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  • बांग्लादेश चीन से J-10CE लड़ाकू विमान खरीदने की तैयारी में, रक्षा आधुनिकीकरण से बदलेगा क्षेत्रीय सामरिक संतुलन

    बांग्लादेश चीन से J-10CE लड़ाकू विमान खरीदने की तैयारी में, रक्षा आधुनिकीकरण से बदलेगा क्षेत्रीय सामरिक संतुलन


    नई दिल्ली ।
    बांग्लादेश अपनी वायुसेना की क्षमता बढ़ाने के लिए चीन निर्मित J-10CE मल्टीरोल लड़ाकू विमानों की खरीद की दिशा में आगे बढ़ रहा है। प्रस्तावित सौदे को देश के व्यापक रक्षा आधुनिकीकरण कार्यक्रम का हिस्सा बताया जा रहा है। इसके साथ ही अटैक हेलीकॉप्टर, वीआईपी हेलीकॉप्टर और ड्रोन प्रणालियां खरीदने की योजना पर भी काम चल रहा है।

    बांग्लादेश सरकार के अनुसार, J-10CE और अटैक हेलीकॉप्टरों से संबंधित प्रस्ताव पर खरीद समितियों ने मसौदा तैयार कर लिया है। अब इन दस्तावेजों को सशस्त्र बल प्रभाग और संबंधित मंत्रालयों से मंजूरी मिलने का इंतजार है। सरकार की योजना उपलब्ध वित्तीय संसाधनों के आधार पर खरीद को मौजूदा वित्तीय वर्ष में आगे बढ़ाने या अगले बजट में शामिल करने की है।

    J-10CE चीन का चौथी पीढ़ी का मल्टीरोल लड़ाकू विमान है। यह अलग-अलग प्रकार के हवाई अभियानों के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। बांग्लादेश की ओर से विमान की क्षमताओं और लागत को खरीद प्रक्रिया में महत्वपूर्ण आधार माना जा रहा है। सरकार का तर्क है कि समान श्रेणी के कुछ पश्चिमी लड़ाकू विमानों की तुलना में चीनी विकल्प अपेक्षाकृत कम लागत में उपलब्ध हो सकते हैं।

    बांग्लादेश के सूचना एवं प्रसारण सलाहकार जाहेद उर रहमान ने J-10CE के युद्ध प्रदर्शन का उल्लेख करते हुए भारत और पाकिस्तान के बीच हालिया सैन्य संघर्ष का हवाला दिया। हालांकि, किसी राफेल विमान को J-10CE द्वारा मार गिराए जाने की स्वतंत्र और आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। इस दावे को लेकर अलग-अलग विरोधाभासी बातें सामने आती रही हैं, इसलिए इसे प्रमाणित तथ्य के रूप में देखना उचित नहीं है।

    ढाका की प्रस्तावित खरीद केवल लड़ाकू विमानों तक सीमित नहीं है। सरकार अटैक हेलीकॉप्टर, वीआईपी परिवहन के लिए हेलीकॉप्टर और मानव रहित हवाई प्रणालियों यानी ड्रोन की क्षमता बढ़ाने पर भी विचार कर रही है। इसका उद्देश्य बांग्लादेश की वायुसेना और व्यापक सुरक्षा ढांचे को आधुनिक तकनीक से मजबूत करना बताया गया है।

    J-10CE की संभावित खरीद का क्षेत्रीय प्रभाव भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। बांग्लादेश भारत का पड़ोसी देश है और दोनों देशों के बीच लंबे समय से राजनीतिक, आर्थिक तथा सुरक्षा संबंध रहे हैं। ऐसे में ढाका की सैन्य खरीद में चीन की भूमिका बढ़ने पर दक्षिण एशिया के सामरिक समीकरणों पर चर्चा स्वाभाविक है।

