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  • शरद पूर्णिमा 2026 पर 30 साल बाद दुर्लभ संयोग की चर्चा, हर्षण और सर्वार्थ सिद्धि योग का विशेष महत्व

    शरद पूर्णिमा 2026 पर 30 साल बाद दुर्लभ संयोग की चर्चा, हर्षण और सर्वार्थ सिद्धि योग का विशेष महत्व

    नई दिल्ली । शरद पूर्णिमा हिंदू धर्म के प्रमुख पर्वों में शामिल है। इस दिन मां लक्ष्मी की पूजा, चंद्रमा के दर्शन और रात्रि में खीर बनाकर चांदनी में रखने की परंपरा निभाई जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, शरद पूर्णिमा की रात चंद्रमा अपनी 16 कलाओं से परिपूर्ण होता है और उसकी किरणों को अमृत के समान गुणों वाला माना जाता है। वर्ष 2026 में यह पर्व 25 अक्टूबर को मनाया जाएगा। इसे कोजागरी पूर्णिमा और रास पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है। इस बार 30 साल बाद दुर्लभ शुभ संयोग बनने की चर्चा के चलते भी इस पर्व को लेकर लोगों में उत्सुकता है।

    ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार, शरद पूर्णिमा पर हर्षण योग और सर्वार्थ सिद्धि योग का विशेष महत्व बताया जा रहा है। इन योगों को पूजा-पाठ, मंत्र जाप और दान-पुण्य के लिए शुभ माना जाता है। सर्वार्थ सिद्धि योग को ज्योतिष में विभिन्न शुभ कार्यों की शुरुआत के लिए अनुकूल समझा जाता है। वहीं, हर्षण योग को प्रसन्नता, उत्साह और सकारात्मकता से जोड़कर देखा जाता है। हालांकि, इन योगों के प्रभाव से जीवन में होने वाले बदलाव धार्मिक और ज्योतिषीय मान्यताओं का विषय हैं।

    कोजागरी पूर्णिमा पर मां लक्ष्मी की पूजा का महत्व

    धार्मिक मान्यता है कि शरद पूर्णिमा की रात मां लक्ष्मी पृथ्वी पर भ्रमण करती हैं और यह देखती हैं कि कौन उनकी आराधना के लिए जाग रहा है। इसी मान्यता से कोजागरी नाम जुड़ा है, जिसका अर्थ है ‘कौन जाग रहा है’। इस अवसर पर श्रद्धालु मां लक्ष्मी की पूजा करके घर में सुख, शांति और समृद्धि की कामना करते हैं। कई स्थानों पर रात में जागरण, भजन-कीर्तन और मंत्र जाप भी किया जाता है। भक्तों के लिए यह रात पूजा, साधना और धार्मिक आस्था से जुड़ी मानी जाती है।

    चांदनी में खीर रखने की परंपरा

    शरद पूर्णिमा पर दूध और चावल से खीर बनाने तथा उसे रातभर चंद्रमा की रोशनी में रखने की परंपरा प्रचलित है। मान्यता है कि इस रात चंद्रमा की किरणों में अमृत के समान गुण होते हैं। इसी विश्वास के आधार पर खीर को चांदनी में रखा जाता है और अगले दिन प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है। यह परंपरा देश के कई हिस्सों में श्रद्धा के साथ निभाई जाती है। हालांकि, चंद्रमा की किरणों में विशेष औषधीय या अमृत जैसे गुण होने की मान्यता वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित तथ्य नहीं है।

    शरद पूर्णिमा पर कैसे करें पूजा?

    इस दिन सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनने के बाद मां लक्ष्मी और भगवान विष्णु की पूजा करने की परंपरा है। शाम को चंद्रमा के दर्शन करके अर्घ्य दिया जाता है और खीर का भोग लगाया जाता है। श्रद्धालु अपनी सामर्थ्य के अनुसार जरूरतमंद लोगों को भोजन, वस्त्र या अन्य आवश्यक वस्तुओं का दान भी कर सकते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार, श्रद्धा और विधि-विधान से पूजा करने पर परिवार में सुख-समृद्धि बनी रहती है।

    इस प्रकार शरद पूर्णिमा धार्मिक आस्था, चंद्र उपासना और पारंपरिक रीति-रिवाजों से जुड़ा पर्व है। हर्षण योग और सर्वार्थ सिद्धि योग को लेकर बताई जा रही ज्योतिषीय मान्यताएं इस अवसर को विशेष बनाती हैं। वहीं, मां लक्ष्मी की आराधना, भजन-कीर्तन, दान और चांदनी में खीर रखने की परंपरा इस पर्व की प्रमुख विशेषताएं हैं।

  • शरद पूर्णिमा पर बनाएं ब्राउन राइस की हेल्दी खीर, स्वाद के साथ पोषण का रखें ध्यान..

