Tag: pulses

  • चीनी के साथ प्याज, दाल और खाद्य तेल की कीमतों में तेजी ने बढ़ाई चिंता, सरकार के कदमों के बावजूद महंगाई का दबाव जारी

    चीनी के साथ प्याज, दाल और खाद्य तेल की कीमतों में तेजी ने बढ़ाई चिंता, सरकार के कदमों के बावजूद महंगाई का दबाव जारी

    नई दिल्ली । देश के कई हिस्सों में रोजमर्रा की रसोई में इस्तेमाल होने वाली जरूरी खाद्य वस्तुओं की कीमतों में पिछले कुछ समय से तेजी देखी जा रही है। चीनी, प्याज, दाल और खाद्य तेल के दाम बढ़ने से आम परिवारों के मासिक बजट पर दबाव बढ़ गया है। खास तौर पर चीनी की कीमतों में तेज उछाल ने उपभोक्ताओं की चिंता बढ़ाई है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, पिछले एक सप्ताह में चीनी के दाम करीब 7 रुपये प्रति किलो तक बढ़े हैं, जबकि एक महीने में इसकी कीमत में लगभग 17 रुपये प्रति किलो तक की वृद्धि दर्ज की गई है। कई बाजारों में चीनी करीब 70 रुपये किलो तक बिक रही है।

    चीनी की कीमतों में तेजी के पीछे आपूर्ति और बाजार में उपलब्ध स्टॉक को लेकर चिंता प्रमुख कारणों में शामिल है। सरकार ने कीमतों को नियंत्रित करने के लिए बाजार में अतिरिक्त आपूर्ति सुनिश्चित करने की दिशा में कदम उठाए हैं। इसके तहत 31 अक्टूबर तक 10 लाख टन चीनी के शुल्क-मुक्त आयात को मंजूरी दी गई है। इसके अलावा जमाखोरी रोकने के लिए कारोबारियों के स्टॉक पर सीमा निर्धारित की गई है। घरेलू स्तर पर नई चीनी की उपलब्धता जल्दी बढ़ाने के लिए चीनी मिलों में पेराई सत्र भी सामान्य से पहले शुरू करने की तैयारी है।

    प्याज की कीमतों में भी पिछले कुछ सप्ताह में बढ़ोतरी हुई है। 21 अगस्त को प्याज का औसत खुदरा भाव करीब 40.79 रुपये प्रति किलो दर्ज किया गया, जबकि एक सप्ताह पहले यह लगभग 36.56 रुपये और एक महीने पहले 34.87 रुपये प्रति किलो था। इस तरह कुछ ही समय में प्याज के दाम में 4 से 5 रुपये प्रति किलो तक की वृद्धि हुई है। खरीफ प्याज की नई फसल की आवक में देरी को इसकी प्रमुख वजह माना जा रहा है। दक्षिण भारत में आवक प्रभावित होने के साथ महाराष्ट्र के प्रमुख उत्पादक क्षेत्रों में मानसून की स्थिति का भी असर पड़ा है। कीमतों को नियंत्रित करने के लिए बफर स्टॉक से प्याज की आपूर्ति बढ़ाने की कोशिश की जा रही है।

    दालों की कीमतों में भी हल्की तेजी का रुख बना हुआ है। अरहर, मूंग, उड़द और चना जैसी प्रमुख दालों के दाम में पिछले एक महीने में लगभग 1 से 2 रुपये प्रति किलो तक की बढ़ोतरी हुई है। दलहन की बुवाई के रकबे में कमी और मानसून से जुड़ी अनिश्चितता को इसकी प्रमुख वजहों में गिना जा रहा है। कमजोर बारिश या फसल उत्पादन में कमी की आशंका आगे दालों की कीमतों पर दबाव बढ़ा सकती है।

    खाद्य तेल भी महंगाई के इस दबाव से अछूते नहीं हैं। अंतरराष्ट्रीय बाजार में पाम ऑयल की कीमतों में तेजी आई है। उत्पादन वाले क्षेत्रों में मौसम संबंधी परिस्थितियों और वैश्विक आपूर्ति में बदलाव का असर भारतीय बाजार पर भी पड़ रहा है। भारत खाद्य तेल की अपनी जरूरत का एक बड़ा हिस्सा आयात के जरिए पूरा करता है, इसलिए अंतरराष्ट्रीय कीमतों में बदलाव का सीधा प्रभाव घरेलू बाजार पर पड़ता है। पिछले एक महीने में खाद्य तेलों की कीमतों में करीब 2 से 3 प्रतिशत तक बढ़ोतरी देखी गई है।