    हालांकि, प्रस्तावित खरीद को अभी अंतिम सौदा नहीं माना जा सकता। मसौदा समझौतों को विभिन्न सरकारी स्तरों पर मंजूरी की प्रक्रिया से गुजरना है। इसके बाद ही विमान और अन्य रक्षा उपकरणों की वास्तविक खरीद, संख्या, कीमत तथा आपूर्ति से जुड़ी शर्तें स्पष्ट हो सकेंगी।

    बांग्लादेश सरकार इस रक्षा योजना को अपनी रणनीतिक निर्णय क्षमता से भी जोड़ रही है। सरकार के प्रतिनिधियों का कहना है कि देश अब अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर विदेश और रक्षा नीति से जुड़े फैसले लेने पर अधिक जोर दे रहा है। इसी संदर्भ में चीन से लड़ाकू विमान खरीदने की चर्चा को स्वतंत्र रणनीतिक विकल्प के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है।

    J-10CE सौदा आगे बढ़ता है तो यह बांग्लादेश की वायुसेना के आधुनिकीकरण में महत्वपूर्ण कदम हो सकता है। हालांकि इसकी वास्तविक सामरिक उपयोगिता विमान की संख्या, हथियार प्रणाली, प्रशिक्षण, रखरखाव और परिचालन क्षमता पर निर्भर करेगी। फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि ढाका ने खरीद प्रक्रिया को औपचारिक स्तर पर आगे बढ़ा दिया है और संबंधित प्रस्ताव मंजूरी के चरण में पहुंच चुके हैं।

  • पीएम-आशा से किसानों को उपज का बेहतर मूल्य, डिजिटल खरीद व्यवस्था ने बढ़ाई पारदर्शिता और भुगतान प्रक्रिया की रफ्तार

    पीएम-आशा से किसानों को उपज का बेहतर मूल्य, डिजिटल खरीद व्यवस्था ने बढ़ाई पारदर्शिता और भुगतान प्रक्रिया की रफ्तार

    नई दिल्ली ।केंद्र सरकार की प्रधानमंत्री अन्नदाता आय संरक्षण अभियान यानी पीएम-आशा योजना किसानों को उनकी कृषि उपज का बेहतर मूल्य दिलाने और मजबूरी में कम कीमत पर बिक्री रोकने के उद्देश्य से संचालित की जा रही है। योजना के तहत खरीद व्यवस्था, मूल्य स्थिरीकरण और बाजार हस्तक्षेप को मजबूत करने के साथ किसानों तक सरकारी समर्थन पहुंचाने पर जोर दिया गया है।

    पीएम-आशा के अंतर्गत दलहन, तिलहन और खोपरा जैसी प्रमुख कृषि उपज की समय पर खरीद सुनिश्चित करने के लिए विभिन्न स्तरों पर व्यवस्थाओं का विस्तार किया गया है। किसानों को स्थानीय स्तर पर अपनी उपज बेचने में सुविधा मिले, इसके लिए अतिरिक्त खरीद केंद्र स्थापित किए गए हैं। इससे बाजार तक पहुंच बढ़ाने और बिक्री प्रक्रिया को आसान बनाने में मदद मिली है।

    योजना की खरीद व्यवस्था में नाफेड और राष्ट्रीय सहकारी उपभोक्ता संघ जैसी संस्थाओं की महत्वपूर्ण भूमिका है। इन संस्थाओं के माध्यम से किसानों से निर्धारित व्यवस्था के तहत उपज खरीदी जाती है। इसका उद्देश्य बाजार में कीमतों के दबाव के समय किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य का लाभ उपलब्ध कराना और उन्हें तत्काल कम कीमत पर उपज बेचने से बचाना है।

    सरकार ने पीएम-आशा की खरीद प्रक्रिया में तकनीक के इस्तेमाल को भी बढ़ाया है। आधार आधारित प्रमाणीकरण के साथ ई-एनएएम, ई-समृद्धि और ई-सम्युक्ति जैसे डिजिटल मंचों का उपयोग खरीद और भुगतान व्यवस्था को अधिक पारदर्शी बनाने के लिए किया जा रहा है। डिजिटल प्रणाली से किसानों की पहचान, खरीद संबंधी रिकॉर्ड और भुगतान प्रक्रिया को व्यवस्थित करने में सहायता मिल रही है।

