियमित रूप से छंटाई कराना अनिवार्य है, ताकि खुले और साफ स्थान पर ये जीव ठहर न सकें।

    सुरक्षा व्यवस्था को सुदृढ़ करने के अगले चरण में घर के भौतिक ढांचे का बारीकी से निरीक्षण करना आवश्यक है। भवन की दीवारों, खिड़कियों के कोनों, मुख्य दरवाजों के निचले हिस्सों और फर्श में मौजूद किसी भी प्रकार की छोटी-बड़ी दरारों या गैप की सघन जांच की जानी चाहिए। बिच्छू और छोटे सांप बेहद महीन दरारों के रास्ते भी घर के भीतर सुगमता से प्रवेश कर जाते हैं। अतः ऐसी किसी भी संभावित एंट्री पॉइंट या झिरी के दिखाई देने पर उसे अविलंब सीमेंट, सिलिकॉन सीलेंट या अन्य मजबूत निर्माण सामग्री की सहायता से पूरी तरह एयरटाइट बंद कर देना चाहिए।

    बरसात के दिनों में घर के आंतरिक वातावरण को सूखा रखना और वहां पर्याप्त रोशनी की व्यवस्था करना भी सुरक्षा के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण है। स्टोर रूम, बेसमेंट और घर के उन कोनों में जहां हवा और रोशनी कम पहुंचती है, वहां नियमित रूप से सफाई और कीटनाशक दवाओं का छिड़काव किया जाना चाहिए। अक्सर लोग जूते, चप्पल, पुराने कपड़े या कार्डबोर्ड के बक्से लंबे समय तक एक ही स्थान पर रख देते हैं, जो इन जीवों के लिए छिपने का आदर्श स्थान बन जाते हैं। विशेषज्ञों की सलाह है कि इस मौसम में किसी भी रखे हुए सामान, कपड़ों या जूतों का उपयोग करने से पहले उन्हें एक बार अच्छी तरह से झाड़कर और जांचकर ही इस्तेमाल में लाएं।

    इन तमाम सावधानियों के बावजूद यदि कभी घर के भीतर या आसपास कोई जहरीला सांप अथवा अन्य जीव दिखाई दे, तो नागरिकों को अत्यधिक संयम बरतने की आवश्यकता है। ऐसी आपातकालीन स्थिति में जीव को खुद पकड़ने, सहलाने या लाठी-डंडों से मारने का प्रयास बिल्कुल नहीं करना चाहिए, क्योंकि भयभीत होने पर ये जीव और अधिक आक्रामक होकर हमला कर सकते हैं। इसके स्थान पर स्थानीय वन विभाग के अधिकारियों, पशु बचाव दल (एनिमल रेस्क्यू टीम) या किसी प्रमाणित और प्रशिक्षित सर्प विशेषज्ञ से तुरंत संपर्क करना चाहिए, जो आधुनिक उपकरणों की मदद से सुरक्षित रूप से जीव को वहां से रेस्क्यू कर सकें।

  • हफ्ते से ज्यादा खांसी है तो हो जाए सावधान टीबी का संकेत हो सकता है

    हफ्ते से ज्यादा खांसी है तो हो जाए सावधान टीबी का संकेत हो सकता है

    नई दिल्ली:  टीबी यानी ट्यूबरकुलोसिस आज भी भारत में एक गंभीर स्वास्थ्य समस्या बनी हुई है। बदलते मौसम में खांसी होना आम बात है, लेकिन हर खांसी को हल्के में लेना खतरनाक साबित हो सकता है। कई बार साधारण दिखने वाली खांसी किसी बड़ी बीमारी का शुरुआती संकेत हो सकती है

    सामान्य खांसी आमतौर पर 5 से 7 दिनों में ठीक हो जाती है, जो सर्दी, वायरल इंफेक्शन या एलर्जी के कारण होती है। लेकिन अगर खांसी 2 से 3 हफ्ते से ज्यादा समय तक बनी रहती है और दवाओं से आराम नहीं मिलता, तो यह टीबी का संकेत हो सकता है। ऐसे में तुरंत डॉक्टर से जांच कराना जरूरी है

    टीबी सिर्फ खांसी तक सीमित नहीं रहती, बल्कि यह शरीर को अंदर से कमजोर कर देती है। इसके साथ कई अन्य लक्षण भी दिखाई दे सकते हैं, जैसे शाम के समय हल्का बुखार, रात में ज्यादा पसीना आना, बिना कारण वजन कम होना, लगातार थकान महसूस होना और सीने में दर्द

    टीबी के शुरुआती लक्षणों को पहचानना बेहद जरूरी है, क्योंकि समय पर इलाज न मिलने पर यह बीमारी गंभीर रूप ले सकती है और दूसरों में भी फैल सकती है। इसलिए अगर खांसी के साथ ये लक्षण नजर आएं, तो देरी न करें और तुरंत जांच कराएं

    विशेषज्ञों के अनुसार, जागरूकता और समय पर इलाज ही टीबी से बचाव का सबसे प्रभावी तरीका है। अगर शुरुआती लक्षणों को पहचान लिया जाए, तो इस बीमारी को पूरी तरह नियंत्रित किया जा सकता है
    हर खांसी को नजरअंदाज न करें। अगर यह लंबे समय तक बनी रहे, तो इसे चेतावनी संकेत मानकर तुरंत मेडिकल सलाह लेना ही समझदारी है