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  • 'जिंदगी कैसी है पहेली' पहले सिर्फ बैकग्राउंड ट्रैक था, राजेश खन्ना की जिद ने बना दिया फिल्म का सबसे यादगार दृश्य

    'जिंदगी कैसी है पहेली' पहले सिर्फ बैकग्राउंड ट्रैक था, राजेश खन्ना की जिद ने बना दिया फिल्म का सबसे यादगार दृश्य


    नई दिल्ली । हिंदी सिनेमा के इतिहास में कुछ गीत ऐसे हैं जो समय के साथ केवल लोकप्रिय नहीं, बल्कि अमर बन जाते हैं। वर्ष 1971 में रिलीज हुई फिल्म आनंद का गीत जिंदगी कैसी है पहेली भी उन्हीं कालजयी गीतों में शामिल है। यह गीत आज भी अपनी गहरी भावनाओं, अर्थपूर्ण बोल और मधुर धुन के लिए याद किया जाता है। हालांकि बहुत कम लोग जानते हैं कि शुरुआत में इस गीत को फिल्म का हिस्सा नहीं, बल्कि केवल बैकग्राउंड ट्रैक के रूप में इस्तेमाल करने की योजना थी।

    फिल्म के निर्माण के दौरान निर्देशक ऋषिकेश मुखर्जी ने इस गीत को शुरुआती शीर्षक या बैकग्राउंड संगीत के रूप में रखने का विचार बनाया था। गीतकार योगेश के लिखे शब्द और संगीत की गहराई के बावजूद इसे किसी दृश्य पर फिल्माने की योजना नहीं थी। उस दौर में बैकग्राउंड में इस्तेमाल होने वाले कई गीत दर्शकों तक व्यापक रूप से नहीं पहुंच पाते थे।

    बताया जाता है कि जब राजेश खन्ना ने जिंदगी कैसी है पहेली सुना तो वह इसके भाव और शब्दों से बेहद प्रभावित हुए। उन्हें लगा कि इतना प्रभावशाली गीत केवल बैकग्राउंड में सीमित रह जाएगा तो दर्शक उसकी पूरी खूबसूरती महसूस नहीं कर पाएंगे। उन्होंने निर्देशक ऋषिकेश मुखर्जी से आग्रह किया कि इस गीत के लिए फिल्म में एक उपयुक्त दृश्य तैयार किया जाए, ताकि इसे कहानी का अभिन्न हिस्सा बनाया जा सके।

    राजेश खन्ना के इस सुझाव को स्वीकार किया गया और गीत को फिल्म की कथा के साथ जोड़ा गया। पर्दे पर उनके सहज अभिनय और मन्ना डे की भावपूर्ण आवाज ने इस गीत को ऐसी ऊंचाई दी कि यह हिंदी सिनेमा के सबसे यादगार गीतों में गिना जाने लगा। जीवन, मृत्यु और मानवीय भावनाओं को सरल शब्दों में व्यक्त करने वाला यह गीत आज भी हर पीढ़ी के दर्शकों को समान रूप से प्रभावित करता है।

    आनंद की कहानी एक ऐसे व्यक्ति के इर्द-गिर्द घूमती है, जो गंभीर बीमारी से जूझने के बावजूद जीवन को पूरी सकारात्मकता और मुस्कान के साथ जीने में विश्वास रखता है। फिल्म में राजेश खन्ना ने आनंद का किरदार निभाया, जबकि अमिताभ बच्चन डॉक्टर भास्कर के रूप में दिखाई दिए। दोनों कलाकारों की अभिनय क्षमता और ऋषिकेश मुखर्जी के संवेदनशील निर्देशन ने इस फिल्म को भारतीय सिनेमा की सर्वश्रेष्ठ फिल्मों में स्थान दिलाया।

    फिल्म के संवाद भी उतने ही लोकप्रिय हुए जितने इसके गीत। “बाबूमोशाय, जिंदगी बड़ी होनी चाहिए, लंबी नहीं” जैसे संवाद आज भी लोगों की जुबान पर हैं। इसी तरह कहीं दूर जब दिन ढल जाए, मैंने तेरे लिए, ना जिया लगे ना और जिंदगी कैसी है पहेली जैसे गीत समय की कसौटी पर खरे उतरे और आज भी संगीत प्रेमियों की पसंद बने हुए हैं।

    जिंदगी कैसी है पहेली की लोकप्रियता केवल इसकी धुन या गायकी तक सीमित नहीं रही, बल्कि यह गीत जीवन के दर्शन को सरल और प्रभावशाली तरीके से प्रस्तुत करने के कारण भी विशेष पहचान रखता है। राजेश खन्ना की दूरदर्शिता और निर्देशक के फैसले ने एक ऐसे गीत को जन्म दिया, जो आज भी भारतीय सिनेमा की अमूल्य धरोहर माना जाता है और नई पीढ़ी के बीच भी उतनी ही श्रद्धा और भावनात्मक जुड़ाव के साथ सुना जाता है।

  • क्यों ऋषिकेश मुखर्जी की 'बावर्ची' के बाद जया बच्चन और राजेश खन्ना की जोड़ी हमेशा के लिए टूट गई

