Tag: Public Interest Litigation

  • पानी की समस्या पहुंची कोर्ट, प्री-मानसून तैयारियों को लेकर नगर निगम को फटकार

    पानी की समस्या पहुंची कोर्ट, प्री-मानसून तैयारियों को लेकर नगर निगम को फटकार


    मध्य प्रदेश । इंदौर में लगातार गहराते जल संकट को लेकर दायर जनहित याचिका पर हाईकोर्ट ने गंभीर रुख अपनाया है। जबलपुर स्थित Madhya Pradesh High Court की अवकाशकालीन पीठ ने नगर निगम को मानसून पूर्व जल संरक्षण और भूजल पुनर्भरण से जुड़े जरूरी कार्य तत्काल शुरू करने के निर्देश दिए हैं। न्यायमूर्ति Pranay Verma और Jai Kumar Pillai की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि वर्षा जल के अधिकतम उपयोग और जल स्रोतों के संरक्षण के लिए त्वरित कदम उठाए जाना आवश्यक है।

    यह जनहित याचिका Rajlakshmi Foundation की ओर से दायर की गई है। याचिका में इंदौर और आसपास के क्षेत्रों में तेजी से गिरते भूजल स्तर, सूखते तालाबों, झीलों, कुओं और बावड़ियों की स्थिति पर चिंता जताई गई है। साथ ही यह भी बताया गया कि कई पारंपरिक जल स्रोतों से जुड़े फीडर चैनल और मोहरियां अवरुद्ध हो चुकी हैं, जिससे वर्षा जल का प्राकृतिक प्रवाह बाधित हो रहा है।

    याचिका में रेनवॉटर हार्वेस्टिंग नियमों के प्रभावी क्रियान्वयन की कमी, शहर में बढ़ते कंक्रीटीकरण, जलाशयों में सीवेज प्रदूषण, पाइपलाइन लीकेज, परित्यक्त बोरवेल और उपचारित अपशिष्ट जल के सीमित उपयोग जैसे मुद्दों को भी प्रमुखता से उठाया गया। इसके अलावा ग्रामीण और पेरी-अर्बन क्षेत्रों के वाटरशेड संरक्षण और पुनर्स्थापन की आवश्यकता पर भी जोर दिया गया।

    विशेष रूप से असराबाद खुर्द, मिर्जापुर, रालामंडल, लिम्बोदी, बिलावली, छोटी बिलावली और पिपल्यापाला जैसे जलाशयों के वैज्ञानिक पुनर्जीवन की मांग याचिका में की गई है। इन जल स्रोतों को इंदौर की पारंपरिक जल-श्रृंखला का महत्वपूर्ण हिस्सा बताया गया है, जो भूजल स्तर बनाए रखने में अहम भूमिका निभाते हैं।

    मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने इंदौर नगर निगम को निर्देश दिया कि अगले सात दिनों के भीतर सार्वजनिक सूचना जारी कर सभी सरकारी भवनों, अस्पतालों, स्कूलों, कॉलेजों, अपार्टमेंट्स, मॉल, होटल, व्यावसायिक परिसरों और अन्य संस्थानों को अपने रेनवॉटर हार्वेस्टिंग सिस्टम की सफाई, डी-सिल्टिंग और उन्हें पूरी तरह क्रियाशील बनाने के लिए निर्देशित किया जाए।

    अदालत ने यह भी कहा कि पहली भारी मानसूनी बारिश से पहले प्राथमिकता वाले जलाशयों से जुड़े स्टॉर्म वॉटर ड्रेन्स, फीडर चैनलों, झीलों के इनलेट और आउटलेट, मोहरियों तथा रिचार्ज चैनलों की आपात सफाई कराई जाए। कोर्ट का मानना है कि यदि इन मार्गों को समय रहते साफ कर दिया जाए तो बारिश का पानी बहकर नष्ट होने के बजाय भूजल रिचार्ज और जलाशयों के पुनर्भरण में उपयोग हो सकेगा।

    जल संकट जैसे गंभीर मुद्दे पर हाईकोर्ट के हस्तक्षेप को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अब सभी की नजरें 8 जून को होने वाली अगली सुनवाई पर टिकी हैं, जिसमें नगर निगम द्वारा उठाए गए कदमों की जानकारी अदालत के समक्ष रखी जाएगी।

  • धर्मांतरण और सरकारी लाभ पर HC की सख्ती, पूछा– कितने लोग ले रहे दोहरा फायदा?

    धर्मांतरण और सरकारी लाभ पर HC की सख्ती, पूछा– कितने लोग ले रहे दोहरा फायदा?