    शरद पूर्णिमा पर बनाएं ब्राउन राइस की हेल्दी खीर, स्वाद के साथ पोषण का रखें ध्यान..

    नई दिल्ली । शरद पूर्णिमा का त्योहार चांदनी रात, पूजा-पाठ और पारंपरिक पकवानों के लिए खास माना जाता है। इस अवसर पर कई घरों में दूध और चावल से बनी खीर तैयार की जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, शरद पूर्णिमा की रात खीर को चांदनी में रखने और अगले दिन उसका सेवन करने की परंपरा है। अगर आप इस बार पारंपरिक खीर में कुछ बदलाव करना चाहते हैं, तो ब्राउन राइस से बनी खीर एक विकल्प हो सकती है। इसे दूध, मेवे, इलायची और केसर के साथ तैयार किया जा सकता है। हालांकि, इसे हेल्दी बनाने के लिए मिठास और मात्रा का ध्यान रखना भी जरूरी है।

    हिंदू धर्म में शरद पूर्णिमा का विशेष महत्व माना जाता है। इस दिन चंद्रमा पूर्ण अवस्था में दिखाई देता है और कई घरों में मां लक्ष्मी की पूजा की जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस रात चंद्रमा की रोशनी में रखी खीर का सेवन शुभ माना जाता है। इसी परंपरा के कारण इस पर्व को खीर पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है। दूध, चावल और मेवों से तैयार खीर त्योहार की परंपरा और पारिवारिक उत्सव का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

    इस बार खीर को अलग अंदाज में बनाने के लिए सफेद चावल की जगह ब्राउन राइस का इस्तेमाल किया जा सकता है। ब्राउन राइस में फाइबर और कुछ जरूरी पोषक तत्व मौजूद होते हैं। वहीं, दूध से प्रोटीन और कैल्शियम मिलता है। बादाम और पिस्ता जैसे मेवे खीर में स्वाद और पोषक तत्व जोड़ते हैं। मिठास के लिए ब्राउन शुगर का इस्तेमाल किया जा सकता है, लेकिन ध्यान रखें कि इसमें भी चीनी होती है। इसलिए इसे शुगर-फ्री विकल्प नहीं समझना चाहिए और इसकी मात्रा सीमित रखनी चाहिए।

    ब्राउन राइस की खीर बनाने के लिए ब्राउन राइस, अपनी पसंद के अनुसार फुल क्रीम या अन्य दूध, थोड़ी ब्राउन शुगर, इलायची पाउडर, कटे हुए बादाम और पिस्ता तथा केसर की जरूरत होगी। सामग्री की मात्रा खीर बनाने वाले लोगों की संख्या के अनुसार तय की जा सकती है।

    खीर बनाने के लिए सबसे पहले ब्राउन राइस को अच्छी तरह धो लें और लगभग 30 मिनट तक पानी में भिगोकर रखें। इससे चावल को पकने में मदद मिलेगी। इसके बाद एक भारी तले वाले बर्तन में दूध गर्म करें। दूध में उबाल आने पर भीगे हुए चावल डाल दें। अब इसे धीमी आंच पर पकने दें और बीच-बीच में चलाते रहें, ताकि चावल बर्तन के तले में न चिपके।

    जब चावल अच्छी तरह नरम हो जाएं और दूध गाढ़ा होने लगे, तो खीर को आंच से उतार लें। इसे थोड़ा ठंडा होने दें और फिर स्वाद के अनुसार ब्राउन शुगर मिलाएं। अंत में इलायची पाउडर, केसर और कटे हुए बादाम-पिस्ता डालकर अच्छी तरह मिला दें। इस तरह ब्राउन राइस की खीर तैयार हो जाएगी। चावल के प्रकार और पकाने के तरीके के अनुसार इसे तैयार होने में अधिक समय लग सकता है, इसलिए चावल के पूरी तरह नरम होने तक पकाना जरूरी है।

