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  • शारदीय नवरात्रि के तीसरे दिन करें मां चंद्रघंटा की पूजा, जानें पौराणिक कथा, प्रिय भोग, मंत्र और पूजन विधि

    शारदीय नवरात्रि के तीसरे दिन करें मां चंद्रघंटा की पूजा, जानें पौराणिक कथा, प्रिय भोग, मंत्र और पूजन विधि

    नई दिल्ली ।शारदीय नवरात्रि का तीसरा दिन 13 अक्टूबर 2026 को मनाया जा रहा है। इस दिन मां दुर्गा के तीसरे स्वरूप मां चंद्रघंटा की पूजा की जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, देवी की आराधना से मन को शांति मिलती है और व्यक्ति में साहस, धैर्य तथा एकाग्रता का भाव विकसित होता है। मां चंद्रघंटा का स्वरूप कठिन परिस्थितियों में भी संयम बनाए रखने की प्रेरणा देता है। आज की व्यस्त दिनचर्या में कामकाज का दबाव और एक साथ कई जिम्मेदारियां निभाने की चुनौती लोगों के मानसिक तनाव को बढ़ा सकती है। ऐसे में भक्त मां चंद्रघंटा की पूजा करके मानसिक शांति और सकारात्मकता की कामना करते हैं।

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मां चंद्रघंटा के माथे पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र सुशोभित है। इसी कारण देवी को चंद्रघंटा कहा जाता है। देवीभागवत पुराण में उनके स्वरूप का वर्णन मिलता है। उनका शरीर स्वर्ण के समान चमकदार बताया गया है। मां की दस भुजाएं हैं और वे सिंह पर सवार रहती हैं। उनकी भुजाओं में विभिन्न अस्त्र-शस्त्र सुशोभित हैं। देवी का यह रूप सौम्यता और वीरता का प्रतीक माना जाता है। उनकी आराधना में भक्त शक्ति, साहस और कठिन परिस्थितियों का सामना करने की क्षमता प्राप्त करने की प्रार्थना करते हैं।

    पौराणिक कथा के अनुसार, जब महिषासुर नामक दैत्य का अत्याचार बढ़ने लगा और देवताओं को परेशान किया जाने लगा, तब मां दुर्गा ने दुष्ट शक्तियों का मुकाबला करने के लिए चंद्रघंटा का स्वरूप धारण किया। मान्यता है कि देवी के घंटे की भयानक ध्वनि से दैत्यों में भय फैल गया और बुरी शक्तियों का नाश हुआ। इसी कारण उनके घंटे को नकारात्मक शक्तियों को दूर करने और सकारात्मक ऊर्जा के संचार का प्रतीक माना जाता है। मां चंद्रघंटा का स्वरूप यह संदेश भी देता है कि विपरीत परिस्थितियों में घबराने के बजाय धैर्य और साहस के साथ आगे बढ़ना चाहिए।

    नवरात्रि के तीसरे दिन मां चंद्रघंटा को दूध और दूध से बनी मिठाइयों का भोग लगाने की परंपरा है। भक्त माता को मखाने या केसर की खीर, पेड़े, रबड़ी और मेवों से बनी मिठाइयां अर्पित कर सकते हैं। फूलों में कमल और सफेद या पीली चमेली को प्रिय माना जाता है। इसके अलावा लाल गुलाब, गेंदा और पीले रंग के फूल भी पूजा में चढ़ाए जा सकते हैं। पूजन के लिए सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें और पूजा स्थल को साफ रखें। इसके बाद मां की प्रतिमा या तस्वीर के सामने दीपक और धूप जलाएं, फूल अर्पित करें तथा दूध से बनी मिठाई का भोग लगाएं। श्रद्धापूर्वक आरती करें और पूजा के दौरान मन को शांत रखने का प्रयास करें।

