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  • IDBI बैंक की 60.72% हिस्सेदारी बेचने पर राहुल गांधी और निर्मला सीतारमण आमने-सामने, 52,878 करोड़ के सौदे पर बढ़ा विवाद

    IDBI बैंक की 60.72% हिस्सेदारी बेचने पर राहुल गांधी और निर्मला सीतारमण आमने-सामने, 52,878 करोड़ के सौदे पर बढ़ा विवाद

    नई दिल्ली । IDBI बैंक की बहुलांश हिस्सेदारी बेचने के केंद्र सरकार के फैसले ने राजनीतिक विवाद का रूप ले लिया है। बैंक की 60.72 प्रतिशत हिस्सेदारी कनाडा की कंपनी Fairfax Financial Holdings की सहयोगी इकाई को 52,878.08 करोड़ रुपये में बेचने की तैयारी है। इस फैसले को लेकर लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी और केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण आमने-सामने हैं। राहुल गांधी ने बैंक के निजीकरण और कर्मचारियों के भविष्य पर सवाल उठाए हैं, जबकि वित्त मंत्री ने कांग्रेस के शासनकाल में बैंकों पर कथित राजनीतिक दबाव और खराब कर्ज व्यवस्था को इसके लिए जिम्मेदार ठहराया है।

    राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि मौजूदा सरकार सार्वजनिक संस्थानों को निजी हाथों में सौंप रही है। उन्होंने IDBI बैंक के कर्मचारियों के प्रति समर्थन जताते हुए कहा कि बैंक की स्थापना देश के औद्योगिक विकास को मजबूत करने के उद्देश्य से की गई थी। उनके मुताबिक, सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक केवल व्यावसायिक संपत्ति नहीं, बल्कि देश के विकास और आम जनता की आर्थिक जरूरतों से जुड़े संस्थान हैं।

    राहुल ने कर्मचारियों के नाम एक खुला पत्र भी साझा किया। इसमें उन्होंने बैंक के वित्तीय प्रदर्शन का उल्लेख करते हुए दावा किया कि सात साल पहले IDBI बैंक घाटे में था, जबकि पिछले वित्त वर्ष में उसने 9,000 करोड़ रुपये से अधिक का मुनाफा कमाया। उन्होंने इस उपलब्धि का श्रेय बैंक कर्मचारियों की मेहनत को दिया। साथ ही सवाल उठाया कि जब बैंक मुनाफे में है तो उसे निजी हाथों में सौंपने की जरूरत क्यों पड़ रही है। उन्होंने कर्मचारियों की नौकरी, सेवा शर्तों और आरक्षण व्यवस्था को लेकर भी चिंता जताई।

    राहुल गांधी के आरोपों पर निर्मला सीतारमण ने जवाब देते हुए कांग्रेस के शासनकाल की बैंकिंग व्यवस्था पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि उस दौर में प्रभावशाली लोगों के लिए फोनबुक और आम नागरिकों के लिए रूलबुक जैसी व्यवस्था थी। वित्त मंत्री के अनुसार, राजनीतिक संपर्क और फोन कॉल के जरिए कर्ज दिलाने का दबाव बैंक अधिकारियों पर बनाया जाता था। उन्होंने दावा किया कि वर्तमान व्यवस्था में इस तरह के हस्तक्षेप को समाप्त किया गया है।

    सीतारमण ने अपने जवाब में बैंकिंग क्षेत्र से जुड़े कई पुराने मामलों का उल्लेख किया। इनमें 1957 का हरिदास मूंदड़ा-एलआईसी प्रकरण, 1976 में SBI के तत्कालीन चेयरमैन आरके तलवार को पद से हटाया जाना और संजय गांधी से जुड़े मारुति लोन मामले का जिक्र शामिल था। उन्होंने यूपीए शासनकाल में पवन कुमार बंसल से जुड़े कारोबार को केनरा बैंक से कर्ज दिलाने के आरोपों का भी उल्लेख किया।