    खीर को संतुलित आहार का हिस्सा बनाने के लिए अतिरिक्त चीनी डालने से बचें और ब्राउन शुगर भी सीमित मात्रा में इस्तेमाल करें। मेवे स्वाद बढ़ाते हैं, लेकिन उनकी मात्रा भी अपनी जरूरत के अनुसार रखें। यदि आप मधुमेह या किसी अन्य स्वास्थ्य संबंधी समस्या के कारण मीठे का सेवन सीमित करते हैं, तो खीर की मात्रा और मिठास का विशेष ध्यान रखें।

    शरद पूर्णिमा पर खीर को चांदनी में रखने की परंपरा निभाते समय खाद्य सुरक्षा को नजरअंदाज न करें। दूध से बनी खीर को पूरी रात खुले में या कमरे के तापमान पर छोड़ने से उसमें बैक्टीरिया पनपने का खतरा बढ़ सकता है। खीर को ढककर रखें और लंबे समय तक बाहर न छोड़ें। सुरक्षित रखने के लिए इसे उचित समय पर फ्रिज में रखें। इस तरह त्योहार की परंपरा निभाने के साथ स्वाद और सेहत, दोनों का ध्यान रखा जा सकता है।

  • शरद पूर्णिमा पर इन 5 चीजों का दान माना जाता है शुभ, मां लक्ष्मी की कृपा और सुख-समृद्धि के लिए जानें धार्मिक मान्यताएं

    शरद पूर्णिमा पर इन 5 चीजों का दान माना जाता है शुभ, मां लक्ष्मी की कृपा और सुख-समृद्धि के लिए जानें धार्मिक मान्यताएं

    नई दिल्ली । शरद पूर्णिमा का हिंदू धर्म में विशेष महत्व माना जाता है। यह तिथि मां लक्ष्मी की पूजा, चंद्रदेव की आराधना और दान-पुण्य के लिए महत्वपूर्ण मानी जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, शरद पूर्णिमा की रात चंद्रमा अपनी 16 कलाओं से परिपूर्ण होता है। इस अवसर पर पूजा-पाठ करने के साथ जरूरतमंद लोगों की सहायता करने की परंपरा भी प्रचलित है। मान्यता है कि इस दिन श्रद्धापूर्वक दान करने से सुख-शांति और घर में सुख-समृद्धि की कामना की जाती है। ऐसे में इस पावन अवसर पर कुछ विशेष वस्तुओं का दान करने का धार्मिक महत्व बताया गया है।

    सनातन परंपरा में पूर्णिमा तिथि को पूजा, जप और दान-पुण्य के लिए विशेष माना जाता है। शरद पूर्णिमा पर मां लक्ष्मी का स्मरण करने और चंद्रदेव की पूजा करने की परंपरा है। इस रात खीर बनाकर चंद्रमा की रोशनी में रखने की मान्यता भी काफी प्रचलित है। इसके साथ ही जरूरतमंदों को भोजन, वस्त्र और उपयोगी सामग्री देना सेवा भाव से जुड़ा माना जाता है। धार्मिक विश्वास के अनुसार, दान का महत्व केवल वस्तु देने तक सीमित नहीं है, बल्कि जरूरतमंद व्यक्ति की सहायता करना भी इसका प्रमुख उद्देश्य है।

    शरद पूर्णिमा पर सफेद वस्त्रों का दान करना शुभ माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं में सफेद रंग को शांति, पवित्रता और चंद्रमा से जोड़कर देखा जाता है। इस दिन जरूरतमंद लोगों को साफ-सुथरे कपड़े दिए जा सकते हैं। दान करते समय अपनी आर्थिक स्थिति और सामर्थ्य का ध्यान रखना चाहिए। महंगे वस्त्र देना आवश्यक नहीं है, बल्कि किसी जरूरतमंद की आवश्यकता पूरी करना अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है।

    इस अवसर पर चावल, दूध और चीनी का दान भी शुभ माना जाता है। शरद पूर्णिमा पर खीर बनाने और उसे चंद्रमा की रोशनी में रखने की परंपरा के कारण इन खाद्य सामग्रियों का विशेष उल्लेख किया जाता है। जरूरतमंद परिवारों को चावल, दूध, चीनी या अन्य उपयोगी खाद्य सामग्री देना अन्नदान और सेवा भाव से जुड़ा है। इस तरह का दान परिवारों की भोजन संबंधी जरूरतों को पूरा करने में भी मदद कर सकता है।

