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  • राधा-कृष्ण की शादी पर आज भी क्यों है अलग-अलग मत? सेवायत ने बताया खेल-खेल में कैसे हुआ था दिव्य विवाह

    राधा-कृष्ण की शादी पर आज भी क्यों है अलग-अलग मत? सेवायत ने बताया खेल-खेल में कैसे हुआ था दिव्य विवाह


    नई दिल्ली। राधा और कृष्ण का प्रेम भारतीय धार्मिक परंपरा में सबसे चर्चित और पूजनीय प्रसंगों में शामिल है। दोनों के रिश्ते को लेकर सदियों से अलग-अलग मान्यताएं और धार्मिक व्याख्याएं सामने आती रही हैं। इनमें सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या राधा रानी और भगवान श्रीकृष्ण का विवाह वास्तव में हुआ था। राधा अष्टमी के मौके पर बरसाना के श्री लाड़ली जी मंदिर के सेवायत भगवानदास गोस्वामी ने इस सवाल से जुड़ी ब्रज की प्रचलित मान्यता और कथा के बारे में जानकारी दी है।

    ब्रज क्षेत्र में राधा-कृष्ण के विवाह से जुड़ी भांडीर वन की कथा विशेष रूप से प्रचलित है। ब्रह्मवैवर्त पुराण में वर्णित मान्यता के अनुसार भांडीर वन में राधा और कृष्ण का विवाह हुआ था और स्वयं ब्रह्मा जी इस विवाह में पुरोहित बने थे। धार्मिक परंपरा में इसे सामान्य राजसी या सामाजिक विवाह के बजाय भगवान कृष्ण की लीला के रूप में देखा जाता है।

    बरसाना के सेवायत भगवानदास गोस्वामी के अनुसार जब कृष्ण बाल रूप में थे तब वे राधा रानी के साथ अपने सखा और सखियों के साथ खेला करते थे। इसी दौरान खेल खेल में राधा और कृष्ण का विवाह कराने की बात सामने आई। बाल विवाह के खेल की तरह इसकी तैयारी की गई और भांडीर वन में विवाह की वेदी सजाई गई। मान्यता है कि इसी दौरान ब्रह्मा जी स्वयं पुरोहित के रूप में वहां उपस्थित हुए और वैदिक मंत्रों के साथ राधा-कृष्ण का विवाह संपन्न कराया।

    इस कथा में विवाह को कृष्ण की दिव्य लीला माना जाता है। इसलिए इसे किसी सामान्य सांसारिक विवाह की तरह नहीं देखा जाता। ब्रज की धार्मिक परंपरा में राधा और कृष्ण का प्रेम सामाजिक और सांसारिक बंधनों से ऊपर माना गया है। यही वजह है कि दोनों के संबंध को केवल पति-पत्नी के रिश्ते तक सीमित करके नहीं देखा जाता बल्कि इसे शाश्वत प्रेम और भक्ति का प्रतीक माना जाता है।

    हालांकि सभी धार्मिक ग्रंथों में राधा-कृष्ण के विवाह का स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता। श्रीमद्भागवत पुराण और विष्णु पुराण जैसे प्रमुख ग्रंथों में राधा-कृष्ण के विवाह का सीधा वर्णन नहीं मिलता। दूसरी ओर ब्रह्मवैवर्त पुराण और कुछ वैष्णव परंपराओं में उनके विवाह से जुड़ी कथाएं मिलती हैं। इसी वजह से इस विषय पर अलग-अलग धार्मिक मत मौजूद हैं।

    राधा-कृष्ण के प्रेम को लेकर आध्यात्मिक मान्यता यह भी है कि दोनों एक ही दिव्य प्रेम के दो स्वरूप हैं। भक्त परंपरा में राधा को कृष्ण की आराध्या और उनके हृदय की शक्ति के रूप में देखा जाता है। इसी कारण उनका संबंध सांसारिक रिश्तों से अलग और आध्यात्मिक प्रेम का स्वरूप माना जाता है।