    वित्त मंत्री ने IDBI बैंक की पुरानी वित्तीय स्थिति पर बात करते हुए वीडियोकॉन, विनसम, ABG शिपयार्ड और किंगफिशर जैसी कंपनियों को दिए गए कर्ज का हवाला दिया। उनके अनुसार, इन कंपनियों को दिए गए कई बड़े कर्ज बाद में फंस गए, जिससे बैंक को नुकसान उठाना पड़ा। उन्होंने दावा किया कि NDA सरकार ने बैंक को वित्तीय रूप से मजबूत बनाने के लिए 25,000 करोड़ रुपये से अधिक की पूंजी उपलब्ध कराई।

    प्रस्तावित सौदे के तहत केंद्र सरकार अपनी 30.48 प्रतिशत और भारतीय जीवन बीमा निगम यानी LIC अपनी 30.24 प्रतिशत हिस्सेदारी बेचेगी। इस तरह कुल 60.72 प्रतिशत हिस्सेदारी का हस्तांतरण होगा। सौदा पूरा होने के बाद केंद्र सरकार के पास 15 प्रतिशत और LIC के पास 19 प्रतिशत हिस्सेदारी बची रहेगी। दोनों की संयुक्त हिस्सेदारी घटकर 34 प्रतिशत रह जाएगी।

    सरकार ने 14 अक्टूबर को Fairfax की सहयोगी कंपनी 10955230 Canada Inc. को खरीदार के रूप में मंजूरी दी थी। वित्त मंत्रालय के अनुसार, दो स्वतंत्र एजेंसियों ने बैंक का मूल्यांकन किया था। उनका औसत उचित मूल्य 75.99 रुपये प्रति शेयर निकला, जबकि Fairfax ने 81 रुपये प्रति शेयर की बोली लगाई। सरकार का कहना है कि बोली मूल्यांकन से अधिक थी और पूरी प्रक्रिया निर्धारित नियमों के तहत पूरी की गई है।

    हालांकि, सौदे की कीमत, बैंक के निजीकरण और कर्मचारियों के भविष्य को लेकर विपक्ष तथा बैंक कर्मचारियों की चिंताएं बनी हुई हैं। अब इस प्रस्तावित विनिवेश पर सरकार और विपक्ष के बीच राजनीतिक बहस तेज हो गई है।

  • रेलवे में बदलती व्यवस्थाओं के खिलाफ कुलियों का बड़ा अभियान, निजीकरण पर उठे सवाल, संसद में मांगों के समर्थन में पहुंचेगा प्रतिनिधिमंडल

    रेलवे में बदलती व्यवस्थाओं के खिलाफ कुलियों का बड़ा अभियान, निजीकरण पर उठे सवाल, संसद में मांगों के समर्थन में पहुंचेगा प्रतिनिधिमंडल


    नई दिल्ली ।
    रेलवे में निजीकरण और बदलती परिचालन व्यवस्थाओं को लेकर राष्ट्रीय कुली मोर्चा ने अपनी चिंता सार्वजनिक रूप से व्यक्त की है। संगठन ने घोषणा की है कि संसद के आगामी मानसून सत्र के दौरान देशभर के कुली प्रतिनिधियों का एक प्रतिनिधिमंडल नई दिल्ली पहुंचकर केंद्र सरकार और विभिन्न सांसदों से मुलाकात करेगा। इस दौरान संगठन अपनी प्रमुख मांगों से संबंधित ज्ञापन सौंपेगा और कुलियों के रोजगार, सामाजिक सुरक्षा तथा रेलवे व्यवस्था में उनकी भूमिका को लेकर ठोस कदम उठाने की मांग करेगा।

