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  • तंबाकू सेवन में वैश्विक गिरावट के बावजूद किशोरों में वेपिंग बना गंभीर स्वास्थ्य संकट, WHO की रिपोर्ट में चेतावनी

    तंबाकू सेवन में वैश्विक गिरावट के बावजूद किशोरों में वेपिंग बना गंभीर स्वास्थ्य संकट, WHO की रिपोर्ट में चेतावनी

    नई दिल्ली । दुनिया भर में तंबाकू सेवन को कम करने के लिए किए जा रहे प्रयासों के सकारात्मक परिणाम सामने आ रहे हैं और वैश्विक स्तर पर इसके उपयोग में लगातार गिरावट दर्ज की जा रही है, लेकिन इसके साथ ही एक नई और गंभीर चुनौती उभरकर सामने आई है, जिसने स्वास्थ्य विशेषज्ञों की चिंता बढ़ा दी है। यह चुनौती किशोरों में तेजी से बढ़ती वेपिंग यानी ई-सिगरेट के उपयोग की है, जिसे सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए एक नया खतरा माना जा रहा है।

    विश्व स्वास्थ्य संगठन की ताजा रिपोर्ट के अनुसार पिछले दो दशकों में तंबाकू उपयोग में उल्लेखनीय कमी आई है और कई देशों में सख्त नीतियों के कारण इसके सेवन पर नियंत्रण पाया गया है। वर्ष 2000 में जहां दुनिया भर में लगभग 1.379 अरब लोग किसी न किसी रूप में तंबाकू का उपयोग करते थे, वहीं 2024 तक यह संख्या घटकर लगभग 1.202 अरब रह गई है। यह गिरावट सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रयासों की एक बड़ी उपलब्धि के रूप में देखी जा रही है।

    हालांकि इस सकारात्मक तस्वीर के बीच किशोरों में वेपिंग का बढ़ता चलन एक गंभीर चिंता का विषय बन गया है। रिपोर्ट के अनुसार लगभग 1.5 करोड़ किशोर, जिनकी उम्र 13 से 15 वर्ष के बीच है, ई-सिगरेट या वेपिंग का उपयोग कर रहे हैं। कई देशों में उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर यह पाया गया है कि किशोरों में वेपिंग की दर वयस्कों की तुलना में कई गुना अधिक है, जो इस समस्या की गंभीरता को दर्शाता है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि ई-सिगरेट और फ्लेवरयुक्त निकोटीन उत्पादों की आसान उपलब्धता ने युवाओं को तेजी से इसकी ओर आकर्षित किया है। इन उत्पादों को अक्सर सुरक्षित विकल्प के रूप में प्रचारित किया जाता है, लेकिन इनमें मौजूद निकोटीन अत्यधिक नशे की लत पैदा करने वाला पदार्थ है, जो किशोरों के विकसित हो रहे मस्तिष्क पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है।

    रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया है कि तंबाकू उद्योग लगातार अपने उत्पादों और विपणन रणनीतियों में बदलाव कर रहा है ताकि नई पीढ़ी को आकर्षित किया जा सके। फ्लेवरयुक्त ई-सिगरेट, निकोटीन पाउच और अन्य नए उत्पादों के माध्यम से युवाओं को लक्ष्य बनाने की प्रवृत्ति बढ़ी है, जिसे स्वास्थ्य विशेषज्ञ गंभीर चुनौती के रूप में देख रहे हैं।

    लिंग और क्षेत्रीय स्तर पर भी तंबाकू उपयोग में विविध रुझान देखे जा रहे हैं। पुरुषों में तंबाकू सेवन अभी भी अधिक है, जबकि महिलाओं में लगातार गिरावट दर्ज की जा रही है। इसके अलावा कुछ क्षेत्रों में सुधार देखने को मिला है, जबकि अफ्रीका और पूर्वी भूमध्यसागरीय क्षेत्रों में तंबाकू उपयोग बढ़ने की आशंका जताई गई है।