    राधा रानी के प्राकट्य की कथा भी ब्रज की परंपराओं में बेहद विशेष मानी जाती है। ब्रह्मवैवर्त पुराण और गर्ग संहिता से जुड़ी मान्यताओं के अनुसार राधा रानी का प्राकट्य साधारण जन्म की तरह नहीं हुआ था। कथा के अनुसार राजा वृषभानु को यमुना के किनारे एक दिव्य स्वर्ण कमल पर राधा रानी शिशु रूप में प्राप्त हुई थीं। ब्रज की मान्यता में इसी दिव्य प्राकट्य को राधा रानी के धरती पर आगमन से जोड़ा जाता है।

    इस तरह राधा-कृष्ण के विवाह को लेकर अलग-अलग धार्मिक परंपराएं मौजूद हैं। बरसाना की प्रचलित कथा में भांडीर वन का विवाह और ब्रह्मा जी का पुरोहित बनना प्रमुख रूप से बताया जाता है जबकि अन्य ग्रंथों में विवाह का स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता। यही विविधता राधा-कृष्ण की कथा को धार्मिक आस्था और भक्ति की दृष्टि से और भी विशेष बनाती है।

  • ग्वालियर में 120 करोड़ के रत्नजड़ित गहनों से सजे राधा-कृष्ण, साल में एक बार दिखता है ये राजसी रूप

    ग्वालियर में 120 करोड़ के रत्नजड़ित गहनों से सजे राधा-कृष्ण, साल में एक बार दिखता है ये राजसी रूप

    ग्वालियर। जन्माष्टमी के मौके पर मध्य प्रदेश के ग्वालियर का ऐतिहासिक गोपाल मंदिर एक बार फिर आस्था और राजसी वैभव का केंद्र बन गया। भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव पर राधा-कृष्ण का करीब 120 करोड़ रुपये के बेशकीमती रत्नजड़ित आभूषणों से विशेष शृंगार किया गया। इस दुर्लभ स्वरूप के दर्शन के लिए मंदिर में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ रही है।

    गोपाल मंदिर में होने वाला यह विशेष शृंगार साल में केवल एक बार किया जाता है। यही वजह है कि भक्त पूरे साल जन्माष्टमी का इंतजार करते हैं। इस दौरान मंदिर में सुरक्षा के भी कड़े इंतजाम किए जाते हैं।

    बैंक लॉकर से निकाले गए ऐतिहासिक गहने

    राधा-कृष्ण के राजसी शृंगार के लिए इन ऐतिहासिक आभूषणों को बैंक लॉकर से निकाला गया। कड़ी सुरक्षा के बीच इन्हें गोपाल मंदिर पहुंचाया गया, जहां विशेष सफाई के बाद भगवान के विग्रहों को इन आभूषणों से सजाया गया।

    बेशकीमती गहनों की सुरक्षा के लिए मंदिर परिसर और आसपास बड़ी संख्या में पुलिसकर्मी तैनात किए गए। सादे कपड़ों में भी जवानों को निगरानी के लिए लगाया गया, जबकि वरिष्ठ अधिकारी सुरक्षा और भीड़ प्रबंधन की लगातार निगरानी करते रहे।

    हीरा, पन्ना, माणिक से लेकर मोती तक जड़े हैं

    गोपाल मंदिर के इन आभूषणों को रियासतकालीन विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। इनमें हीरा, पन्ना, माणिक, पुखराज, नीलम और मोती जैसे बेशकीमती रत्न जड़े हुए हैं।

