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  • रेल यात्रियों के सफर को आरामदायक बनाने की पहल, भोपाल में विशेष उपकरण से बदली गई बोगी की तकनीक

    रेल यात्रियों के सफर को आरामदायक बनाने की पहल, भोपाल में विशेष उपकरण से बदली गई बोगी की तकनीक


    भोपाल । भोपाल स्थित सवारी डिब्बा पुनर्वास कारखाने यानी सीआरडब्ल्यूएस ने रेलवे के तकनीकी कामकाज में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। कारखाने में पहली बार कॉइल स्प्रिंग बोगी को एयर सस्पेंशन बोगी में बदलने का काम सफलतापूर्वक पूरा किया गया है। इस बदलाव का उद्देश्य रेल यात्रा के दौरान कोच में महसूस होने वाले झटकों और कंपन के प्रभाव को कम करना है। इससे यात्रियों को अपेक्षाकृत आरामदायक सफर का अनुभव मिल सकता है। खासकर लंबी दूरी की यात्रा करने वाले यात्रियों के लिए यह तकनीकी सुधार उपयोगी साबित हो सकता है।

    पश्चिम मध्य रेलवे के अंतर्गत आने वाले इस कारखाने में बोगी के निचले ढांचे में एयर सस्पेंशन प्रणाली लगाने के लिए विशेष उपकरण तैयार किया गया। इस काम की खास बात यह रही कि कारखाने में उपलब्ध संसाधनों का इस्तेमाल करते हुए तकनीकी जरूरत के अनुसार उपकरण बनाया गया। इसकी सहायता से बोगी में चारों कंसोल को निर्धारित स्थान पर सटीकता के साथ लगाने की प्रक्रिया पूरी की गई। इस तरह के तकनीकी बदलाव में सटीक माप और सही फिटिंग का विशेष महत्व होता है क्योंकि बोगी के विभिन्न हिस्सों की स्थिति और उनकी कार्यप्रणाली का असर कोच के संचालन पर पड़ता है।

    इस प्रक्रिया के दौरान पुराने कंसोल को हटाकर उनकी जगह नए कंसोल और ब्रैकेट लगाए गए। यह काम तकनीकी रूप से चुनौतीपूर्ण था क्योंकि मौजूदा ढांचे में बदलाव करते हुए नए सस्पेंशन सिस्टम के अनुरूप व्यवस्था तैयार करनी थी। कारखाने के कर्मचारियों ने विशेष उपकरण की मदद से इस काम को पूरा किया। इससे यह भी सामने आया कि जरूरत के अनुसार स्थानीय स्तर पर उपकरण विकसित करके तकनीकी कार्यों को अधिक सटीकता के साथ अंजाम दिया जा सकता है।

    कॉइल स्प्रिंग और एयर सस्पेंशन प्रणाली में मुख्य अंतर उनके काम करने के तरीके का है। कॉइल स्प्रिंग में धातु की स्प्रिंग के माध्यम से झटकों को संभालने में मदद मिलती है जबकि एयर सस्पेंशन में हवा के दबाव पर काम करने वाली व्यवस्था का इस्तेमाल किया जाता है। एयर सस्पेंशन प्रणाली का उद्देश्य कोच को मिलने वाले झटकों और कंपन के असर को कम करना है। हालांकि वास्तविक आराम और प्रदर्शन का आकलन संबंधित तकनीकी परीक्षणों और परिचालन परिणामों के आधार पर ही किया जा सकता है।

    रेलवे में यात्रियों की सुविधा के साथ कोचों की गुणवत्ता और तकनीकी दक्षता पर भी लगातार ध्यान दिया जा रहा है। भोपाल के सीआरडब्ल्यूएस में किया गया यह काम इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा सकता है। विशेष उपकरण तैयार करने और मौजूदा बोगी के ढांचे में जरूरी बदलाव करने का अनुभव भविष्य में इस तरह के अन्य तकनीकी कार्यों में भी मददगार हो सकता है।

    इस उपलब्धि से कारखाने के कर्मचारियों की तकनीकी क्षमता और उपलब्ध संसाधनों के बेहतर उपयोग की भूमिका भी सामने आई है। एयर सस्पेंशन प्रणाली से लैस बोगी का वास्तविक लाभ उसके परीक्षण और संचालन के बाद स्पष्ट होगा। फिर भी इस तरह के प्रयोग रेलवे को कोचों की तकनीक में सुधार करने और यात्रियों के सफर को अधिक सुविधाजनक बनाने की दिशा में नए विकल्प उपलब्ध करा सकते हैं।

  • ट्रेन हादसों पर और मजबूत होगी सुरक्षा की ढाल: रेलवे ने कवच 4.0 के लिए 170 करोड़ मंजूर किए, 712 किमी ट्रैक होगा सुरक्षित

    ट्रेन हादसों पर और मजबूत होगी सुरक्षा की ढाल: रेलवे ने कवच 4.0 के लिए 170 करोड़ मंजूर किए, 712 किमी ट्रैक होगा सुरक्षित


