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  • मंदाकिनी का बड़ा खुलासा फिल्मों में काम के बाद भी नहीं मिली फीस बताया कैसा था उस दौर का माहौल

    मंदाकिनी का बड़ा खुलासा फिल्मों में काम के बाद भी नहीं मिली फीस बताया कैसा था उस दौर का माहौल


    नई दिल्ली। 1985 में रिलीज हुई फिल्म राम तेरी गंगा मैली ने मंदाकिनी को रातोंरात पहचान दिला दी थी। राज कपूर के निर्देशन में बनी इस फिल्म में मंदाकिनी ने राजीव कपूर के साथ मुख्य भूमिका निभाई थी। फिल्म की कहानी के साथ इसके कई दृश्य और गाने भी उस समय काफी चर्चा में रहे थे। फिल्म की सफलता ने मंदाकिनी को हिंदी सिनेमा की चर्चित अभिनेत्रियों में शामिल कर दिया था। अब फिल्म के रिलीज होने के कई साल बाद मंदाकिनी ने अपने फिल्मी करियर के शुरुआती दौर से जुड़ी कुछ ऐसी बातें साझा की हैं जो काफी चर्चा में हैं।

    मंदाकिनी ने न्यूज एजेंसी एएनआई को दिए एक इंटरव्यू में अपने करियर के दिनों को याद किया। बातचीत के दौरान उन्होंने बताया कि उस समय फिल्म इंडस्ट्री का काम करने का तरीका आज के मुकाबले काफी अलग था। मंदाकिनी के मुताबिक उन्होंने अपने करियर में करीब 16 से 17 फिल्मों में काम किया लेकिन उन्हें उन फिल्मों की पूरी फीस नहीं मिली। उन्होंने उस दौर को याद करते हुए फिल्म सेट के माहौल को बेहद अनौपचारिक और घर जैसा बताया।

    अभिनेत्री ने बताया कि फिल्मों में काम करने का अनुभव उनके लिए काफी अच्छा रहा। उनके अनुसार कलाकारों के बीच आपसी मेलजोल ज्यादा था और सेट पर सभी लोग साथ मिलकर समय बिताते थे। कलाकार एक साथ खाना खाते थे और किसी दूसरे कलाकार से मिलने के लिए पहले से अनुमति लेने जैसी औपचारिकता नहीं होती थी। लोग एक दूसरे के कमरे में भी आसानी से जा सकते थे। मंदाकिनी ने कहा कि उस समय का माहौल उन्हें काफी सहज और परिवार जैसा महसूस होता था।

    मंदाकिनी ने उस दौर के फिल्मी कॉन्ट्रैक्ट को लेकर भी अपनी यादें साझा कीं। उन्होंने बताया कि उस समय फिल्मों को साइन करने की प्रक्रिया काफी अनौपचारिक हुआ करती थी। कई बार कलाकारों से पहले फिल्म साइन करने के लिए कहा जाता था और भुगतान की बात बाद में होती थी। इस वजह से कई मौकों पर कलाकारों को अपनी फीस को लेकर इंतजार करना पड़ता था। मंदाकिनी ने इसी संदर्भ में बताया कि उनके साथ भी कई फिल्मों में ऐसा हुआ।

    उन्होंने यह भी बताया कि कभी कभी वह बिना फीस लिए भी फिल्मों में काम करने के लिए तैयार हो जाती थीं। खासकर जब फिल्म से जुड़े लोग या उनके साथी कलाकार कुछ दिनों के काम के लिए मदद मांगते थे तो वह सहयोग कर देती थीं। उनके अनुसार उस समय इंडस्ट्री में काम करने का तरीका काफी अलग था और कई चीजें औपचारिक समझौते के बजाय आपसी भरोसे और बातचीत के आधार पर तय हो जाती थीं।

    मंदाकिनी के करियर की सबसे चर्चित फिल्मों में राम तेरी गंगा मैली का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। राज कपूर के निर्देशन में बनी यह फिल्म 1985 में रिलीज हुई थी। फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर शानदार प्रदर्शन किया था और मंदाकिनी को इसके बाद बड़ी पहचान मिली। फिल्म में उनके कई दृश्य उस समय चर्चा का विषय बने थे। खासतौर पर झरने के नीचे फिल्माया गया दृश्य और ब्रेस्ट फीडिंग सीन लंबे समय तक लोगों के बीच चर्चा में रहे।