    कृषि क्षेत्र में भंडारण और अन्य बुनियादी सुविधाओं को मजबूत करने के लिए कृषि अवसंरचना कोष का समर्थन भी योजना की प्रभावशीलता बढ़ाने में उपयोगी माना गया है। खरीद केंद्रों और कृषि ढांचे के विस्तार से किसानों को अपनी उपज के लिए बेहतर बाजार विकल्प उपलब्ध कराने की कोशिश की जा रही है।

    पीएम-आशा के लिए बजटीय प्रावधान में भी वृद्धि दर्ज की गई है। वर्ष 2024-25 में योजना के तहत वास्तविक व्यय 5,437.99 करोड़ रुपये रहा। वर्ष 2025-26 में इसका बजट बढ़ाकर 6,941.36 करोड़ रुपये किया गया, जबकि 2026-27 के लिए 7,200 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। बढ़ता आवंटन किसानों की आय सुरक्षा और कृषि मूल्य समर्थन व्यवस्था को मजबूत करने की प्राथमिकता को दर्शाता है।

    फसल उत्पादन लागत और न्यूनतम समर्थन मूल्य के बीच अंतर भी किसानों के लिए मूल्य सुरक्षा के महत्व को स्पष्ट करता है। वर्ष 2026-27 में सामान्य धान की उत्पादन लागत 1,627 रुपये प्रति क्विंटल बताई गई है, जबकि एमएसपी 2,441 रुपये प्रति क्विंटल है। इस तरह दोनों के बीच 814 रुपये प्रति क्विंटल का अंतर है।

    पीली सोयाबीन के मामले में उत्पादन लागत 3,805 रुपये प्रति क्विंटल और एमएसपी 5,708 रुपये प्रति क्विंटल है। इसके अलावा गेहूं की उत्पादन लागत 1,239 रुपये प्रति क्विंटल के मुकाबले एमएसपी 2,585 रुपये प्रति क्विंटल निर्धारित है।

    जूट के लिए उत्पादन लागत 3,662 रुपये प्रति क्विंटल बताई गई है, जबकि एमएसपी 5,925 रुपये प्रति क्विंटल है। इस आधार पर दोनों के बीच 2,293 रुपये प्रति क्विंटल का अंतर बनता है। सरकार की कोशिश है कि खरीद व्यवस्था, डिजिटल निगरानी और बाजार हस्तक्षेप के माध्यम से किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य मिले तथा कृषि बाजार में पारदर्शिता और स्थिरता को और मजबूत किया जा सके।

  • अपनी मांगों को लेकर भोपाल पहुंचे किसान, सड़क पर बनाई दाल-बाटी, सीएम हाउस का घेराव करने पर अड़े

    अपनी मांगों को लेकर भोपाल पहुंचे किसान, सड़क पर बनाई दाल-बाटी, सीएम हाउस का घेराव करने पर अड़े


    भोपाल। मध्य प्रदेश में मूंग की फसल की न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर पूरी खरीदी की मांग को लेकर किसानों का आंदोलन तेज हो गया है। नर्मदापुरम, हरदा, सीहोर, रायसेन, विदिशा समेत मालवा और नर्मदापुरम संभाग के 19 किसान संगठनों के बैनर तले हजारों किसान भोपाल पहुंच गए हैं। प्रदर्शनकारी वीर सावरकर सेतु पर डटे हुए हैं, जहां उन्होंने सड़क किनारे कंडों पर दाल-बाटी बनाकर अपना विरोध दर्ज कराया।

