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  • सार्वजनिक परिवहन बनाम वीआईपी संस्कृति: आशुतोष की अपील से फिर केंद्र में आए अरविंद केजरीवाल

    सार्वजनिक परिवहन बनाम वीआईपी संस्कृति: आशुतोष की अपील से फिर केंद्र में आए अरविंद केजरीवाल

    नई दिल्ली । देश और दुनिया में बढ़ते ऊर्जा संकट और राजनीतिक सादगी की बहस के बीच एक बार फिर सार्वजनिक जीवनशैली और नेताओं की यात्रा शैली चर्चा के केंद्र में आ गई है। इसी संदर्भ में आम आदमी पार्टी के पूर्व नेता और वरिष्ठ पत्रकार Ashutosh ने दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री Arvind Kejriwal को लेकर एक ऐसी टिप्पणी की है जिसने राजनीतिक हलकों में नई बहस छेड़ दी है। आशुतोष ने केजरीवाल से अपील की है कि वे एक बार फिर मेट्रो जैसे सार्वजनिक परिवहन का उपयोग कर अपने शुरुआती राजनीतिक जीवन की सादगी को दोहराएं।

    यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब वैश्विक स्तर पर ऊर्जा आपूर्ति को लेकर तनाव गहरा गया है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तेल आपूर्ति से जुड़े मार्गों में आई बाधाओं के कारण कई देशों में ईंधन की कीमतों पर असर देखा जा रहा है, जिसका प्रभाव भारत में भी महसूस किया जाने लगा है। ऐसे माहौल में सार्वजनिक जीवन में ईंधन की खपत और वीआईपी काफिलों की लागत पर भी सवाल उठ रहे हैं। इसी पृष्ठभूमि में आशुतोष का बयान और अधिक राजनीतिक महत्व रखता है।

    आशुतोष ने अपने बयान में उस पुराने क्षण को भी याद दिलाया जब अरविंद केजरीवाल ने पहली बार मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के दौरान मेट्रो से यात्रा की थी। उस समय इसे सादगी और जनता से जुड़ाव के प्रतीक के रूप में देखा गया था। अब आशुतोष का कहना है कि यदि वर्तमान परिस्थितियों में राजनीतिक नेतृत्व सादगी का संदेश देता है, तो यह जनता के बीच सकारात्मक संदेश जाएगा और ईंधन बचत जैसे व्यावहारिक मुद्दों पर भी असर पड़ेगा।

    इस बीच देश के कई राज्यों में शीर्ष नेतृत्व द्वारा अपने काफिलों और सरकारी वाहनों के उपयोग में कटौती के निर्णय भी सामने आए हैं। प्रधानमंत्री Narendra Modi की ओर से वीआईपी काफिलों के आकार को सीमित करने की अपील के बाद विभिन्न राज्यों में प्रशासनिक स्तर पर बदलाव देखे जा रहे हैं। उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री Yogi Adityanath ने सरकारी वाहनों के उपयोग को अधिक नियंत्रित करने के निर्देश दिए हैं, जबकि मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री Mohan Yadav ने अपने काफिले में वाहनों की संख्या में कटौती की है।

    इसी तरह अन्य राज्यों में भी प्रशासनिक और राजनीतिक स्तर पर सादगी और संसाधन बचत को लेकर नए कदम उठाए जा रहे हैं। बिहार में उपमुख्यमंत्री स्तर के नेतृत्व ने भी अपने काफिले को सीमित करने की दिशा में निर्णय लिया है, जिससे यह संकेत मिलता है कि सार्वजनिक जीवन में संयम और खर्च नियंत्रण को लेकर एक व्यापक संदेश उभर रहा है।

    आशुतोष की यह टिप्पणी केवल एक व्यक्तिगत अपील नहीं मानी जा रही, बल्कि इसे राजनीतिक प्रतीकवाद के रूप में भी देखा जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, मेट्रो जैसी सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था का उपयोग नेताओं द्वारा किया जाना जनता के बीच एक मजबूत संदेश देता है कि शासन और नेतृत्व केवल सुविधाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि वह आम नागरिक के अनुभवों से भी जुड़ा है।

    हालांकि इस पूरे मुद्दे पर विभिन्न राजनीतिक प्रतिक्रियाएं भी सामने आने की संभावना है, लेकिन इतना तय है कि सादगी, ऊर्जा संकट और सार्वजनिक संसाधनों के उपयोग को लेकर यह बहस आगे भी राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बनी रहेगी।

  • राजधानी में संसाधन बचाने की मुहिम तेज: दिल्ली सरकार ने विदेश यात्राओं और सरकारी खर्चों में कटौती का किया ऐलान

