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  • ऊर्जा मंत्री के क्षेत्र में भी गंदा पानी: ग्वालियर में नालियों के बीच से होकर गुजर रही पाइपलाइनें, स्वास्थ्य खतरे में

    ऊर्जा मंत्री के क्षेत्र में भी गंदा पानी: ग्वालियर में नालियों के बीच से होकर गुजर रही पाइपलाइनें, स्वास्थ्य खतरे में


    ग्वालियर । ग्वालियर शहर में पेयजल संकट गंभीर रूप ले चुका है। इंदौर के भागीरथपुरा हादसे के बावजूद यहां हालात में कोई सुधार नहीं हुआ है। सरकारी निर्देशों के बावजूद कई इलाकों में पाइपलाइनें सीवर और नालों के बीच से गुजर रही हैं जिससे गंदा और दूषित पानी घरों तक पहुंच रहा है।

    नगर निगम ने दो महीने में मात्र 28 स्थानों की पहचान की जिनमें से केवल 13 पर सुधार किया जा सका। बाकी जगहों पर खतरा अब भी जस का तस बना हुआ है। रविवार को कई इलाकों में निगम को मौके पर उतरकर मोटर से पानी निकालना पड़ा। कई वार्डों में सीवर लाइन चोक होने से गंदा पानी सड़कों और गलियों में भर गया जिससे घरों में मटमैला पानी पहुंच रहा है।

    वार्ड 38 में नलों से शुरुआती 10 मिनट तक मटमैला पानी आता है और कई बार उसमें कीड़े भी दिखाई देते हैं। वार्ड 39 में नालियों के बीच से खुली पाइपलाइनें गुजर रही हैं। वार्ड 17 के निवासी नवीन तोमर ने बताया कि यहां कभी भी पूरी तरह साफ पानी नहीं आता। पानी में लगातार मटमैलापन और बदबू बनी रहती है और कई बार कीड़े भी पड़ जाते हैं।

    हजीरा इलाके जो ऊर्जा मंत्री प्रद्युमन सिंह तोमर का निवास क्षेत्र है में भी पानी की समस्या गंभीर है। स्थानीय पार्षद धर्मेंद्र वर्मा ने बताया कि लोग लगातार शिकायत लेकर आते हैं लेकिन निगम के अधिकारियों के भेदभावपूर्ण रवैये के कारण समस्या का समाधान नहीं हो पा रहा है।

    शहर के कई हिस्सों में लोग सीवरयुक्त पानी पीने को मजबूर हैं। वार्ड 12 में लोग बताते हैं कि नल खोलने पर ऐसा लगता है मानो नालों का पानी आ गया हो। वार्ड 16 में ताज़ा पानी में दुर्गंध और सफेद झाग दिखाई दे रही थी। लोग फिटकरी या अन्य सामग्री डालकर ही पानी को उपयोग लायक बनाते हैं।स्थानीय निवासी बीमार पड़ रहे हैं और पानी की समस्या पर लगातार धरना-प्रदर्शन कर रहे हैं। कई लोगों ने सीएम हेल्पलाइन पर शिकायत दर्ज कराई लेकिन ठोस कार्रवाई अब तक नहीं हुई।

    नगर निगम के उपायुक्त प्रदीप सिंह तोमर ने कहा कि गंदे पानी की समस्या के समाधान के लिए प्रयास लगातार जारी हैं और नगर निगम का अमला कार्यरत है। बावजूद इसके शहरवासियों की चिंता बरकरार है और स्वास्थ्य जोखिम बढ़ता जा रहा है।

  • 100 mg से ज्यादा निमेसुलाइड पर सरकार की सख्ती, मैन्युफैक्चरिंग और बिक्री पर तत्काल रोक