    धार्मिक मान्यताओं में चांदी का संबंध चंद्रदेव से माना जाता है। इसलिए शरद पूर्णिमा पर सामर्थ्य के अनुसार चांदी के बर्तनों का दान करना भी शुभ बताया जाता है। मान्यता है कि ऐसा करने से मानसिक शांति और सुख-समृद्धि की कामना की जाती है। हालांकि, दान के लिए चांदी जैसी महंगी वस्तु देना अनिवार्य नहीं है। व्यक्ति अपनी क्षमता के अनुसार छोटी वस्तु दान करके भी सेवा कार्य में योगदान दे सकता है।

    शरद पूर्णिमा पर सफेद मिठाई और मौसमी फलों का दान करना भी पुण्यदायी माना जाता है। इस दिन जरूरतमंद लोगों को मिठाई, फल और अन्य खाद्य पदार्थ दिए जा सकते हैं। भोजन साझा करना और दूसरों की सहायता करना इस परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसके अलावा जरूरतमंदों को भोजन कराना, राशन देना या आर्थिक सहायता उपलब्ध कराना भी उपयोगी दान कार्यों में शामिल है। धार्मिक परंपराओं में अन्नदान को विशेष महत्व दिया गया है, क्योंकि इससे लोगों की बुनियादी जरूरतों को पूरा करने में मदद मिलती है।

    दान करते समय कुछ बातों का ध्यान रखना भी जरूरी है। दान हमेशा श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार करना चाहिए। खाद्य सामग्री साफ-सुथरी और उपयोग के योग्य होनी चाहिए। सहायता करते समय सामने वाले व्यक्ति की वास्तविक जरूरत को प्राथमिकता देनी चाहिए और किसी भी प्रकार के दिखावे या अहंकार से बचना चाहिए। किसी जरूरतमंद की मदद करते समय उसके सम्मान और भावनाओं का ध्यान रखना भी महत्वपूर्ण है।

    मां लक्ष्मी की कृपा पाने की धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, शरद पूर्णिमा की रात घर की साफ-सफाई करने, दीपक जलाने, श्रद्धापूर्वक पूजा करने और जरूरतमंदों की सहायता करने की परंपरा है। हालांकि, इन धार्मिक मान्यताओं को आस्था और विश्वास के संदर्भ में समझना चाहिए। इस पर्व का एक महत्वपूर्ण संदेश दूसरों के साथ खुशियां बांटना और समाज में सेवा भावना को बढ़ावा देना भी है। इसलिए शरद पूर्णिमा पर दान करते समय वस्तु के मूल्य से अधिक उसके पीछे की भावना और जरूरतमंद की सहायता को महत्व देना चाहिए।

  • पूर्णिमा सुबह 09:09 बजे से प्रारंभ…. आज पूरे दिन भद्रा का साया और कल पंचक, जानें राखी बांधने का शुभ मुहूर्त!

    पूर्णिमा सुबह 09:09 बजे से प्रारंभ…. आज पूरे दिन भद्रा का साया और कल पंचक, जानें राखी बांधने का शुभ मुहूर्त!


    नई दिल्ली।
    हिंदू धर्म ( Hinduism) में सावन पूर्णिमा (Sawan Purnima) का विशेष महत्व है। इस दिन रक्षा बंधन (Raksha Bandhan) या राखी का त्योहार मनाया जाता है। यह पर्व भाई-बहन के अटूट प्रेम, विश्वास और स्नेह का प्रतीक है। इस साल सावन पूर्णिमा तिथि 27 अगस्त को सुबह 09: 09 मिनट पर प्रारंभ हो गई है और 28 अगस्त 2026 को सुबह 09:47 बजे समाप्त होगी।

    प्रदोष काल और चंद्रोदय के समय पूर्णिमा तिथि व्याप्त होने के कारण सावन पूर्णिमा व्रत आज 27 अगस्त को है। 27 अगस्त को पूर्णिमा व्रत के दिन भद्रा और पंचक का साया भी रहेगा। इस बार पूर्णिमा तिथि पर चंद्र ग्रहण का संयोग भी बन रहा है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या चंद्र ग्रहण (Lunar Eclipse) के कारण सावन पूर्णिमा व्रत के दिन ही रक्षा बंधन मनाया जाएगा और भद्रा के कारण राखी बांधने में अड़चन आएगी या नहीं। आइए जानते हैं रक्षा बंधन कब मनाएं?