    क्यों ऋषिकेश मुखर्जी की 'बावर्ची' के बाद जया बच्चन और राजेश खन्ना की जोड़ी हमेशा के लिए टूट गई


    नई दिल्ली ।
    भारतीय सिनेमा के इतिहास में कलाकारों के आपसी संबंध और सेट पर हुए विवाद कई बार बड़े फैसलों की वजह बन जाते हैं। ऐसा ही एक ऐतिहासिक और दिलचस्प किस्सा हिंदी सिनेमा के पहले सुपरस्टार राजेश खन्ना और मशहूर अभिनेत्री जया बच्चन (तब जया भादुड़ी) से जुड़ा है। साल 1972 में आई ऋषिकेश मुखर्जी की क्लासिक फिल्म ‘बावर्ची’ में एक साथ काम करने के बाद इस जोड़ी ने हमेशा के लिए एक-दूसरे के साथ काम करने से तौबा कर ली थी। इसके पीछे की मुख्य वजह कोई व्यावसायिक मतभेद नहीं, बल्कि महानायक अमिताभ बच्चन से जुड़ा एक वाक्या था।

    उस दौर में राजेश खन्ना भारतीय फिल्म उद्योग के शीर्ष शिखर पर थे और उनकी लगातार हिट फिल्मों के कारण उनका एकछत्र राज था। दूसरी ओर, अमिताभ बच्चन उस समय फिल्म इंडस्ट्री में अपनी पहचान बनाने के लिए कड़ा संघर्ष कर रहे थे। ‘आनंद’ जैसी सफल फिल्म में साथ काम करने के बावजूद राजेश खन्ना तत्कालीन परिस्थितियों में अमिताभ बच्चन को केवल एक संघर्षरत अभिनेता के रूप में ही देखते थे और उनके प्रति उनका रवैया बहुत सकारात्मक नहीं रहता था।

    ‘बावर्ची’ की शूटिंग के दिनों में जया बच्चन और अमिताभ बच्चन एक-दूसरे को डेट कर रहे थे। अमिताभ बच्चन अक्सर जया बच्चन से मिलने के लिए फिल्म के सेट पर आया करते थे। दोनों को इस तरह साथ देखना उस समय के सुपरस्टार राजेश खन्ना को रास नहीं आता था। वह अक्सर सेट पर जया बच्चन को टोकते थे और उनसे पूछते थे कि वह इस संघर्षरत अभिनेता के साथ अपना समय क्यों बर्बाद कर रही हैं।

    राजेश खन्ना के जीवन पर आधारित संस्मरणों और वरिष्ठ पत्रकार अली पीटर जॉन के हवाले से सामने आए विवरणों के अनुसार, राजेश खन्ना अक्सर जया से कहते थे कि उन्हें अमिताभ बच्चन के साथ घूमना-फिरना बंद कर देना चाहिए। उनके शब्द इतने कड़े थे कि उन्होंने यहां तक कह दिया था कि इस आदमी के साथ रहने से उनका करियर भी आगे नहीं बढ़ पाएगा। राजेश खन्ना का यह रवैया जया बच्चन को लगातार परेशान कर रहा था।

    विवाद तब और बढ़ गया जब एक दिन अमिताभ बच्चन हमेशा की तरह जया बच्चन से मिलने सेट पर पहुंचे। उस दौरान राजेश खन्ना ने वहां मौजूद अमिताभ बच्चन को पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया और उनके प्रति बेहद उपेक्षापूर्ण व्यवहार किया। अपने होने वाले जीवनसाथी का ऐसा अपमान देखकर जया बच्चन का गुस्सा फूट पड़ा। उन्होंने उसी वक्त बेहद आक्रामक अंदाज में राजेश खन्ना को जवाब देते हुए कहा था कि एक दिन वक्त बदलेगा और तब देखा जाएगा कि कौन किस मुकाम पर खड़ा है।

    इस घटना से आहत और नाराज जया बच्चन ने तत्काल यह कड़ा फैसला लिया कि वह अपने आत्मसम्मान से समझौता नहीं करेंगी। उन्होंने फिल्म की शूटिंग पूरी होने के बाद साफ कर दिया था कि वह भविष्य में कभी भी राजेश खन्ना के साथ स्क्रीन साझा नहीं करेंगी। उन्होंने कड़े शब्दों में टिप्पणी की थी कि वह ऐसे व्यक्ति के साथ काम करना पसंद नहीं करेंगी जो खुद को बहुत ऊपर समझता हो।

    प्रशासनिक और व्यावसायिक दृष्टि से ‘बावर्ची’ साल 1972 की सबसे बड़ी हिट फिल्मों में से एक साबित हुई थी। ऋषिकेश मुखर्जी के निर्देशन में बनी इस फिल्म ने राजेश खन्ना को उनकी पारंपरिक रोमांटिक और गंभीर छवि से निकालकर एक बेहतरीन कॉमिक टाइमिंग वाले अभिनेता के रूप में स्थापित किया था। आज भी इस फिल्म की आईएमडीबी रेटिंग 8.1 है, लेकिन इस बड़ी सफलता के बावजूद जया बच्चन ने अपने फैसले को कायम रखा और कूटनीतिक रूप से इस सुपरस्टार के साथ दोबारा कभी कोई फिल्म साइन नहीं की।