    नई दिल्ली(New Delhi)। 
    Uttarakhand High Court में धर्मांतरण के बाद सरकारी योजनाओं और आरक्षण के कथित “दोहरी सुविधा” को लेकर दायर जनहित याचिका पर सुनवाई हुई। यह याचिका पिथौरागढ़ निवासी दर्शन लाल द्वारा दाखिल की गई है, जिसमें आरोप लगाया गया है कि कुछ लोग धर्म परिवर्तन के बाद भी पहले से मिल रहे सरकारी लाभों का फायदा उठा रहे हैं।

    सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश मनोज कुमार गुप्ता और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ ने याचिकाकर्ता से पूछा कि ऐसे कितने लोग हैं जिन्होंने धर्म परिवर्तन के बाद भी सरकारी योजनाओं और आरक्षण का लाभ लिया है। कोर्ट ने याचिकाकर्ता को निर्देश दिया कि वह ऐसे सभी मामलों को चिन्हित कर तीन सप्ताह के भीतर उन्हें पक्षकार बनाए और विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत करे।

    याचिका में दावा किया गया है कि इस कथित स्थिति के कारण वास्तविक पात्र लाभार्थियों तक योजनाओं का लाभ नहीं पहुंच पा रहा है। याचिकाकर्ता ने इस पर रोक लगाने की मांग भी अदालत से की है। मामले की अगली सुनवाई तीन सप्ताह बाद तय की गई है।

    इसी बीच प्रशासनिक स्तर पर भी निगरानी बढ़ाई गई है। रुद्रपुर में जिला प्रशासन ने धर्मांतरण, अवैध नशा, अतिक्रमण और अन्य अवैध गतिविधियों पर कड़ी नजर रखने के निर्देश जारी किए हैं।

  • मंडला में स्वास्थ्य सिस्टम की पोल खुली, हाईकोर्ट में पहुंचा मामला-प्रसूति वार्ड में फर्श पर लेटती महिलाएं

    मंडला में स्वास्थ्य सिस्टम की पोल खुली, हाईकोर्ट में पहुंचा मामला-प्रसूति वार्ड में फर्श पर लेटती महिलाएं


    नई दिल्ली। मध्य प्रदेश के Jabalpur स्थित हाईकोर्ट में मंडला जिला अस्पताल की बदहाल स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर एक जनहित याचिका दायर की गई है, जिसने पूरे स्वास्थ्य तंत्र पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। याचिका में आरोप लगाया गया है कि आदिवासी बहुल जिले में चिकित्सा सुविधाएं बेहद कमजोर हैं और मरीजों को बुनियादी इलाज तक नहीं मिल पा रहा है।
    याचिकाकर्ता के अनुसार मंडला जिले की आबादी करीब 10 लाख है, जिसमें अधिकांश लोग ग्रामीण और आदिवासी समुदाय से आते हैं, लेकिन जिला अस्पताल में डॉक्टरों की भारी कमी बनी हुई है। 42 स्वीकृत पदों के मुकाबले केवल 17 डॉक्टर ही वर्तमान में तैनात हैं।
    याचिका में यह भी बताया गया है कि कई अहम विशेषज्ञ पद वर्षों से खाली पड़े हैं। कार्डियोलॉजिस्ट, न्यूरोलॉजिस्ट, गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट, यूरोलॉजिस्ट और रेडियोलॉजिस्ट जैसे विशेषज्ञ डॉक्टरों की अनुपस्थिति के कारण गंभीर मरीजों को इलाज के लिए जबलपुर या नागपुर रेफर करना पड़ता है। रेडियोलॉजिस्ट न होने से सोनोग्राफी जैसी महत्वपूर्ण सेवाएं भी बाधित हैं, जिससे मरीजों को निजी केंद्रों पर महंगे परीक्षण कराने पड़ते हैं।
    सबसे चिंताजनक स्थिति प्रसूति वार्ड की बताई गई है, जहां बिस्तरों की कमी के कारण गर्भवती महिलाओं और नवजात शिशुओं को फर्श पर लेटने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। इसे याचिका में संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत गरिमापूर्ण जीवन के अधिकार का उल्लंघन बताया गया है।
    मामले की सुनवाई करते हुए मुख्य न्यायाधीश Sanjeev Sachdeva और न्यायमूर्ति विनय सराफ की डिवीजन बेंच ने राज्य सरकार, स्वास्थ्य विभाग और मंडला सीएमएचओ को नोटिस जारी कर चार सप्ताह में जवाब देने का आदेश दिया है। अगली सुनवाई जून में होगी।
    याचिकाकर्ता ने यह भी आरोप लगाया है कि स्थिति सुधारने के लिए कई बार प्रदर्शन और ज्ञापन दिए गए, लेकिन प्रशासन की ओर से कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया।
    कोर्ट में दायर याचिका में मांग की गई है कि प्रसूति वार्ड में तत्काल अतिरिक्त बिस्तरों की व्यवस्था की जाए, विशेषज्ञ डॉक्टरों की नियुक्ति समयबद्ध तरीके से हो और स्वास्थ्य सेवाओं में लापरवाही बरतने वाले अधिकारियों पर कार्रवाई की जाए। फिलहाल यह मामला न सिर्फ मंडला की स्वास्थ्य व्यवस्था पर सवाल खड़ा कर रहा है, बल्कि पूरे राज्य की ग्रामीण स्वास्थ्य सुविधाओं की स्थिति को भी उजागर कर रहा है।

