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  • सर्वाइकल कैंसर से जंग में एमपी नंबर वन एचपीवी वैक्सीनेशन में बनाया बड़ा रिकॉर्ड

    सर्वाइकल कैंसर से जंग में एमपी नंबर वन एचपीवी वैक्सीनेशन में बनाया बड़ा रिकॉर्ड


    मध्यप्रदेश । सर्वाइकल कैंसर जैसी गंभीर और जानलेवा बीमारी से बचाव के लिए चलाए जा रहे एचपीवी वैक्सीनेशन अभियान में मध्यप्रदेश ने देशभर में एक मिसाल कायम कर दी है। किशोरियों के स्वास्थ्य और भविष्य को सुरक्षित करने की दिशा में राज्य ने उल्लेखनीय प्रगति करते हुए खुद को शीर्ष स्थान पर स्थापित किया है। आंकड़ों के अनुसार प्रदेश में 7 लाख 51 हजार से अधिक किशोरियों को टीकाकरण के लिए चिन्हित किया गया था जिनमें से अब तक करीब 5 लाख बालिकाओं को एचपीवी वैक्सीन लगाई जा चुकी है। इस तरह राज्य ने अपने लक्ष्य का लगभग 66 प्रतिशत हासिल कर लिया है जो राष्ट्रीय स्तर पर सबसे बेहतर प्रदर्शन में गिना जा रहा है।

    अन्य राज्यों की तुलना में मध्यप्रदेश की यह उपलब्धि और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। जहां मिजोरम में लगभग 57 प्रतिशत गुजरात में 36 प्रतिशत और आंध्र प्रदेश में 33 प्रतिशत टीकाकरण ही हो सका है वहीं पश्चिम बंगाल में अब तक यह अभियान शुरू भी नहीं हो पाया है। उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में 21 लाख किशोरियों को टीका लगाने का लक्ष्य रखा गया है लेकिन अब तक केवल 6 हजार के आसपास ही वैक्सीनेशन हो सका है। ऐसे में मध्यप्रदेश का प्रदर्शन स्पष्ट रूप से आगे नजर आता है।

    राज्य के भीतर भी कई जिलों ने शानदार काम किया है। डिंडोरी और राजगढ़ जैसे जिलों ने 100 प्रतिशत लक्ष्य हासिल कर एक उदाहरण प्रस्तुत किया है। वहीं खंडवा और बालाघाट जैसे जिले 95 प्रतिशत से अधिक टीकाकरण के साथ लक्ष्य के बेहद करीब हैं। सागर और खरगोन में भी 90 प्रतिशत से अधिक उपलब्धि दर्ज की गई है जो इस अभियान की गति और प्रभावशीलता को दर्शाती है। खास बात यह है कि सागर जिले में महज एक सप्ताह के भीतर दस हजार से अधिक टीकाकरण कर तेजी का परिचय दिया गया है।

    हालांकि इस सफलता के बीच कुछ चिंताजनक तस्वीर भी सामने आई है। प्रदेश के कुछ जिले जैसे रीवा धार शिवपुरी और इंदौर टीकाकरण के मामले में काफी पीछे हैं जहां यह आंकड़ा 10 प्रतिशत से भी कम है। इन क्षेत्रों में जागरूकता की कमी सामाजिक हिचकिचाहट और अभियान की कमजोर मॉनिटरिंग को मुख्य कारण माना जा रहा है। यह अंतर इस बात की ओर संकेत करता है कि अभियान को समान रूप से प्रभावी बनाने के लिए अभी और प्रयासों की जरूरत है।

    सर्वाइकल कैंसर भारत में महिलाओं के लिए एक गंभीर खतरा बना हुआ है। हर साल लगभग सवा लाख महिलाएं इस बीमारी की चपेट में आती हैं और करीब 75 हजार महिलाओं की मौत हो जाती है। यह बीमारी धीरे धीरे विकसित होती है और शुरुआती चरण में इसके लक्षण सामने नहीं आते जिससे समय पर पहचान मुश्किल हो जाती है। विशेषज्ञों के अनुसार किशोरावस्था में एचपीवी वैक्सीनेशन इस बीमारी से बचाव का सबसे प्रभावी और सुरक्षित तरीका है।