    मां चंद्रघंटा की आराधना में मंत्र जाप का भी विशेष महत्व माना जाता है। भक्त देवी का ध्यान करते हुए ‘ॐ देवी चंद्रघण्टायै नमः॥’ मंत्र का जाप कर सकते हैं। उनका ध्यान मंत्र है, ‘पिण्डजप्रवरारूढा चण्डकोपास्त्रकैर्युता। प्रसादं तनुते मह्यं चंद्रघण्टेति विश्रुता॥’ इसका भावार्थ है कि श्रेष्ठ सिंह पर सवार, दुष्टों के संहार के लिए अस्त्र-शस्त्र धारण करने वाली और चंद्रघंटा के नाम से प्रसिद्ध देवी भक्त पर अपनी कृपा बनाए रखें।

    पूजा के दौरान क्रोध, कटुता और अनावश्यक विवाद से बचने की सलाह दी जाती है। घर और पूजा स्थल में स्वच्छता बनाए रखें तथा बासी फूलों को जमा न होने दें। धार्मिक परंपराओं के अनुसार, नवरात्रि में सात्विक भोजन करने और शराब तथा मांसाहार से दूर रहने की सलाह दी जाती है। मां चंद्रघंटा की आराधना का संदेश है कि कामकाज के दबाव और जीवन की कठिनाइयों के बीच भी शांत मन से निर्णय लेना चाहिए। घर और कार्यस्थल पर अनावश्यक शोर से बचना, दूसरों का सम्मान करना और धैर्य बनाए रखना जीवन में संतुलन स्थापित करने में मदद कर सकता है।

  • छिंदवाड़ा में बंगाली समाज की अनोखी दुर्गा पूजा, पांच दिन होती है आराधना; चार महीने पहले पहुंचते हैं मूर्तिकार

    छिंदवाड़ा में बंगाली समाज की अनोखी दुर्गा पूजा, पांच दिन होती है आराधना; चार महीने पहले पहुंचते हैं मूर्तिकार

    नई दिल्ली ।शारदीय नवरात्रि के दौरान आम तौर पर मां दुर्गा की आराधना नौ दिनों तक की जाती है, लेकिन छिंदवाड़ा के मोहन नगर में बंगाली समाज की पूजा परंपरा इससे अलग है। यहां बंगाली पंचांग के अनुसार मां दुर्गा की स्थापना पंचमी के दिन की जाती है और पांच दिनों तक विशेष पूजा-अर्चना होती है। इस वर्ष शारदीय नवरात्रि की शुरुआत 11 अक्टूबर से हो रही है, जबकि बंगाली समाज 16 अक्टूबर को मां दुर्गा की स्थापना करेगा और 21 अक्टूबर को विसर्जन किया जाएगा।

    मोहन नगर में बंगाली समाज की ओर से दुर्गा पूजा का आयोजन पिछले करीब 40 वर्षों से किया जा रहा है। इस दौरान विशेष रूप से तैयार किए गए दुर्गा पंडाल में एक साथ मां दुर्गा के साथ लक्ष्मी, सरस्वती, कार्तिक और गणेश की प्रतिमाएं स्थापित की जाती हैं। इसके अलावा महिषासुर की मूर्ति भी स्थापित की जाती है। बंगाली समाज में दुर्गा पूजा के लिए अलग विधि-विधान का पालन किया जाता है और इसी परंपरा के अनुसार पांच दिनों तक मां की आराधना की जाती है।

    इस बार बंगाली पंचांग के अनुसार 16 अक्टूबर को मां दुर्गा की स्थापना होगी। पूजा का समापन 21 अक्टूबर को प्रतिमाओं के विसर्जन के साथ होगा। इस तरह यहां नवरात्रि के पूरे नौ दिनों के बजाय पंचमी से शुरू होकर पांच दिनों तक दुर्गा पूजा की विशेष परंपरा निभाई जाएगी। पूजा के दौरान अलग-अलग धार्मिक अनुष्ठान किए जाते हैं और कई कार्यक्रम सुबह के समय आयोजित किए जाएंगे।

    बंगाली समाज की पूजा में अष्टमी और नवमी का भी विशेष महत्व है। दोनों तिथियों को मिलाकर एक विशेष पूजा की जाती है, जिसे संधी पूजा कहा जाता है। बंगाली दुर्गा पूजा की परंपरा में इसका खास महत्व माना जाता है। पांच दिनों की इस पूजा व्यवस्था में धार्मिक अनुष्ठानों का आयोजन बंगाली पंचांग और परंपरागत विधि-विधान के अनुसार किया जाता है।