    इस तरह रसोई की महंगाई के पीछे किसी एक वस्तु की समस्या नहीं बल्कि आपूर्ति, मौसम, घरेलू उत्पादन, आयात लागत और वैश्विक बाजार की परिस्थितियों का संयुक्त प्रभाव दिखाई दे रहा है। सरकार चीनी और प्याज की उपलब्धता बढ़ाने तथा जमाखोरी पर रोक लगाने जैसे कदम उठा रही है, लेकिन आने वाले दिनों में कीमतों की दिशा नई फसल की आवक, मानसून और अंतरराष्ट्रीय बाजार की स्थिति पर काफी हद तक निर्भर करेगी।

  • पाकिस्तान में आर्थिक बदहाली के बीच नया संकट… दाल के लिए मचा हाहाकार

    पाकिस्तान में आर्थिक बदहाली के बीच नया संकट… दाल के लिए मचा हाहाकार


    फैसलाबाद।
    पड़ोसी देश पाकिस्तान (Pakistan) की आर्थिक बदहाली (Economic Distress) की खबरें नई नहीं हैं। खस्ताहाल पाकिस्तान दुनिया की कई वैश्विक संस्थानों (Global Institutions) से कर्ज लेकर अपनी जरूरतें पूरी कर पा रहा है। अब हाल ही में यह खबरें सामने आई हैं कि पाकिस्तान में दाल (Lentils) के लिए हाहाकार मचा हुआ है। स्थिति यह है कि पाकिस्तान अब अपनी जरूरतें पूरी करने के लिए लगभग पूरी तरह आयात पर निर्भर हो चुका है। पाकिस्तान में दाल का उत्पादन लगातार घट रहा है, जिससे देश को जरूरतें पूरी करने के लिए हर साल करीब 98 करोड़ डॉलर आयात पर खर्च करने पड़ रहे हैं।

    एक रिपोर्ट के मुताबिक कृषि विशेषज्ञों ने इस हालात पर गंभीर चिंता जताई है और कहा है कि अगर उत्पादन नहीं बढ़ा तो आयात पर निर्भरता और बढ़ेगी। पंजाब पल्सेज इंपोर्टर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष और ग्रेन मार्केट के चेयरमैन राणा मुहम्मद तैय्यब ने बताया कि 1998 से पहले पाकिस्तान दाल का प्रमुख निर्यातक देश था। लेकिन परवेज मुशर्रफ के दौर में लगाए गए निर्यात बैन के बाद किसानों का उत्साह कम हो गया, क्योंकि दाल कम मुनाफे वाली फसल बन गई। जानकारों के मुताबिक देश में हर साल करीब 16.2 लाख टन दाल की खपत होती है, जिसमें से लगभग 10.7 लाख टन आयात की जाती है। यानी पाकिस्तान को देश में खपत होने वाली करीब 80 प्रतिशत दाल आयात करनी पड़ती है।


    बारिश ने भी तरसाया

    तैय्यब ने जलवायु परिवर्तन के असर का भी जिक्र किया। उन्होंने बताया कि थल जैसे वर्षा आधारित इलाकों में समय पर बारिश हो जाए तो पैदावार 35 प्रतिशत तक बढ़ सकती है, लेकिन बारिश कम होने पर भारी नुकसान होता है और किसान अगले सीजन में दाल बोने से हिचकते हैं।

    जानकारों ने जताई चिंता
    ये मुद्दे विश्व दाल दिवस के मौके पर आयूब एग्रीकल्चरल रिसर्च इंस्टीट्यूट के पल्सेज रिसर्च इंस्टीट्यूट में आयोजित एक सेमिनार में उठाए गए। विशेषज्ञों ने कहा कि पाकिस्तान की सालाना जरूरत करीब 15 लाख टन है, लेकिन लोकल उत्पादन इसका सिर्फ एक छोटा हिस्सा ही पूरा कर पा रहा है। इसी कारण हर साल करीब 10 लाख टन दाल आयात करनी पड़ती है।