  • मध्यप्रदेश में बंद परिवहन निगम पर हाईकोर्ट सख्त, सरकार को फिर नोटिस

    मध्यप्रदेश में बंद परिवहन निगम पर हाईकोर्ट सख्त, सरकार को फिर नोटिस


    नई दिल्ली। मध्यप्रदेश में वर्षों से बंद पड़े राज्य सड़क परिवहन निगम को लेकर मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने सख्त टिप्पणी की है। कोर्ट ने राज्य और केंद्र सरकार को पुनः नोटिस जारी करते हुए छह सप्ताह के भीतर विस्तृत जवाब प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं। यह मामला जनहित याचिका के रूप में सामने आया है, जिसमें राज्य में सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था की गंभीर स्थिति को उजागर किया गया है।

     21 साल से बंद परिवहन सेवा पर सवाल
    यह याचिका सामाजिक कार्यकर्ता और अधिवक्ता बीएल जैन द्वारा दायर की गई थी। इसमें कहा गया है कि लगभग 21 वर्षों से राज्य का परिवहन निगम बंद पड़ा है, जिसके कारण लोगों को यात्रा के लिए निजी बसों और असुरक्षित साधनों पर निर्भर रहना पड़ रहा है।

     ग्रामीण इलाकों में हालात गंभीर
    याचिका में बताया गया कि ग्रामीण क्षेत्रों में बसों की कमी के कारण लोग मालवाहक वाहनों में यात्रा करने को मजबूर हैं, जिससे दुर्घटनाओं का खतरा लगातार बढ़ रहा है। कई मामलों में जानमाल की हानि भी हो चुकी है।

     पहले भी नोटिस, लेकिन जवाब नहीं
    कोर्ट ने पहले भी सितंबर 2024 में राज्य सरकार को चार सप्ताह में जवाब देने के निर्देश दिए थे, लेकिन अब तक कोई जवाब दाखिल नहीं किया गया। इस पर अदालत ने नाराजगी जताते हुए दोबारा नोटिस जारी किया है।

    सरकारी जिम्मेदारी पर उठे सवाल
    याचिकाकर्ता की ओर से तर्क दिया गया कि सुरक्षित और सुलभ परिवहन व्यवस्था उपलब्ध कराना सरकार की मूल जिम्मेदारी है, ठीक वैसे ही जैसे शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएं। केरल और महाराष्ट्र जैसे राज्यों का उदाहरण देते हुए कहा गया कि वहां सरकारी परिवहन निगम सफलतापूर्वक चल रहे हैं और लाभ में भी हैं।

     घोषणाओं के बावजूद ठोस कदम नहीं
    याचिका में यह भी कहा गया कि राज्य सरकार द्वारा समय-समय पर सार्वजनिक परिवहन सेवा शुरू करने की घोषणाएं की गईं, लेकिन अब तक कोई ठोस कार्रवाई जमीन पर नहीं दिखी।

     सार्वजनिक परिवहन पर बढ़ा दबाव
    मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की यह सख्ती राज्य में बंद परिवहन व्यवस्था को लेकर नई बहस छेड़ रही है। अब सभी की नजर सरकार के जवाब और आगामी कदमों पर टिकी है।

  • नई दिल्ली में एलपीजी व्यवस्था को लेकर न्यायिक टिप्पणी, नीति निर्धारण को कार्यपालिका का विषय बताया गया

    नई दिल्ली में एलपीजी व्यवस्था को लेकर न्यायिक टिप्पणी, नीति निर्धारण को कार्यपालिका का विषय बताया गया