    राजधानी में संसाधन बचाने की मुहिम तेज: दिल्ली सरकार ने विदेश यात्राओं और सरकारी खर्चों में कटौती का किया ऐलान

    नई दिल्ली । राजधानी दिल्ली में अब सरकारी कार्यप्रणाली को अधिक सादगीपूर्ण और संसाधन-केंद्रित बनाने की दिशा में बड़े कदम उठाए जा रहे हैं। ऊर्जा बचत, सरकारी खर्चों में कटौती और सार्वजनिक परिवहन को बढ़ावा देने के उद्देश्य से दिल्ली सरकार ने कई महत्वपूर्ण घोषणाएं की हैं। इन फैसलों के तहत आने वाले एक वर्ष तक सरकार का कोई भी मंत्री या अधिकारी सरकारी विदेश यात्रा पर नहीं जाएगा। इसके साथ ही प्रशासनिक स्तर पर भी कई नई व्यवस्थाएं लागू करने की तैयारी शुरू हो चुकी है।

    सरकार का मानना है कि मौजूदा समय में ईंधन और संसाधनों का संतुलित उपयोग बेहद जरूरी है। इसी सोच के साथ राजधानी में एक व्यापक जन-अभियान की शुरुआत की जा रही है, जिसका उद्देश्य केवल सरकारी स्तर पर बदलाव करना नहीं बल्कि आम लोगों को भी इस पहल से जोड़ना है। सरकार का कहना है कि यदि प्रशासन और जनता दोनों मिलकर छोटे-छोटे कदम उठाएं तो बड़े स्तर पर बचत और सकारात्मक बदलाव संभव हो सकते हैं।

    वर्क फ्रॉम होम व्यवस्था को इस अभियान का अहम हिस्सा बनाया गया है। सरकारी विभागों में सप्ताह में दो दिन घर से काम करने की योजना तैयार की गई है। साथ ही निजी कंपनियों और संस्थानों से भी अपील की जाएगी कि वे अपने कर्मचारियों को सीमित दिनों के लिए घर से काम करने की सुविधा दें। माना जा रहा है कि इससे सड़कों पर वाहनों की संख्या कम होगी, ट्रैफिक का दबाव घटेगा और पेट्रोल-डीजल की खपत में कमी आएगी।

    सरकारी वाहनों के इस्तेमाल को भी सीमित करने का फैसला लिया गया है। प्रशासनिक अधिकारियों और मंत्रियों के काफिलों में गाड़ियों की संख्या कम की जाएगी और जहां संभव होगा वहां सार्वजनिक परिवहन को प्राथमिकता दी जाएगी। अगले छह महीनों तक नई पेट्रोल, डीजल, सीएनजी या हाइब्रिड गाड़ियों की खरीद नहीं की जाएगी। इसके साथ ही कर्मचारियों को मेट्रो और बस जैसे सार्वजनिक परिवहन के उपयोग के लिए प्रोत्साहित करने की योजना भी बनाई गई है।

    राजधानी में मेट्रो स्टेशनों तक पहुंच आसान बनाने के लिए विशेष बस सेवाएं शुरू करने की तैयारी की गई है। इसके अलावा बैठकों और प्रशासनिक गतिविधियों को अधिक से अधिक ऑनलाइन मोड में करने की योजना बनाई जा रही है। विश्वविद्यालयों, कॉलेजों और अन्य संस्थानों से भी ऑनलाइन क्लास और मीटिंग्स को बढ़ावा देने की अपील की गई है, ताकि अनावश्यक यात्रा को कम किया जा सके।

    सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि अगले कुछ महीनों तक बड़े सरकारी आयोजन और खर्चीले कार्यक्रम आयोजित नहीं किए जाएंगे। इसके साथ ही “मेड इन India” उत्पादों को बढ़ावा देने और सरकारी विभागों में स्वदेशी वस्तुओं के उपयोग को प्राथमिकता देने की दिशा में भी काम किया जाएगा।

    ऊर्जा बचत के तहत सरकारी दफ्तरों में बिजली उपयोग को नियंत्रित करने के लिए विशेष दिशा-निर्देश जारी किए जाएंगे। एयर कंडीशनर के तापमान को सीमित रखने और बिजली की अनावश्यक खपत रोकने पर भी ध्यान दिया जाएगा।

    कुल मिलाकर राजधानी में शुरू की गई यह पहल केवल खर्च कम करने का प्रयास नहीं बल्कि एक नई प्रशासनिक सोच का संकेत मानी जा रही है। सरकार इस अभियान के जरिए सादगी, जिम्मेदारी और संसाधनों के संतुलित उपयोग का संदेश जनता तक पहुंचाना चाहती है।