    विश्व स्वास्थ्य संगठन ने स्पष्ट किया है कि तंबाकू से हर वर्ष लाखों लोगों की मौत होती है और यह हृदय रोग, कैंसर तथा श्वसन संबंधी गंभीर बीमारियों का प्रमुख कारण बना हुआ है। ऐसे में भले ही पारंपरिक तंबाकू उपयोग में गिरावट एक सकारात्मक संकेत हो, लेकिन वेपिंग का बढ़ता चलन इस प्रगति को चुनौती दे रहा है।

    स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि यदि समय रहते किशोरों में वेपिंग की आदत को नियंत्रित नहीं किया गया, तो आने वाले वर्षों में यह एक बड़े सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट का रूप ले सकता है। इसी कारण कई देशों में इसके नियमन और जागरूकता अभियानों को और तेज करने की आवश्यकता पर जोर दिया जा रहा है।

  • भारत का बड़ा मानवीय कदम, अफगानिस्तान को भेजी 20 टन वैक्सीन, बच्चों के टीकाकरण कार्यक्रम को मिलेगा बूस्ट

    भारत का बड़ा मानवीय कदम, अफगानिस्तान को भेजी 20 टन वैक्सीन, बच्चों के टीकाकरण कार्यक्रम को मिलेगा बूस्ट


    नई दिल्ली। भारत ने एक बार फिर अपने मानवीय सहयोग के तहत अफगानिस्तान की स्वास्थ्य व्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है। इस बार भारत की ओर से काबुल को करीब 20 टन जरूरी वैक्सीन की खेप भेजी गई है, जिसका उद्देश्य वहां बच्चों के टीकाकरण कार्यक्रम को और अधिक प्रभावी बनाना है। इस सहायता में मुख्य रूप से बीसीजी और टेटनस-डिप्थीरिया से संबंधित टीके शामिल हैं, जो संक्रामक बीमारियों से बचाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

    विदेश मंत्रालय के अनुसार भारत लगातार अफगानिस्तान के सार्वजनिक स्वास्थ्य ढांचे को समर्थन देने के लिए प्रतिबद्ध है। इसी क्रम में यह नई खेप भेजी गई है, जिससे वहां चल रहे इम्यूनाइजेशन कार्यक्रमों को मजबूती मिलेगी और बच्चों को गंभीर बीमारियों से बचाने में मदद मिलेगी। अधिकारियों का कहना है कि यह सहायता केवल एक बार की नहीं है, बल्कि लगातार जारी मानवीय प्रयासों का हिस्सा है।

    इससे पहले भी भारत ने अफगानिस्तान को स्वास्थ्य और आपदा राहत के क्षेत्र में सहायता उपलब्ध कराई है। हाल ही में ट्यूबरकुलोसिस से लड़ने के लिए बीसीजी वैक्सीन की खेप भेजी गई थी, जिससे बच्चों के टीकाकरण अभियान को बढ़ावा मिला था। इसके अलावा प्राकृतिक आपदाओं जैसे बाढ़ और भूकंप के समय भी भारत ने राहत सामग्री भेजकर वहां प्रभावित लोगों की मदद की थी।

    भारत का यह कदम न केवल स्वास्थ्य सहयोग को दर्शाता है, बल्कि दोनों देशों के बीच मानवीय संबंधों को भी मजबूत करता है। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे प्रयास अफगानिस्तान जैसे देशों में स्वास्थ्य संकट को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, जहां चिकित्सा सुविधाएं सीमित संसाधनों पर निर्भर हैं।

    भारत की यह पहल यह भी दर्शाती है कि वह क्षेत्रीय स्थिरता और मानव कल्याण को लेकर अपनी जिम्मेदारी को गंभीरता से निभा रहा है। टीकाकरण जैसी बुनियादी स्वास्थ्य सेवाएं बच्चों की जीवन रक्षा में अहम होती हैं और इस दिशा में दी गई सहायता लंबे समय तक सकारात्मक प्रभाव छोड़ सकती है।