    नई दिल्ली :में एलपीजी सिलेंडर की कमी और कथित कालाबाजारी से जुड़ी एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए दिल्ली हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया है। अदालत ने इस याचिका को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि इस प्रकार के मामलों का समाधान न्यायपालिका के बजाय कार्यपालिका के स्तर पर किया जाना चाहिए। इस फैसले के बाद एलपीजी आपूर्ति और उससे जुड़े मुद्दों को लेकर चर्चा एक बार फिर तेज हो गई है।
    याचिका में यह दावा किया गया था कि राजधानी में एलपीजी सिलेंडरों की आपूर्ति में कमी के कारण आम लोगों को कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है और कई स्थानों पर कालाबाजारी के चलते उपभोक्ताओं को अधिक कीमत चुकानी पड़ रही है। याचिकाकर्ता ने सरकार पर पर्याप्त कदम न उठाने का आरोप लगाते हुए न्यायालय से हस्तक्षेप की मांग की थी।
    सुनवाई के दौरान अदालत ने स्पष्ट किया कि एलपीजी जैसी आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति, वितरण और मूल्य निर्धारण से जुड़े निर्णय सरकार और प्रशासनिक तंत्र के अधिकार क्षेत्र में आते हैं। अदालत ने यह भी कहा कि नीति निर्धारण और संसाधन प्रबंधन से जुड़े मुद्दों पर न्यायिक आदेश देना उचित नहीं होगा, क्योंकि यह कार्यपालिका की जिम्मेदारी है।
    न्यायालय ने यह टिप्पणी भी की कि सामाजिक और आर्थिक समस्याओं जैसे गरीबी, शिक्षा और आवश्यक वस्तुओं की उपलब्धता से जुड़े विषयों का समाधान सरकार की नीतियों और योजनाओं के माध्यम से किया जाता है। अदालत ने यह स्पष्ट किया कि वह ऐसे मामलों में प्रशासनिक निर्णयों की जगह नहीं ले सकती, चाहे परिस्थितियां कितनी भी चुनौतीपूर्ण क्यों न हों।
    एलपीजी आपूर्ति से जुड़े मुद्दों पर हाल के समय में कुछ क्षेत्रों में अस्थायी बाधाएं और वितरण संबंधी शिकायतें सामने आई थीं, जिससे उपभोक्ताओं में असंतोष देखा गया। कुछ स्थानों पर कीमतों में अनियमितता और जमाखोरी की शिकायतें भी दर्ज की गई थीं, जिसके बाद प्रशासनिक स्तर पर कार्रवाई की गई थी। संबंधित एजेंसियों ने ऐसे मामलों में जांच और छापेमारी की प्रक्रिया भी अपनाई थी।
    अदालत के इस निर्णय के बाद अब यह स्पष्ट हो गया है कि एलपीजी आपूर्ति और वितरण से जुड़े सभी मुद्दों का समाधान सरकार और संबंधित विभागों द्वारा ही किया जाएगा। न्यायालय ने संकेत दिया कि ऐसे मामलों में नीति सुधार और प्रशासनिक दक्षता ही मुख्य समाधान का आधार हैं।
    यह फैसला इस बात को भी रेखांकित करता है कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली और आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति जैसे विषयों में संतुलन बनाए रखना प्रशासनिक जिम्मेदारी का हिस्सा है। इससे यह संदेश भी जाता है कि न्यायपालिका और कार्यपालिका की भूमिकाएं स्पष्ट रूप से अलग हैं और दोनों अपने अपने दायरे में कार्य करते हैं।
  • नर्मदा में जहर घोल रहा सीवेज: हाईकोर्ट ने नगर निगम और प्रदूषण बोर्ड को थमाया नोटिस; हर दिन 98 करोड़ लीटर गंदा पानी मिलने का सनसनीखेज दावा

    नर्मदा में जहर घोल रहा सीवेज: हाईकोर्ट ने नगर निगम और प्रदूषण बोर्ड को थमाया नोटिस; हर दिन 98 करोड़ लीटर गंदा पानी मिलने का सनसनीखेज दावा


    जबलपुर। मध्य प्रदेश की जीवनदायिनी नर्मदा नदी के प्रदूषण को लेकर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने बेहद गंभीर रुख अपनाया है। नदी में सीधे तौर पर मिल रहे गंदे पानी और सीवेज को लेकर दायर एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने जबलपुर नगर निगममध्य प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और अन्य संबंधित विभागों से जवाब तलब किया है। याचिका में किए गए दावे ने प्रशासन की कार्यप्रणाली पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैंजिसमें कहा गया है कि नर्मदा में प्रतिदिन 98 करोड़ लीटर 980 MLD सीवेज का पानी बिना उपचार के मिल रहा है।

    हाईकोर्ट की खंडपीठ ने लिया संज्ञान

    इस संवेदनशील मामले की सुनवाई हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस संजीव सचदेवा और जस्टिस विनय शराप की युगलपीठ में हुई। याचिकाकर्ता जबलपुर निवासी विनीता आहूजा ने अपनी याचिका में साक्ष्यों के साथ यह दलील दी कि तमाम वादों और प्रोजेक्ट्स के बावजूद नर्मदा के पवित्र जल में गंदे नालों का पानी मिलना बंद नहीं हुआ है। मामले की गंभीरता को देखते हुए माननीय न्यायालय ने तत्काल प्रभाव से नोटिस जारी कर संबंधित पक्षों से स्पष्टीकरण मांगा है।

    इन प्रमुख विभागों को देना होगा जवाब

    हाईकोर्ट ने इस मामले में जिम्मेदारी तय करने के लिए विस्तृत सूची को नोटिस जारी किया हैजिनमें शामिल हैं:प्रमुख सचिवलोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग सचिव नगरीय विकास विभागजबलपुर नगर निगम मध्य प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड

    नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण

    कोर्ट ने इस नई जनहित याचिका को पहले से लंबित इसी तरह की एक अन्य याचिका के साथ जोड़ दिया हैताकि नदी प्रदूषण के मुद्दे पर एक साथ और व्यापक सुनवाई की जा सके।