    सरकार ने टीकाकरण को आसान बनाने के लिए डिजिटल और ऑफलाइन दोनों विकल्प उपलब्ध कराए हैं। अभिभावक यू विन प्लेटफॉर्म के जरिए स्लॉट बुक कर सकते हैं या फिर नजदीकी सरकारी स्वास्थ्य केंद्र पर जाकर भी टीकाकरण करवा सकते हैं। भोपाल सहित कई शहरों में यह सुविधा विभिन्न अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों पर उपलब्ध है जहां आवश्यक दस्तावेजों के साथ आसानी से टीका लगवाया जा सकता है। मध्यप्रदेश का यह अभियान न केवल स्वास्थ्य क्षेत्र में एक बड़ी उपलब्धि है बल्कि यह समाज में जागरूकता और सकारात्मक बदलाव का भी संकेत है। यदि इसी तरह प्रयास जारी रहे तो आने वाले समय में सर्वाइकल कैंसर जैसी गंभीर बीमारी पर काफी हद तक नियंत्रण पाया जा सकता है।

  • इंडियाएआई मिशन का असर, सरकारी अस्पतालों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से बेहतर इलाज

    इंडियाएआई मिशन का असर, सरकारी अस्पतालों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से बेहतर इलाज


    नई दिल्ली। भारत ने अपनी सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं में बड़ा तकनीकी बदलाव करते हुए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई को रणनीतिक रूप से शामिल किया है। सरकार के अनुसार, इसका उद्देश्य डॉक्टरों और विशेषज्ञों की कमी को दूर करना, बीमारी की जल्द पहचान सुनिश्चित करना और दूर-दराज के इलाकों तक बेहतर इलाज पहुंचाना है।

    आधिकारिक बयान में बताया गया कि एआई टूल्स का उपयोग अब कई प्रमुख राष्ट्रीय स्वास्थ्य कार्यक्रमों में किया जा रहा है। National TB Elimination Programme के तहत एआई आधारित स्क्रीनिंग और विश्लेषण से टीबी के गंभीर मामलों में 27 प्रतिशत तक कमी दर्ज की गई है। इसी तरह National Diabetic Retinopathy Screening Programme में एआई की मदद से गैर-विशेषज्ञ स्वास्थ्यकर्मी भी शुरुआती जांच कर पा रहे हैं।

    बीमारी निगरानी प्रणाली में एआई के इस्तेमाल से अब तक 4,500 से अधिक संभावित प्रकोपों के अलर्ट समय रहते मिल चुके हैं, जिससे त्वरित कार्रवाई संभव हो सकी। इससे संक्रमण के फैलाव को रोकने में मदद मिली है।

    डिजिटल हेल्थ प्लेटफॉर्म eSanjeevani ने इस बदलाव को और मजबूती दी है। इस ऑनलाइन परामर्श सेवा के जरिए अब तक 28.2 करोड़ से अधिक लोगों को चिकित्सा सलाह मिल चुकी है। एआई आधारित टूल्स डॉक्टरों को बीमारी की पहचान और उपचार निर्णय में सहयोग प्रदान कर रहे हैं।

    सरकार ने कुपोषण की निगरानी के लिए भी एआई आधारित प्रणालियों का उपयोग शुरू किया है। इससे बच्चों और माताओं में पोषण संबंधी समस्याओं की समय पर पहचान और हस्तक्षेप संभव हो पा रहा है।

    अब भारत का स्वास्थ्य तंत्र केवल संक्रामक रोगों तक सीमित नहीं रहा। कैंसर के उपचार, आयुर्वेद जैसी पारंपरिक चिकित्सा के आधुनिकीकरण और National One Health Programme के तहत मानव, पशु और पर्यावरणीय स्वास्थ्य के समन्वित दृष्टिकोण में भी एआई का इस्तेमाल बढ़ रहा है।

    इसी कड़ी में 16 से 20 फरवरी तक नई दिल्ली में ग्लोबल साउथ के पहले अंतरराष्ट्रीय एआई शिखर सम्मेलन का आयोजन किया जाएगा, जहां नीति, शोध, उद्योग और सामाजिक भागीदारी से जुड़े मुद्दों पर चर्चा होगी।

    मार्च 2024 में प्रधानमंत्री Narendra Modi की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने IndiaAI Mission को मंजूरी दी थी। इस मिशन के लिए 10,371.92 करोड़ रुपए का बजट निर्धारित किया गया है। इसका उद्देश्य एआई के माध्यम से सामाजिक और आर्थिक विकास को गति देना है।
    इसी मिशन के तहत ‘इंडियाएआई एप्लिकेशन डेवलपमेंट इनिशिएटिव’ भी चलाया जा रहा है, जिसका लक्ष्य देश की प्रमुख समस्याओं के समाधान हेतु स्वदेशी एआई समाधान विकसित करना है। बेहतर और सुलभ स्वास्थ्य सेवाएं इस पहल का एक महत्वपूर्ण परिणाम मानी जा रही हैं।