    आने वाले समय में भी भारत की ओर से अफगानिस्तान को इस तरह की सहायता जारी रहने की संभावना जताई जा रही है। सरकार का मानना है कि स्वास्थ्य और मानवीय सहायता के माध्यम से लोगों के जीवन में वास्तविक बदलाव लाया जा सकता है और इसी दिशा में यह प्रयास एक महत्वपूर्ण कदम है।

  • ग्वालियर में सनसनी: पानी की टंकी में मरा सांप मिलने से 19 हजार लोगों की सुरक्षा पर चिंता

    ग्वालियर में सनसनी: पानी की टंकी में मरा सांप मिलने से 19 हजार लोगों की सुरक्षा पर चिंता


    नई दिल्ली। ग्वालियर में एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जिसने नगर निगम की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। वार्ड क्रमांक 10 के घासमंडी मिर्जापुर मस्जिद इलाके में स्थित पानी की टंकी में मरा हुआ सांप मिलने से पूरे क्षेत्र में हड़कंप मच गया है। यह वही टंकी है जिससे करीब 19 हजार लोगों को पेयजल की सप्लाई होती है।
    स्थानीय लोगों का आरोप है कि इस टंकी की लंबे समय से सफाई नहीं की गई थी, जिसके कारण अंदर गंदगी जमा हो गई और अंततः मरा हुआ सांप पानी में पाया गया। हैरान करने वाली बात यह है कि लोग कई दिनों से इसी पानी का उपयोग कर रहे थे, जिससे उनके स्वास्थ्य पर गंभीर खतरा पैदा होने की आशंका जताई जा रही है।
    वीडियो सामने आने के बाद बढ़ा विवाद
    इस घटना का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया है, जिसमें एक युवक लकड़ी की मदद से टंकी के अंदर से मरा हुआ सांप बाहर निकालता दिखाई दे रहा है। बताया जा रहा है कि यह घटना शनिवार की है, लेकिन इसका वीडियो रविवार को सामने आने के बाद मामला और गंभीर हो गया।
    वीडियो वायरल होते ही स्थानीय लोगों में गुस्सा फूट पड़ा और उन्होंने नगर निगम प्रशासन के खिलाफ लापरवाही के आरोप लगाए।
    नगर निगम पर गंभीर सवाल
    रहवासियों का कहना है कि उन्होंने कई बार टंकी की सफाई और पानी की गुणवत्ता को लेकर शिकायत की थी, लेकिन कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई। लोगों का आरोप है कि निगम की लापरवाही के कारण वे दूषित पानी पीने को मजबूर थे, जिससे बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है।
    हालांकि इस मामले पर अभी तक नगर निगम की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है, जिससे लोगों की नाराजगी और बढ़ गई है।
    स्थानीय प्रतिनिधियों को भी नहीं जानकारी
    वार्ड क्रमांक 10 के पार्षद शकील मंसूरी ने बताया कि उन्हें इस घटना की जानकारी नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि हाल ही में उन पर हमला हुआ था और वे फिलहाल अस्पताल में भर्ती हैं। इसलिए वे क्षेत्र की स्थिति पर पूरी तरह अपडेट नहीं हैं।
    पहले भी सामने आ चुकी हैं ऐसी लापरवाहियां
    यह पहली बार नहीं है जब ग्वालियर में पानी की टंकी को लेकर सवाल उठे हों। दो महीने पहले भी मानपुर क्षेत्र में प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत बनी टंकी में पांच मरी हुई छिपकलियां मिलने का मामला सामने आया था, जिससे हजारों लोग प्रभावित हुए थे।
    लोगों की मांग: जिम्मेदारों पर हो कार्रवाई
    घटना के बाद क्षेत्रीय लोगों ने टंकी की तुरंत सफाई, पानी की जांच और जिम्मेदार अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई की मांग की है। लोगों ने चेतावनी दी है कि यदि जल्द समाधान नहीं हुआ तो वे आंदोलन करने को मजबूर होंगे।
  • भोपाल नगर निगम की नई भयानक योजना: पानी की लाइन के ऊपर शौचालय निर्माण, भागीरथपुरा जैसी जल त्रासदी का खतरा