    दुर्गा पूजा के लिए मूर्तियां तैयार करने का काम भी कई महीने पहले शुरू हो जाता है। पश्चिम बंगाल से आने वाले मूर्तिकार छिंदवाड़ा में करीब चार महीने पहले पहुंचते हैं। यहां वे बंगाली समाज की ओर से दिए गए ऑर्डर के अनुसार दुर्गा और अन्य देवी-देवताओं की प्रतिमाएं तैयार करते हैं। मूर्तियों को पूजा के लिए निर्धारित समय तक पूरी तरह तैयार करने के लिए यह प्रक्रिया कई महीनों तक चलती है।

    मूर्तिकार अपने साथ पश्चिम बंगाल से मूर्ति बनाने के लिए इस्तेमाल होने वाली विशेष मिट्टी भी लेकर आते हैं। इसके अलावा मां दुर्गा की प्रतिमा के कपड़े और सजावट में इस्तेमाल होने वाली सामग्री भी बंगाल से ही लाई जाती है। छिंदवाड़ा पहुंचने के बाद मूर्तिकार इन सामग्रियों के साथ चार महीने तक प्रतिमाओं को तैयार करने और उन्हें सजाने का काम करते हैं। पूजा के लिए प्रतिमाओं की तैयारी और सजावट की यह प्रक्रिया पिछले करीब 40 वर्षों से इसी तरह चल रही है।

    छिंदवाड़ा के मोहन नगर में बंगाली समाज की यह दुर्गा पूजा स्थानीय स्तर पर अपनी अलग धार्मिक परंपरा के लिए जानी जाती है। यहां स्थापना का समय, पूजा की अवधि, प्रतिमाओं की संख्या और संधी पूजा जैसी परंपराएं बंगाली पंचांग के अनुसार तय होती हैं। इस वर्ष भी समाज इसी परंपरा के अनुसार 16 अक्टूबर को मां दुर्गा की स्थापना कर पांच दिनों तक पूजा-अर्चना करेगा और 21 अक्टूबर को प्रतिमाओं का विसर्जन किया जाएगा।

  • Ganesh Chaturthi 2026: बप्पा की स्थापना से पहले जुटा लें पूजा सामग्री, चौकी से मोदक और पंचामृत तक पूरी तैयारी रखें

    Ganesh Chaturthi 2026: बप्पा की स्थापना से पहले जुटा लें पूजा सामग्री, चौकी से मोदक और पंचामृत तक पूरी तैयारी रखें

    नई दिल्ली । गणेश चतुर्थी पर घर में भगवान गणेश की स्थापना को लेकर तैयारियां शुरू हो जाती हैं। बप्पा के स्वागत के लिए पूजा स्थल सजाने से लेकर पूजा की सामग्री जुटाने तक कई काम पहले से करने पड़ते हैं। यदि आप भी इस बार घर पर गणपति स्थापना करने की तैयारी कर रहे हैं, तो पूजा में इस्तेमाल होने वाली सामग्री की पूरी सूची पहले ही तैयार कर लेना बेहतर रहेगा। इससे स्थापना के समय किसी जरूरी सामान की कमी नहीं होगी और पूजा की तैयारी व्यवस्थित तरीके से की जा सकेगी।

    गणपति को विराजमान करने के लिए सबसे पहले एक साफ चौकी की जरूरत होती है। चौकी पर बिछाने के लिए लाल या पूजा के अनुकूल साफ कपड़ा रखा जा सकता है। इसी स्थान पर गणपति की मूर्ति स्थापित की जाती है। मूर्ति के साथ अक्षत, रोली, कुमकुम, सिंदूर, हल्दी की गांठ और सिक्का जैसी पूजा सामग्री भी पहले से तैयार रखी जा सकती है।

    गणेश स्थापना में कलश का भी महत्व बताया गया है। इसके लिए तांबे या पीतल का कलश, गंगाजल, आम या अशोक के पत्ते, नारियल और कलावा जैसी सामग्री जुटाकर रखी जा सकती है। पूजा के समय इन चीजों की जरूरत पड़ती है, इसलिए इन्हें पहले से एक स्थान पर रखना सुविधाजनक रहेगा।