    राम तेरी गंगा मैली को फिल्मफेयर अवॉर्ड्स में भी सफलता मिली थी। फिल्म को विभिन्न श्रेणियों में पुरस्कार मिले थे। इसके संगीत और निर्देशन की भी काफी सराहना हुई थी। फिल्म की सफलता ने मंदाकिनी के करियर को नई ऊंचाई दी और वह दर्शकों के बीच तेजी से लोकप्रिय हो गईं।

    अब इतने वर्षों बाद जब मंदाकिनी ने अपने शुरुआती फिल्मी सफर को याद किया है तो उनकी बातों से उस दौर के हिंदी फिल्म उद्योग के कामकाज की एक अलग तस्वीर सामने आती है। एक तरफ उन्होंने सेट के दोस्ताना माहौल और सहयोग को याद किया तो दूसरी तरफ यह भी बताया कि उस समय काम और भुगतान से जुड़े समझौते आज की तरह व्यवस्थित नहीं थे। इसी वजह से उनके मुताबिक कई फिल्मों में काम करने के बावजूद उन्हें पूरी फीस नहीं मिल सकी।

  • सलमान खान की ऑनस्क्रीन बहन आकांक्षा मल्होत्रा का राज कपूर परिवार से खास रिश्ता, रणबीर-करीना-करिश्मा से है नाता

    सलमान खान की ऑनस्क्रीन बहन आकांक्षा मल्होत्रा का राज कपूर परिवार से खास रिश्ता, रणबीर-करीना-करिश्मा से है नाता


    नई दिल्ली ।
    सलमान खान और अरबाज खान की फिल्म ‘गर्व: प्राइड एंड ऑनर’ साल 2004 में रिलीज हुई थी। फिल्म की कहानी एक ईमानदार पुलिस ऑफिसर की थी, जिसे झूठे मामलों में फंसाया जाता है। फिल्म में सलमान खान ने ACP अर्जुन राणावत का किरदार निभाया था। वहीं, एक्ट्रेस आकांक्षा मल्होत्रा ने उनकी मुंह बोली बहन राखी दीक्षित की भूमिका निभाई थी। कम ही लोग जानते हैं कि आकांक्षा मल्होत्रा का राज कपूर के परिवार से पारिवारिक रिश्ता है।

    सलमान खान की ऑनस्क्रीन बहन

    ‘गर्व’ में आकांक्षा मल्होत्रा ने राखी का किरदार निभाया था। फिल्म में जब सलमान के किरदार को कोर्ट में सजा सुनाई जाती है, तब स्लो मोशन में आकांक्षा के किरदार राखी की एंट्री दिखाई जाती है। राखी कोर्ट में पहुंचकर बयान देती है, जिसके बाद ACP अर्जुन राणावत की ईमानदारी की सच्चाई सामने आती है। फिल्म की कहानी के अंत में आकांक्षा के किरदार की अहम भूमिका रहती है।

    इस फिल्म को आकांक्षा के परिवार से भी खास कनेक्शन था। फिल्म को उनके पिता और गुजरे जमाने के अभिनेता प्रेम किशन ने प्रोड्यूस किया था। फिल्म का निर्देशन पुनीत इस्सर ने किया था, जो दुर्योधन के किरदार से भी पहचाने जाते हैं।

    प्रेम नाथ और राज कपूर का रिश्ता

    आकांक्षा मल्होत्रा के दादा प्रेम नाथ अपने दौर के मशहूर अभिनेता थे। उन्होंने कई फिल्मों में विलेन की भूमिकाएं निभाईं। फिल्म ‘बॉबी’ में उन्हें डिंपल कपाड़िया के पिता के किरदार में देखा गया था। प्रेम नाथ की बहन कृष्णा ने अभिनेता और फिल्मकार राज कपूर से शादी की थी। इस रिश्ते के कारण राज कपूर, प्रेम नाथ के जीजा लगते थे।

    प्रेम नाथ के बेटे प्रेम किशन ने भी फिल्मों में बतौर अभिनेता काम किया। उन्होंने 70 और 80 के दशक में ‘दुल्हन वो ही जो पिया मन भाए’, ‘जय विजय’ और ‘हमारे तुम्हारे’ जैसी फिल्मों में मुख्य भूमिकाएं निभाईं। हालांकि, बतौर अभिनेता वह अपने पिता जैसी पहचान नहीं बना सके। बाद में उन्होंने टीवी सीरियल और फिल्मों के निर्माण का काम शुरू किया।