    राधारानी के शृंगार में पुखराज, माणिक और पन्ना जड़ित करीब तीन किलो वजनी मुकुट प्रमुख आकर्षण है। भगवान श्रीकृष्ण को भी विशेष राजसी मुकुट पहनाया जाता है। इसके अलावा सफेद मोतियों से बना पंचमढ़ी हार और सात लड़ी का विशेष हार भी शृंगार का हिस्सा है। बताया जाता है कि सात लड़ी वाले हार में 62 असली मोती और 55 पन्ने जड़े हैं। इसके साथ सोने के झुमके, नथ, कंठी, चूड़ियां, कड़े और अन्य बहुमूल्य आभूषण भी भगवान के शृंगार में शामिल किए जाते हैं।

    1921 में हुआ था गोपाल मंदिर का निर्माण

    ग्वालियर के गोपाल मंदिर की स्थापना 1921 में तत्कालीन ग्वालियर रियासत के शासक माधवराव सिंधिया प्रथम ने कराई थी। रियासतकाल में भगवान की पूजा और शृंगार के लिए सोने-चांदी के बर्तन तथा कई बहुमूल्य आभूषण तैयार करवाए गए थे।

    भगवान की पूजा में इस्तेमाल होने वाली रियासतकालीन सामग्री में इत्रदान, पिचकारी, चलनी, धूपदान, छत्र और निरंजनी समेत कई विशेष वस्तुएं शामिल हैं। ये सामान आज भी ग्वालियर की ऐतिहासिक और धार्मिक विरासत की पहचान बने हुए हैं।


    आजादी के बाद बैंक लॉकर में रखे गए गहने

    आजादी से पहले इन आभूषणों का नियमित रूप से इस्तेमाल भगवान के शृंगार में किया जाता था। लेकिन आजादी के बाद सुरक्षा कारणों से इन्हें बैंक लॉकर में सुरक्षित रखा जाने लगा।

    2007 से इन आभूषणों की देखरेख नगर निगम के पास है। इसके बाद से हर वर्ष जन्माष्टमी पर विशेष सुरक्षा के बीच गहनों को लॉकर से निकालकर गोपाल मंदिर लाया जाता है और भगवान राधा-कृष्ण का राजसी शृंगार किया जाता है।


    हजारों श्रद्धालुओं को रहता है पूरे साल इंतजार

    गोपाल मंदिर में जन्माष्टमी की रात राधा-कृष्ण का यह अलौकिक स्वरूप देखने के लिए श्रद्धालुओं में खास उत्साह रहता है। सुबह से ही मंदिर के बाहर भक्तों की लंबी कतारें लग जाती हैं।

    आस्था, इतिहास और राजसी वैभव का यह संगम गोपाल मंदिर को खास बनाता है। करीब 120 करोड़ रुपये मूल्य के बताए जाने वाले रत्नजड़ित आभूषणों से सजे राधा-कृष्ण के दर्शन भक्तों के लिए धार्मिक आस्था के साथ-साथ ग्वालियर की समृद्ध रियासतकालीन विरासत को देखने का भी दुर्लभ अवसर होते हैं।

  • राधा-कृष्ण की कहानी पर करण जौहर का बड़ा दांव! सचिन रवि संभालेंगे निर्देशन और लेखन की कमान

    राधा-कृष्ण की कहानी पर करण जौहर का बड़ा दांव! सचिन रवि संभालेंगे निर्देशन और लेखन की कमान


    नई दिल्ली । करण जौहर अब अपनी फिल्मों के रोमांस और फैमिली ड्रामा से आगे बढ़कर एक ऐसी कहानी बड़े पर्दे पर लाने की तैयारी में हैं जिसमें प्रेम के साथ भक्ति और भावनाओं का गहरा मेल देखने को मिलेगा। रिपोर्ट्स के मुताबिक करण जौहर का प्रोडक्शन हाउस धर्मा प्रोडक्शन्स राधा और कृष्ण की प्रेम कहानी पर फिल्म बनाने की तैयारी कर रहा है। इस प्रोजेक्ट का संभावित नाम फिलहाल राधा कृष्ण बताया जा रहा है और फिल्म के विकास का काम काफी आगे बढ़ चुका है।