    गणपति पूजा की सामग्री में दूर्वा और सुपारी भी खास तौर पर शामिल की जाती है। बप्पा को अर्पित करने के लिए ताजे फूल भी तैयार रखें। इसके अलावा जनेऊ, पानी वाला नारियल और गुड़-नारियल का गोला भी पूजा की सामग्री में रखा जा सकता है। इनका इस्तेमाल पूजा और भोग की तैयारी में किया जाता है।

    भगवान गणेश को भोग लगाने के लिए मोदक या लड्डू, फल और पंचमेवा तैयार रखना चाहिए। यदि घर पर मोदक बनाने की तैयारी है तो उन्हें पूजा के समय से पहले बनाकर रख लेना बेहतर रहेगा। पंचामृत भी पूजा के लिए तैयार किया जा सकता है। इससे स्थापना और पूजा के दौरान जरूरी सामग्री पहले से उपलब्ध रहेगी।

    पूजा की थाली में घी का दीपक और धूप भी जरूर रखें। आरती और पूजा के दौरान इनकी जरूरत होती है। पूजा की सभी छोटी-बड़ी चीजों को एक साथ व्यवस्थित करके रखने से स्थापना के समय सामान तलाशने में परेशानी नहीं होगी।

    गणेश चतुर्थी की पूजा में कई तरह की सामग्री का इस्तेमाल होता है। इसलिए आखिरी समय की भागदौड़ से बचने के लिए पूजा का सामान एक दिन पहले ही जुटा लेना बेहतर रहेगा। चौकी, कपड़ा, गणपति मूर्ति, अक्षत, रोली, कुमकुम, सिंदूर, हल्दी, सिक्का, कलश, गंगाजल, पत्ते, नारियल, कलावा, सुपारी, दूर्वा, फूल और जनेऊ जैसी सामग्री की तैयारी पहले की जा सकती है।

    इसी तरह भोग के लिए मोदक या लड्डू, फल, पंचमेवा और पंचामृत भी समय से तैयार रखें। दीपक और धूप को भी पूजा की सामग्री के साथ रख दें। इस तरह गणपति स्थापना के समय जरूरी सामान पहले से तैयार रहेगा और पूजा की प्रक्रिया को आसानी से पूरा किया जा सकेगा।

  • अमेरिका में सत्यनारायण पूजा करवाना क्यों पड़ता है महंगा, पंडित की फीस से लेकर मंदिर और पूजा सामग्री तक जानें पूरा खर्च

    अमेरिका में सत्यनारायण पूजा करवाना क्यों पड़ता है महंगा, पंडित की फीस से लेकर मंदिर और पूजा सामग्री तक जानें पूरा खर्च

    नई दिल्ली । भारत में सत्यनारायण भगवान की कथा या पूजा करवाना आम बात है। खास मौकों, गृह प्रवेश, शादी के बाद, नामकरण या नए कारोबार की शुरुआत जैसे अवसरों पर लोग अपने घर में पंडित को बुलाकर पूजा करवाते हैं। पूजा की सामग्री जुटाने से लेकर पंडित की व्यवस्था तक ज्यादातर काम आसानी से हो जाता है। लेकिन अमेरिका में यही पूजा करवाना काफी महंगा और मेहनत वाला काम हो सकता है।

    भारत में सत्यनारायण पूजा सामान्य तौर पर कुछ हजार रुपये में हो जाती है। छोटे शहरों और गांवों में इसका खर्च करीब दो से पांच हजार रुपये तक हो सकता है, जबकि दिल्ली, मुंबई और बेंगलुरु जैसे बड़े शहरों में भी करीब 15 से 20 हजार रुपये में पूजा करवाई जा सकती है। इसके मुकाबले अमेरिका में इसी पूजा का खर्च काफी ज्यादा हो सकता है।

    अमेरिका में सत्यनारायण पूजा के लिए पंडित की फीस 300 डॉलर या उससे अधिक हो सकती है। भारत की तरह वहां हर शहर, कस्बे या इलाके में आसानी से पंडित उपलब्ध नहीं होते। ऐसे में कई दिन पहले बुकिंग करानी पड़ सकती है। पंडित अगर किसी दूसरे शहर या दूर की जगह से आ रहे हैं तो उनके आने-जाने का खर्च भी यजमान को उठाना पड़ सकता है।