    प्रेम किशन का परिवार

    प्रेम किशन के दो बच्चे हैं, बेटी आकांक्षा मल्होत्रा और बेटे पी. सिद्धार्थ मल्होत्रा। आकांक्षा ने ‘गर्व’ में सलमान खान की बहन का किरदार निभाया था। वहीं, पी. सिद्धार्थ मल्होत्रा फिल्म निर्देशन में सक्रिय हैं। उन्होंने करीना कपूर के साथ ‘वी आर फैमिली’ का निर्देशन किया था। इसके अलावा उन्होंने रानी मुखर्जी की ‘हिचकी’ और आमिर खान के बेटे जुनैद खान की फिल्म ‘महाराज’ का निर्देशन किया। हाल ही में नेटफ्लिक्स पर आई फिल्म ‘इक्का’ का निर्देशन भी सिद्धार्थ मल्होत्रा ने किया है। इसमें सनी देओल और अक्षय खन्ना मुख्य भूमिकाओं में हैं।

    राज कपूर परिवार से कनेक्शन

    प्रेम किशन की बुआ कृष्णा राज कपूर थीं। इसी पारिवारिक रिश्ते के चलते आकांक्षा मल्होत्रा और उनके भाई पी. सिद्धार्थ मल्होत्रा का कपूर परिवार से संबंध बनता है। इस रिश्ते के अनुसार रणबीर कपूर, करीना कपूर और करिश्मा कपूर उनके पारिवारिक रिश्ते में भाई-बहन लगते हैं। हालांकि, यह रिश्ता अब दूर का है।

    आकांक्षा मल्होत्रा अब फिल्मों से दूर हैं और अपनी निजी जिंदगी में व्यस्त हैं। वह अपने परिवार और दो बेटियों के साथ समय बिताती हैं। इस तरह सलमान खान की फिल्म में उनकी ऑनस्क्रीन बहन का किरदार निभाने वाली आकांक्षा का फिल्म इंडस्ट्री के कपूर परिवार से भी पुराना पारिवारिक संबंध रहा है।

  • फिल्मफेयर 1962 की वह रात जब दिलीप कुमार रह गए पीछे राज कपूर ने मारी बाजी

    फिल्मफेयर 1962 की वह रात जब दिलीप कुमार रह गए पीछे राज कपूर ने मारी बाजी


    नई दिल्ली। भारतीय सिनेमा के सुनहरे दौर में कई ऐसे मौके आए जब दर्शकों की पसंद और अवॉर्ड के फैसलों में अंतर देखने को मिला। ऐसा ही एक यादगार किस्सा साल 1962 के फिल्मफेयर अवॉर्ड से जुड़ा है। उस समय दिलीप कुमार और राज कपूर दोनों ही अपने करियर के शिखर पर थे और दोनों की फिल्मों ने दर्शकों के दिलों पर गहरी छाप छोड़ी थी। यह मुकाबला केवल दो कलाकारों के बीच नहीं था बल्कि दो अलग अलग तरह की फिल्मों और सोच के बीच भी था।

    साल 1961 में दिलीप कुमार की फिल्म गंगा जमुना ने बॉक्स ऑफिस पर बड़ी सफलता हासिल की। इस फिल्म में उन्होंने न सिर्फ मुख्य भूमिका निभाई बल्कि इसकी कहानी और पटकथा में भी योगदान दिया। यह फिल्म ग्रामीण पृष्ठभूमि पर आधारित थी और इसमें भाईचारे सामाजिक संघर्ष और पारिवारिक भावनाओं को गहराई से दिखाया गया था। दिलीप कुमार ने गंगा नाम के किरदार में ऐसा अभिनय किया जिसे आज भी उनके सबसे मजबूत प्रदर्शनों में गिना जाता है। वैजयंती माला ने भी इस फिल्म में अहम भूमिका निभाई और कहानी को और प्रभावशाली बनाया। यह फिल्म उस साल की सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्मों में शामिल रही और इसे आलोचकों की भी खूब सराहना मिली।