    98 करोड़ लीटर सीवेज: एक बड़ी चुनौती
    याचिका में दावा किया गया है कि शहर का सीवेज सिस्टम पूरी तरह विफल है और ट्रीटमेंट प्लांट की क्षमता इतनी नहीं है कि वह प्रतिदिन निकलने वाले 98 करोड़ लीटर गंदे पानी को साफ कर सके। परिणामस्वरुपयह प्रदूषित पानी सीधे नर्मदा में जाकर गिर रहा हैजिससे न केवल जल प्रदूषित हो रहा हैबल्कि जलीय जीवों और इस जल का उपयोग करने वाले लाखों लोगों के स्वास्थ्य पर भी संकट मंडरा रहा है। अब देखना यह होगा कि नगर निगम और प्रशासन हाईकोर्ट में क्या सफाई पेश करते हैं और नर्मदा को प्रदूषण मुक्त करने के लिए क्या ठोस कार्ययोजना कोर्ट के सामने रखी जाती है।

  • आयुष्मान योजना पर बड़ा फैसला: निजी अस्पतालों के इंपैनलमेंट को चुनौती देने वाली याचिका हाईकोर्ट ने की खारिज

    आयुष्मान योजना पर बड़ा फैसला: निजी अस्पतालों के इंपैनलमेंट को चुनौती देने वाली याचिका हाईकोर्ट ने की खारिज


    जबलपुर । मध्यप्रदेश में आयुष्मान भारत योजना के तहत निजी अस्पतालों के इंपैनलमेंट को लेकर दायर की गई जनहित याचिका को हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया है। जबलपुर हाईकोर्ट ने अपने अहम फैसले में साफ कहा कि राज्य सरकार का यह कदम आम जनता को बेहतर और गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने के उद्देश्य से उठाया गया है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि जिन निजी अस्पतालों को इंपैनलमेंट या नवीनीकरण की शर्तों से कोई आपत्ति है, वे स्वयं अदालत का दरवाजा खटखटा सकते हैं, लेकिन जनहित याचिका के माध्यम से इस प्रक्रिया को चुनौती नहीं दी जा सकती।

    यह याचिका जबलपुर निवासी देवेंद्र दत्त द्वारा दायर की गई थी, जिसमें आयुष्मान योजना के अंतर्गत निजी अस्पतालों के इंपैनलमेंट के लिए नेशनल एक्रिडिटेशन बोर्ड फॉर हॉस्पिटल्स NABH  सर्टिफिकेट को अनिवार्य किए जाने पर सवाल उठाए गए थे। याचिकाकर्ता का तर्क था कि मध्यप्रदेश सरकार द्वारा 23 सितंबर और 10 अक्टूबर 2025 को जारी आदेश छोटे और मध्यम स्तर के निजी अस्पतालों के हितों के खिलाफ हैं। याचिका में कहा गया था कि NABH सर्टिफिकेट की शर्तें जटिल और खर्चीली हैं, जिससे छोटे अस्पताल योजना से बाहर हो सकते हैं और स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच प्रभावित होगी।

    हालांकि, हाईकोर्ट ने इन दलीलों को स्वीकार नहीं किया। कोर्ट ने कहा कि आयुष्मान भारत योजना का मुख्य उद्देश्य गरीब और जरूरतमंद लोगों को मुफ्त और गुणवत्तापूर्ण इलाज उपलब्ध कराना है। ऐसे में यह आवश्यक है कि योजना से जुड़े अस्पतालों में इलाज की गुणवत्ता और मरीजों की सुरक्षा के मानक सुनिश्चित किए जाएं। NABH सर्टिफिकेशन इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, जिससे अस्पतालों की सेवाओं की गुणवत्ता का आकलन किया जा सकता है।

    कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि सरकार को यह अधिकार है कि वह अपनी योजनाओं के लिए आवश्यक मानक तय करे। यदि किसी निजी अस्पताल को लगता है कि ये शर्तें उसके लिए अनुचित हैं या उसके अधिकारों का उल्लंघन करती हैं, तो वह व्यक्तिगत रूप से अदालत में याचिका दायर कर सकता है। लेकिन जनहित याचिका के माध्यम से पूरी नीति को चुनौती देना उचित नहीं है।

    इस फैसले को राज्य सरकार के लिए बड़ी राहत के रूप में देखा जा रहा है। सरकार पहले ही स्पष्ट कर चुकी है कि आयुष्मान योजना में केवल उन्हीं अस्पतालों को शामिल किया जाना चाहिए, जो मरीजों को सुरक्षित, पारदर्शी और उच्च गुणवत्ता वाली स्वास्थ्य सेवाएं देने में सक्षम हों। NABH सर्टिफिकेशन को इसी दिशा में गुणवत्ता सुनिश्चित करने का एक मानक माना जा रहा है।