  • पीएम की अपील के बाद देशभर में बदलाव की लहर: काफिले घटे, कर्मचारी व्यवस्था बदली, सरकारी खर्च पर सख्ती शुरू

    पीएम की अपील के बाद देशभर में बदलाव की लहर: काफिले घटे, कर्मचारी व्यवस्था बदली, सरकारी खर्च पर सख्ती शुरू

    प्रधानमंत्री की पेट्रोल और डीजल की बचत को लेकर की गई हालिया अपील का असर अब देश के कई राज्यों में स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा है। केंद्र से लेकर राज्य सरकारों तक, प्रशासनिक ढांचे में सादगी और संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग को लेकर तेजी से बदलाव किए जा रहे हैं। इस पहल का उद्देश्य न केवल ईंधन की बचत करना है, बल्कि सरकारी खर्च को कम करते हुए आम जनता के बीच एक सकारात्मक संदेश भी देना है कि देश के नेतृत्व स्तर पर भी संसाधनों के उपयोग में अनुशासन अपनाया जा रहा है।

    त्रिपुरा में इस दिशा में सबसे बड़ा कदम देखने को मिला है, जहां ग्रुप C और D श्रेणी के केवल 50 प्रतिशत सरकारी कर्मचारी ही प्रतिदिन कार्यालय आएंगे, जबकि शेष कर्मचारी वर्क फ्रॉम होम व्यवस्था के तहत कार्य करेंगे। राज्य सरकार ने सभी विभागों को साप्ताहिक रोस्टर तैयार करने के निर्देश दिए हैं, ताकि कार्य प्रभावित न हो और संसाधनों की भी बचत हो सके। इसी तरह आंध्र प्रदेश और गोवा में मुख्यमंत्री स्तर पर भी बड़े बदलाव किए गए हैं, जहां वीआईपी काफिले में वाहनों की संख्या को आधा कर दिया गया है। इससे सरकारी दौरों के दौरान ईंधन की खपत में उल्लेखनीय कमी आने की उम्मीद है।

    हरियाणा में मुख्यमंत्री ने स्वयं सप्ताह में एक दिन बिना सरकारी वाहन के चलने का निर्णय लिया है, जबकि पंजाब में हर बुधवार को अधिकारियों के लिए चार पहिया वाहनों के उपयोग पर रोक जैसी व्यवस्था लागू की गई है। ओडिशा में भी मुख्यमंत्री के काफिले को सीमित कर मात्र चार वाहनों तक लाया गया है, जिसमें सुरक्षा वाहनों को प्राथमिकता दी गई है। राजस्थान में भी मुख्यमंत्री के काफिले की गाड़ियों की संख्या को घटाकर पहले के मुकाबले काफी कम कर दिया गया है, जिससे सरकारी यात्रा अधिक सरल और कम खर्चीली हो सके।

    बिहार और मध्य प्रदेश में भी इस अभियान का प्रभाव देखा जा रहा है, जहां मंत्री और अधिकारी या तो इलेक्ट्रिक वाहनों का उपयोग कर रहे हैं या फिर सीमित काफिले में यात्रा कर रहे हैं। मध्य प्रदेश में कई जनप्रतिनिधियों ने व्यक्तिगत रूप से भी सादगी अपनाने की पहल की है, जिससे जनता में एक सकारात्मक संदेश गया है। उत्तर प्रदेश में भी सरकारी बैठकों और यात्राओं को वर्चुअल मोड में स्थानांतरित करने और काफिले को आधा करने जैसे निर्णय लिए गए हैं, जो डिजिटल और पर्यावरण-अनुकूल प्रशासन की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माने जा रहे हैं।

    दिल्ली में भी मंत्री स्तर पर सार्वजनिक परिवहन का उपयोग बढ़ा है, जहां कुछ मंत्री मेट्रो और ई-रिक्शा से कार्यक्रमों में पहुंचे। महाराष्ट्र में भी सरकारी खर्चों में कटौती करते हुए विदेश यात्राओं और आयोजनों को सीमित किया गया है। वहीं गोवा में मुख्यमंत्री के काफिले को पहले के मुकाबले आधा कर दिया गया है, जिससे ईंधन बचत के प्रयासों को और मजबूती मिली है।