    दूरी के हिसाब से पंडित के आने-जाने का खर्च करीब 50 डॉलर से लेकर 100 या 150 डॉलर तक हो सकता है। यानी पूजा के शुरुआती खर्च में ही पंडित की फीस के साथ यात्रा का खर्च जुड़ जाता है।

    अगर कोई व्यक्ति अपने घर या ऑफिस की जगह मंदिर में सत्यनारायण पूजा करवाना चाहता है, तो वहां भी पहले से बुकिंग करानी पड़ सकती है। मंदिर में पूजा करवाने के लिए अलग से शुल्क देना पड़ सकता है, जो करीब 100 से 150 डॉलर तक बताया गया है। इसके बाद पूजा सामग्री का खर्च सामने आता है।

    अमेरिका में भारत की तुलना में पूजा सामग्री हर जगह आसानी से उपलब्ध नहीं होती। फल, फूल, प्रसाद, कलश, पान, सुपारी और पूजा में इस्तेमाल होने वाली अन्य जरूरी चीजों के लिए कई किलोमीटर की यात्रा करनी पड़ सकती है। कुछ सामग्री की कीमत भी भारत के मुकाबले अधिक हो सकती है। केले का पत्ता तक वहां महंगा मिल सकता है।

    प्रसाद की व्यवस्था भी खर्च बढ़ा सकती है। यदि घर पर प्रसाद बनाया जाए तो अलग बात है, लेकिन बाहर से ऑर्डर करने पर अतिरिक्त पैसा खर्च होता है। इन सभी खर्चों को जोड़ने के बाद अमेरिका में सत्यनारायण पूजा का कुल खर्च 1000 डॉलर यानी करीब एक लाख रुपये या उससे अधिक तक पहुंच सकता है।

    भारत में पूजा के खर्च में पंडित की फीस करीब 1100 से 5100 रुपये, पूजा सामग्री 500 से 2000 रुपये, ताजे फल 500 से 2000 रुपये, पंचामृत और प्रसाद 500 से 1000 रुपये तथा मुख्य प्रसाद के लिए करीब 300 से 1500 रुपये तक खर्च हो सकता है। हालांकि, जगह और आयोजन के स्तर के अनुसार यह रकम कम या ज्यादा हो सकती है।

    अमेरिका हो या भारत, यदि पूजा बड़े स्तर पर आयोजित की जाए तो सजावट, मेहमानों की संख्या और भोजन जैसी व्यवस्थाओं से खर्च कई गुना बढ़ सकता है। अमेरिका में भारतीय त्योहारों के दौरान पंडितों की मांग बढ़ने से फीस भी अधिक हो सकती है। नवरात्र, दिवाली, गणेश चतुर्थी, जन्माष्टमी और महाशिवरात्रि जैसे अवसरों पर मांग बढ़ने के कारण पूजा से जुड़ा कुल खर्च और बढ़ सकता है।

  • अमेरिका में नई कार की पूजा के दौरान पंडित ने स्वस्तिक बनाने से किया इनकार, सामने आई बड़ी वजह

    अमेरिका में नई कार की पूजा के दौरान पंडित ने स्वस्तिक बनाने से किया इनकार, सामने आई बड़ी वजह

    नई दिल्ली ।विदेशों में रहने वाले भारतीय अपनी सांस्कृतिक जड़ों और धार्मिक परंपराओं को सहेजकर रखने के लिए जाने जाते हैं। चाहे कोई नया घर खरीदना हो या नई गाड़ी, पूजा-पाठ और अनुष्ठान की रस्में पूरी श्रद्धा के साथ निभाई जाती हैं। हाल ही में अमेरिका से एक ऐसा ही दिलचस्प मामला सामने आया है, जहां एक भारतीय मूल की महिला ने अपनी नई कार की वैदिक रीति-रिवाज से पूजा कराई। हालांकि, इस धार्मिक अनुष्ठान के दौरान एक अनोखी स्थिति देखने को मिली, जब पंडित ने गाड़ी पर स्वस्तिक का चिन्ह बनाने से मना कर दिया।