    वहीं, निजी अस्पतालों के एक वर्ग का मानना है कि NABH सर्टिफिकेशन की प्रक्रिया महंगी और समय लेने वाली है, जिससे छोटे अस्पतालों को कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है। हालांकि, हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद अब ऐसे अस्पतालों को या तो तय मानकों को पूरा करना होगा या फिर व्यक्तिगत स्तर पर कानूनी विकल्प तलाशने होंगे।

    कुल मिलाकर, हाईकोर्ट का यह निर्णय आयुष्मान योजना के तहत स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता को प्राथमिकता देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है, जिससे योजना के लाभार्थियों को बेहतर इलाज मिल सकेगा।

  • वेश्यावृत्ति व तस्करी के आरोपों पर हाईकोर्ट सख्त, IG से कहा– सोच बदलिए, 11 साल का डेटा पेश करें

    वेश्यावृत्ति व तस्करी के आरोपों पर हाईकोर्ट सख्त, IG से कहा– सोच बदलिए, 11 साल का डेटा पेश करें


    ग्वालियर। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने लड़कियों की कथित तस्करी और जबरन वेश्यावृत्ति से जुड़े एक गंभीर मामले में पुलिस प्रशासन के रवैये पर कड़ी नाराजगी जताई है। ग्वालियर खंडपीठ ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि महिलाओं और नाबालिगों से जुड़े अपराधों को हल्के में लेना अस्वीकार्य है। अदालत ने ग्वालियर रेंज के पुलिस महानिरीक्षक अरविंद सक्सेना को व्यक्तिगत रूप से पेश होने के निर्देश देते हुए वर्ष 2014 से अब तक के 11 वर्षों में ग्वालियर संभाग से लापता हुई लड़कियों और उनकी बरामदगी से जुड़ा विस्तृत रिकॉर्ड तलब किया है।

    यह सख्त आदेश पायल नामक महिला द्वारा दायर जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान दिया गया। याचिका में आरोप लगाया गया है कि शिवपुरी जिले में कुछ संगठित गिरोह युवतियों को बंधक बनाकर उनसे जबरन देह व्यापार करवा रहे हैं। याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता ऋषिकेश बोहरे ने अदालत को बताया कि इस संबंध में पुलिस और प्रशासन को कई बार शिकायतें दी गईं, लेकिन कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई।सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से पेश जवाब पर अदालत ने तीखी आपत्ति जताई। शासन ने अपने जवाब में इस पूरे मामले को आपसी पारिवारिक विवाद बताया था। हाईकोर्ट ने इस तर्क को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि यदि आरोपों में जरा भी सच्चाई है, तो यह केवल निजी विवाद नहीं बल्कि संगठित अपराध, मानव तस्करी और गंभीर मानवाधिकार उल्लंघन का मामला बनता है।

    खंडपीठ ने टिप्पणी की कि पुलिस का दृष्टिकोण बेहद चिंताजनक है। अदालत ने कहा कि महिलाओं और नाबालिगों की सुरक्षा से जुड़े मामलों में संवेदनशीलता और जिम्मेदारी सबसे अहम है। इसी क्रम में कोर्ट ने आईजी को स्पष्ट निर्देश देते हुए कहा कि केवल फाइलों और कागजी जवाबों से काम नहीं चलेगा, बल्कि सोच और कार्यशैली में बदलाव जरूरी है।हाईकोर्ट ने निर्देश दिए हैं कि वर्ष 2014 से अब तक ग्वालियर संभाग में दर्ज सभी गुमशुदगी मामलों का विस्तृत ब्योरा पेश किया जाए। इसमें यह जानकारी भी शामिल करनी होगी कि कितनी लड़कियां लापता घोषित की गईं, कितनी को बरामद किया गया और कितने मामलों की जांच अब तक लंबित है। अदालत ने संकेत दिए हैं कि इन आंकड़ों के विश्लेषण के बाद पुलिस प्रशासन पर और भी सख्त निर्देश जारी किए जा सकते हैं।

    गौरतलब है कि इससे पहले शिवपुरी जिले के पुलिस अधीक्षक को भी इस मामले में तलब किया जा चुका है। हाईकोर्ट ने दो टूक कहा कि गंभीर आरोपों को नजरअंदाज करना या उन्हें घरेलू विवाद बताकर दबाना कानून व्यवस्था पर सवाल खड़े करता है।अदालत के इस सख्त रुख के बाद पुलिस महकमे में हलचल मच गई है। अधिकारियों के अनुसार, पुराने रिकॉर्ड खंगाले जा रहे हैं और आंकड़ों को संकलित करने की प्रक्रिया तेज कर दी गई है। वहीं महिला अधिकार संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने हाईकोर्ट के हस्तक्षेप को अहम बताते हुए कहा है कि इससे लड़कियों की सुरक्षा और पुलिस की जवाबदेही तय करने की दिशा में ठोस कदम उठाए जा सकेंगे।

  • दूषित पानी पर हाईकोर्ट का कड़ा प्रहार, इंदौर की ‘स्वच्छ’ छवि पर लगे दाग से कोर्ट चिंतित