    27 या 28 अगस्त कब मनाएं रक्षा बंधन:

    पंडित नरेंद्र उपाध्याय के अनुसार, हिंदू धर्म में किसी भी पर्व या त्योहार को उदया तिथि में मनाना सर्वोत्तम माना गया है। सावन पूर्णिमा तिथि 27 अगस्त को सुबह प्रारंभ होगी। शास्त्रों में पूर्णिमा व्रत का विधान उस दिन है, दिन समय पूर्णिमा तिथि के साथ चंद्रोदय होता है। ऐसा संयोग 27 अगस्त को ही मिल रहा है। 28 अगस्त को सुबह के समय पूर्णिमा तिथि समाप्त हो जाएगी जिसके कारण पूर्णिमा युक्त चंद्रोदय संभव नहीं है। इसलिए सावन पूर्णिमा का व्रत 27 अगस्त को मान्य रहेगा।

    अगर रक्षा बंधन के पर्व की बात करें तो यह त्योहार हमेशा भद्रा रहित पूर्णिमा में मनाना उत्तम माना गया है। 27 अगस्त को भद्रा सुबह 07 बजे से शाम 06:02 बजे तक रहेगी। 28 अगस्त को सूर्योदय से पूर्व भद्रा समाप्त हो जाएगी और उदया पूर्णिमा मिलेगी। इसलिए उदयाव्यापी पूर्णिमा में रक्षा बंधन और सावन पूर्णिमा का स्नान-दान मनाना उत्तम रहने वाला है। हालांकि इस दिन पंचक भी रहेगा। लेकिन रक्षा बंधन पर भद्रा ज्यादा महत्वपूर्ण मानी गई है। मान्यता है कि भद्रा काल में भाई को राखी बांधने से भाई-बहन दोनों को ही नकारात्मक फलों की प्राप्ति होती है। इसलिए भद्रा के समय राखी बांधने से बचना चाहिए।


    28 अगस्त को राखी बांधने का शुभ मुहूर्त:

    28 अगस्त 2026 को भाई की कलाई पर राखी बांधने का सबसे उत्तम और श्रेष्ठ मुहूर्त सुबह 5:57 बजे से सुबह 9:48 बजे तक रहेगा। अगर आप सुबह के समय राखी नहीं बांध पाते हैं तो दोपहर 12:04 बजे से दोपहर 12:53 बजे तक भी राखी बांधने का शुभ मुहूर्त रहेगा। शुभ मुहूर्त में राखी बांधना अत्यंत शुभ माना गया है। भद्रा विराजमान नहीं होने के कारण 28 अगस्त को पूरे दिन राखी का पर्व मनाया जा सकेगा। हालांकि राहुकाल का विचार अनिवार्य है।

    28 अगस्त को राहुकाल कब से कब तक है:
    ज्योतिष शास्त्र में राहुकाल को शुभ नहीं माना गया है। मान्यता है कि इस समय किए गए कार्यों का अशुभ फल प्राप्त होता है। 28 अगस्त को राहुकाल सुबह 10:46 बजे से दोपहर 12:22 बजे के बीच रहेगा।


    चंद्र ग्रहण का राखी पर असर:

    28 अगस्त को साल का दूसरा और आखिरी चंद्र ग्रहण लगेगा। भारतीय समयानुसार इस ग्रहण की शुरुआत सुबह 06 बजकर 53 मिनट पर होगी और दोपहर 12 बजकर 32 मिनट पर समाप्त होगा। यह ग्रहण अपने चरम पर सुबह 09 बजकर 43 मिनट के आसपास होगा। यह ग्रहण दिन में लगेगा, जिसके कारण भारत में यह नजर नहीं आएगा। ग्रहण नहीं दिखने के कारण इसका सूतक काल मान्य नहीं रहेगा। सूतक काल नहीं लगने के कारण चंद्र ग्रहण का राखी के पर्व पर कोई असर नहीं रहेगा।