    नई दिल्ली। दर्द और बुखार में तेजी से राहत देने वाली निमेसुलाइड (Nimesulide) दवा को लेकर केंद्र सरकार ने बड़ा फैसला लिया है। स्वास्थ्य मंत्रालय ने 100 मिलीग्राम से अधिक डोज वाली सभी ओरल निमेसुलाइड दवाओं की मैन्युफैक्चरिंग और बिक्री पर तत्काल प्रतिबंध लगा दिया है। यह आदेश 29 दिसंबर से प्रभावी होगा।
    हालांकि 100 mg या उससे कम डोज की दवाएं डॉक्टर की सलाह पर उपलब्ध रहेंगी।

    स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार, निमेसुलाइड एक नॉन-स्टेरॉइडल एंटी-इंफ्लेमेटरी ड्रग (NSAID) है, जो दर्द और सूजन कम करने में असरदार है, लेकिन इसकी ज्यादा मात्रा से लिवर को गंभीर नुकसान पहुंचने का खतरा रहता है। विशेषज्ञों की रिपोर्ट और फार्माकोविजिलेंस डाटा के आधार पर यह फैसला लिया गया है, क्योंकि बाजार में इसके कई सुरक्षित विकल्प मौजूद हैं।

    सरकारी आदेश के बाद निमेसुलाइड के हाई डोज ब्रांड बेचने वाली दवा कंपनियों को तुरंत प्रोडक्शन बंद करना होगा। साथ ही, बाजार में पहले से मौजूद 100 mg से ज्यादा डोज वाली दवाओं को रिकॉल करना अनिवार्य होगा।

    नियमों का उल्लंघन करने पर कंपनियों और मेडिकल स्टोर्स के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जा सकती है।

    इस फैसले का असर आम मरीजों पर भी पड़ेगा। कुछ बड़ी फार्मा कंपनियों की दर्द निवारक दवाएं मेडिकल स्टोर्स से हट सकती हैं। अब मरीजों को बिना डॉक्टर की सलाह के निमेसुलाइड लेना मुश्किल होगा और चिकित्सक जरूरत के अनुसार पैरासिटामोल, आइबुप्रोफेन या अन्य विकल्प लिखेंगे। विशेषज्ञों का कहना है कि हाई डोज दर्द निवारक दवाओं का लंबे समय तक सेवन लिवर के लिए खतरनाक हो सकता है।

    बच्चों के मामले में यह फैसला ज्यादा प्रभावी नहीं होगा, क्योंकि निमेसुलाइड बच्चों के लिए पहले से ही प्रतिबंधित है। वहीं, जानवरों के इलाज में इस्तेमाल होने वाली सभी तरह की निमेसुलाइड दवाओं पर सरकार फरवरी 2025 में ही पूरी तरह रोक लगा चुकी है।

    इसी बीच दवाओं की गुणवत्ता को लेकर भी चिंता बढ़ी है। पैरासिटामोल सहित 53 दवाएं क्वालिटी टेस्ट में फेल पाई गई हैं। इनमें विटामिन, शुगर, ब्लड प्रेशर और एंटीबायोटिक दवाएं शामिल हैं। देश की शीर्ष ड्रग रेगुलेटरी संस्था सीडीएससीओ (CDSCO) ने इन दवाओं की सूची जारी कर संबंधित कंपनियों से जवाब तलब किया है।

    सरकार का कहना है कि इन कदमों का मकसद मरीजों की सुरक्षा सुनिश्चित करना और दवाओं के दुरुपयोग पर सख्ती से रोक लगाना है।

  • गलत इस्तेमाल से एंटीबायोटिक दवाओं पर खतरा बढ़ा: एम्स निदेशक का चेतावनी संदेश, AMR बना सामान्य संक्रमणों के लिए जानलेवा

    गलत इस्तेमाल से एंटीबायोटिक दवाओं पर खतरा बढ़ा: एम्स निदेशक का चेतावनी संदेश, AMR बना सामान्य संक्रमणों के लिए जानलेवा


