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  • पूर्व अभिनेत्री सोमी अली ने बयां किया बचपन का गहरा मानसिक आघात; चार साल की उम्र से ही घर के भीतर हुईं गंभीर उत्पीड़न का शिकार

    पूर्व अभिनेत्री सोमी अली ने बयां किया बचपन का गहरा मानसिक आघात; चार साल की उम्र से ही घर के भीतर हुईं गंभीर उत्पीड़न का शिकार

    नई दिल्ली । मनोरंजन जगत की कई जानी-मानी हस्तियां समय-समय पर अपने जीवन के ऐसे अनसुने और संवेदनशील पहलुओं को उजागर करती हैं, जो न केवल समाज को झकझोर देते हैं बल्कि सुरक्षा और सामाजिक मानसिकता पर भी बड़े सवाल खड़े करते हैं। इसी क्रम में, पूर्व बॉलीवुड अभिनेत्री सोमी अली का एक नवीनतम साक्षात्कार इन दिनों व्यापक चर्चा में है। उन्होंने अपने बचपन के दौरान घरेलू परिवेश में झेले गए गंभीर शारीरिक और मानसिक उत्पीड़न को लेकर कई अत्यंत दुखद और चौंकाने वाले खुलासे किए हैं। सोमी अली ने स्पष्ट किया कि मात्र चार वर्ष की कोमल आयु से ही वह अपने ही घर के घरेलू सहायकों द्वारा निरंतर यौन शोषण और प्रताड़ना का शिकार होती रहीं, जिसका गहरा मानसिक आघात वह आज भी महसूस करती हैं।

    अपने हर विचार को बिना किसी झिझक के साझा करने के लिए पहचानी जाने वाली सोमी अली ने एक हालिया साक्षात्कार में बाल शोषण की इस वीभत्स हकीकत पर विस्तार से बात की। उन्होंने बताया कि यह दर्दनाक सिलसिला तब शुरू हुआ जब वह महज चार वर्ष की थीं। इसके बाद, जब वह पांच वर्ष की हुईं, तो उनके घर के मुख्य रसोइए (खानसामे) ने उनके साथ कई बार अनैतिक और गंदी हरकतें कीं। यहीं पर यह ज्यादती नहीं रुकी, बल्कि जब वह नौ वर्ष की आयु में पहुंचीं, तो घर की सुरक्षा में तैनात सुरक्षाकर्मियों ने उन्हें बहला-फुसफुसाकर सर्वेंट क्वार्टर में ले जाकर शारीरिक रूप से गंभीर प्रताड़ना दी। इन घटनाओं ने उनके बाल मन को बुरी तरह झकझोर कर रख दिया था।

    इस दर्दनाक घटनाक्रम के दौरान पारिवारिक प्रतिक्रिया और प्रशासनिक या कानूनी कार्रवाई के अभाव पर बात करते हुए पूर्व अभिनेत्री ने बताया कि उस दौर में उनके पिता एक संपन्न फिल्म निर्माता, निर्देशक और वितरक थे और उनका परिवार एक भव्य बहुमंजिला इमारत में निवास करता था। जब उन्होंने पहली बार अपनी मां के माध्यम से और बाद में इंटरकॉम पर अपने पिता को रसोइए अब्दुल द्वारा चूजे दिखाने के बहाने कमरे में ले जाकर तीन बार की गई इस हैवानियत के बारे में सूचित किया, तो उनके पिता ने आरोपी को कानूनी रूप से पुलिस के हवाले करने के बजाय एक अनुचित और हिंसक मार्ग चुना।

    सोमी अली के अनुसार, उनके पिता ने आरोपी रसोइए को अन्य कर्मचारियों के माध्यम से सेट पर ही अत्यधिक लहूलुहान होने तक पिटवाया और बिना किसी पुलिस शिकायत के नौकरी से निष्कासित कर दिया। एक पांच वर्ष की अबोध बच्ची के लिए अपने सामने इस प्रकार का अत्यधिक खून-खराबा और मारपीट देखना एक अन्य गहरे मनोवैज्ञानिक आघात (ट्रॉमा) का कारण बन गया। इससे भी अधिक दुखद स्थिति तब उत्पन्न हुई जब नौ वर्ष की आयु में उनके साथ दोबारा ऐसी ही घटना घटी और उनकी माता ने इस विषय पर वैधानिक कार्रवाई करने के स्थान पर उन्हें लोकलाज के डर से पूरी तरह चुप रहने की नसीहत दे डाली।