  • रक्षाबंधन 2026 की तिथि को लेकर दूर हुआ भ्रम, 28 अगस्त को शुभ मुहूर्त में मनाया जाएगा भाई-बहन का पावन पर्व

    रक्षाबंधन 2026 की तिथि को लेकर दूर हुआ भ्रम, 28 अगस्त को शुभ मुहूर्त में मनाया जाएगा भाई-बहन का पावन पर्व

    नई दिल्ली । भाई-बहन के स्नेह, विश्वास और आजीवन सुरक्षा के संकल्प का प्रतीक रक्षाबंधन का पर्व वर्ष 2026 में 28 अगस्त, शुक्रवार को मनाया जाएगा। सावन पूर्णिमा पर मनाए जाने वाले इस महत्वपूर्ण सनातन पर्व को लेकर इस बार तिथि और भद्रा काल के कारण लोगों के बीच भ्रम की स्थिति बनी हुई थी। हालांकि पंचांग के अनुसार उदया तिथि के आधार पर 28 अगस्त को ही रक्षाबंधन मनाना शास्त्रसम्मत और शुभ माना गया है। यही कारण है कि ज्योतिषाचार्य और धर्माचार्य भी इसी दिन पर्व मनाने की सलाह दे रहे हैं।

    हिंदू पंचांग के अनुसार सावन पूर्णिमा तिथि का आरंभ 27 अगस्त को सुबह 9 बजकर 9 मिनट पर होगा और इसका समापन 28 अगस्त को सुबह 9 बजकर 49 मिनट पर होगा। चूंकि 28 अगस्त को सूर्योदय के समय पूर्णिमा तिथि विद्यमान रहेगी, इसलिए धार्मिक परंपरा के अनुसार इसी दिन रक्षाबंधन का पर्व मनाया जाएगा। सनातन धर्म में अधिकांश प्रमुख पर्व उदया तिथि के आधार पर निर्धारित किए जाते हैं, इसलिए इस वर्ष भी 28 अगस्त को ही मान्यता दी गई है।

    रक्षाबंधन पर शुभ मुहूर्त में राखी बांधने का विशेष महत्व माना जाता है। पंचांग के अनुसार बहनें 28 अगस्त को सुबह 5 बजकर 57 मिनट से सुबह 9 बजकर 48 मिनट तक अपने भाइयों की कलाई पर रक्षा सूत्र बांध सकती हैं। यह अवधि अत्यंत शुभ मानी गई है। इस दौरान पूजा-अर्चना, तिलक, आरती और रक्षा सूत्र बांधने की परंपरा का पालन करना मंगलकारी माना जाता है। जो लोग किसी कारणवश इस समय में राखी नहीं बांध पाते, उनके लिए अभिजीत मुहूर्त भी उपलब्ध रहेगा। अभिजीत मुहूर्त सुबह 11 बजकर 56 मिनट से दोपहर 12 बजकर 48 मिनट तक रहेगा, जिसे भी शुभ कार्यों के लिए अनुकूल माना जाता है।

    रक्षाबंधन पर भद्रा काल का विशेष ध्यान रखा जाता है, क्योंकि धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भद्रा के दौरान रक्षा सूत्र बांधना उचित नहीं माना जाता। वर्ष 2026 में 27 अगस्त को सुबह 9 बजकर 8 मिनट से रात 9 बजकर 32 मिनट तक भद्रा का प्रभाव रहेगा। यही कारण है कि इस दिन राखी बांधने से बचने की सलाह दी जाती है। राहत की बात यह है कि 28 अगस्त को भद्रा का प्रभाव समाप्त हो चुका होगा, जिससे पूरे विधि-विधान और शुभ मुहूर्त में रक्षाबंधन का पर्व मनाया जा सकेगा।

    रक्षाबंधन केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति में पारिवारिक मूल्यों, विश्वास और स्नेह का भी प्रतीक है। इस दिन बहनें अपने भाइयों की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधकर उनके सुख, समृद्धि, उत्तम स्वास्थ्य और दीर्घायु की कामना करती हैं। बदले में भाई अपनी बहनों की हर परिस्थिति में रक्षा करने और जीवनभर साथ निभाने का संकल्प लेते हैं। यही भावनात्मक रिश्ता इस पर्व को भारतीय समाज में विशेष महत्व प्रदान करता है।