    कुल मिलाकर यह बदलाव केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं बल्कि एक व्यापक सामाजिक संदेश के रूप में देखा जा रहा है, जिसमें संसाधनों के जिम्मेदार उपयोग, पर्यावरण संरक्षण और सरकारी कार्यशैली में सादगी को प्राथमिकता दी जा रही है। यह पहल आने वाले समय में नीतिगत बदलावों और सार्वजनिक व्यवहार पर भी गहरा प्रभाव डाल सकती है, जिससे देश में एक अधिक संतुलित और टिकाऊ प्रशासनिक संस्कृति विकसित होने की उम्मीद की जा रही है।

  • होली पर बसें थमेंगी: नई परिवहन नीति के विरोध में 2 मार्च से अनिश्चितकालीन हड़ताल

    होली पर बसें थमेंगी: नई परिवहन नीति के विरोध में 2 मार्च से अनिश्चितकालीन हड़ताल


    जबलपुर । मध्यप्रदेश में होली के त्यौहार से पहले बसों के पहिए थम सकते हैं। बस एसोसिएशन ने 2 मार्च से अनिश्चितकालीन हड़ताल की घोषणा की है। संगठन ने यह कदम नई परिवहन नीति के विरोध में उठाया है। इसके कारण पूरे प्रदेश में त्योहार के दौरान सार्वजनिक परिवहन बाधित रहेगा, और यात्रियों को अपनी यात्रा के लिए वैकल्पिक इंतजाम करने पड़ सकते हैं।

    बस एसोसिएशन का आरोप है कि नई नीति के तहत बसों का राष्ट्रीयकरण कर छोटे बस मालिकों को बाहर किया जा रहा है। संगठन का कहना है कि नई पॉलिसी में परमिट का काम एक ही कंपनी को सौंपा जा रहा है और मल्टीनेशनल कंपनियों के आने से छोटे बस मालिक किराएदार बन जाएंगे। इसके अलावा, निजी बसों के परमिट रद्द कर उन्हें अनुबंध पर चलाने की योजना बनाई जा रही है। बस मालिकों का आरोप है कि सरकार बस संचालकों का शोषण कर उन्हें कमजोर करने पर तुली है।

    नई परिवहन नीति में बस संचालन को पूरी तरह डिजिटल मॉनिटरिंग के तहत रखा जाएगा। बसों में अतिरिक्त यात्रियों को बैठने पर पाबंदी रहेगी और ओवरलोडिंग रोकने के लिए चालान का प्रावधान होगा। नीति के अनुसार किसी भी रूट का किराया परिवहन विभाग तय करेगा और बस संचालन के दौरान सरकार का पूरा नियंत्रण रहेगा।

    बस मालिकों और सरकार के बीच विवाद के कारण होली पर यात्रियों को विशेष सावधानी बरतनी होगी। त्योहार के दौरान घर लौटने वाले लोग समय से पहले अपने यात्रा प्रबंध करने को मजबूर हैं, क्योंकि हड़ताल की अनिश्चित अवधि को देखते हुए बसों की उपलब्धता नहीं रहेगी।

  • कश्मीरी गेट अब अकेला नहीं! दिल्ली मेट्रो में 3 नए ट्रिपल-इंटरचेंज हब बनेंगे, आजादपुर, नई दिल्ली और लाजपत नगर

    कश्मीरी गेट अब अकेला नहीं! दिल्ली मेट्रो में 3 नए ट्रिपल-इंटरचेंज हब बनेंगे, आजादपुर, नई दिल्ली और लाजपत नगर


    नई दिल्ली। दिल्ली मेट्रो की तस्वीर बदलने जा रही है। लंबे समय तक कश्मीरी गेट ही राजधानी का एकमात्र ट्रिपल-इंटरचेंज स्टेशन रहा, जहां तीन मेट्रो लाइनें मिलती हैं। लेकिन अब फेज-4 के तहत आजादपुर, नई दिल्ली और लाजपत नगर भी ट्रिपल-इंटरचेंज बनेंगे, जिससे दिल्ली में यात्रा और तेज, आसान और सुविधाजनक होगी।

    फेज-4 में तीन नए सुपर हब
    दिल्ली मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन (DMRC) ने कहा है कि फेज-4 के पूरा होने के बाद ये तीनों स्टेशन ऐसे हब बनेंगे जहां तीन-तीन लाइनें एक ही प्लेटफॉर्म/कनेक्शन पॉइंट पर मिलेंगी। इससे यात्रियों को बार-बार लाइन बदलने की परेशानी कम होगी और सफर का समय भी घटेगा।

    खासकर उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम दिल्ली की कनेक्टिविटी मजबूत होगी।