    राष्ट्रीय कुली मोर्चा के अनुसार हाल ही में आयोजित वर्चुअल बैठक में यह निर्णय सर्वसम्मति से लिया गया। बैठक में विभिन्न राज्यों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया और रेलवे स्टेशनों पर बदलती व्यवस्थाओं के कारण कुलियों की आजीविका पर पड़ रहे प्रभाव को लेकर चिंता व्यक्त की। संगठन का कहना है कि रेलवे परिसरों में सामान ढुलाई से जुड़ी कई सेवाएं अब निजी एजेंसियों और नई व्यवस्थाओं के माध्यम से संचालित की जा रही हैं, जिससे पारंपरिक रूप से कार्यरत अधिकृत कुलियों के सामने रोजगार का संकट उत्पन्न हो रहा है।

    मोर्चा का कहना है कि रेलवे स्टेशनों पर बैटरी कार, ट्रॉली व्यवस्था और डिजिटल प्लेटफॉर्म आधारित सेवाओं के विस्तार से कुलियों के काम के अवसर लगातार प्रभावित हो रहे हैं। संगठन ने मांग की है कि ऐसी सेवाओं के संचालन में कुलियों की सहकारी समितियों को प्राथमिकता दी जाए, ताकि रोजगार के अवसर सुरक्षित रह सकें और पारंपरिक श्रमिकों की आय प्रभावित न हो। उनका तर्क है कि यदि इन व्यवस्थाओं का संचालन कुलियों के माध्यम से किया जाए तो आधुनिक सुविधाओं और रोजगार सुरक्षा के बीच संतुलन बनाया जा सकता है।

    संगठन ने यह भी मांग उठाई है कि रेलवे में कार्यरत अधिकृत कुलियों के लिए स्थायी सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था विकसित की जाए। इसके अंतर्गत आर्थिक सुरक्षा, कल्याणकारी योजनाओं का लाभ और भविष्य की रोजगार संबंधी स्पष्ट नीति तैयार करने की आवश्यकता बताई गई है। प्रतिनिधियों का कहना है कि वर्षों से रेलवे यात्रियों की सेवा करने वाले कुलियों के हितों की रक्षा के लिए दीर्घकालिक नीति बनाई जानी चाहिए।

    बैठक में यह मुद्दा भी उठाया गया कि कुलियों की जीवन परिस्थितियों और सरकारी नीतियों के प्रभाव का अध्ययन करने के लिए पूर्व में कराई गई जांच रिपोर्ट अब तक सार्वजनिक नहीं की गई है। संगठन ने मांग की है कि इस रिपोर्ट को संसद के मानसून सत्र के दौरान सदन के पटल पर रखा जाए, ताकि उसके निष्कर्षों के आधार पर आवश्यक नीतिगत निर्णय लिए जा सकें और कुलियों से जुड़े मुद्दों पर पारदर्शी चर्चा हो सके।

    राष्ट्रीय कुली मोर्चा ने अपने एक पदाधिकारी के खिलाफ कथित शिकायत के आधार पर हुई कार्रवाई पर भी आपत्ति जताई है। संगठन का कहना है कि इस विषय को भी रेल मंत्रालय के समक्ष उठाया जाएगा और निष्पक्ष जांच की मांग की जाएगी। मोर्चा का कहना है कि प्रतिनिधिमंडल सरकार के साथ संवाद के माध्यम से सभी मुद्दों का समाधान चाहता है।

    अब सभी की नजर संसद के मानसून सत्र पर रहेगी, जहां कुली प्रतिनिधिमंडल अपनी मांगों को सरकार और जनप्रतिनिधियों के समक्ष विस्तार से रखेगा। दूसरी ओर, इन मांगों पर सरकार की प्रतिक्रिया और संभावित नीतिगत निर्णयों का इंतजार किया जा रहा है।

  • सरकार की रणनीति में बदलाव के संकेत, IDBI Bank बिक्री प्रक्रिया दोबारा शुरू होने की संभावना से बाजार में जोश