    रक्षाबंधन से जुड़ी कई धार्मिक और ऐतिहासिक कथाएं प्रचलित हैं। इनमें सबसे प्रसिद्ध प्रसंग महाभारत काल का माना जाता है। मान्यता है कि भगवान श्रीकृष्ण की उंगली घायल होने पर द्रौपदी ने अपनी साड़ी का एक टुकड़ा फाड़कर उनकी उंगली पर बांध दिया था। द्रौपदी के इस स्नेह और समर्पण से प्रसन्न होकर श्रीकृष्ण ने उनकी रक्षा का वचन दिया और बाद में संकट की घड़ी में उस वचन को निभाया। यही प्रसंग भाई-बहन के अटूट विश्वास, प्रेम और सुरक्षा के भाव का प्रतीक माना जाता है। इसी संदेश के साथ रक्षाबंधन का पर्व आज भी पूरे देश में श्रद्धा, उल्लास और पारिवारिक एकता के वातावरण में मनाया जाता है।

  • क्षौर कर्म के नियम: भद्रा, श्राद्ध और आयु से जुड़ी मान्यताओं का सच, जानिए क्या है परंपरा

    क्षौर कर्म के नियम: भद्रा, श्राद्ध और आयु से जुड़ी मान्यताओं का सच, जानिए क्या है परंपरा


    नई दिल्ली। हिंदू परंपरा में क्षौर कर्म को केवल शरीर की सफाई नहीं, बल्कि एक शुद्धिकरण और अनुशासन से जुड़ी धार्मिक क्रिया माना गया है। इसमें बाल कटवाना, दाढ़ी-मूंछ बनवाना और नाखून काटना शामिल होता है। शास्त्रों और परंपराओं में इससे जुड़े कई नियम बताए गए हैं, जिन्हें लोग आस्था के आधार पर मानते हैं।

    क्या है क्षौर कर्म?
    क्षौर कर्म का अर्थ है शरीर की स्वच्छता से जुड़ी गतिविधियाँ जैसे

    बाल कटवाना या मुंडन कराना

    दाढ़ी और मूंछ बनवाना

    नाखून काटना

    धार्मिक दृष्टि से इसे शुद्धता और नए आरंभ का प्रतीक माना जाता है।

    किन दिनों में इसे टालने की परंपरा है?
    परंपरागत मान्यताओं में कुछ तिथियों और दिनों को क्षौर कर्म के लिए कम शुभ माना गया है, जैसे—

    एकादशी, अमावस्या और पूर्णिमा

    कुछ धार्मिक पर्व और व्रत के दिन

    संक्रांति के समय

    कुछ परंपराओं में मंगलवार और शनिवार को भी इसे टालने की सलाह दी जाती है, लेकिन यह सभी जगह समान नहीं है और क्षेत्रीय परंपराओं पर निर्भर करता है।

    भद्रा और मुहूर्त का महत्व
    शास्त्रीय मान्यताओं के अनुसार भद्रा काल में कोई भी शुभ कार्य, जिसमें क्षौर कर्म भी शामिल है, करने से बचने की सलाह दी जाती है। इसलिए कई लोग शुभ मुहूर्त देखकर ही यह कार्य करते हैं।

    श्राद्ध से जुड़ी परंपरा
    श्राद्ध कर्म के समय शुद्धता और नियमों का विशेष महत्व माना गया है। इसी कारण श्राद्ध करने से पहले शरीर की स्वच्छता पर ध्यान देने की परंपरा रही है, जिसमें क्षौर कर्म को भी शामिल किया जाता है।

    आयु से जुड़ी मान्यताएं
    कुछ परंपराओं में अलग-अलग दिनों में क्षौर कर्म करने को लेकर आयु बढ़ने या घटने जैसी मान्यताएं प्रचलित हैं। लेकिन यह पूरी तरह धार्मिक आस्था और लोकविश्वास पर आधारित है, इसका कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है।

  • आज का पंचांग और होलिका दहन: राहुकाल, शुभ मुहूर्त और धार्मिक आयोजन

    आज का पंचांग और होलिका दहन: राहुकाल, शुभ मुहूर्त और धार्मिक आयोजन

     
    नई दिल्ली :आज 3 मार्च 2026 मंगलवार को फाल्गुन मास की पूर्णिमा तिथि है और पूरे देश में होलिका दहन का पर्व बड़े धूमधाम से मनाया जाएगा। पंचांग के अनुसार पूर्णिमा तिथि आज शाम 5:07 बजे तक रहेगी और इसके बाद प्रतिपदा तिथि प्रारंभ होगी। सूर्योदय आज प्रातः 6:44 बजे होगा और सूर्यास्त सायं 6:22 बजे होगा।