    भोपाल नगर निगम की नई भयानक योजना: पानी की लाइन के ऊपर शौचालय निर्माण, भागीरथपुरा जैसी जल त्रासदी का खतरा


    भोपाल। इंदौर के भागीरथपुरा में जल त्रासदी के बाद अब तक 35 लोगों की जान जा चुकी है, लेकिन इस हादसे ने भोपाल नगर निगम को कोई सबक नहीं सिखाया। शहर के एक गैस पीड़ित इलाके में नगर निगम द्वारा पानी की पाइपलाइन के ऊपर शौचालय निर्माण का मामला सामने आया है, जो एक नई आपदा को जन्म दे सकता है।

    बताया जा रहा है कि जिस जगह से पीने के पानी की पाइपलाइन गुजर रही है, उसी के ऊपर शौचालय बनाया जा रहा है। यदि पाइपलाइन लीक हो जाती है, तो शौचालय का पानी सीधे पाइपलाइन में मिल जाएगा। इससे न केवल पानी दूषित होगा, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए यह एक गंभीर संकट भी बन सकता है। साथ ही यह सवाल भी उठता है कि अगर पाइपलाइन में गड़बड़ी हो, तो उसे कैसे ठीक किया जाएगा, जब ऊपर शौचालय का निर्माण चल रहा हो।

    स्थानीय लोगों का कहना है कि यह निर्माण कार्य सीधे मानवीय जीवन को जोखिम में डालने वाला है। वे निगम से मांग कर रहे हैं कि तुरंत इस निर्माण को रोका जाए और पाइपलाइन की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए। नगर निगम अध्यक्ष किशन सूर्यवंशी ने मामले पर कहा कि लोकल इंजीनियर ने टेक्निकल एनालिसिस किया होगा। उन्होंने कहा कि विषय संज्ञान में आया है और अधिकारियों से चर्चा की जाएगी। हालांकि अभी तक निगम की ओर से कोई ठोस कदम नहीं दिख रहा है।

    भागीरथपुरा जैसी त्रासदी के बाद भी नगर निगम की इस उदासीनता पर सवाल उठ रहे हैं। यदि जल्द ही सुधार नहीं किया गया, तो भोपाल में भी जल संकट और बीमारी फैलने जैसी स्थिति बन सकती है। नागरिकों का कहना है कि पानी की सुरक्षा को प्राथमिकता नहीं दी गई तो नुकसान भारी हो सकता है।

  • भागीरथपुरा त्रासदी के बाद ज़मीन से लेकर हाईकोर्ट तक हलचल, 23 मौतों ने झकझोरा सिस्टम

    भागीरथपुरा त्रासदी के बाद ज़मीन से लेकर हाईकोर्ट तक हलचल, 23 मौतों ने झकझोरा सिस्टम


    इंदौर के भागीरथपुरा क्षेत्र में दूषित पेयजल से हुई 23 मौतों ने प्रशासन और सिस्टम को झकझोर कर रख दिया है। जिस इलाके में कुछ दिन पहले तक मातम पसरा हुआ था वहां अब हालात तेजी से बदलते नजर आ रहे हैं। ज़मीन के नीचे से लेकर अदालत के गलियारों तक इस त्रासदी का असर साफ दिख रहा है। प्रशासनिक स्तर पर जहां सुधार कार्य युद्धस्तर पर चल रहे हैं वहीं न्यायिक मोर्चे पर भी मामले ने गंभीर रूप ले लिया है। गुरुवार को मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर बेंच में इस मामले से जुड़ी याचिकाओं पर अहम सुनवाई प्रस्तावित है।