    कश्मीरी गेट की मौजूदा भूमिका
    वर्तमान में कश्मीरी गेट स्टेशन रेड, येलो और वायलेट लाइन को जोड़ता है और रोजाना भारी संख्या में यात्रियों का यह प्रमुख ट्रांजिट प्वाइंट है। यह स्टेशन उत्तर/उत्तर-पश्चिम दिल्ली को मध्य और दक्षिण दिल्ली से जोड़ने में अहम भूमिका निभाता रहा है।

    2026 तक 3 नए ट्रिपल-इंटरचेंज हब
    फेज-4 में सबसे पहले आजादपुर ट्रिपल-इंटरचेंज के रूप में काम करेगा, जहां येलो, पिंक और मैजेंटा लाइन मिलेगी। अधिकारियों के अनुसार यह हब 2026 के अंत तक चालू हो जाएगा, जिससे उत्तर, पश्चिम और दक्षिण दिल्ली के बीच यात्रा आसान हो जाएगी।

    नई दिल्ली स्टेशन बनेगा एयरपोर्ट-हब
    नई दिल्ली स्टेशन भी जल्द ही येलो लाइन, एयरपोर्ट एक्सप्रेस और ग्रीन लाइन से जुड़कर ट्रिपल-इंटरचेंज बन जाएगा। इससे एयरपोर्ट, सेंट्रल दिल्ली और पश्चिमी दिल्ली के बीच कनेक्टिविटी और मजबूत होगी। हालांकि, ग्रीन लाइन का विस्तार अभी शुरू नहीं हुआ है और इसे चालू होने में कुछ साल लग सकते हैं।
    लाजपत नगर होगा दक्षिण दिल्ली का नया हब
    लाजपत नगर स्टेशन वायलेट, पिंक और प्रस्तावित गोल्डन लाइन को जोड़कर दक्षिण दिल्ली में एक प्रमुख कनेक्टिविटी पॉइंट बन जाएगा। इससे दक्षिण दिल्ली में ईस्ट-वेस्ट और नॉर्थ-साउथ कनेक्टिविटी मजबूत होगी और यात्रियों को रूट बदलने की जरूरत कम होगी।

    फेज-5 (ए) में सेंट्रल सेक्रेटेरिएट भी बनेगा हब
    फेज-5 (ए) में सेंट्रल सेक्रेटेरिएट स्टेशन को भी ट्रिपल-इंटरचेंज बनाने की योजना है, जहां येलो, वायलेट और मैजेंटा लाइनें मिलेंगी। इससे सेंट्रल विस्टा और सरकारी इलाकों तक पहुंच और आसान होगी।

    DMRC का दावा
    DMRC अधिकारियों का कहना है कि ट्रिपल-इंटरचेंज स्टेशनों से यात्रियों का समय बचेगा, मेट्रो का उपयोग बढ़ेगा और सड़क ट्रैफिक व प्रदूषण कम होंगे।

  • माघ मेला 2026 के लिए रोडवेज की स्पेशल बसें, 1 जनवरी से प्रयागराज पहुंचना होगा और आसान

    माघ मेला 2026 के लिए रोडवेज की स्पेशल बसें, 1 जनवरी से प्रयागराज पहुंचना होगा और आसान




    प्रयागराज।
    प्रयागराज में 1 जनवरी से शुरू हो रहे माघ मेला 2026 को लेकर उत्तर प्रदेश परिवहन निगम ने श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए व्यापक तैयारियां पूरी कर ली हैं। संगम स्नान के लिए देश-प्रदेश से आने वाले लाखों श्रद्धालुओं को सुगम, सुरक्षित और सस्ती परिवहन सुविधा उपलब्ध कराने के उद्देश्य से विशेष रोडवेज बस सेवाएं शुरू की जा रही हैं। इससे माघ मेले के दौरान प्रयागराज पहुंचना और वहां से संगम घाट तक जाना बेहद आसान हो जाएगा।

    परिवहन निगम के अनुसार, गाजीपुर डिपो से प्रयागराज के लिए कुल 15 बसों का नियमित संचालन किया जाएगा।

    इनमें से 1 जनवरी से 13 जनवरी तक गाजीपुर डिपो की 10 बसें सीधे प्रयागराज के लिए चलाई जाएंगी, जबकि जनपद की पांच बसें वाराणसी मार्ग होते हुए झूसी तक संचालित होंगी। झूसी पहुंचने के बाद श्रद्धालुओं को संगम घाट तक पहुंचाने के लिए विशेष व्यवस्था की गई है।

    श्रद्धालुओं की भीड़ और पैदल चलने की परेशानी को देखते हुए झूसी से संगम घाट तक चार बसों की शटल सेवा चलाई जाएगी। ये बसें लगातार फेरे लगाती रहेंगी, ताकि श्रद्धालुओं को जाम और भीड़ से राहत मिल सके।