    नई दिल्ली । भारतीय रेलवे ने रेल यात्रियों की सुरक्षा को और मजबूत बनाने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है। रेलवे ने स्वदेशी ऑटोमैटिक ट्रेन प्रोटेक्शन सिस्टम कवच 4.0 की तैनाती के लिए 170 करोड़ रुपए मंजूर किए हैं। इस राशि से उत्तरी रेलवे के मुरादाबाद डिवीजन के 712 रूट किलोमीटर बचे हुए ट्रैक पर कवच सिस्टम लगाया जाएगा। सरकार के मुताबिक यह परियोजना रेलवे के सुरक्षा इंफ्रास्ट्रक्चर को आधुनिक बनाने के साथ ट्रेन हादसों के जोखिम को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।

    कवच भारत में विकसित एक आधुनिक ऑटोमैटिक ट्रेन प्रोटेक्शन सिस्टम है जिसे रेलवे संचालन के दौरान होने वाले संभावित खतरों को समय रहते पहचानने और दुर्घटनाओं को रोकने के उद्देश्य से तैयार किया गया है। यह तकनीक खासतौर पर सिग्नल पासिंग एट डेंजर यानी एसपीएडी जैसी स्थितियों को रोकने में मदद करती है। यदि किसी कारणवश ट्रेन चालक खतरे वाले सिग्नल को पार करने की स्थिति में पहुंचता है तो सिस्टम आवश्यक परिस्थितियों में स्वतः हस्तक्षेप कर सकता है।

    कवच 4.0 की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह ट्रेन संचालन के दौरान सुरक्षा की एक अतिरिक्त और उन्नत परत प्रदान करता है। असुरक्षित स्थिति बनने पर यह सिस्टम जरूरत के अनुसार अपने आप ब्रेक लगाने में मदद कर सकता है। खराब दृश्यता या अन्य चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में ट्रेन की गति को नियंत्रित करने में भी इसकी भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है। इसके जरिए आमने सामने या पीछे से होने वाली संभावित टक्कर के खतरे को काफी हद तक कम करने का लक्ष्य रखा गया है।

    रेल मंत्रालय का कहना है कि यह मंजूरी भारतीय रेलवे नेटवर्क पर कवच सिस्टम के विस्तार की व्यापक योजना का हिस्सा है। रेलवे लगातार अपनी सिग्नलिंग व्यवस्था और ट्रेन प्रोटेक्शन सिस्टम को आधुनिक तकनीक से मजबूत कर रही है। मुरादाबाद डिवीजन के शेष 712 रूट किलोमीटर हिस्से में कवच 4.0 की तैनाती से इस महत्वपूर्ण रेल नेटवर्क पर यात्रियों और ट्रेन संचालन की सुरक्षा को नई मजबूती मिलने की उम्मीद है।

    सरकार के आंकड़ों के अनुसार रेलवे सुरक्षा के क्षेत्र में पिछले वर्षों में उल्लेखनीय सुधार हुआ है। 2014-15 में जहां ट्रेन दुर्घटनाओं की संख्या 135 थी वहीं 2025-26 में यह घटकर 16 रह गई। चालू वित्तीय वर्ष में जून तक केवल दो दुर्घटनाएं दर्ज होने की जानकारी दी गई है। प्रति मिलियन ट्रेन किलोमीटर होने वाली दुर्घटनाओं का कॉन्सिक्वेंशियल एक्सीडेंट इंडेक्स भी 2014-15 के 0.11 से घटकर 2025-26 में 0.01 तक पहुंच गया है।

    रेलवे ने सुरक्षा पर खर्च भी लगातार बढ़ाया है। 2013-14 में सुरक्षा संबंधी कार्यों पर करीब 39 हजार 200 करोड़ रुपए खर्च किए गए थे जबकि 2026-27 में यह राशि बढ़कर 1 लाख 20 हजार 389 करोड़ रुपए तक पहुंच गई है। इसके अलावा हजारों स्टेशनों पर आधुनिक इलेक्ट्रिकल और इलेक्ट्रॉनिक इंटरलॉकिंग सिस्टम तथा ट्रैक सर्किटिंग जैसी सुविधाएं स्थापित की गई हैं।

    कुल मिलाकर 170 करोड़ रुपए की नई मंजूरी केवल एक तकनीकी परियोजना नहीं बल्कि भारतीय रेलवे की उस बड़ी रणनीति का हिस्सा है जिसमें भविष्य की रेल यात्रा को अधिक सुरक्षित और आधुनिक बनाने पर जोर दिया जा रहा है। कवच 4.0 के विस्तार के साथ रेलवे का लक्ष्य है कि तकनीक के जरिए मानवीय भूल और परिचालन संबंधी जोखिमों को कम किया जाए ताकि करोड़ों यात्रियों का सफर पहले से ज्यादा सुरक्षित बनाया जा सके।