    दूषित पानी पर हाईकोर्ट का कड़ा प्रहार, इंदौर की ‘स्वच्छ’ छवि पर लगे दाग से कोर्ट चिंतित


     इंदौर।  मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर पीठ ने दूषित पेयजल से हुई मौतों के मामले में सख्त रुख अपनाते हुए राज्य सरकार और इंदौर नगर निगम को कड़ी फटकार लगाई है। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि इस गंभीर लापरवाही ने न सिर्फ आम नागरिकों की जान ली, बल्कि ‘देश के सबसे स्वच्छ शहर’ के रूप में पहचान बना चुके इंदौर की छवि को भी गहरा आघात पहुंचाया है। कोर्ट ने दो टूक कहा कि स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराना नागरिकों का मौलिक अधिकार है और इसमें किसी भी स्तर पर की गई लापरवाही अस्वीकार्य है। यदि जरूरत पड़ी तो दोषी अधिकारियों की सिविल के साथ-साथ आपराधिक जिम्मेदारी भी तय की जाएगी।

    हाईकोर्ट में दूषित पेयजल से संबंधित पांच याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई हुई। सुनवाई के दौरान पीठ ने यह भी संकेत दिया कि पीड़ित परिवारों को दिया गया मुआवजा यदि अपर्याप्त पाया गया, तो उसे बढ़ाने के निर्देश दिए जा सकते हैं। अदालत ने राज्य सरकार और नगर निगम से विस्तृत जवाब के साथ नई और अपडेटेड स्टेटस रिपोर्ट पेश करने को कहा है, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि अब तक क्या कदम उठाए गए हैं और आगे क्या कार्ययोजना है।कोर्ट ने अपने आदेश में संविधान के अनुच्छेद 21 का हवाला देते हुए कहा कि जीवन के अधिकार में स्वच्छ और सुरक्षित पेयजल का अधिकार भी शामिल है। इस अधिकार की अनदेखी को अदालत ने गंभीर अपराध की श्रेणी में माना। मामले की अगली सुनवाई 15 जनवरी को निर्धारित की गई है, जिसमें राज्य के मुख्य सचिव को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से व्यक्तिगत रूप से उपस्थित रहने के निर्देश दिए गए हैं। इससे साफ है कि कोर्ट इस मामले में किसी भी तरह की ढिलाई बरतने के मूड में नहीं है।

    स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि भागीरथपुरा इलाके में दूषित पानी पीने से अब तक 17 लोगों की मौत हो चुकी है। मंगलवार को उल्टी-दस्त के 38 नए मामले सामने आए, जिनमें से 6 मरीजों की हालत गंभीर होने पर उन्हें अरबिंदो अस्पताल रेफर किया गया। स्वास्थ्य विभाग के अनुसार कुल 110 मरीज फिलहाल विभिन्न अस्पतालों में भर्ती हैं। अब तक 421 मरीज इलाज के लिए अस्पताल पहुंचे, जिनमें से 311 को इलाज के बाद छुट्टी दे दी गई है, जबकि 15 मरीज अभी भी आईसीयू में जिंदगी और मौत से जूझ रहे हैं।

    याचिकाकर्ताओं की ओर से कोर्ट को यह भी बताया गया कि 31 दिसंबर को ही हाईकोर्ट ने स्वच्छ पेयजल आपूर्ति सुनिश्चित करने के निर्देश दिए थे, इसके बावजूद प्रभावित इलाकों में दूषित पानी की सप्लाई जारी रही। वरिष्ठ अधिवक्ता ने दलील दी कि यदि समय रहते शिकायतों पर गंभीरता से कार्रवाई होती, तो यह जनहानि रोकी जा सकती थी।अदालत के सामने यह तथ्य भी रखा गया कि वर्ष 2022 में नई पाइपलाइन बिछाने का प्रस्ताव पास किया गया था लेकिन फंड जारी न होने के कारण काम शुरू ही नहीं हो सका। इसके अलावा 2017-18 में लिए गए 60 जल नमूनों में से 59 नमूने पीने योग्य नहीं पाए गए थे। मध्यप्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की रिपोर्ट सामने होने के बावजूद ठोस सुधारात्मक कदम नहीं उठाए गए, जिससे हालात लगातार बिगड़ते चले गए।

  • ग्वालियर में अपात्र लोगों को पुलिस सुरक्षा पर हाईकोर्ट सख्त, सरकार से मांगा जवाब..

    ग्वालियर में अपात्र लोगों को पुलिस सुरक्षा पर हाईकोर्ट सख्त, सरकार से मांगा जवाब..