    सोशल मीडिया पर सामने आए एक वीडियो के अनुसार, अमेरिका में रह रही सारिका नाम की कंटेंट क्रिएटर ने अपनी नई कार की पूजा का आयोजन किया था। इस दौरान धोती-कुर्ता पहने पंडित ने भारतीय परंपरा के अनुसार पूरी विधि से पूजा संपन्न कराई। कार के बोनट पर सिंदूर से भगवान गणेश की आकृति बनाई गई, पुष्प अर्पित किए गए और सुरक्षा की कामना के साथ गंगाजल का छिड़काव किया गया। इसके अतिरिक्त, टायर के नीचे नींबू रखकर गाड़ी आगे बढ़ाने जैसी पारंपरिक रस्म भी पूरी की गई।

    पूजा के दौरान जब महिला ने कार पर ‘ओम’ और ‘स्वस्तिक’ बनाने का अनुरोध किया, तो पंडित ने ‘ओम’ का चिन्ह सहजता से अंकित कर दिया। हालांकि, जब स्वस्तिक बनाने की बात आई तो उन्होंने ऐसा करने से साफ मना कर दिया। पंडित का यह फैसला किसी धार्मिक मान्यता या मतभेद के कारण नहीं, बल्कि अमेरिका में स्वस्तिक को लेकर व्याप्त गलतफहमी और उससे उत्पन्न होने वाले संभावित विवादों से बचाव के लिए था।

    दरअसल, पश्चिमी देशों में कई लोग सनातन परंपरा के शुभ प्रतीक स्वस्तिक और नाजी जर्मनी के प्रतीक ‘हाकेनक्रूज’ के बीच अंतर नहीं समझ पाते हैं। अमेरिका में अनेक लोग स्वस्तिक को नाजी विचारधारा से जोड़कर देखने की भूल कर बैठते हैं। इसी भ्रम के कारण यह आशंका रहती है कि सार्वजनिक स्थान पर गाड़ी पर स्वस्तिक बना देखकर कोई स्थानीय निवासी विरोध दर्ज करा सकता है या फिर वाहन को क्षति पहुंचा सकता है।

    सांस्कृतिक विशेषज्ञों के अनुसार, हिंदू धर्म में स्वस्तिक को हजारों वर्षों से अत्यंत पवित्र, मंगलकारी और समृद्धि का प्रतीक माना जाता रहा है। किसी भी शुभ कार्य, नए प्रतिष्ठान या वाहन क्रय पर स्वस्तिक का निर्माण अनिवार्य माना जाता है। इसके विपरीत, पश्चिमी समाज में ऐतिहासिक कारणों से इस चिन्ह को लेकर एक नकारात्मक धारणा बनी हुई है। इसी व्यावहारिक समस्या को देखते हुए अमेरिका में कई भारतीय परिवार कार के बाहरी हिस्से पर स्वस्तिक बनाने के बजाय उसे कागज पर बनवाकर गाड़ी के अंदर रख लेते हैं।

    विदेशों में रहने वाले भारतीयों को अक्सर अपनी धार्मिक परंपराओं का पालन करते समय स्थानीय सामाजिक परिस्थितियों और संवेदनशीलता का ध्यान रखना पड़ता है। मध्य प्रदेश सहित भारत के विभिन्न राज्यों से विदेश गए लोग अपनी संस्कृति को जीवित रखने का प्रयास करते हैं, लेकिन सामाजिक सौहार्द बनाए रखने के लिए समय-समय पर व्यावहारिक बदलाव भी अपनाते हैं।

    इस घटनाक्रम ने एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारतीय प्रतीकों को लेकर जागरूकता और सही जानकारी के प्रसार की आवश्यकता को रेखांकित किया है। सोशल मीडिया पर भी इस निर्णय को पंडित जी की समझदारी और व्यावहारिक दृष्टिकोण के रूप में देखा जा रहा है, जिसने एक धार्मिक रस्म को किसी भी संभावित विवाद से बचा लिया।