    इस फिल्म की सबसे खास बात इसके विषय के साथ साथ इसका निर्देशन भी हो सकता है। रिपोर्ट के अनुसार फिल्ममेकर सचिन रवि को इस बड़े प्रोजेक्ट की जिम्मेदारी सौंपी गई है। वह फिल्म की कहानी लिखने के साथ इसका निर्देशन भी कर सकते हैं। हालांकि अभी फिल्म की स्टारकास्ट को लेकर कोई आधिकारिक जानकारी सामने नहीं आई है। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि करण जौहर राधा और कृष्ण की भूमिकाओं के लिए किन कलाकारों को चुनते हैं।

    करण जौहर लंबे समय से भारतीय संस्कृति और प्रेम की इस चर्चित कहानी को बड़े पर्दे पर लाने की इच्छा रखते थे। बताया जा रहा है कि उन्हें अब ऐसी कहानी मिली है जो इस विषय की भावनात्मक गहराई और पौराणिक महत्व के साथ न्याय कर सकती है। यही वजह है कि धर्मा प्रोडक्शन्स इस फिल्म को सामान्य रोमांटिक फिल्म के बजाय बड़े स्तर पर बनाने की तैयारी कर रहा है।

    फिल्म में राधा और कृष्ण के प्रेम को कहानी का मुख्य केंद्र रखा जा सकता है। इसके साथ ही कृष्ण के जन्म से लेकर कंस के वध तक की महत्वपूर्ण घटनाओं को भी कहानी का हिस्सा बनाए जाने की चर्चा है। ऐसे में फिल्म में रोमांस के अलावा इमोशन ड्रामा संघर्ष और ट्रेजेडी का भी मजबूत मेल देखने को मिल सकता है। अगर यह प्रोजेक्ट अपनी योजना के मुताबिक बनता है तो दर्शकों को पौराणिक कथा का एक भव्य सिनेमाई रूप देखने को मिल सकता है।

    सचिन रवि की बात करें तो वह कन्नड़ सिनेमा में अपने अलग अंदाज के लिए पहचाने जाते हैं। साल 2019 में रिलीज हुई फैंटेसी एडवेंचर कॉमेडी फिल्म अवने श्रीमननारायण के निर्देशन के लिए उन्हें खास पहचान मिली। निर्देशन से पहले सचिन रवि बतौर एडिटर भी काम कर चुके हैं। किरिक पार्टी उलिदावरु कंदन्थे और सिंपल अगि ओंध लव स्टोरी जैसी फिल्मों की एडिटिंग से भी उनका नाम जुड़ा रहा है।

    फिलहाल धर्मा प्रोडक्शन्स की तरफ से राधा कृष्ण फिल्म को लेकर कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है। इसलिए स्टारकास्ट रिलीज डेट और शूटिंग से जुड़ी जानकारी का इंतजार करना होगा। अगर करण जौहर इस प्रोजेक्ट को बड़े स्तर पर पर्दे पर उतारते हैं तो यह धर्मा प्रोडक्शन्स की अब तक की फिल्मों से काफी अलग और महत्वाकांक्षी कोशिश साबित हो सकती है।

  • राधा रानी का दिव्य स्वरूप: शब्दों से परे सौंदर्य, जिसे केवल भक्ति से ही पाया जा सकता है

    राधा रानी का दिव्य स्वरूप: शब्दों से परे सौंदर्य, जिसे केवल भक्ति से ही पाया जा सकता है


    नई दिल्ली । भक्ति मार्ग में एक प्रश्न सदियों से लोगों के मन में उठता रहा है आखिर राधा रानी कैसी दिखती हैं? भक्त साधक और जिज्ञासु अक्सर संतों से इस रहस्य को जानने की इच्छा रखते हैं लेकिन संतों का स्पष्ट कहना है कि राधा रानी के वास्तविक स्वरूप को शब्दों में बांध पाना संभव नहीं है। उनका दिव्य रूप सामान्य दृष्टि से परे है और उसे देखने के लिए केवल भौतिक आंखें पर्याप्त नहीं हैं बल्कि इसके लिए दिव्य अनुभूति और गहन भक्ति की आवश्यकता होती है।