    भागीरथपुरा की सड़कों पर इन दिनों भारी हलचल है। पुलिस चौकी के सामने की मुख्य सड़क से लेकर अंदरूनी गलियों तक जेसीबी मशीनें लगातार खुदाई में जुटी हैं। कई जगह पुरानी और जर्जर पाइपलाइनों को हटाकर नई पाइप डाली जा रही हैं तो कहीं ड्रेनेज सिस्टम को सुधारने का काम चल रहा है। प्रशासन का दावा है कि नर्मदा जल आपूर्ति लाइन और सीवरेज व्यवस्था को पूरी तरह अलग किया जा रहा है ताकि दूषित पानी की समस्या भविष्य में दोबारा न हो।हालांकि इन सुधार कार्यों के चलते स्थानीय लोगों को फिलहाल भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। जगह-जगह खुदी सड़कों कीचड़ और अधूरे भराव के कारण आवाजाही मुश्किल हो गई है। दोपहिया वाहन चालकों बुजुर्गों और स्कूली बच्चों को वैकल्पिक रास्तों से निकलना पड़ रहा है। बावजूद इसके क्षेत्रवासियों का कहना है कि यह असुविधा उन्हें मंजूर है अगर इससे भविष्य में किसी और परिवार को अपनों को खोने का दर्द न झेलना पड़े।

    स्थानीय निवासियों का आरोप है कि इलाके की पेयजल और ड्रेनेज व्यवस्था वर्षों से बदहाल थी। इसको लेकर कई बार शिकायतें भी की गईं लेकिन समय रहते प्रशासन ने गंभीरता नहीं दिखाई। लोगों का कहना है कि यदि पहले ही सुधार कार्य किए गए होते तो शायद 23 निर्दोष लोगों की जान नहीं जाती।स्वास्थ्य विभाग के आंकड़े इस त्रासदी की भयावहता को और स्पष्ट करते हैं। अब तक कुल 440 लोग दूषित पानी से बीमार होकर अस्पताल पहुंचे थे। इनमें से 413 मरीजों को इलाज के बाद छुट्टी दी जा चुकी है जबकि 27 मरीज अब भी विभिन्न अस्पतालों में भर्ती हैं। इनमें 8 मरीज आईसीयू में हैं और 3 की हालत गंभीर बताई जा रही है जिन्हें वेंटिलेटर सपोर्ट पर रखा गया है। स्वास्थ्य विभाग की ओर से इलाके में लगातार स्वास्थ्य शिविर लगाए जा रहे हैं ताकि किसी भी नए मामले को समय रहते पकड़ा जा सके।

    न्यायिक स्तर पर भी मामला तूल पकड़ चुका है। हाईकोर्ट की इंदौर बेंच में दूषित पेयजल से जुड़ी पांच याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई होनी है। पिछली सुनवाई में अदालत ने प्रशासन के रवैये पर सख्त टिप्पणी करते हुए कहा था कि स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराना नागरिकों का मौलिक अधिकार है। कोर्ट ने यह भी संकेत दिए थे कि यदि लापरवाही सामने आती है तो जिम्मेदार अधिकारियों की व्यक्तिगत जवाबदेही तय की जा सकती है।भागीरथपुरा की यह त्रासदी अब केवल एक स्थानीय हादसा नहीं रही बल्कि यह सिस्टम की जवाबदेही और नागरिक अधिकारों से जुड़ा एक बड़ा सवाल बन चुकी है।

  • नर्मदा में सीवेज से पेयजल पर संकट: दिग्विजय सिंह की चेतावनी से मचा हड़कंपजबलपुर में जनता भयभीत

    नर्मदा में सीवेज से पेयजल पर संकट: दिग्विजय सिंह की चेतावनी से मचा हड़कंपजबलपुर में जनता भयभीत


    जबलपुर । जबलपुर में नर्मदा नदी में सीवेज मिलने और उससे जुड़े पेयजल संकट को लेकर सियासी और प्रशासनिक हलकों में हलचल तेज हो गई है। पूर्व मुख्यमंत्री और राज्यसभा सांसद दिग्विजय सिंह ने इस गंभीर मुद्दे को सार्वजनिक रूप से उठाते हुए चेतावनी दी है कि यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गएतो शहर एक बड़े सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट की ओर बढ़ सकता है। उन्होंने सोशल मीडिया के माध्यम से इस स्थिति पर चिंता जताते हुए सीधे मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादवकेंद्रीय मंत्री कैलाश विजयवर्गीय और जबलपुर के महापौर जगत बहादुर सिंह से हस्तक्षेप की मांग की है।