    नई दिल्ली। आईसीयू में भर्ती गंभीर मरीजों से लेकर कई सामान्य रोगी सही इलाज के बावजूद ठीक नहीं हो पा रहे हैं। इसका मुख्य कारण एंटीबायोटिक दवाओं का घटता प्रभाव माना जा रहा है। यह स्थिति एंटी माइक्रोबियल रेजिस्टेंस (AMR) के रूप में जानी जाती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी ‘मन की बात’ कार्यक्रम में इस मुद्दे को उठाया था, वहीं सोमवार को एम्स भोपाल में इस विषय पर विशेष चर्चा हुई।

    एम्स के निदेशक डॉ. माधवानंद कर ने बताया कि AMR पूरी दुनिया में चिकित्सा क्षेत्र के लिए गंभीर चुनौती बन चुका है। बिना डॉक्टर की सलाह एंटीबायोटिक लेना, गलत खुराक, अधूरा कोर्स और जरूरत से ज्यादा शक्तिशाली दवाओं का इस्तेमाल इस संकट को और बढ़ा रहे हैं। यदि एंटीबायोटिक के जिम्मेदार उपयोग पर ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो सामान्य बीमारियां जैसे निमोनिया और मूत्र मार्ग संक्रमण भी जानलेवा हो सकती हैं।

    एम्स की रिसर्च में पता चला है कि यूरीन इन्फेक्शन, फेफड़े और खून के संक्रमण में इस्तेमाल होने वाली दवाएं तेजी से बेअसर हो रही हैं। 3,330 मरीजों पर किए गए अध्ययन में सिप्रोफ्लॉक्सासिन दवा अब ई.कोलाई बैक्टीरिया पर केवल 39% असर दिखा रही है। वहीं, मेरोपेनम दवा, जो केलबसीला न्यूमोनिया के इलाज में उपयोग होती थी, अब सिर्फ 52% मामलों में प्रभावी रही।

    डॉ. कर ने चेताया कि अगर AMR पर नियंत्रण नहीं किया गया, तो आने वाले समय में आम संक्रमण भी जानलेवा बन सकते हैं। एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस वह स्थिति है, जब बैक्टीरिया और अन्य सूक्ष्मजीव दवाओं के प्रति प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर लेते हैं,

    जिससे पहले असरदार दवाएं अब रोग को ठीक नहीं कर पा रही हैं।

    विशेषज्ञों के अनुसार, एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस के कारण निमोनिया, मूत्र मार्ग संक्रमण, त्वचा और पेट के कई रोगों का इलाज पहले की तुलना में अधिक कठिन हो गया है। मरीजों को महंगी और अधिक साइड इफेक्ट वाली दवाओं पर निर्भर होना पड़ रहा है। इसका मुख्य कारण है आम लोगों की गलत आदतें, जैसे डॉक्टर की सलाह के बिना दवा लेना, अधूरी खुराक लेना, जल्दी दवा बंद कर देना और हाई-एंड एंटीबायोटिक का जरूरत से ज्यादा उपयोग।

    एम्स भोपाल ने रोकथाम के लिए कई कदम उठाए हैं, जिनमें सुव्यवस्थित एंटीबायोटिक नीति, नियमित प्रशिक्षण कार्यक्रम, जनजागरूकता अभियान और एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस अवेयरनेस वीक शामिल हैं। डॉ. कर के अनुसार, डॉक्टरों, नर्सों और अन्य स्वास्थ्यकर्मियों के साथ-साथ आम नागरिकों की जागरूकता भी AMR से लड़ाई में बेहद अहम है।

    एम्स निदेशक ने अंतिम चेतावनी दी कि एंटीबायोटिक दवाएं मानव सभ्यता की सबसे बड़ी चिकित्सा उपलब्धियों में से एक हैं। अगर इनका गलत इस्तेमाल जारी रहा, तो आने वाली पीढ़ियां इन जीवनरक्षक दवाओं के लाभ से वंचित रह जाएंगी। इसलिए जिम्मेदारी और सतर्कता आज ही जरूरी है।