    यह विशेष परिवहन व्यवस्था 1 जनवरी से 17 फरवरी तक, यानी पूरे माघ मेला काल में जारी रहेगी।

    माघ मेले के दौरान संगम स्नान के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु प्रयागराज पहुंचते हैं। इसी को ध्यान में रखते हुए परिवहन निगम ने बसों की संख्या में इजाफा किया है। विभाग के अधिकारियों के अनुसार, वर्तमान में गाजीपुर डिपो से 94 बसों का संचालन किया जा रहा है और माघ मेले के दौरान ग्रामीण रूटों पर भी अतिरिक्त बसें लगाई जाएंगी, ताकि दूर-दराज के गांवों से आने वाले श्रद्धालुओं को भी सुविधा मिल सके।

    इसके अलावा, प्रमुख बस अड्डों पर अतिरिक्त कर्मचारियों की तैनाती, टिकट काउंटरों की संख्या बढ़ाने, समय-सारिणी में लचीलापन और जरूरत पड़ने पर अतिरिक्त फेरे लगाने की व्यवस्था की गई है।

    विशेष स्नान पर्वों के दौरान यात्रियों की संख्या में भारी बढ़ोतरी को देखते हुए परिवहन निगम ने सतर्कता बढ़ाने और बसों की उपलब्धता सुनिश्चित करने के निर्देश दिए हैं।

    माघ मेले की प्रमुख स्नान तिथियों पर विशेष भीड़ रहने की संभावना है। इनमें पौष पूर्णिमा (13 जनवरी), मकर संक्रांति (14 जनवरी), मौनी अमावस्या (29 जनवरी), बसंत पंचमी (3 फरवरी) और माघी पूर्णिमा (12 फरवरी) शामिल हैं। इन तिथियों पर अतिरिक्त बसें और शटल सेवाएं चलाई जाएंगी।

    परिवहन निगम का कहना है कि श्रद्धालुओं को सुरक्षित, व्यवस्थित और सुगम यात्रा उपलब्ध कराना उनकी प्राथमिकता है। माघ मेला 2026 के दौरान यह विशेष बस सेवा श्रद्धालुओं के लिए बड़ी राहत साबित होगी।

  • भोपाल मेट्रो का पहला दिन बना उत्सव, यात्रियों ने डांस कर मनाया जश्न

    भोपाल मेट्रो का पहला दिन बना उत्सव, यात्रियों ने डांस कर मनाया जश्न

    भोपाल /राजधानी भोपाल में रविवार को मेट्रो सेवा का औपचारिक कमर्शियल शुभारंभ हो गया। सुबह ठीक 9 बजे एम्स स्टेशन से पहली मेट्रो रवाना हुई-जिसने करीब 30 मिनट में सुभाष नगर स्टेशन तक का सफर तय किया। इस ऐतिहासिक मौके पर लगभग 100 यात्रियों ने मेट्रो की पहली सवारी का अनुभव लिया। यात्रियों में 7 साल के बच्चे से लेकर 75 साल के बुजुर्ग तक शामिल रहे। पहली ही यात्रा में मेट्रो का माहौल उत्सव जैसा नजर आयाजहां कई यात्री खुशी में डांस करते दिखाई दिए और मोबाइल से इस पल को कैद करते रहे।भोपाल मेट्रो के चलने के साथ ही भोपाल देश का 26वां मेट्रो शहर बन गया है। इससे पहले मध्यप्रदेश के इंदौर में 31 मई 2024 को मेट्रो का कमर्शियल रन शुरू हुआ था। भोपाल मेट्रो का उद्घाटन शनिवार को मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और केंद्रीय मंत्री मनोहर लाल खट्टर ने किया था। उद्घाटन के बाद रविवार, 21 दिसंबर से आम जनता के लिए मेट्रो सेवा शुरू कर दी गई।

    सुबह से ही स्टेशन पर उमड़ा उत्साह

    मेट्रो में सफर करने को लेकर लोगों में जबरदस्त उत्साह देखने को मिला। कई यात्री सुबह 7 बजे से ही स्टेशन पहुंच गए थे। यात्रियों का कहना था कि भोपाल के मेट्रो सिटी बनने का सपना आज साकार हो गया है और यह शहर के लिए गर्व का क्षण है। कोलार से आए एक कपल ने बताया कि भोपाल में मेट्रो की शुरुआत उनके लिए “वाओ मोमेंट” जैसा है।मेट्रो में सवार स्कूली बच्चों में भी खासा उत्साह दिखा। केंद्रीय विद्यालय में पढ़ने वाले बच्चों ने कहा कि मेट्रो से उनका स्कूल नजर आया और पहली बार मेट्रो में बैठना बेहद रोमांचक अनुभव रहा। वहीं एक युवक वीडियो कॉल के जरिए अपने परिवार को मेट्रो और भोपाल के नजारे दिखाता नजर आया।