    दिग्विजय सिंह ने अपने बयान में कहा कि ग्वारीघाट क्षेत्र में बने सीवेज टैंक से बिना पूरी तरह फिल्टर किया गया गंदा पानी सीधे नर्मदा नदी में छोड़ा जा रहा है। यही नर्मदा नदी लगभग 500 मीटर दूर स्थित ललपुर पेयजल सप्लाई प्लांट के माध्यम से जबलपुर शहर को पानी उपलब्ध कराती है। ऐसे में सीवेज मिश्रित पानी के जरिए हजारों लोगों के स्वास्थ्य पर सीधा खतरा मंडरा रहा है। उन्होंने इस पूरे तंत्र को लापरवाही का गंभीर उदाहरण बताते हुए तत्काल सुधारात्मक कदम उठाने की जरूरत बताई।

    इस बीचगंदे पानी की सप्लाई का मामला न्यायिक दहलीज तक भी पहुंच चुका है। जबलपुर निवासी अधिवक्ता ओपी यादव ने इस संबंध में हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की है। याचिका में कलेक्टरनगर निगम आयुक्तमहापौर और प्रमुख सचिव नगरीय प्रशासन को पक्षकार बनाया गया है। याचिकाकर्ता का आरोप है कि वर्ष 2019 से शहर के कई इलाकों में लगातार गंदे और बदबूदार पानी की आपूर्ति की जा रही है। बार-बार शिकायतों के बावजूद प्रशासन ने कोई ठोस कार्रवाई नहीं की।

    याचिका में हाईलेवल कमेटी गठित कर पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराने और जबलपुर की जनता को सुरक्षित एवं स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराने की मांग की गई है। हाईकोर्ट ने इस मामले को गंभीर मानते हुए संबंधित अधिकारियों को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है और स्पष्ट किया है कि जनता के स्वास्थ्य से किसी भी प्रकार का समझौता स्वीकार्य नहीं होगा।

    यह मामला इसलिए भी ज्यादा संवेदनशील हो गया है क्योंकि हाल ही में इंदौर के भागीरथपुरा क्षेत्र में दूषित पानी पीने से 18 लोगों की मौत हो चुकी हैजबकि कई अन्य लोग अस्पताल में भर्ती हैं। इस घटना के बाद प्रदेश सरकार ने मृतकों के परिजनों को दो-दो लाख रुपये की सहायता और प्रभावितों के मुफ्त इलाज की घोषणा की है। ऐसे में जबलपुर में भी इसी तरह की स्थिति बनने की आशंका ने लोगों की चिंता बढ़ा दी है।

    विपक्षी दलों और सामाजिक संगठनों ने सरकार से मांग की है कि नर्मदा जैसी पवित्र और जीवनदायिनी नदी में सीवेज मिलने की घटनाओं पर तत्काल रोक लगाई जाए। उनका कहना है कि यह केवल एक शहर का मुद्दा नहींबल्कि पर्यावरणजल सुरक्षा और जनस्वास्थ्य से जुड़ा गंभीर प्रश्न है। अब सबकी निगाहें हाईकोर्ट की अगली सुनवाई और प्रशासन की कार्रवाई पर टिकी हैं।

  • प्रदूषण से जूझते मध्य प्रदेश में विकास की भारी कीमत, 15 लाख पेड़ों की कटाई पर उठे गंभीर सवाल

    प्रदूषण से जूझते मध्य प्रदेश में विकास की भारी कीमत, 15 लाख पेड़ों की कटाई पर उठे गंभीर सवाल