    इसी दौरान राज कपूर की फिल्म जिस देश में गंगा बहती है भी चर्चा में थी। इस फिल्म में राज कपूर ने राजू नाम के एक ऐसे युवक का किरदार निभाया था जो अनाथ होता है और बाद में डाकुओं के समूह में पहुंच जाता है। कहानी में वह देखता है कि यह समूह अमीरों से लूटकर गरीबों की मदद करता है। धीरे धीरे उसका नजरिया बदलता है और वह अहिंसा और सुधार की राह पर चलता है। इस फिल्म का सामाजिक संदेश बहुत मजबूत था और यह आम जनता के बीच बेहद लोकप्रिय हुई।

    जब फिल्मफेयर अवॉर्ड 1962 में घोषणा हुई तो सभी को उम्मीद थी कि बेस्ट एक्टर का पुरस्कार दिलीप कुमार को मिलेगा क्योंकि गंगा जमुना को एक मास्टरपीस माना जा रहा था। लेकिन नतीजा चौंकाने वाला रहा और यह अवॉर्ड राज कपूर को मिल गया। उनके किरदार की सामाजिक न्याय की भावना और बदलाव की कहानी को निर्णायक माना गया। उस समय जूरी ने माना कि राज कपूर का किरदार समाज में सकारात्मक संदेश देने वाला था और यही उन्हें बढ़त दिला गया।

    इस फैसले ने फिल्म इंडस्ट्री में लंबे समय तक चर्चा पैदा की। एक तरफ दिलीप कुमार की गहरी भावनात्मक अभिनय शैली थी और दूसरी तरफ राज कपूर का सामाजिक संदेश से भरा चरित्र था। अंत में पुरस्कार उस किरदार को मिला जिसने सामाजिक बदलाव की सोच को दर्शाया।

    यह घटना आज भी बॉलीवुड इतिहास में एक महत्वपूर्ण उदाहरण के रूप में याद की जाती है जब कला की श्रेष्ठता केवल अभिनय से नहीं बल्कि उसके सामाजिक प्रभाव से भी तय हुई।

  • तीन बार रिजेक्ट हुआ था बॉलीवुड का ये मशहूर गीत, आज भी बारिश में गूंजता है हर दिल में

    तीन बार रिजेक्ट हुआ था बॉलीवुड का ये मशहूर गीत, आज भी बारिश में गूंजता है हर दिल में

    नई दिल्ली ।  हिंदी फिल्मों में कई अमर गीत बने हैं। अमर गीतों की लिस्ट में एक ऐसा भी गाना है जिसे एक नहीं बल्कि तीन बार रिजेक्ट किया गया। सेंसर बोर्ड ने गाने के कुछ बोल पर आपत्ति जताई जिसके बाद उस गाने को फिल्म में लाना मुश्किल हो गया। लेकिन अंत में जब वही गाना सालों बाद किसी दूसरी फिल्म में सुनाई दिया तो वो गाना हमेशा के लिए अमर हो गया। आज भी बारिश के गानों में एक उस गाने की गिनती भी की जाती है।

    सेंसर बोर्ड ने रिजेक्ट किया गाना

    ये 50 का दशक था। उस दौर में मम्यूजिक कंपोजर कल्याण जी आनंदजी की नई जोड़ी थी जो फिल्म मदारी के लिए गाने बना रही थी। फिल्म रिलीज के लिए तैयार थी। जब इस फिल्म को सर्टिफिकेट के लिए सेंसर बोर्ड के पास भेजा गया तो गाने के कुछ बोल को लेकर उसे रिजेक्ट कर दिया गया। बोर्ड की तरफ से गाने के बोल में बदलाव करने की बात कही गई। लेकिन गाना तो पहले ही शूट हो चुका था। और रिलीज डेट भी करीब थी। ऐसे में मेकर्स ने रिस्क नहीं लिया और गाने को ही फिल्म से हटा दिया। लेकिन कल्याणजी आनंदजी जानते थे कि इस गाने में वो बात है जो ऑडियंस को खुश कर सकती है। उन्होंने वो गाना अपनी आने वाली फिल्मों में इस्तेमाल करने के बारे में सोचा।