    साक्षात्कार के दौरान सोमी अली ने भारतीय और दक्षिण एशियाई समाज की इस रूढ़िवादी और शोषक मानसिकता पर गहरा क्षोभ और दुख व्यक्त किया, जहां पीड़ित बच्ची को ही यह कहकर चुप करा दिया जाता है कि यदि समाज को इस सच का पता चला तो भविष्य में कोई उससे विवाह नहीं करेगा। उन्होंने कहा कि माता-पिता का यह सुरक्षाहीन रवैया और सामाजिक दृष्टिकोण बच्चों के मानसिक विकास पर अत्यंत विनाशकारी प्रभाव डालता है। अपने इस सच को सार्वजनिक करने के पीछे उनका मुख्य उद्देश्य समाज में बाल सुरक्षा के प्रति चेतना जागृत करना और पीड़ित बच्चों को अपनी आवाज उठाने के लिए प्रेरित करना है, ताकि भविष्य में कोई अन्य बच्चा इस प्रकार के एकाकी संघर्ष और आघात से न गुजरे।

  • प्यार से हत्या तक क्यों पहुंच रहे रिश्ते एक्सपर्ट ने बताए बदलते समाज और मानसिक तनाव के चौंकाने वाले कारण

    प्यार से हत्या तक क्यों पहुंच रहे रिश्ते एक्सपर्ट ने बताए बदलते समाज और मानसिक तनाव के चौंकाने वाले कारण


    भोपाल । बीते कुछ समय में सामने आए कई चर्चित मामलों ने समाज को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या पति पत्नी और प्रेम संबंधों में हिंसा का स्वरूप पहले से अधिक खतरनाक होता जा रहा है। मध्य प्रदेश सहित देश के अलग अलग हिस्सों में सामने आए हत्या और गंभीर अपराधों के मामलों ने रिश्तों में बढ़ते तनाव और मानसिक असंतुलन को लेकर नई बहस छेड़ दी है। विशेषज्ञों का मानना है कि बदलती सामाजिक परिस्थितियां संवाद की कमी सोशल मीडिया का बढ़ता प्रभाव और विवाहेतर संबंधों से उपजा तनाव कई बार लोगों को हिंसक सोच की ओर धकेल देता है। हालांकि वे यह भी स्पष्ट करते हैं कि किसी अपराध को केवल महिला या पुरुष अथवा मानसिक बीमारी से जोड़कर देखना पूरी तरह गलत और वैज्ञानिक दृष्टि से अनुचित होगा।

    भोपाल के मनोचिकित्सक डॉ. सत्यकांत त्रिवेदी के अनुसार पिछले सात से आठ वर्षों में पुरुषों के साथ मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना से जुड़े मामलों में लगभग साठ से सत्तर प्रतिशत तक वृद्धि दर्ज की गई है। पहले जहां गंभीर आक्रामकता या हत्या जैसे विचारों के साथ महीने में एक या दो मरीज इलाज के लिए आते थे वहीं अब हर महीने पांच से दस ऐसे मामले सामने आ रहे हैं। इनमें केवल शारीरिक हिंसा ही नहीं बल्कि मानसिक प्रताड़ना और रिश्तों में लगातार बढ़ता तनाव भी प्रमुख कारण बनकर उभर रहा है।

    विशेषज्ञ बताते हैं कि उनके पास आने वाले कई मामलों में मरीज स्वयं स्वीकार करते हैं कि उनके मन में अपने जीवनसाथी को नुकसान पहुंचाने या हत्या करने जैसे विचार आते हैं। एक मामले में युवा महिला ने चिकित्सकों को बताया कि उसे डर है कहीं वह अपने पति की हत्या न कर दे। जांच में सामने आया कि लंबे समय से वह अपनी भावनाएं व्यक्त नहीं कर पा रही थी और व्यक्तित्व संबंधी समस्याओं से भी जूझ रही थी। उपचार और कपल काउंसलिंग के बाद उसकी स्थिति में सुधार आया और हिंसक विचार समाप्त हो गए।

    एक अन्य मामले में एक व्यक्ति ने स्वीकार किया कि उसके मन में कई बार पत्नी की हत्या कर जेल जाने तक के विचार आते थे। जांच में उसमें डिप्रेशन और पर्सनैलिटी डिसऑर्डर जैसी मानसिक समस्याएं सामने आईं। विशेषज्ञों ने उसके मानसिक उपचार और व्यवहार नियंत्रण पर काम किया जिसके बाद उसकी स्थिति में सुधार देखा गया।

    डॉ. त्रिवेदी का कहना है कि सोशल मीडिया ने लोगों की अपेक्षाएं और तुलना की प्रवृत्ति बढ़ा दी है। संयुक्त परिवारों की जगह न्यूक्लियर फैमिली का चलन बढ़ने से भावनात्मक सहारा कम हुआ है। इसके साथ ही रिश्तों में संवाद की कमी और विवाहेतर संबंधों से पैदा होने वाला अविश्वास कई बार मानसिक दबाव को बढ़ा देता है। मनोरंजन के बदलते स्वरूप का भी असर देखने को मिल रहा है जहां अपराध करने वाले किरदारों को भी नायक के रूप में प्रस्तुत किया जाता है जिससे कुछ लोगों की सोच प्रभावित होती है।