    सरकार का दावा है कि एआई के इस्तेमाल से दवाओं और चिकित्सा उपकरणों की गुणवत्ता सुधर रही है, उपचार की लागत घट रही है और ग्रामीण क्षेत्रों तक विशेषज्ञ सेवाएं पहुंच रही हैं। यदि यह पहल इसी तरह आगे बढ़ती रही, तो भारत का सार्वजनिक स्वास्थ्य तंत्र डिजिटल और तकनीकी दृष्टि से और अधिक सशक्त हो सकता है।

  • ग्वालियर में रेबीज का कहर 6 साल के मासूम समेत तीन की मौत अधूरा इलाज और बढ़ते आवारा कुत्ते चिंता का सबब

    ग्वालियर में रेबीज का कहर 6 साल के मासूम समेत तीन की मौत अधूरा इलाज और बढ़ते आवारा कुत्ते चिंता का सबब


    ग्वालियर: में रेबीज का कहर थमने का नाम नहीं ले रहा है फरवरी 2026 के शुरुआती दिनों में ही छह साल के मासूम समेत तीन लोगों की मौत हो चुकी है। इन मौतों का कारण अधूरा इलाज गलत मेडिकल सलाह और आवारा कुत्तों की बढ़ती संख्या को बताया जा रहा है। विशेषज्ञ लगातार चेतावनी दे रहे हैं कि समय पर पूरा वैक्सीनेशन लेने से रेबीज जैसी घातक बीमारी को रोका जा सकता है।

    दतिया जिले के हंस प्रजापति का मामला सबसे दुखद है। छह वर्षीय हंस को कुत्ते ने काटा था। कमला राजा शासकीय अस्पताल में एंटी-रेबीज वैक्सीन के तीन डोज लगाए जा चुके थे। डॉक्टरों ने चौथा डोज अस्पताल में ही कराने की सलाह दी थी। परिजन बच्चे को घर ले गए और कुछ ही समय बाद उसकी हालत बिगड़ गई। स्कूल से लौटने के बाद उसके मुंह से लार बहने लगी, जो रेबीज का गंभीर लक्षण है। इसके बाद मासूम की मौत हो गई।

    पहली मौत 4 फरवरी को दर्ज की गई। ग्वालियर के बगिया इलाके के 48 वर्षीय किरण लालवानी को जनवरी में आवारा कुत्ते ने काटा था। परिजनों के अनुसार स्थानीय क्लीनिक में डॉक्टर ने केवल टिटनेस का इंजेक्शन लगाया और एंटी-रेबीज वैक्सीन देने से मना कर दिया। लगभग एक महीने बाद किरण में रेबीज के क्लासिक लक्षण सामने आए। न्यू जेएएच में भर्ती कराने के दौरान उनकी मौत हो गई। इस मामले में डॉक्टर के खिलाफ लापरवाही का केस भी दर्ज किया गया।

    दूसरी मौत टीकमगढ़ जिले की 65 वर्षीय महिला की हुई, जिसे सियार ने काटा था। समय पर एंटी-रेबीज इलाज न मिलने के कारण संक्रमण तेजी से फैला। गंभीर हालत में महिला को ग्वालियर रेफर किया गया लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। इस घटना ने ग्रामीण इलाकों में स्वास्थ्य सेवाओं और रेफरल सिस्टम की कमजोरी को उजागर किया।

    हालिया तीन मौतों ने ग्वालियर में डॉग बाइट मामलों की गंभीरता को सामने ला दिया है। विशेषज्ञों का कहना है कि शहर में हर साल हजारों डॉग बाइट केस सामने आते हैं लेकिन स्ट्रीट डॉग कंट्रोल, स्टरलाइजेशन और जन-जागरूकता की रफ्तार धीमी है। रेबीज एक बार फैलने के बाद 100 प्रतिशत घातक है लेकिन समय पर पूरा वैक्सीनेशन लेने से इसे रोका जा सकता है। विशेषज्ञों ने आम जनता को कुत्ते या किसी भी संदिग्ध जानवर के काटने के बाद घाव को साबुन और पानी से तुरंत धोने अस्पताल पहुंचने और एंटी-रेबीज वैक्सीन का पूरा कोर्स लेने की सलाह दी है। बच्चों को अकेले बाहर न छोड़ने और लापरवाही न करने की चेतावनी भी दी गई है।

    मौतों ने स्वास्थ्य व्यवस्था की तैयारियों और प्रशासन की उदासीनता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। डॉक्टरों और विशेषज्ञों का कहना है कि अगर सिस्टम और समाज दोनों नहीं सतर्क हुए तो रेबीज और ज्यादा जानें ले सकता है। लोगों में जागरूकता और समय पर इलाज की समझ ही इस जानलेवा बीमारी से बचाव का सबसे बड़ा हथियार है।