    दूसरी फिल्म से रिजेक्ट हुआ गाना

    इसके बाद 1959 में कल्याणजी आनंदजी को फिल्म घर घर की बात में गाने देने का मौका मिला। लेकिन इस फिल्म में भी वो अपना रिजेक्ट हुआ गाना इस्तेमाल नहीं कर पाए, क्योंकि फिल्म की सिचुएशन वैसी नहीं थी। इसके बाद 1960 में दिल भी तेरा हम भी तेरे रिलीज हुई। फिल्म के हीरो थे धर्मेंद्र। फिल्म का गाना कल्यानजी आनंदजी बना रहे थे। उन्होंने अपना वही गीत डायरेक्टर अर्जुन हिंगोरानी को सुनाया। लेकिन उन्हें ये गाना पसंद नहीं आया। ऊपर गाना सेंसर बोर्ड ने रिजेक्ट किया था। तो डायरेक्टर रिस्क नहीं लेना चाहते थे। अब तक ये गाना दो फिल्मों से रिजेक्ट हो चुका था। लेकिन म्यूजिक कंपोजर की जोड़ी को अपने गाने पर यकीन था।

    राज कपूर की फिल्म में मिला मौका

    1960 में एक फिल्म आई छलिया। इस फिल्म में राज कपूर और नूतन लीड रोल में थे। फिल्म की कहानी भारत-पाकिस्तान के बीच हुए बंटवारे पर बेस्ड थी। इस फिल्म में कल्यानजी आनंदजी को म्यूजिक देने का मौका मिला। मनमोहन देसाई की ये पहली डायरेक्टोरियल फिल्म थी। इस फिल्म के लिए उन्हें एक बारिश सॉन्ग की जरूरत थी। उन्होंने ये बात जब म्यूजिक कंपोजर की जोड़ी कल्यानजी और आनंदजी को बताई तो उन्होंने फटाक से अपना रिजेक्टेड गाना उन्हें सुना दिया। मनमोहन देसाई को गाना बहुत पसंद आया। क्योंकि सेंसर बोर्ड को गाने के कुछ बोल से आपत्ति थी तो गीतकार कमाल जलालाबादी को फिर से उस गाने के बोल बदलने के लिए बुलाया गया। मुखड़ा वैसा ही रखा लेकिन अंतरे में बदलाव किया गया। इस गाने को आवाज देने वाले मुकेश को फिर से बुलाया गया और गाना अंतरा फिर से रिकॉर्ड किया गया।
    आज अमर है ये गीत
    गाने के नए वर्जन पर राज कपूर और नूतन ने खूब डांस करते हुए शूट किया। लेकिन जब फिल्म सेंसर बोर्ड के पास पहुंची तो गाना फिर से अटक गया। सेंसर बोर्ड ने फिर से अंतरे के बोल पर आपत्ति जताई। गीतकार कमाल जलालाबादी को फिर से बुलाया गया। गाने के बोल फिर से बदले गए। और जिस गाने को लेकर सभी को इतनी दिक्कतों का सामना करना पड़ा था वो था ‘डम डम डिगा डिगा, मौसम भीगा भीगा’ । इस गाने के अंतरे के पहले बोल थे ‘देखो लुटारा आज लुट गया हाय अल्लाह’ की जगह ‘देखो रे आज कोई लुट गया’ और ‘भोला भाला छुप के डाका डाला जाने तू कैसा मेहमान है’ की जगह ‘सनम हम माना गरीब हैं नसीब खोटा ही सही सही बंदा छोटा सही दिल खजाना है प्यार का हाय अल्लाह’। ये गाना जब बनकर फिल्म में सुना गया तो अमर हो गया। आज भी ये गीत अमर है।
  • इंदिरा गांधी चाहती थीं कपूर परिवार से रिश्ता, राजीव गांधी के लिए देखी थी राज कपूर की बेटी

    इंदिरा गांधी चाहती थीं कपूर परिवार से रिश्ता, राजीव गांधी के लिए देखी थी राज कपूर की बेटी

    नई दिल्ली ।  फिल्म कलाकार और नेताओं के बीच दोस्ती और रिश्तेदारी का रिश्ता आम बात है। लेकिन क्या आप कपूर परिवार और गांधी परिवार की दोस्ती के बारे में जानते हैं? ये 60 के दशक के कुछ आखिरी सालों की बात है। देश की पहली महिला प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और राज कपूर के बीच दोस्ती और सम्मान का रिश्ता हुआ करता था। इंदिरा गांधी इस रिश्ते को इतना सम्मान देतीं थीं कि वो राजकपूर की बड़ी बेटी ऋतू कपूर को अपने घर की बहू बनाना चाहती थीं।
    बेटे राजीव गांधी की शादी राज कपूर की बेटी के साथ चाहती थीं इंदिरा
    सीनियर जर्नलिस्ट रशीद किदवई ने अपनी किताब ‘नेता अभिनेता: बॉलीवुड स्टार पॉवर इन इंडियन पॉलिटिक्स’ में इंदिरा गांधी की इस ख्वाहिश का ज़िक्र किया है। उन्होंने अपनी किताब में बताया कि राज कपूर और इंदिरा गांधी के परिवार के बीच दोस्ती का रिश्ता था। लेकिन इंदिरा गांधी इस रिश्ते को रिश्तेदारी में बदलना चाहती थीं। वो बेटे राजीव गांधी की शादी राज कपूर की बड़ी बेटी ऋतू कपूर से करवाना चाहती थीं।