    मध्य प्रदेश में एक ओर वायु प्रदूषण लगातार खतरनाक स्तर पर पहुंच रहा है, वहीं दूसरी ओर विकास परियोजनाओं के नाम पर बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई प्रस्तावित है। राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण एनजीटीद्वारा राज्य के आठ शहरों को गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट की श्रेणी में रखे जाने के बावजूद इन्हीं क्षेत्रों में लाखों पेड़ों को काटने की तैयारी ने पर्यावरण और जनस्वास्थ्य दोनों को लेकर चिंता बढ़ा दी है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार केवल इन आठ शहरों में ही करीब 6.50 लाख पेड़ों के कटने का प्रस्ताव है, जबकि पूरे प्रदेश में विभिन्न परियोजनाओं के चलते लगभग 15 लाख पेड़ संकट में हैं।

    जिन शहरों को एनजीटी और प्रदूषण नियंत्रण एजेंसियों ने सबसे अधिक प्रदूषित माना है, उनमें भोपाल, इंदौर, ग्वालियर, जबलपुर, उज्जैन, सिंगरौली, सागर और देवास शामिल हैं। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड सीपीसीबीके अनुसार इन शहरों में पीएम-10 का औसत स्तर 130 से 190 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर और पीएम-2.5 का स्तर 80 से 100 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर तक दर्ज किया गया है, जो सुरक्षित सीमा से कई गुना अधिक है। इसके बावजूद इन्हीं इलाकों में सड़क, मेट्रो, कोयला, ऊर्जा और परिवहन से जुड़ी परियोजनाओं के लिए पुराने और परिपक्व पेड़ों को हटाने की योजनाएं आगे बढ़ाई जा रही हैं।

    सबसे बड़ा पर्यावरणीय खतरा सिंगरौली जिले में प्रस्तावित धिरौली कोल ब्लॉक परियोजना से जुड़ा माना जा रहा है। इस परियोजना के लिए करीब 1,397 हेक्टेयर वन भूमि आवंटित की गई है, जिसमें अधिकांश हिस्सा घने जंगल का है। जानकारी के अनुसार अब तक लगभग 35 हजार पेड़ काटे जा चुके हैं, जबकि करीब 5.70 लाख और पेड़ों के कटने की आशंका जताई जा रही है। सिंगरौली पहले से ही कोयला खनन और ताप विद्युत संयंत्रों के कारण गंभीर प्रदूषण झेल रहा है।राजधानी भोपाल में अयोध्या बायपास को फोरलेन से 10 लेन में तब्दील करने की योजना के तहत लगभग 7,800 पेड़ों को हटाने की अनुमति दी गई है। इसके अलावा कोलार बायपास और बंगरसिया से भोजपुर तक सड़क निर्माण कार्यों में भी बड़ी संख्या में पेड़ पहले ही काटे जा चुके हैं। इंदौर में रीगल चौराहे पर मेट्रो स्टेशन निर्माण के लिए 1,200 से अधिक पेड़ों पर संकट है, जबकि इंदौर-उज्जैन मार्ग के चौड़ीकरण में करीब 3,000 पेड़ प्रभावित होंगे।

    ग्वालियर में थाटीपुर रीडेंसिफिकेशन योजना और अन्य सड़क परियोजनाओं के चलते हजारों पुराने पेड़ हटाए जा चुके हैं या हटाने की प्रक्रिया में हैं। मंडला जिले में बसनिया डेम और उससे जुड़ी नहर व पावर परियोजनाओं से लगभग 2,100 हेक्टेयर वन क्षेत्र प्रभावित होगा, जहां करीब 5 लाख पेड़ों के कटने का अनुमान है। डिंडोरी में नर्मदा पर प्रस्तावित राघवपुर बांध और महू-खंडवा रेलवे लाइन परियोजना भी बड़े पैमाने पर वन कटाई का कारण बन रही हैं।पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि प्रदूषण से जूझ रहे शहरों में हरित आवरण का इस तरह कम होना सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट को और गहरा सकता है। वहीं सरकार का तर्क है कि इन परियोजनाओं के बदले बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण किया जाएगा, लेकिन विशेषज्ञ सवाल उठा रहे हैं कि क्या नए पौधे दशकों पुराने पेड़ों की भरपाई कर पाएंगे।

  • AIIMS की सबसे बड़ी स्टडी: कोविड वैक्सीन और युवाओं की अचानक मौत में 'कोई संबंध नहीं'