    चंद्रमा आज सिंह राशि में मघा नक्षत्र में विराजमान हैं और यह नक्षत्र प्रातः 7:31 बजे तक रहेगा। मघा नक्षत्र के देवता पितृ माने गए हैं, इसलिए आज का दिन पूर्वजों के स्मरण, आशीर्वाद और आध्यात्मिक साधना के लिए अत्यंत फलदायी है। ज्योतिषाचार्यों का मानना है कि इस दिन की पूजा और धार्मिक अनुष्ठान विशेष फलदायक होते हैं। चंद्रोदय सायं 6:21 बजे होगा और चंद्रास्त नहीं होगा, जिससे पूर्णिमा की रात विशेष महत्व रखती है।

    ग्रहों की स्थिति पर नजर डालें तो सूर्य, मंगल, बुध और राहु कुंभ राशि में स्थित हैं। गुरु बृहस्पति मिथुन राशि में, जबकि शुक्र और शनि मीन राशि में विराजमान हैं और केतु सिंह राशि में हैं। इन ग्रहों की स्थिति सामाजिक सक्रियता और धार्मिक आयोजनों को बल देने वाली मानी जाती है।

    आज का योग ‘सुकर्मा’ है, जो प्रातः 10:25 बजे तक रहेगा। यह योग नए कार्यों की शुरुआत और प्रतिष्ठा में वृद्धि के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है। करण बव आज सायं 5:07 बजे तक रहेगा और इसके बाद अगले दिन प्रातः 4:54 बजे तक अन्य करण प्रभावी रहेगा।

    शुभ मुहूर्त की बात करें तो अभिजीत मुहूर्त दोपहर 12:10 बजे से 12:56 बजे तक है। इस दौरान महत्वपूर्ण निर्णय लेना, पूजा-अर्चना करना और नए कार्य की शुरुआत करना लाभकारी माना जाता है। अमृत काल 4 मार्च की प्रातः 1:13 बजे से 2:49 बजे तक रहेगा।

    अशुभ समय में राहुकाल दोपहर 3:28 बजे से 4:55 बजे तक रहेगा, इस दौरान किसी भी महत्वपूर्ण कार्य से बचना चाहिए। गुलिकाल दोपहर 12:33 बजे से 2:00 बजे तक है और यमगण्ड प्रातः 9:39 बजे से 11:06 बजे तक रहेगा। धार्मिक विशेषज्ञों का कहना है कि राहुकाल के समय किसी भी निर्णय या पूजा से बचना चाहिए और शुभ मुहूर्त का ही पालन करना चाहिए।

    देशभर में होलिका दहन की तैयारियां पूरी हो चुकी हैं। यह पर्व बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है। पूर्णिमा तिथि पर विधिपूर्वक पूजा-अर्चना और रात्रि में होलिका दहन का आयोजन किया जाएगा। धार्मिक आस्थावानों को सलाह दी गई है कि इस दिन दान-पुण्य करें, पारिवारिक एकता बनाए रखें और आध्यात्मिक साधना में समय दें।

    पूर्णिमा और मघा नक्षत्र का यह संयोजन धार्मिक दृष्टि से अत्यंत फलदायी है। यह दिन न केवल धार्मिक अनुष्ठानों के लिए उपयुक्त है बल्कि सामाजिक और पारिवारिक मेल-जोल के लिए भी महत्वपूर्ण है। पंचांग के जानकारों के अनुसार इस दिन पूजा-अर्चना और धार्मिक अनुष्ठान करने से मनोकामना पूरी होती है और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।

    आज का दिन आध्यात्मिक जागरूकता और धार्मिक गतिविधियों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। राहुकाल में सतर्क रहने और शुभ मुहूर्त का लाभ उठाने से सभी कार्य सफल और फलदायी होंगे। होलिका दहन के साथ यह पूर्णिमा तिथि जीवन में अच्छाई और समृद्धि का संदेश लेकर आती है।