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  • नमिता थापर विवाद ने खड़े किए गंभीर सवाल, क्या डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर जिम्मेदारी का है भारी अभाव?

    नमिता थापर विवाद ने खड़े किए गंभीर सवाल, क्या डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर जिम्मेदारी का है भारी अभाव?


    नई दिल्ली। उद्यमिता और टेलीविजन जगत की जानी मानी हस्ती नमिता थापर हाल ही में सोशल मीडिया पर अपने एक वीडियो को लेकर विवादों में आ गई हैं। नमाज के स्वास्थ्य लाभों पर जानकारी साझा करने के बाद उन्हें ऑनलाइन ट्रोलिंग और अपमानजनक टिप्पणियों का सामना करना पड़ा। इस घटना ने एक बार फिर डिजिटल प्लेटफॉर्म पर संवाद की मर्यादा और जिम्मेदारी को लेकर बहस को तेज कर दिया है।

    मार्च के अंतिम सप्ताह में साझा किए गए एक वीडियो में नमिता थापर ने नमाज को एक शारीरिक गतिविधि के रूप में समझाते हुए उसके संभावित स्वास्थ्य लाभों पर चर्चा की थी। उन्होंने इसे एक नियमित व्यायाम की तरह बताया जो शरीर को सक्रिय रखने में मदद कर सकता है। उनका कहना था कि यह जानकारी पूरी तरह स्वास्थ्य जागरूकता के उद्देश्य से दी गई थी और इसका किसी भी धार्मिक भावना से कोई नकारात्मक संबंध नहीं था।

    हालांकि इस वीडियो के बाद उन्हें लगातार कई हफ्तों तक आलोचना और अपमानजनक प्रतिक्रियाओं का सामना करना पड़ा। उन्होंने बताया कि इस दौरान न केवल उन्हें बल्कि उनकी मां को भी निशाना बनाया गया और सोशल मीडिया पर असम्मानजनक भाषा का इस्तेमाल किया गया। इस स्थिति पर प्रतिक्रिया देते हुए उन्होंने सार्वजनिक रूप से अपनी नाराजगी जताई और इस तरह के व्यवहार को गलत ठहराया।

    उन्होंने यह भी कहा कि वे पहले भी कई सांस्कृतिक और पारंपरिक विषयों पर स्वास्थ्य से जुड़ी जानकारी साझा करती रही हैं, जिनमें योग और सूर्य नमस्कार जैसे विषय शामिल हैं। ऐसे विषयों पर कभी इस प्रकार की प्रतिक्रिया नहीं मिली, जिससे उन्होंने यह सवाल उठाया कि अलग अलग परिस्थितियों में लोगों की प्रतिक्रिया इतनी भिन्न क्यों हो जाती है।

    नमिता थापर ने इस पूरे मामले को महिलाओं के प्रति ऑनलाइन व्यवहार से भी जोड़ा और कहा कि समाज में महिलाओं के सम्मान की बात तो की जाती है, लेकिन वास्तविकता में कई बार उन्हें अपमानजनक टिप्पणियों का सामना करना पड़ता है। उन्होंने कहा कि असहमति होना स्वाभाविक है, लेकिन उसे व्यक्त करने का तरीका सभ्य और मर्यादित होना चाहिए।

    अपने बयान में उन्होंने अपनी धार्मिक पहचान को लेकर भी स्पष्ट रुख अपनाया और कहा कि वे अपने विश्वासों पर गर्व करती हैं। साथ ही उन्होंने यह दोहराया कि उनका उद्देश्य केवल स्वास्थ्य से जुड़ी जानकारी साझा करना था, न कि किसी धर्म या समुदाय को लेकर कोई टिप्पणी करना।

    यह पूरा घटनाक्रम सोशल मीडिया पर बढ़ती असहिष्णुता और संवाद के स्तर को लेकर गंभीर चिंताओं को उजागर करता है। विशेषज्ञों का मानना है कि डिजिटल माध्यमों पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ साथ जिम्मेदारी और सम्मान बनाए रखना भी उतना ही जरूरी है, ताकि स्वस्थ और संतुलित संवाद संभव हो सके।

  • राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा बना सियासी तूफान, मुख्यमंत्री सरमा के आरोपों के केंद्र में सांसद गौरव गोगोई और उनकी पत्नी

    राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा बना सियासी तूफान, मुख्यमंत्री सरमा के आरोपों के केंद्र में सांसद गौरव गोगोई और उनकी पत्नी


    गुवाहाटी। असम की राजनीति में उस समय बड़ा विवाद खड़ा हो गया जब मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने कांग्रेस सांसद गौरव गोगोई और उनकी पत्नी एलिजाबेथ कोलबर्न से जुड़े गंभीर आरोपों को सार्वजनिक किया। गुवाहाटी में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में सरमा ने दावा किया कि एलिजाबेथ कोलबर्न जो ब्रिटिश नागरिक हैं को एक पाकिस्तान आधारित फर्म ने नौकरी पर रखा था और उनकी सैलरी पाकिस्तानी नागरिक अली तौकीर शेख के माध्यम से दी जाती थी। मुख्यमंत्री ने इस पूरे मामले को व्यक्तिगत नहीं बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा मुद्दा बताया।

