Tag: Private Hospitals

  • अस्पतालों को मान्यता देने की प्रक्रिया पर हाईकोर्ट की नजर, 5 जनहित याचिकाओं पर सरकार से मांगा ताजा स्टेटस रिपोर्ट

    अस्पतालों को मान्यता देने की प्रक्रिया पर हाईकोर्ट की नजर, 5 जनहित याचिकाओं पर सरकार से मांगा ताजा स्टेटस रिपोर्ट


    जबलपुर  । मध्य प्रदेश में निजी अस्पतालों और नर्सिंग होम के पंजीयन की प्रक्रिया को लेकर दायर पांच जनहित याचिकाओं पर जबलपुर हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से ताजा स्टेटस रिपोर्ट मांगी है। सोमवार को मामले की सुनवाई चीफ जस्टिस अल्पेश यशवंत कोगजे और जस्टिस विवेक जैन की डिवीजन बेंच में हुई। सुनवाई के दौरान सरकार की ओर से मौजूदा स्थिति से जुड़ी रिपोर्ट पेश करने के लिए चार दिन का समय मांगा गया जिसे अदालत ने स्वीकार कर लिया। अब मामले की अगली सुनवाई 12 अक्टूबर को होगी। इस दौरान सरकार की ओर से दी जाने वाली ताजा रिपोर्ट में अब तक की कार्रवाई और मौजूदा स्थिति का ब्यौरा सामने आने की उम्मीद है।

    लॉ स्टूडेंट एसोसिएशन और अन्य की ओर से दायर जनहित याचिकाओं में प्रदेश में निजी अस्पतालों और नर्सिंग होम के पंजीयन की प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाए गए हैं। याचिकाकर्ताओं ने आरटीआई के जरिए मिली जानकारी का हवाला देते हुए बताया है कि जबलपुर शहर में करीब 160 निजी अस्पताल और नर्सिंग होम संचालित हो रहे हैं। इनमें से 63 संस्थानों का पंजीयन वर्ष 2019 से 2021 के बीच किए जाने की जानकारी सामने आई है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि इन पंजीयन प्रक्रियाओं में निर्धारित नियमों का पालन हुआ या नहीं इसकी जांच जरूरी है।

    जनहित याचिकाओं में जबलपुर के मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी कार्यालय में निजी अस्पतालों के पंजीयन को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। आरोप है कि नए अस्पतालों और नर्सिंग होम का भौतिक सत्यापन किए बिना केवल ऑनलाइन आवेदन और अधूरे दस्तावेजों के आधार पर पंजीयन जारी किए जा रहे हैं। याचिकाकर्ताओं ने इस प्रक्रिया को निर्धारित नियमों के अनुरूप नहीं बताते हुए हाईकोर्ट से हस्तक्षेप की मांग की है। उनका कहना है कि अस्पताल जैसी स्वास्थ्य सुविधाओं के पंजीयन से पहले जरूरी मानकों की जांच होना महत्वपूर्ण है।

    मामले में फायर सेफ्टी की अनुमति भी प्रमुख मुद्दा बनकर सामने आई है। याचिकाकर्ताओं ने सवाल उठाया है कि यदि किसी निजी अस्पताल के पास जरूरी अग्नि सुरक्षा मंजूरी उपलब्ध नहीं है तो उसे पंजीयन किस आधार पर दिया गया। इसी तरह नगर निगम से मिलने वाली आवश्यक अनुमति को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। जनहित याचिकाओं में अस्पतालों के पंजीयन की पूरी प्रक्रिया की जांच कराने और संबंधित नियमों का पालन सुनिश्चित करने की मांग की गई है।

    सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से उप महाधिवक्ता अभिजीत अवस्थी ने अदालत को बताया कि सरकार पहले अपनी रिपोर्ट पेश कर चुकी है। हालांकि मामले की वर्तमान स्थिति बताने वाली ताजा स्टेटस रिपोर्ट दाखिल करने के लिए चार दिन का समय मांगा गया। हाईकोर्ट ने सरकार को समय देते हुए यह भी निर्देश दिया कि नई रिपोर्ट की प्रतियां याचिकाकर्ताओं के अधिवक्ताओं को उपलब्ध कराई जाएं।

    याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता आलोक बगरेचा और अमिताभ गुप्ता ने पक्ष रखा। अब 12 अक्टूबर को होने वाली सुनवाई में हाईकोर्ट के सामने सरकार की ताजा स्टेटस रिपोर्ट होगी। इसके आधार पर अदालत निजी अस्पतालों और नर्सिंग होम के पंजीयन को लेकर लगाए गए आरोपों तथा सरकार की ओर से की गई कार्रवाई पर आगे विचार करेगी। मामले की अगली सुनवाई में यह स्पष्ट हो सकता है कि पंजीयन प्रक्रिया को लेकर सरकार ने अब तक क्या कदम उठाए हैं और आगे किन स्तरों पर कार्रवाई की जानी है।

  • करोड़ों के बकाया भुगतान पर प्राइवेट अस्पतालों का बड़ा ऐलान, 8 अक्टूबर से आयुष्मान इलाज बंद, दिल्ली में होगा प्रदर्शन

    करोड़ों के बकाया भुगतान पर प्राइवेट अस्पतालों का बड़ा ऐलान, 8 अक्टूबर से आयुष्मान इलाज बंद, दिल्ली में होगा प्रदर्शन


    भोपाल। मध्य प्रदेश में आयुष्मान भारत योजना को लेकर प्राइवेट अस्पतालों और सरकार के बीच विवाद अब बड़े आंदोलन की ओर बढ़ता दिखाई दे रहा है। प्रदेश के निजी अस्पताल संचालकों और चिकित्सा संगठनों ने 8 अक्टूबर से आयुष्मान योजना का अनिश्चितकालीन बहिष्कार करने का ऐलान किया है। यदि तय समय तक सरकार की ओर से अस्पताल संगठनों की मांगों पर ठोस समाधान नहीं निकला तो निजी अस्पतालों में आयुष्मान योजना के तहत मरीजों का इलाज नहीं किया जाएगा। इस फैसले के पीछे सबसे बड़ी वजह अस्पतालों के लंबे समय से अटके भुगतान और क्लेम में हो रही कटौती बताई जा रही है।

    अस्पताल संगठनों के अनुसार भोपाल के कई निजी अस्पतालों का आयुष्मान योजना के तहत करीब डेढ़ से दो करोड़ रुपये तक का भुगतान लंबित है। अस्पतालों का कहना है कि मरीजों का इलाज करने के बाद जब भुगतान लंबे समय तक अटकता है तो अस्पतालों के सामने आर्थिक संकट खड़ा हो जाता है। इसके अलावा कई क्लेम तकनीकी और प्रक्रियागत कारणों से रिजेक्ट किए जा रहे हैं या उनमें बड़ी कटौती की जा रही है। अस्पताल संचालकों का सवाल है कि जब मरीज के इलाज से पहले उसकी बीमारी उपचार और पैकेज को मंजूरी दी जाती है तो इलाज पूरा होने के बाद वैध क्लेम को रोकने या काटने का आधार स्पष्ट होना चाहिए।

    आईएमए मध्य प्रदेश और यूनाइटेड प्राइवेट हॉस्पिटल्स डायरेक्टर्स एसोसिएशन समेत कई संगठनों ने इस मुद्दे पर संयुक्त आंदोलन का फैसला लिया है। संगठनों का कहना है कि वे लंबे समय से सरकार के सामने अपनी समस्याएं रखते आ रहे हैं। ज्ञापन बैठकों प्रतिनिधिमंडलों और अलग अलग स्तर पर विरोध के बावजूद स्थिति में अपेक्षित सुधार नहीं हुआ है। अब अस्पताल संचालक इसे निर्णायक आंदोलन के रूप में आगे बढ़ाने की तैयारी कर रहे हैं।