    सुविधाओं से लैस है भोपाल मेट्रो

    मेट्रो के सभी स्टेशनों पर यात्रियों की सुविधा के लिए एस्केलेटर, लिफ्ट और रैंप की व्यवस्था की गई है। सुभाष नगर, डीबी मॉल और एमपी नगर स्टेशनों पर फुट ओवरब्रिज बनाए गए हैं। रानी कमलापति मेट्रो स्टेशन को रेलवे स्टेशन से सीधे जोड़ा गया है, जिससे ट्रेन से उतरकर यात्री सीधे मेट्रो पकड़ सकें। एम्स स्टेशन पर भी फुटओवर ब्रिज के जरिए एम्स कैंपस तक सीधी पहुंच दी गई है।सुरक्षा के लिहाज से सभी स्टेशनों पर प्लेटफॉर्म स्क्रीन डोर लगाए गए हैं, जिससे ट्रेन रुकने के बाद ही दरवाजे खुलते हैं और ट्रैक पर गिरने की आशंका नहीं रहती।

    टाइमिंग, किराया और ट्रिप की जानकारी

    भोपाल मेट्रो सुबह 9 बजे से शाम 7 बजे तक चलेगी। एक दिन में कुल 17 ट्रिप रहेंगी। मेट्रो फिलहाल 8 स्टेशनों-एम्स, अलकापुरी, डीआरएम, आरकेएमपी, एमपी नगर, डीबी मॉल, केंद्रीय स्कूल औरसुभाष नगर-से होकर गुजरेगी। शुरुआती चरण में हर 75 मिनट में एक ट्रेन उपलब्ध होगी।टिकट फिलहाल मैन्युअल रूप से काउंटर से ही मिलेंगे। किराया तीन जोन में तय किया गया है। पहले दो स्टेशनों के लिए 20 रुपये, तीन से पांच स्टेशनों के लिए 30 रुपये और छह से आठ स्टेशनों के लिए 40 रुपये किराया निर्धारित किया गया है।

    पार्किंग बनी बड़ी चुनौती

    मेट्रो की शुरुआत से जहां लोग खुश हैं, वहीं स्टेशनों पर पार्किंग की कमी एक बड़ी समस्या बनकर सामने आई है। किसी भी स्टेशन पर चार पहिया वाहनों के लिए समुचित पार्किंग व्यवस्था नहीं है। हालांकि मेट्रो प्रबंधन टू-व्हीलर पार्किंग की व्यवस्था करने की दिशा में काम कर रहा है।
    2018 से शुरू हुआ था सफर
    भोपाल मेट्रो परियोजना का काम साल 2018 में शुरू हुआ था। पहला मेट्रो रूट एम्स से करोंद तक 16.05 किलोमीटर लंबा है। इसमें से एम्स से सुभाष नगर के बीच 6.22 किलोमीटर का प्राथमिकता कॉरिडोर अब आम जनता के लिए शुरू कर दिया गया है। दो साल पहले, 3 अक्टूबर 2023 को भोपाल में मेट्रो का पहला ट्रायल रन हुआ था।कुल मिलाकर, भोपाल मेट्रो की शुरुआत ने शहर के परिवहन तंत्र को एक नई दिशा दी है। पहले ही दिन दिखा उत्साह इस बात का संकेत है कि आने वाले समय में मेट्रो भोपालवासियों की जीवनरेखा बनने जा रही है।

  • बीजिंग ने कैसे तोड़ा प्रदूषण का घेरा? ‘गैस चैंबर’ बनती दिल्ली के लिए चीन की स्टेप-बाय-स्टेप सीख

    बीजिंग ने कैसे तोड़ा प्रदूषण का घेरा? ‘गैस चैंबर’ बनती दिल्ली के लिए चीन की स्टेप-बाय-स्टेप सीख