    हालांकि विशेषज्ञ इस बात पर विशेष जोर देते हैं कि मानसिक बीमारी से जूझ रहे अधिकांश लोग कभी हिंसक नहीं होते। किसी भी अपराध को केवल मानसिक रोग या किसी एक लिंग से जोड़कर देखना उचित नहीं है। यदि रिश्तों में लगातार तनाव गुस्सा अवसाद या हिंसक विचार महसूस हों तो समय रहते मनोवैज्ञानिक या मनोचिकित्सक की मदद लेना बेहद जरूरी है। सही समय पर काउंसलिंग और उपचार न केवल रिश्तों को बचा सकता है बल्कि किसी बड़ी और दुखद घटना को भी टाल सकता है।

  • राजा बेटा कहकर पाल रहे हैं तो सावधान भारतीय पेरेंटिंग की यह आदत बहुओं और समाज पर डाल रही बोझ

    राजा बेटा कहकर पाल रहे हैं तो सावधान भारतीय पेरेंटिंग की यह आदत बहुओं और समाज पर डाल रही बोझ

    नई दिल्ली :भारतीय परिवारों में राजा बेटा शब्द अक्सर प्यार और गर्व के साथ बोला जाता है। मां बाप को लगता है कि बेटे को हर सुविधा देना और हर जिम्मेदारी से दूर रखना उनका फर्ज है। लेकिन मनोवैज्ञानिक अब चेतावनी दे रहे हैं कि यही सोच आगे चलकर बच्चों खासकर बेटों के भविष्य के लिए खतरनाक साबित हो सकती है। इस व्यवहार को विशेषज्ञ राजा बेटा सिंड्रोम का नाम दे रहे हैं।

    मनोवैज्ञानिकों के अनुसार राजा बेटा सिंड्रोम कोई मेडिकल बीमारी नहीं बल्कि एक व्यवहारिक स्थिति है। यह तब विकसित होती है जब माता पिता बेटे से कभी जवाबदेही की उम्मीद नहीं करते। उसे घर के कामों से दूर रखा जाता है। उसकी गलतियों को यह कहकर टाल दिया जाता है कि वह अभी बच्चा है। नतीजा यह होता है कि उम्र बढ़ने के साथ शरीर तो बड़ा हो जाता है लेकिन मानसिक परिपक्वता विकसित नहीं हो पाती।

    सोशल मीडिया पर साइकोलॉजिस्ट स्नोई राही का एक वीडियो इन दिनों चर्चा में है। इस वीडियो में उन्होंने इस सिंड्रोम की जड़ पर सीधा प्रहार किया है। उन्होंने एक असल अनुभव साझा करते हुए बताया कि वह एक घर में गईं जहां एक पूरी तरह वयस्क बेटा सोफे पर लेटा हुआ था। न उसने मेहमान का अभिवादन किया और न ही अपनी जगह से हिला। मां ने प्यार से उसके सिर को चूमा तो उसका जवाब था कि उसे गेम खेलने दिया जाए। यह दृश्य बताता है कि कैसे जरूरत से ज्यादा लाड़ प्यार सम्मान और जिम्मेदारी की भावना को खत्म कर देता है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि राजा बेटा सिंड्रोम का सबसे गहरा असर शादी के बाद सामने आता है। ऐसे पुरुष शादी के बाद भी अपने रोजमर्रा के कामों के लिए पत्नी पर निर्भर रहते हैं। खाना बनाना हो घर संभालना हो या छोटी छोटी जिम्मेदारियां निभानी हों वे अक्सर यह कहकर बच निकलते हैं कि उन्हें यह सब नहीं आता। समस्या यह नहीं कि वे सीख नहीं सकते बल्कि यह है कि उनसे कभी सीखने की उम्मीद ही नहीं की गई।

    इस विषय पर इंटरनेट पर तीखी बहस छिड़ गई है। कई लोग अपनी निजी कहानियां साझा कर रहे हैं। किसी ने लिखा कि उनके भाई की परवरिश भी बिल्कुल इसी पैटर्न पर हुई है। एक यूजर ने बताया कि एक कामकाजी व्यक्ति हर पंद्रह दिन में अपने गंदे कपड़ों का सूटकेस मां के पास धुलवाने के लिए लेकर आता है। कुछ लोगों का यह भी कहना है कि कई बार माता पिता अपनी निजी जिंदगी के खालीपन को भरने के लिए बेटे को जरूरत से ज्यादा केंद्र में रख लेते हैं जिससे आगे चलकर बहू के प्रति असंतोष और टकराव पैदा होता है।

    मनोवैज्ञानिक साफ कहते हैं कि प्यार जरूरी है लेकिन बिना जिम्मेदारी के प्यार नुकसानदेह है। अगर बेटे को हर चीज तैयार मिलती रही तो वह एक सक्षम वयस्क नहीं बन पाएगा। जिम्मेदारी उठाना सीखना आत्मनिर्भर बनने की पहली सीढ़ी है। सही परवरिश वही है जिसमें प्यार और अनुशासन के बीच संतुलन हो ताकि बच्चा सिर्फ राजा बेटा नहीं बल्कि एक जिम्मेदार इंसान बन सके।