    AARI के पल्सेज सेक्शन के चीफ साइंटिस्ट खालिद हुसैन ने कहा कि दाल मानव पोषण और मिट्टी की उर्वरता दोनों के लिए जरूरी है। लेकिन सीमित मुनाफा और निर्यात बैन के कारण किसान इसकी खेती से बच रहे हैं। दाल उत्पादन बढ़ाने के मकसद से एक प्रस्ताव तैयार कर संबंधित अधिकारियों को भेजा गया है, लेकिन उसे अभी तक मंजूरी नहीं मिली है।

  • सब्जियां, मांस-मछली, अंडा-दाल और मसाले फिर हुए महंगे … खुदरा महंगाई दर में इजाफा

    सब्जियां, मांस-मछली, अंडा-दाल और मसाले फिर हुए महंगे … खुदरा महंगाई दर में इजाफा


    नई दिल्ली।
    बीते महीने के दौरान खुदरा महंगाई दर (Retail inflation rate) में बढ़ोतरी दर्ज की गई है जो बढ़कर 1.33 फीसदी रही है। इससे पहले नवंबर में सीपीआई 0.71 फीसदी थी। वहीं, खाद्य वस्तुओं (Food Items) की महंगाई दर -2.71 फीसदी दर्ज की गई है, जो नवंबर में -3.91 प्रतित रही थी। आंकड़ों से पता चलता है कि सब्जियों, मांस-मछली, अंडा, दाल, मसाले और व्यक्तिगत देखभाल के सामान की कीमतों में बढ़ोतरी के कारण कुल स्तर पर महंगाई दर में इजाफा हुआ है।

    सोमवार को राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय की तरफ से जारी आंकड़ों से पता चलता है कि नवंबर के मुकाबले दिसंबर में महंगाई दर 0.62 अंकों को बढ़ोतरी हुई है लेकिन उसके बाद भी महंगाई दर रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (आरबीआई) के अनुमान से कम रही है। चालू वित्तीय वर्ष की तीसरी तिमाही में आरबीआई ने महंगाई दर 3.9 प्रतिशत रहने का अनुमान जताया था।


    इन राज्यों में महंगाई सबसे ज्यादा

    राज्यों के लिहाज से देखा जाए तो केरल में सबसे अधिक महंगाई है। जहां पर बीते महीने औसत महंगाई दर 9.49 फीदी रही है। इसके बाद कर्नाटक का नंबर आता है। जहां पर महंगाई दर 2.99 फीसदी दर्ज की हई है। इसके बाद आंध्र प्रदेश (2.71%), तमिलनाडु (2.67%) और जम्मू-कश्मीर (2.26%) रही है।

    बीते महीने ग्रामीण इलाकों में महंगाई दर बढ़कर 0.76 फीसदी रही, जो नवंबर में 0.10 फीसदी थी। वहीं, शहरी क्षेत्रों में महंगाई बढ़कर 2.03 फीसदी पहुंच गई, जो उससे पहले महीने 1.40 फीसदी थी। इस अवधि में कई क्षेत्रों से जुड़ी महंगाई दर में नरमी भी देखने को मिली है। जैसे मकान (हाउसिंग) की महंगाई 2.86 फीसदी रही है जो एक महीने पहले 2.96 प्रतिशत थी। शिक्षा महंगाई 3.38 से घटकर 3.32 फीसदी रही है। वहीं, स्वास्थ्य महंगाई 3.60 से घटकर 3.43 फीसदी रही है।

    ईंधन और बिजली की महंगाई दर 1.97 फीसदी रही है जो नवंबर में 2.32 प्रतिशत रही थी। जबकि परिवहन और संचार क्षेत्र की महंगाई 0.88 प्रतिशत से घटकर 0.76 फीसदी रही।


    महीने के आधार पर बढ़ी और सालाना आधार पर घटी कीमतें

    अगर महीने के आधार पर देखा जाए तो नवंबर के मुकाबले दिसंबर में सब्जियों, अनाज और मसालों की कीमतें बढ़ी है, लेकिन सालाना आधार पर दिसंबर 2024 के मुकाबले दिसंबर 2025 में कीमतों में गिरावट आई है। सब्जियों के दाम 18.47 प्रतिशत और दालें 15.09 प्रतिशत घट गई। मसालों के दामों में भी 2.15 प्रतिशत और अनाजों में 0.35 प्रतिशत की नरमी रही। हालांकि तेल के दाम 6.75 प्रतिशत, फलों के 6.66 फीसदी और मांस एवं मछलियों के दामों में 5.12 प्रतिशत की वृद्धि हुई।