    किसानों का कहना है कि लंबा आंदोलन जारी रखने के लिए वे अपने साथ भोजन की पूरी व्यवस्था लेकर आए हैं। सड़क किनारे कंडों पर बाटियां सेंकी जा रही हैं और दाल तैयार की जा रही है। प्रदर्शनकारियों ने केंद्रीय कृषि मंत्री Shivraj Singh Chouhan और मुख्यमंत्री Mohan Yadav को भी दाल-बाटी खाने का आमंत्रण दिया है।

    किसानों के आंदोलन को देखते हुए कलेक्टर ने नर्मदापुरम रोड स्थित सभी सरकारी और निजी स्कूलों में आज अवकाश घोषित किया है। कलेक्टर के आदेश के बाद क्षेत्र के सभी स्कूल आज बंद रहेंगे। किसानों का बुधवार को मुख्यमंत्री निवास की ओर कूच करने का दावा है। किसान मूंग की 100% सरकारी खरीद और खाद वितरण व्यवस्था में सुधार की मांग को लेकर भोपाल पहुंचे हैं। किसान नेताओं का कहना है कि वे मुख्यमंत्री निवास के सामने धरना देंगे और मांगें पूरी होने तक वापस नहीं लौटेंगे।

    ट्रैक्टर-ट्रॉली ही बना ठिकाना
    आंदोलन में शामिल किसान ट्रैक्टर-ट्रॉलियों में ही भोजन, बिस्तर और जरूरी सामान लेकर आए हैं। उनका कहना है कि पुलिस जहां रोकेगी या रात जहां होगी, वहीं ट्रॉली में रुक जाएंगे, लेकिन मांगें पूरी होने तक वापस नहीं लौटेंगे। आंदोलन के चलते भोपाल-नागपुर मार्ग पर यातायात भी प्रभावित हुआ है।

    सरकार ने बातचीत का दिया भरोसा
    किसान कल्याण एवं कृषि विकास मंत्री ऐदल सिंह कंसाना ने मंत्रालय में किसान प्रतिनिधियों से मुलाकात कर उनकी मांगों पर चर्चा की। उन्होंने कहा कि मूंग खरीदी सहित किसानों के सभी मुद्दों पर सकारात्मक विचार किया जा रहा है और सरकार किसानों के हितों के प्रति प्रतिबद्ध है।

    क्या है किसानों की मुख्य मांग?
    किसान संगठनों का आरोप है कि सरकार की मौजूदा नीति के तहत प्रति एकड़ केवल 1 क्विंटल 20 किलो मूंग ही समर्थन मूल्य पर खरीदी जा रही है, जबकि एक एकड़ में औसतन 4 से 5 क्विंटल उत्पादन होता है। सरकार ने मूंग का MSP ₹8,668 प्रति क्विंटल तय किया है।

    खुले बाजार में भारी नुकसान
    खरीदी की सीमा तय होने के कारण किसानों को बची हुई उपज खुले बाजार में ₹4,000 से ₹5,500 प्रति क्विंटल के भाव पर बेचनी पड़ रही है। किसानों का दावा है कि इससे उन्हें हर क्विंटल पर ₹3,000 से ₹4,000 तक का नुकसान उठाना पड़ रहा है।

    हनुमान चालीसा के साथ शुरू हुआ मार्च
    संयुक्त किसान मोर्चा के नेतृत्व में आंदोलन की शुरुआत नर्मदापुरम के सेठानी घाट पर धरना और हनुमान चालीसा के पाठ से हुई। तिरंगा हाथ में लेकर और “जय जवान, जय किसान” के नारे लगाते हुए किसान बुधनी होते हुए भोपाल पहुंचे। रास्ते में प्रशासन ने किसानों को समझाने का प्रयास किया, लेकिन बातचीत से कोई समाधान नहीं निकल सका।

  • जीईएम ने बदली सरकारी खरीद की तस्वीर, 10 साल में 400 करोड़ से 5 लाख करोड़ रुपए तक पहुंचा कारोबार: सीईओ मिहिर कुमार