    दरअसल यह विवाद अचानक नहीं उभरा है इसकी जड़ें फरवरी 2025 में असम सरकार द्वारा गठित एक स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम SIT तक जाती हैं। इस टीम का गठन अली तौकीर शेख नामक पाकिस्तानी नागरिक की गतिविधियों की जांच के लिए किया गया था। सरकार के अनुसार शेख पर भारत विरोधी साजिश रचने और देश के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करने के आरोप थे। SIT ने करीब सात महीने तक जांच करने के बाद सितंबर 2025 में अपनी रिपोर्ट मुख्यमंत्री को सौंप दी।

    सरकार के मुताबिक रिपोर्ट में कुछ संवेदनशील जानकारियां थीं लेकिन राज्य पुलिस के अधिकार क्षेत्र और संसाधनों की सीमाओं को देखते हुए असम कैबिनेट ने निर्णय लिया कि इस मामले को केंद्र सरकार के गृह मंत्रालय MHA को भेजा जाए। अब संभावना जताई जा रही है कि आगे की जांच राष्ट्रीय जांच एजेंसी इंटेलिजेंस ब्यूरो IB या केंद्रीय जांच ब्यूरो CBI जैसी केंद्रीय एजेंसियों द्वारा की जा सकती है। जरूरत पड़ने पर इंटरपोल की मदद लेने की बात भी सामने आई है।

    मुख्यमंत्री सरमा ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में दावा किया कि एलिजाबेथ कोलबर्न को मार्च 2011 से मार्च 2012 के बीच पाकिस्तान स्थित एक फर्म में नियुक्त किया गया था। बाद में उन्हें भारत ट्रांसफर किया गया। सरमा के अनुसार उनकी सैलरी अली तौकीर शेख के माध्यम से दी जाती थी जिसे उन्होंने “पाकिस्तानी एजेंट करार दिया। आरोप है कि भारत में रहने के दौरान एलिजाबेथ ने विभिन्न सामाजिक और सरकारी मुद्दों पर जानकारी एकत्र की और कथित तौर पर उसे शेख तक पहुंचाया।

    मुख्यमंत्री ने यह भी दावा किया कि अगस्त 2014 की एक रिपोर्ट में भारतीय खुफिया एजेंसी IB से जुड़ी कुछ गोपनीय सूचनाओं का उल्लेख था। साथ ही जलवायु परिवर्तन से जुड़े प्रोजेक्ट्स और सरकार की प्रतिक्रिया को लेकर भी जानकारी साझा करने की बात कही गई। हालांकि इन दावों के समर्थन में सार्वजनिक रूप से कोई विस्तृत दस्तावेज पेश नहीं किए गए हैं और जांच अभी आगे की प्रक्रिया में है।

    अली तौकीर शेख को लेकर भी मुख्यमंत्री ने कई तथ्य रखे। उनके अनुसार शेख 2010 से 2013 के बीच कम से कम 13 बार भारत आया था। उन पर आरोप है कि वे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत के खिलाफ नैरेटिव बनाने और देश के अंदरूनी मामलों में हस्तक्षेप करने का प्रयास कर रहे थे। सरमा ने यह भी कहा कि जांच शुरू होने के बाद शेख ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट्स से कई पोस्ट हटा दिए जिसे उन्होंने सबूत मिटाने की कोशिश बताया।

    इस पूरे विवाद में एक और महत्वपूर्ण दावा मुख्यमंत्री ने सांसद गौरव गोगोई को लेकर किया। उन्होंने कहा कि गोगोई 2012 से 2016 के बीच पाकिस्तान गए थे और इन यात्राओं की जानकारी केंद्र सरकार को नहीं दी गई थी। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि इस दौरान गोगोई सोशल मीडिया पर सक्रिय नहीं थे। हालांकि मुख्यमंत्री ने यह स्वीकार किया कि फोन कॉल रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं हैं लेकिन एक व्यक्ति के पाकिस्तान जाने का सबूत मिलने की बात कही गई।

    सरमा ने कहा कि इस मामले में तीन मुख्य किरदार हैं एक पाकिस्तानी नागरिक अली तौकीर शेख एक ब्रिटिश नागरिक एलिजाबेथ कोलबर्न और एक भारतीय सांसद गौरव गोगोई। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि कुछ पहलुओं में धार्मिक परिवर्तन से जुड़े कोण की भी जांच हो सकती है हालांकि इस संबंध में कोई विस्तृत जानकारी सार्वजनिक नहीं की गई। अब राजनीतिक हलकों में यह मामला तेजी से चर्चा का विषय बन गया है। एक तरफ जहां राज्य सरकार इसे राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा गंभीर मुद्दा बता रही है वहीं विपक्ष इसे राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का हिस्सा मान रहा है।