    नई दिल्ली /दिल्ली में वायु प्रदूषण एक बार फिर गंभीर स्तर पर पहुंच चुका है। हालात ऐसे हैं कि सरकार को वर्क फ्रॉम होम निर्माण गतिविधियों पर रोक और बिना पीयूसी पेट्रोल-डीजल न मिलने जैसी सख्त पाबंदियां लागू करनी पड़ी हैं। गैस चैंबर बनती राजधानी के बीच अब चीन का उदाहरण चर्चा में है। चीन के दूतावास की प्रवक्ता यू जिंग ने बताया है कि बीजिंग ने किस तरह प्रदूषण को मात दी और कैसे एक दशक में हवा की गुणवत्ता में ऐतिहासिक सुधार किया।यू जिंग ने दिल्ली और बीजिंग की तुलना करते हुए आंकड़े साझा किए। उनके अनुसार वर्ष 2013 में बीजिंग में पीएम 2.5 का औसत स्तर 101.7 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर था। यह स्तर 2024 तक घटकर 30.9 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर रह गया। यह बदलाव ऐसे समय में हुआ जब चीन में तेज शहरीकरण और औद्योगिक विस्तार जारी रहा। इसके बावजूद लगातार और कठोर नीतियों के कारण बीजिंग आज प्रदूषण नियंत्रण की मिसाल बन चुका है।

    वाहनों पर सबसे पहला वार

    चीन की रणनीति का पहला और सबसे अहम कदम था वाहन उत्सर्जन पर सख्त नियंत्रण। बीजिंग में यूरोपियन मानकों के बराबर कड़े उत्सर्जन नियम लागू किए गए। पुराने और ज्यादा धुआं छोड़ने वाले वाहनों को चरणबद्ध तरीके से सड़कों से हटाया गया। निजी वाहनों की संख्या सीमित करने के लिए लाइसेंस प्लेट लॉटरी सिस्टम ऑड-ईवन जैसी योजनाएं और सप्ताह के कुछ तय दिनों में गाड़ी चलाने पर रोक लगाई गई।इसके साथ-साथ सार्वजनिक परिवहन को मजबूत किया गया। मेट्रो और बस नेटवर्क का बड़े पैमाने पर विस्तार हुआ और इलेक्ट्रिक वाहनों को तेजी से बढ़ावा दिया गया। आज बीजिंग में इलेक्ट्रिक बसों और टैक्सियों की संख्या लाखों में है जिससे प्रदूषण पर सीधा असर पड़ा।

    उद्योगों पर सख्त फैसला

    बीजिंग में प्रदूषण का बड़ा स्रोत भारी उद्योग भी थे। चीन ने इस मोर्चे पर भी कोई नरमी नहीं दिखाई। शहर से 3000 से अधिक बड़ी और प्रदूषण फैलाने वाली फैक्ट्रियों को या तो बंद कराया गया या फिर शहर से बाहर स्थानांतरित किया गया। देश की बड़ी स्टील कंपनी शौगांग को हटाने से ही हवा में खतरनाक कणों में लगभग 20 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई।दिलचस्प बात यह है कि जिन इलाकों में पहले फैक्ट्रियां थीं वहां अब पार्क व्यावसायिक क्षेत्र और तकनीकी हब विकसित किए गए। शौगांग का पुराना औद्योगिक परिसर 2022 के शीतकालीन ओलंपिक का प्रमुख स्थल बना जो पर्यावरणीय बदलाव का प्रतीक बन गया।

    क्षेत्रीय सहयोग बना गेमचेंजर

    चीन ने सिर्फ बीजिंग तक सीमित रहकर कदम नहीं उठाए। आसपास के 26 शहरों को साथ लेकर साझा प्रदूषण नियंत्रण रणनीति अपनाई गई। कोयले का उपयोग न केवल उद्योगों में बल्कि घरों में भी चरणबद्ध तरीके से खत्म किया गया। स्वच्छ ईंधन और गैस आधारित प्रणालियों को बढ़ावा दिया गया।

    भारत के लिए क्या सीख?

    भारत में भी स्वच्छ ईंधन निजी वाहनों पर नियंत्रण और सार्वजनिक परिवहन को मजबूत करने पर लंबे समय से चर्चा होती रही है। सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट की विशेषज्ञ अनुमिता रॉय चौधरी का कहना है कि फर्क नीति के इरादे और उसके पैमाने का है। चीन ने सालभर सख्ती बरती जबकि दिल्ली में अधिकतर कदम आपात स्थिति में ही उठाए जाते हैं।विशेषज्ञ मानते हैं कि दिल्ली में उद्योगों को पूरी तरह हटाना मुश्किल है लेकिन बेहतर तकनीक साझा प्रदूषण नियंत्रण व्यवस्था और लगातार निगरानी से हालात सुधारे जा सकते हैं। बीजिंग का अनुभव बताता है कि अगर इच्छाशक्ति मजबूत हो और नीतियां लंबी अवधि की हों तो प्रदूषण जैसे जटिल संकट पर भी काबू पाया जा सकता है।