    जीईएम ने बदली सरकारी खरीद की तस्वीर, 10 साल में 400 करोड़ से 5 लाख करोड़ रुपए तक पहुंचा कारोबार: सीईओ मिहिर कुमार

    नई दिल्ली । सरकारी खरीद व्यवस्था में पारदर्शिता, दक्षता और समावेशिता को बढ़ावा देने के उद्देश्य से शुरू किया गया सरकारी ई-मार्केटप्लेस (जीईएम) आज देश की सबसे महत्वपूर्ण डिजिटल पहलों में से एक बन चुका है। पिछले एक दशक में इस प्लेटफॉर्म ने सरकारी खरीद की पारंपरिक व्यवस्था को बदलते हुए कारोबार, प्रतिस्पर्धा और उद्यमिता के क्षेत्र में उल्लेखनीय बदलाव दर्ज किए हैं। जीईएम के मुख्य कार्यकारी अधिकारी मिहिर कुमार के अनुसार, जिस प्लेटफॉर्म का कारोबार शुरुआती वर्ष में केवल 400 से 422 करोड़ रुपये के आसपास था, वह आज बढ़कर 5 लाख करोड़ रुपये से अधिक के स्तर तक पहुंच चुका है।

    जीईएम की स्थापना वर्ष 2016 में सरकारी खरीद प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी और तकनीक आधारित बनाने के उद्देश्य से की गई थी। इसके माध्यम से विक्रेताओं का पंजीकरण, उत्पाद सूचीकरण, निविदा प्रक्रिया, ऑर्डर प्रबंधन, आपूर्ति और भुगतान जैसी सभी प्रक्रियाएं पूरी तरह डिजिटल माध्यम से संचालित की जाती हैं। इससे सरकारी विभागों और आपूर्तिकर्ताओं दोनों के लिए प्रक्रियाएं अधिक सरल और तेज हुई हैं।

    प्लेटफॉर्म की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक सूक्ष्म और लघु उद्यमों की बढ़ती भागीदारी रही है। सरकारी नीति के अनुसार सार्वजनिक खरीद का कम से कम 25 प्रतिशत हिस्सा एमएसई क्षेत्र से किया जाना चाहिए, लेकिन जीईएम पर यह हिस्सा लगभग 45 प्रतिशत तक पहुंच चुका है। इससे हजारों छोटे कारोबारियों और उद्यमियों को सीधे सरकारी बाजार तक पहुंच बनाने का अवसर मिला है।

    जीईएम के माध्यम से केवल कारोबार का विस्तार ही नहीं हुआ, बल्कि विभिन्न सामाजिक और आर्थिक वर्गों की भागीदारी भी बढ़ी है। महिला उद्यमियों ने इस मंच का व्यापक लाभ उठाया है। शुरुआती वर्षों में जहां महिला स्वामित्व वाले उद्यमों से होने वाला कारोबार सीमित स्तर पर था, वहीं अब यह कई हजार करोड़ रुपये तक पहुंच चुका है। इससे महिला उद्यमिता को नई गति मिली है और सरकारी खरीद प्रक्रिया में उनकी भागीदारी मजबूत हुई है।

    स्टार्टअप पारिस्थितिकी तंत्र को भी जीईएम से बड़ा लाभ मिला है। एक दशक पहले जहां बहुत कम स्टार्टअप इस प्लेटफॉर्म से जुड़े थे, वहीं अब हजारों स्टार्टअप्स सरकारी खरीद प्रक्रिया का हिस्सा बन चुके हैं। इनके माध्यम से होने वाला कारोबार भी उल्लेखनीय रूप से बढ़ा है। इससे नवाचार आधारित कंपनियों को सरकारी संस्थानों तक अपनी सेवाएं और उत्पाद पहुंचाने का अवसर प्राप्त हुआ है।

    अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति वर्ग से जुड़े उद्यमों की भागीदारी में भी महत्वपूर्ण वृद्धि दर्ज की गई है। सरकार की समावेशी विकास नीति के अनुरूप जीईएम ने उन वर्गों को भी बाजार उपलब्ध कराया है जिन्हें पहले सरकारी खरीद प्रणाली में अपेक्षाकृत कम अवसर मिलते थे। इससे आर्थिक सशक्तिकरण और उद्यमिता को बढ़ावा मिला है।

    स्वास्थ्य क्षेत्र में भी जीईएम ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। विभिन्न सार्वजनिक स्वास्थ्य अभियानों के लिए बड़ी मात्रा में वैक्सीन, सिरिंज, चिकित्सा उपकरण और अन्य आवश्यक सामग्री की खरीद इसी मंच के माध्यम से की गई। इसके अलावा रेलवे, शिक्षा, प्रशासन और अन्य सरकारी क्षेत्रों की आवश्यकताओं की पूर्ति में भी प्लेटफॉर्म की भूमिका लगातार बढ़ती गई है।

    तकनीकी दृष्टि से भी जीईएम लगातार विकसित हुआ है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित विश्लेषण, डिजिटल मॉनिटरिंग, ऑनलाइन नीलामी और डेटा आधारित निर्णय प्रक्रिया ने खरीद व्यवस्था को अधिक पारदर्शी और जवाबदेह बनाया है। इससे मानव हस्तक्षेप में कमी आई है और खरीद प्रक्रिया की विश्वसनीयता बढ़ी है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि जीईएम ने केवल सरकारी खरीद को डिजिटल नहीं बनाया, बल्कि कारोबार करने में आसानी को भी नई मजबूती प्रदान की है। ऑनलाइन पंजीकरण, पारदर्शी बोली प्रणाली और डिजिटल अनुबंध प्रबंधन ने छोटे और बड़े सभी व्यवसायों के लिए सरकारी बाजार तक पहुंच को सरल बनाया है। विकसित भारत के लक्ष्य की दिशा में यह मंच अब देश की डिजिटल अर्थव्यवस्था और सार्वजनिक खरीद प्रणाली का एक महत्वपूर्ण आधार बनकर उभर रहा है।

  • पुतिन भारत दौरे पर रवाना: शाम को PM मोदी देंगे प्राइवेट डिनर; S-400 खरीद पर हो सकता है बड़ा समझौता, पाकिस्तानी जेट गिराने में है सक्षम

    पुतिन भारत दौरे पर रवाना: शाम को PM मोदी देंगे प्राइवेट डिनर; S-400 खरीद पर हो सकता है बड़ा समझौता, पाकिस्तानी जेट गिराने में है सक्षम


    नई दिल्ली। भारत और रूस के बीच कल शुक्रवार को 9 अहम समझौतों पर हस्ताक्षर हो सकते हैं जिसमें रक्षा सौदे प्रमुख होंगेभारत रूस से और ज्यादा S-400 मिसाइल डिफेंस सिस्टम खरीदने पर डील कर सकता है।’ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान S-400 ने कई पाकिस्तानी जेट्स मार गिराए थे, जिसने भारत के लिए गेमचेंजर का काम किया।इसके अपडेटेड वर्जन S-500 को खरीदने को लेकर भी बातचीत हो सकती है।पुतिन के दौरे से ठीक पहले, भारत ने रूस से करीब 2 अरब डॉलर में परमाणु-संचालित अटैक सबमरीन पनडुब्बी 10 साल की लीज पर लेने की डील लगभग फाइनल कर ली है। यह सबमरीन भारतीय नौसैनिकों को ट्रेनिंग देने में मदद करेगी।
    रणनीतिक स्वायत्तता की असली परीक्षा
    पुतिन का यह दौरा ऐसे समय में हो रहा है जब पीएम मोदी अपनी वैश्विक भूमिका को मजबूत करना चाहते हैं, लेकिन भारत-अमेरिका संबंध ट्रम्प प्रशासन के लौटने के बाद सबसे खराब दौर में चले गए हैं।भारत की रणनीति रही है कि वह रूस को छोड़े नहीं और पश्चिमी देशों को भी नाराज न करे। मोदी के लिए यह संतुलन साधना अहम हैट्रम्प के लौटने के बाद भारत-अमेरिका के बीच टैरिफ का मामला अभी भी अटका हुआ है, ऐसे में पुतिन का दौरा मोदी की रणनीतिक स्वतंत्रता की असली परीक्षा है। भारत को यह दिखाना होगा कि वह पुतिन का भरोसेमंद साझेदार है, लेकिन अमेरिका और यूरोप को भी पूरी तरह नाराज नहीं कर रहा है।