  • सावन का दूसरा सोमवार 10 अगस्त को, 6 साल बाद बन रहे शुभ संयोग में जानें पूजा विधि और शिव आराधना का सही तरीका

    सावन का दूसरा सोमवार 10 अगस्त को, 6 साल बाद बन रहे शुभ संयोग में जानें पूजा विधि और शिव आराधना का सही तरीका

    नई दिल्ली ।सावन का महीना भगवान शिव की आराधना के लिए विशेष माना जाता है। इस दौरान आने वाले सोमवार को शिव भक्तों के लिए खास महत्व प्राप्त होता है। इस दिन श्रद्धालु व्रत रखते हैं, भगवान शिव का जलाभिषेक करते हैं और बेलपत्र, फूल, धतूरा, फल तथा प्रसाद अर्पित कर सुख-समृद्धि की कामना करते हैं। इस वर्ष सावन का दूसरा सोमवार 10 अगस्त को पड़ रहा है।

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस बार सावन के दूसरे सोमवार का महत्व इसलिए और बढ़ गया है क्योंकि सोमवार के साथ प्रदोष व्रत का संयोग बन रहा है। उपलब्ध धार्मिक जानकारी के अनुसार, ऐसा शुभ संयोग करीब छह साल बाद बन रहा है। शिव भक्तों के लिए सोमवार और प्रदोष दोनों ही भगवान शिव की उपासना से जुड़े महत्वपूर्ण अवसर माने जाते हैं।

    सावन सोमवार के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करने के बाद व्रत का संकल्प लेने की परंपरा है। इसके बाद भगवान शिव का ध्यान करके शिवलिंग पर जल अर्पित किया जाता है। श्रद्धालु अपनी श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार दूध या अन्य पूजन सामग्री से अभिषेक भी कर सकते हैं।

    पूजा के दौरान भगवान शिव को बेलपत्र, शमी, कनेर, धतूरा, चावल और फूल अर्पित किए जाते हैं। इसके साथ धूप और दीप जलाकर भगवान शिव की आराधना की जाती है। फल, पान, सुपारी और प्रसाद भी पूजा में शामिल किए जा सकते हैं। श्रद्धालु पूरे दिन व्रत रखते हुए भगवान शिव का स्मरण और मंत्र जाप करते हैं।

    भगवान शिव की पूजा में ‘ॐ नमः शिवाय’ मंत्र का जाप विशेष रूप से किया जाता है। इसे शिव का सरल और प्रमुख मंत्र माना जाता है। श्रद्धालु पूजा के दौरान इस मंत्र का जाप अपनी श्रद्धा के अनुसार कर सकते हैं।

    सावन सोमवार के साथ प्रदोष व्रत का संयोग होने के कारण इस दिन शिव आराधना का धार्मिक महत्व और बढ़ जाता है। प्रदोष व्रत भी भगवान शिव को समर्पित होता है और प्रदोष काल में शिव पूजा करने की परंपरा है। ऐसे में भक्त सोमवार की पूजा के साथ प्रदोष काल में भी भगवान शिव की आराधना कर सकते हैं।

    इस दिन महामृत्युंजय मंत्र का जाप भी किया जाता है। मंत्र है, “ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥” धार्मिक मान्यताओं में इस मंत्र को भगवान शिव की उपासना से जुड़ा महत्वपूर्ण मंत्र माना गया है।

    सावन सोमवार के अवसर पर देशभर के शिव मंदिरों में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है। भक्त शिवलिंग पर जल चढ़ाकर अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति और परिवार की सुख-समृद्धि की प्रार्थना करते हैं। कई श्रद्धालु इस दिन उपवास रखते हैं और पूरे दिन सात्विक जीवनशैली का पालन करते हैं।

    धार्मिक परंपराओं के अनुसार, भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए पूजा में दिखावे के बजाय श्रद्धा और भक्ति को महत्व दिया जाता है। इसलिए श्रद्धालु अपनी सुविधा और सामर्थ्य के अनुसार पूजा सामग्री का उपयोग कर सकते हैं। व्रत रखने वाले लोगों को अपनी स्वास्थ्य स्थिति का भी ध्यान रखना चाहिए।