    संत प्रेमानंद जी महाराज के अनुसार मनुष्य जो कुछ भी इस संसार में देखता है वह उसकी भौतिक दृष्टि तक सीमित होता है जो माया से प्रभावित है। यही कारण है कि हम केवल भौतिक जगत को ही देख पाते हैं। जिस प्रकार महाभारत में अर्जुन को भगवान श्री कृष्ण के विराट स्वरूप के दर्शन के लिए दिव्य चक्षु प्रदान किए गए थे उसी प्रकार राधा रानी के वास्तविक स्वरूप को देखने के लिए भी दिव्य दृष्टि की आवश्यकता होती है। बिना इस आध्यात्मिक दृष्टि के उनके स्वरूप को समझ पाना असंभव है।

    संतों का कहना है कि राधा रानी सौंदर्य की पराकाष्ठा हैं। उनके रूप का वर्णन करना इतना कठिन है कि यदि किसी व्यक्ति के शरीर के प्रत्येक रोम में करोड़ों जिह्वाएं भी उत्पन्न हो जाएं तब भी उनके सौंदर्य की पूर्ण व्याख्या नहीं की जा सकती। यह भी कहा जाता है कि जिन भगवान श्री कृष्ण के सौंदर्य से करोड़ों कामदेव भी मोहित हो जाते हैं वही श्री कृष्ण स्वयं राधा रानी की रूप माधुरी के सामने आकर्षित हो जाते हैं। उनकी महिमा इतनी अद्भुत है कि वेद भी उनके वर्णन में असमर्थ होकर नेति-नेति कहकर मौन हो जाते हैं।

    ब्रज की गोपियों का सौंदर्य भी अद्वितीय बताया गया है। कहा जाता है कि ब्रज की प्रत्येक गोपी इतनी सुंदर है कि करोड़ों लक्ष्मी भी उनके सामने फीकी पड़ जाएं। लेकिन जब यही सखियां अपनी आराध्य राधा रानी के दर्शन करती हैं तो वे भी उनके सामने नतमस्तक हो जाती हैं। राधा रानी के प्रत्येक अंग में ऐसी मधुरता और दिव्यता विद्यमान है जिसकी तुलना तीनों लोकों में कहीं नहीं मिलती।

    संतों के अनुसार राधा रानी के स्वरूप का अनुभव करने का सबसे सरल और प्रभावी मार्ग भक्ति और नाम जप है। यदि कोई व्यक्ति सच्चे मन से राधा नाम का निरंतर जप करता है तो धीरे-धीरे उसके हृदय में राधा रानी का दिव्य स्वरूप प्रकट होने लगता है। इसके साथ ही वृंदावन की पवित्र रज को माथे पर धारण करना और संतों का संग करना भी इस आध्यात्मिक यात्रा में सहायक माना जाता है।

    भक्ति परंपरा में राधा और कृष्ण के प्रेम को अद्वितीय बताया गया है। उनका संबंध मछली और जल के समान है अलग होते ही अस्तित्व समाप्त हो जाता है। जब राधा और कृष्ण एक साथ होते हैं तो वृंदावन की पूरी प्रकृति उस दिव्य प्रेम में डूब जाती है। पशु-पक्षी तक शांत होकर उस अलौकिक आनंद का अनुभव करने लगते हैं।

    अंततः संतों का संदेश स्पष्ट है कि राधा रानी का स्वरूप देखने के लिए बाहरी नहीं बल्कि आंतरिक दृष्टि की आवश्यकता है। सच्ची भक्ति समर्पण और नाम जप के माध्यम से ही वह क्षण आता है जब भक्त इस दिव्य प्रेम और स्वरूप का अनुभव कर पाता है।