    AIIMS की सबसे बड़ी स्टडी: कोविड वैक्सीन और युवाओं की अचानक मौत में 'कोई संबंध नहीं'


    नई दिल्ली/ दिल्ली स्थित AIIMS ऑल इंडिया इंस्टिट्यूट ऑफ़ मेडिकल साइंसेज की हालिया स्टडी में यह पुष्टि हुई है कि कोरोना वायरस के टीकाकरण और युवाओं 18-45 साल में अचानक मौतों के बीच कोई वैज्ञानिक संबंध नहीं है। यह अध्ययन फोरेंसिक और पैथोलॉजिकल जांच पर आधारित है और कोविड वैक्सीन की सुरक्षा को दोहराता है। स्टडी में एक वर्ष के दौरान अचानक मौत के 2,214 मामलों का अध्ययन किया गया, जिनमें से 180 मामलों को अचानक मौत माना गया। इसमें दुर्घटना, आत्महत्या, हत्या और ड्रग्स से मौत के केस बाहर रखे गए। हर मामले में परिवार से बातचीत करके मृतक की पुरानी बीमारियों, कोविड संक्रमण का इतिहास, वैक्सीनेशन स्टेटस, धूम्रपान-शराब की आदतें जैसी जानकारियां जुटाई गईं। अध्ययन में मौखिक ऑटोप्सी, पोस्ट-मॉर्टम इमेजिंग, पारंपरिक ऑटोप्सी और हिस्टोपैथोलॉजिकल जांच शामिल थी। शोध टीम में फोरेंसिक विशेषज्ञ, पैथोलॉजिस्ट, रेडियोलॉजिस्ट और क्लिनिशियन शामिल थे।

    मुख्य निष्कर्ष:

    कोविड वैक्सीन सुरक्षित: टीकाकरण की स्थिति और अचानक मौतों के बीच कोई सांख्यिकीय संबंध नहीं पाया गया। हृदय रोग प्रमुख कारण: युवाओं में अचानक मौत का सबसे आम कारण अस्पष्ट हृदय रोग रहा। इसके बाद श्वसन प्रणाली और अन्य गैर-हृदय संबंधी कारण जिम्मेदार थे। युवाओं और बड़ों की तुलना: 18-45 साल के युवाओं और 46-65 साल के बड़ों में कोविड-19 का इतिहास और टीकाकरण लगभग समान पाया गया। सुरक्षा और जागरूकता: डॉक्टरों ने कहा कि अचानक मौतों के पीछे छिपे हृदय रोग और जीवनशैली संबंधी कारण ज़्यादातर जिम्मेदार हैं। इसलिए समय पर जांच, स्वस्थ जीवनशैली और इलाज जरूरी है। AIIMS के प्रोफेसर डॉ. सुधीर अरावा ने कहा, झूठे दावों और अफवाहों के बीच यह स्टडी बहुत जरूरी थी। इससे साबित होता है कि युवाओं में अचानक मौतें कोविड-19 टीकाकरण से संबंधित नहीं हैं। इस अध्ययन के नतीजे दुनिया भर के वैज्ञानिक अध्ययनों से मेल खाते हैं, जो कोविड-19 वैक्सीन को सुरक्षित और प्रभावी बताते हैं।

    स्टडी की अवधि और तरीका:

    समय: मई 2023 से अप्रैल 2024 कुल मामले: 2,214 लाशों में से 180 अचानक मौत छानबीन: पारिवारिक जानकारी, स्वास्थ्य इतिहास, ऑटोप्सी, पोस्ट-मॉर्टम इमेजिंग निष्कर्ष: टीकाकरण और अचानक मौत में कोई संबंध नहीं युवाओं में अचानक मौतें मुख्य रूप से अस्पष्ट हृदय रोगों और जीवनशैली से संबंधित कारणों से होती हैं, न कि कोविड-19 वैक्सीन से। विशेषज्ञों का कहना है कि जल्दी जांच, सही जीवनशैली और समय पर इलाज से इन मौतों को रोका जा सकता है।