    रूस का दबदबा घटा, पर अभी भी सबसे बड़ा सप्लायर

    पिछले दस साल में भारत ने अमेरिका और फ्रांस जैसे देशों के साथ रक्षा सहयोग बढ़ाया है, जिससे हथियारों की सप्लाई में रूस की हिस्सेदारी घटकर लगभग 36% रह गई है SIPRI रिपोर्ट। हालांकि, रूस अभी भी भारत का सबसे बड़ा हथियार सप्लायर बना हुआ है, खासकर न्यूक्लियर सबमरीन, मिसाइल डिफेंस और विशेष तकनीक जैसे बड़े डिफेंस सिस्टम के लिए।

    2030 तक $100 अरब ट्रेड का लक्ष्य

    पुतिन दो दिवसीय दौरे पर 23वीं भारत-रूस समिट में भाग लेंगे, जिसका मुख्य लक्ष्य 2030 तक दोनों देशों के बीच व्यापार को 100 अरब डॉलर तक ले जाना है।एनर्जी, इन्वेस्टमेंट, तकनीक और इंडस्ट्री।भारत रूस की मदद से कुडनकुलम  तमिलनाडु में न्यूक्लियर पावर प्लांट चला रहा है। इस प्रोजेक्ट को आगे बढ़ाने पर भी बात होगी।

    इंडियन वर्कर्स के लिए रूस में नौकरी और पेमेंट सिस्टम पर बात

    पुतिन के साथ 7 मंत्री और रूसी सेंट्रल बैंक के गवर्नर भी आ रहे हैं। इस दौरान दो बड़े मुद्दों पर बात हो सकती हैरूस में वर्कर्स की कमी के कारण, रूस चाहता है कि भारत से तकनीकी विशेषज्ञ, मेडिकल स्टाफ, इंजीनियर आदि आएं। भारत से 10 लाख स्किल्ड वर्कर्स को रूस में रोजगार देने के लिए मोबिलिटी पैक्ट हो सकता है।
    अमेरिका और यूरोपीय दबाव के कारण रूस से सस्ता क्रूड ऑयल खरीदने के पेमेंट में आ रही दिक्कतों को दूर करने के लिए, रुपया-रूबल ट्रेड, डिजिटल भुगतान या किसी तीसरे देश के बैंक का इस्तेमाल जैसे नए पेमेंट सिस्टम बनाने पर सहमति बन सकती हैरूस, भारत को आर्कटिक रीजन की एनर्जी परियोजनाओं में निवेश का मौका भी दे सकता है।

    पुतिन करेंगे ज़्यादा तेल खरीद की डिमांड

    यूक्रेन युद्ध के बाद भारत की रूस से तेल खरीद 2.5% से बढ़कर 35% हो गई थी, लेकिन अमेरिका के टैरिफ लगाने के बाद भारत ने यह खरीद कम कर दी। रिपोर्ट के मुताबिक, पुतिन चाहते हैं कि भारत दोबारा बढ़-चढ़कर रूसी तेल खरीदे, जो दोनों देशों के व्यापार संतुलन के लिए अहम है।पुतिन दिल्ली के ITC मौर्य होटल में रुकेंगे, और दोनों नेताओं के बीच कई दौर की बातचीत होगी।