    ऋतू कपूर को बहू बनाना चाहती थीं इंदिरा गांधी
    रशीद किदवई ने अपनी किताब में आगे लिखा है कि इंदिरा गांधी को बॉलीवुड की बहू की तलाश नहीं थी और ना ही वो स्टार पॉवर से प्रभावित थीं। उनके मन में बस कपूर परिवार के लिए सम्मान और प्यार था। इसलिए वो दोस्ती रिश्तेदारी में बदलना चाहती थी। लेकिन ऋतू कपूर, इंदिरा गांधी की बहू नहीं बन सकी। इसकी वजह राजीव गांधी की जिंदगी में सोनिया की एंट्री थी।

    राजीव गांधी ने की सोनिया से शादी
    राजीव गांधी जब ब्रिटेन में अपनी पढ़ाई पूरी करने गए थे तब उनकी मुलाकात सोनिया गांधी से हुई। दोनों में प्यार हुआ और फरवरी 1968 में सोनिया और राजीव ने शादी कर ली। इस शादी के बाद हैदराबाद हाउस में ग्रैंड पार्टी रखी गई थी जिसमें राजीव के स्कूल और कॉलेज के दोस्त शामिल हुए। दूसरी तरफ 1969 में राज कपूर ने अपनी बेटी ऋतू कपूर की शादी उद्योगपति राजन नंदा से हो गई।
    कपूर परिवार
    राज कपूर ने अपने तीनों बेटों रंधीर, ऋषि और राजीव कपूर फिल्मों की राह दिखाई। तीनों बेटों ने सालों तक ऑडियंस को एंटरटेन किया। शानदार फिल्मों में काम किया। लेकिन सफल सिर्फ ऋषि कपूर ही हुए। वहीं एक्टर की दोनों बेटियां ऋतू और रीमा फिल्मों से दूर रही। शादी के बाद बच्चों और फिर ग्पोता-पोतियों में जीवन बीता। आज राज कपूर के बेटे ऋषि कपूर, राजीव कपूर और बेटी ऋतू नंदा इस दुनिया में नहीं रहे। रणबीर कपूर फिल्मों में एक्टिव हैं। करिश्मा और करीना कपूर ने फिल्मों में अपनी कागा पहचान बनाई।
  • किसी की मुस्कुराहटों पे निसार होने वाले 'शंकरदास' के 'शैलेंद्र' बनने और बेमन से मैकेनिक की नौकरी करने का पूरा सच

    किसी की मुस्कुराहटों पे निसार होने वाले 'शंकरदास' के 'शैलेंद्र' बनने और बेमन से मैकेनिक की नौकरी करने का पूरा सच


    नई दिल्ली ।
    भारतीय सिनेमा के इतिहास में जब भी सादगी और गहराई से भरे गीतों का जिक्र होगा, गीतकार शैलेंद्र का नाम स्वर्ण अक्षरों में लिया जाएगा। ‘किसी की मुस्कुराहटों पे हो निसार’ जैसे कालजयी गीत लिखने वाले इस कलाकार का जीवन किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं था। पाकिस्तान के रावलपिंडी में जन्मे शंकरदास केसरीलाल, जिन्हें दुनिया ने बाद में शैलेंद्र के नाम से पूजा, के पूर्वज मूलतः बिहार के आरा जिले से ताल्लुक रखते थे। उनके पिता ब्रिटिश मिलिट्री अस्पताल में ठेकेदार थे, लेकिन पारिवारिक और आर्थिक परिस्थितियों के चलते उन्हें रावलपिंडी छोड़कर मथुरा बसना पड़ा। शैलेंद्र बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि के थे और उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा मथुरा के ही एक सरकारी स्कूल से पूरी की। उनकी मेधा का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इंटरमीडिएट की परीक्षा में उन्होंने पूरे उत्तर प्रदेश में तीसरा स्थान प्राप्त किया था।