    10 अगस्त का दूसरा सावन सोमवार इसलिए विशेष माना जा रहा है क्योंकि इस दिन सोमवार और प्रदोष व्रत का संयोग बताया जा रहा है। श्रद्धालु सुबह से शिव पूजा के साथ दिनभर भगवान शिव का स्मरण कर सकते हैं और प्रदोष काल में भी विधिपूर्वक आराधना कर सकते हैं।

  • उज्जैन महाकाल मंदिर में टीम इंडिया की जीत के लिए विशेष रुद्राभिषेक

    उज्जैन महाकाल मंदिर में टीम इंडिया की जीत के लिए विशेष रुद्राभिषेक


    उज्जैन । T20 वर्ल्ड कप के रोमांचक मुकाबले से पहले आज भारत-पाकिस्तान के बीच होने वाले मुकाबले को लेकर देशभर में उत्साह चरम पर है। इसी बीच उज्जैन के विश्व प्रसिद्ध श्री महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर में टीम इंडिया की जीत के लिए विशेष पूजा का आयोजन किया गया। महाशिवरात्रि के पावन अवसर पर मंदिर में पुजारियों ने गर्भगृह में विशेष रूप से भगवान महाकाल का पूजन और रुद्राभिषेक किया।

    पूजा के दौरान भारतीय क्रिकेट टीम के खिलाड़ियों की फोटो बाबा महाकाल के चरणों में रखी गई, और उनके लिए विशेष वैदिक मंत्रोच्चार के साथ विजय की कामना की गई। पुजारियों ने मंत्रों और आराधना के माध्यम से यह प्रार्थना की कि भारतीय टीम इस महत्त्वपूर्ण मुकाबले में सफलता अर्जित करे और पाकिस्तान पर करारी जीत हासिल हो।

    मंदिर में उपस्थित श्रद्धालुओं ने भी पूजा में भाग लिया और इस अवसर को देशभक्ति और खेल प्रेम का अनूठा संगम बताया। रुद्राभिषेक के दौरान गर्भगृह में चल रही मंत्रोच्चार की गूंज ने पूरे वातावरण को आध्यात्मिक बना दिया। पुजारियों ने कहा कि इस प्रकार की पूजा से खिलाड़ियों के मनोबल और देशवासियों के उत्साह में वृद्धि होती है।

    भारत-पाकिस्तान मुकाबला हमेशा ही क्रिकेट प्रेमियों के लिए खास होता है, और T20 वर्ल्ड कप जैसे बड़े आयोजन में इसका रोमांच और भी बढ़ जाता है। इसी रोमांच को देखते हुए देशभर के मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चन की जा रही है। उज्जैन का महाकालेश्वर मंदिर भी इस श्रृंखला में शामिल हुआ और भारतीय टीम की विजय के लिए विशेष रूप से भगवान महाकाल की उपासना की गई।

    मंदिर प्रशासन ने बताया कि इस अवसर पर सुरक्षा और व्यवस्थाओं का विशेष ध्यान रखा गया था, ताकि पूजा-संस्कार और खेल प्रेम का यह संगम सुरक्षित और सुचारू रूप से संपन्न हो सके। कई श्रद्धालु और स्थानीय नागरिक भी इस कार्यक्रम में शामिल हुए और उन्होंने अपने विश्वास और आस्था के साथ टीम इंडिया के लिए विजय की प्रार्थना की।

    क्रिकेट प्रेमियों के लिए यह आयोजन उत्साह और आस्था का प्रतीक बन गया है। उज्जैन महाकाल मंदिर की पावन गलियों में मंत्रों की ध्वनि और भारतीय टीम की जीत के लिए किये जा रहे विशेष रुद्राभिषेक ने माहौल को गरिमा और उमंग से भर दिया।

    इस प्रकार महाकालेश्वर मंदिर ने न केवल धार्मिक महत्व को जीवित रखा, बल्कि खेल और देशभक्ति के प्रति श्रद्धा को भी उजागर किया। आज का दिन भारतीय क्रिकेट प्रेमियों के लिए यादगार बन गया है, और उम्मीद जताई जा रही है कि टीम इंडिया के लिए यह पूजा शुभ और फलदायी सिद्ध होगी।