    अस्पताल संगठनों की एक बड़ी आपत्ति आयुष्मान योजना में एनएबीएच सर्टिफिकेट की अनिवार्यता को लेकर भी है। उनका कहना है कि अस्पतालों में गुणवत्ता और मरीजों की सुरक्षा के मानकों का पालन जरूरी है लेकिन हर अस्पताल के लिए एक जैसी शर्त व्यावहारिक नहीं हो सकती। अस्पताल का आकार बिस्तरों की संख्या उपलब्ध सुविधाओं और संसाधनों के अनुसार मानकों को लागू किया जाना चाहिए। संगठनों ने एनएबीएच की अनिवार्यता समाप्त कर इसे स्वैच्छिक और प्रोत्साहन आधारित व्यवस्था बनाने की मांग की है।

    प्रदेश में आयुष्मान योजना से जुड़े अस्पतालों के लिए 1 अक्टूबर से नई शर्त लागू होने की बात भी सामने आई है। भोपाल इंदौर ग्वालियर और जबलपुर जैसे बड़े शहरों में योजना से जुड़े अस्पतालों के लिए एनएबीएच सर्टिफिकेट जरूरी किया गया है। अस्पताल संगठनों का दावा है कि इस नियम के कारण बड़ी संख्या में निजी अस्पतालों की आयुष्मान संबद्धता प्रभावित हो सकती है। उनका कहना है कि नियम लागू करने से पहले अस्पतालों को पर्याप्त समय और व्यावहारिक विकल्प दिए जाने चाहिए।

    क्लेम प्रक्रिया को लेकर भी निजी अस्पतालों ने कई सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि टीएटी प्रमाणीकरण दस्तावेजीकरण ट्रिगर और अन्य तकनीकी वजहों से क्लेम रिजेक्ट किए जाते हैं तो अस्पताल को स्पष्ट लिखित कारण मिलना चाहिए। इसके साथ ही क्लेम की जांच योग्य चिकित्सकों से कराने प्रभावी अपील व्यवस्था बनाने और पैकेज की दरों को वास्तविक चिकित्सा खर्च के अनुरूप संशोधित करने की मांग की गई है।

    अस्पताल संगठनों ने यह भी स्पष्ट किया है कि वास्तविक धोखाधड़ी के मामलों में कार्रवाई का वे विरोध नहीं करते। उनकी आपत्ति उन मामलों को लेकर है जहां मरीज वास्तविक है बीमारी वास्तविक है भर्ती और उपचार भी वास्तविक है लेकिन केवल तकनीकी गलती के आधार पर पूरा क्लेम अस्वीकार कर दिया जाता है। उनका कहना है कि ऐसी व्यवस्था में मरीज को कैशलेस सुविधा मिल सकती है लेकिन अस्पताल के लिए इलाज कस्टलेस नहीं हो सकता।

    आंदोलन को लेकर अस्पताल संगठनों ने सरकार को 8 अक्टूबर तक का समय दिया है। यदि इससे पहले शासन और अस्पताल प्रतिनिधियों के बीच सार्थक बातचीत कर लंबित भुगतान और क्लेम से जुड़े मुद्दों का लिखित समाधान नहीं निकला तो प्रदेशभर में आयुष्मान योजना का अनिश्चितकालीन बहिष्कार शुरू हो सकता है। संगठन ने जरूरत पड़ने पर करीब 1000 एम्बुलेंस के साथ दिल्ली कूच करने की चेतावनी भी दी है। अब सरकार और निजी अस्पताल संगठनों के बीच होने वाली बातचीत पर मरीजों की नजर है क्योंकि विवाद लंबा खिंचने पर आयुष्मान योजना के लाभार्थियों को इलाज की सुविधा प्रभावित होने की चिंता बढ़ सकती है।