    पढ़ाई में अव्वल होने के बावजूद घर की आर्थिक तंगी ने उन्हें अपनी पसंद का रास्ता चुनने की इजाजत नहीं दी। परिवार की जिम्मेदारी कंधे पर आई तो उन्होंने रेलवे की परीक्षा पास की और मुंबई में बतौर मैकेनिक यानी अप्रेंटिस की नौकरी शुरू कर दी। आपको यह जानकर हैरानी होगी कि जिस शख्स ने शब्दों से संवेदनाओं की दुनिया बुनी, उसके पास मैकेनिकल इंजीनियरिंग में डिप्लोमा था और वेल्डिंग जैसे कठोर काम में उनकी विशेषज्ञता थी। मुंबई के रेलवे यार्ड में पसीने और लोहे की गूँज के बीच शैलेंद्र बेमन से अपना काम करते थे, क्योंकि उनका मन तो कविता और साहित्य की दुनिया में बसता था। इस नौकरी के दौरान ही उनके भीतर का कवि जाग उठा और वे खाली समय में कागज के टुकड़ों पर अपनी भावनाओं को उकेरने लगे।

    रेलवे की इस नौकरी के दौरान शैलेंद्र का जीवन काफी संघर्षपूर्ण रहा। आर्थिक तंगी का आलम यह था कि शादी होने के बावजूद वे अपनी पत्नी को मुंबई नहीं ला पा रहे थे। विरह का यही दर्द और अपनों से दूर रहने की तड़प उनके बाद के गीतों में साफ झलकती है। कहा जाता है कि जब वे अपनी कविताओं के जरिए भारतीय जन नाट्य संघ यानी इप्टा से जुड़े, तब उनकी मुलाकात राज कपूर से हुई। राज कपूर उनकी प्रतिभा से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने शैलेंद्र को फिल्मों के लिए लिखने का प्रस्ताव दिया, लेकिन शुरुआत में स्वाभिमानी शैलेंद्र ने इसे ठुकरा दिया था। हालांकि, बाद में अपनी घरेलू जरूरतों और आर्थिक तंगहाली के कारण उन्होंने फिल्मी दुनिया का रुख किया और फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।

    शैलेंद्र और राज कपूर की जोड़ी ने भारतीय सिनेमा को ‘आवारा हूं’, ‘मेरा जूता है जापानी’ और ‘प्यार हुआ इकरार हुआ’ जैसे न भूलने वाले गाने दिए। शैलेंद्र की सबसे बड़ी खूबी यह थी कि वे जटिल से जटिल दार्शनिक बातों को बहुत ही सरल शब्दों में पिरो देते थे। उन्होंने जो कुछ भी अपनी निजी जिंदगी में झेला, चाहे वह मैकेनिक की नौकरी की मजबूरी हो या गरीबी का दंश, उसे उन्होंने अपनी रचनाओं में ईमानदारी से उतारा। उनके गीतों में आम आदमी का दर्द और उसकी छोटी-छोटी खुशियां साफ दिखाई देती थीं। यही वजह है कि उनके लिखे गीत आज भी उतने ही प्रासंगिक और ताजे महसूस होते हैं जितने दशकों पहले थे।

    मात्र 43 साल की छोटी सी उम्र में शैलेंद्र इस दुनिया को अलविदा कह गए। यह एक अजीब संयोग था कि जिस 14 दिसंबर को उनके सबसे अजीज दोस्त राज कपूर का जन्मदिन होता था, उसी दिन हिंदी सिनेमा के इस चमकते सितारे का निधन हुआ। उनके जाने से जो खालीपन पैदा हुआ, उसे आज तक कोई भर नहीं पाया है। एक मैकेनिक के रूप में करियर शुरू करने वाले इस इंसान ने साबित कर दिया कि अगर दिल में जज्बा हो और कलम में सच्चाई, तो लोहे के कारखानों में काम करते हुए भी दुनिया को प्रेम और भाईचारे का संगीत सुनाया जा सकता है। आज भी जब कोई ‘सजन रे झूठ मत बोलो’ या ‘सब कुछ सीखा हमने’ सुनता है, तो उसे उस महान आत्मा की याद आती है जिसने अपनी पूरी जिंदगी शब्दों की साधना में लगा दी।