    ग्वालियर/मध्यप्रदेश के ग्वालियर में अपात्र और निजी व्यक्तियों को दी जा रही पुलिस सुरक्षा का मामला एक बार फिर हाईकोर्ट के संज्ञान में आया है। इस मुद्दे को गंभीर जनहित से जुड़ा मानते हुए मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को कड़ी फटकार लगाई है और चार सप्ताह के भीतर विस्तृत जवाब पेश करने के निर्देश दिए हैं। अदालत ने साफ संकेत दिए हैं कि पुलिस बल का इस तरह दुरुपयोग स्वीकार्य नहीं है।यह मामला याचिकाकर्ता नवल किशोर शर्मा द्वारा दायर जनहित याचिका के माध्यम से उठाया गया है। याचिका में कहा गया है कि हाईकोर्ट के पूर्व आदेशों के बावजूद निजी व्यक्तियों को दी जा रही पुलिस सुरक्षा की कोई प्रभावी समीक्षा नहीं की गई। इसके कारण आज भी कई ऐसे लोग पुलिस सुरक्षा का लाभ उठा रहे हैं, जो इसके पात्र नहीं हैं।

    याचिकाकर्ता की ओर से पैरवी कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता डीपी सिंह ने अदालत को बताया कि ग्वालियर में पुलिस बल की पहले से ही भारी कमी है। इसके बावजूद बड़ी संख्या में पुलिसकर्मी निजी व्यक्तियों की सुरक्षा में तैनात किए गए हैं। इससे न केवल आम जनता की सुरक्षा प्रभावित हो रही है, बल्कि सरकारी खजाने पर भी लाखों रुपये का अतिरिक्त बोझ पड़ रहा है।वकील ने अदालत के सामने उदाहरण पेश करते हुए बताया कि विनय सिंह नामक व्यक्ति को दी गई पुलिस सुरक्षा के दौरान ही उनके खिलाफ वसूली सहित पांच आपराधिक मामले दर्ज हुए। यह साफ तौर पर पुलिस सुरक्षा के दुरुपयोग और सिस्टम की विफलता को दर्शाता है। उन्होंने कहा कि जब सुरक्षा पाने वाले ही अपराधों में लिप्त हों, तो यह व्यवस्था की गंभीर खामी को उजागर करता है।

    हाईकोर्ट को यह भी बताया गया कि पूर्व आदेश के बाद सूचना के अधिकार RTI के तहत जो जानकारी सामने आई, वह और भी चिंताजनक है। RTI से खुलासा हुआ कि 19 व्यक्तियों की सुरक्षा में 33 पुलिसकर्मी तैनात थे, जबकि इनमें से अधिकांश व्यक्ति सुरक्षा के पात्र ही नहीं थे। यह स्थिति तब है जब शहर में आम नागरिकों को पर्याप्त पुलिस सहायता नहीं मिल पा रही है।इससे पहले भी हाईकोर्ट इस तरह के मामलों में सख्त रुख अपना चुका है। दिलीप शर्मा और संजय शर्मा को दी गई पुलिस सुरक्षा के मामले में कोर्ट ने कड़ी टिप्पणी करते हुए दोनों भाइयों से सुरक्षा पर हुए खर्च की वसूली के आदेश दिए थे। उस समय कोर्ट ने स्पष्ट कहा था कि किसी भी तुच्छ या अपात्र व्यक्ति को सरकारी खर्च पर पुलिस सुरक्षा नहीं दी जा सकती।

    न्यायालय ने अपने पुराने आदेशों में यह भी कहा था कि पुलिस सुरक्षा देने के लिए स्पष्ट, पारदर्शी और ठोस नियम बनाए जाने चाहिए। कोर्ट का मानना है कि सुरक्षा जैसी संवेदनशील व्यवस्था का इस्तेमाल केवल वास्तविक और प्रमाणित खतरे वाले मामलों में ही होना चाहिए, न कि प्रभाव या रसूख के आधार पर।हाईकोर्ट ने यह सुझाव भी दिया था कि जिन मामलों में व्यापारिक प्रतिस्पर्धा या निजी कारणों से खतरे की आशंका हो, और संबंधित परिवार के पास लाइसेंसी हथियार उपलब्ध हों, वहां निजी सुरक्षाकर्मियों की व्यवस्था एक बेहतर विकल्प हो सकती है। कोर्ट के अनुसार, निजी सुरक्षा गार्ड कई बार पुलिसकर्मियों की तुलना में ज्यादा सजग और प्रभावी साबित हो सकते हैं, जबकि पुलिस बल को कानून-व्यवस्था के मूल कामों में लगाया जाना चाहिए।

    ताजा सुनवाई में कोर्ट ने राज्य सरकार से पूछा है कि अब तक पूर्व आदेशों का पालन क्यों नहीं किया गया और अपात्र लोगों को दी जा रही सुरक्षा पर क्या कार्रवाई की गई है। नोटिस जारी कर चार सप्ताह में जवाब मांगा गया है।यह मामला न केवल ग्वालियर बल्कि पूरे प्रदेश में पुलिस सुरक्षा के दुरुपयोग और जवाबदेही से जुड़ा एक अहम उदाहरण बनता जा रहा है। आने वाले समय में राज्य सरकार की प्रतिक्रिया और कोर्ट का अगला रुख इस व्यवस्था की दिशा तय करेगा।