    सरकार की रणनीति में बदलाव के संकेत, IDBI Bank बिक्री प्रक्रिया दोबारा शुरू होने की संभावना से बाजार में जोश

    नई दिल्ली । भारतीय बैंकिंग क्षेत्र में एक बार फिर बड़े बदलाव के संकेत दिखाई दे रहे हैं, जहां सरकार के स्वामित्व वाले IDBI Bank के निजीकरण को लेकर रुकी हुई प्रक्रिया फिर से गति पकड़ सकती है। इस संभावना की खबर सामने आने के बाद बाजार में निवेशकों की दिलचस्पी अचानक बढ़ गई और बैंक के शेयर में करीब 7 प्रतिशत तक की तेज़ी दर्ज की गई, जिससे स्टॉक ने इंट्राडे में नया उच्च स्तर छू लिया।

    सूत्रों के अनुसार सरकार IDBI Bank में अपनी बहुमत हिस्सेदारी बेचने की प्रक्रिया को नए सिरे से आगे बढ़ाने पर विचार कर रही है। इससे पहले इस डील को रोक दिया गया था क्योंकि शुरुआती दौर में मिली बोलियां अपेक्षित मूल्य से कम थीं, जिससे सरकार संतुष्ट नहीं थी। अब अधिकारियों द्वारा यह आकलन किया जा रहा है कि प्रक्रिया को अधिक आकर्षक और व्यवहारिक बनाने के लिए इसमें कुछ बदलाव किए जा सकते हैं, ताकि नए और मजबूत निवेशक इसमें रुचि दिखाएं।

    बताया जा रहा है कि सरकार इस बार बिक्री प्रक्रिया को सरल और निवेशकों के लिए अधिक लाभकारी बनाने के विकल्पों पर विचार कर रही है। इसमें बैंक के मूल्यांकन ढांचे में बदलाव और रिजर्व प्राइस को समायोजित करने जैसी संभावनाएं शामिल हैं, ताकि बोली लगाने वाले अधिक प्रतिस्पर्धी माहौल में भाग ले सकें। पहले चरण में मिली कमजोर प्रतिक्रिया के बाद यह माना जा रहा है कि नए सिरे से रणनीति बनाकर प्रक्रिया को फिर से शुरू किया जा सकता है।

    इस डील में IDBI Bank की हिस्सेदारी बिक्री लंबे समय से सरकार की बड़ी आर्थिक योजनाओं का हिस्सा रही है। सरकार लगातार अपने सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों में हिस्सेदारी घटाकर निजीकरण की दिशा में आगे बढ़ने की कोशिश कर रही है, लेकिन इस बैंक की बिक्री अब तक कई कारणों से पूरी नहीं हो पाई है। यदि यह सौदा सफल होता है तो यह हाल के वर्षों में बैंकिंग सेक्टर की सबसे बड़ी हिस्सेदारी बिक्री में से एक माना जाएगा।

    पहले इस प्रक्रिया में कई बड़े निवेशकों ने रुचि दिखाई थी, जिनमें अंतरराष्ट्रीय वित्तीय समूह भी शामिल थे, लेकिन कीमत और शर्तों को लेकर सहमति नहीं बन पाई थी। अब संभावना जताई जा रही है कि यदि प्रक्रिया दोबारा शुरू होती है तो इसमें नए निवेशकों को भी शामिल किया जा सकता है, हालांकि इसके लिए नियामकीय मंजूरी की आवश्यकता होगी, जिससे समय और बढ़ सकता है।

    बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की खबरों का सीधा असर बैंकिंग शेयरों पर पड़ता है और निवेशकों की उम्मीदें तुरंत बदल जाती हैं। IDBI Bank के शेयर में आई तेजी भी इसी सकारात्मक धारणा का परिणाम मानी जा रही है। हालांकि अंतिम फैसला प्रक्रिया की औपचारिक घोषणा और निवेश शर्तों पर निर्भर करेगा।